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Cricket Addiction: क्रिकेट की अफीम
Cricket Addiction in India: ‘क्रिकेट की अफीम’ लेख में आईपीएल, क्रिकेट के बढ़ते जुनून, उपभोक्तावाद, सट्टेबाजी और समाज पर उसके प्रभाव का तीखा विश्लेषण हैं। जानिए कैसे खेल तमाशे में बदलता जा रहा है।
Cricket Addiction in India
Cricket Addiction in India: आईपीएल। देश का एक महान आयोजन। दो महीनों और 7 दर्जन से ज्यादा मैचों का आयोजन। घर, गली, दुकान, ट्रेन, बस, ऑफिस - हर जगह जो चर्चा का केंद्र। क्रिकेट ही क्रिकेट। एक ऐसा नेशनल ज़ुनून जिसके सामने ईरान-अमेरिका युद्ध, तेल-गैस संकट, नीट लीक, सीबीएसई कॉपी, सिटीयूटी परीक्षा, आईटी सेक्टर में जाती नौकरियां, कॉकरोच पार्टी, आसमान से बरसती आग - ये सब दोयम। ये सब तो होता ही रहता है। ये सब तो दर्द हैं। ऐसे दर्द जिसका इलाज ढूंढना भी बहुत बड़ा दर्द है। भुलाने के लिए इन सब पर भारी सदाबहार क्रिकेट। एक नशा। एक हाई फीलिंग। एक नायाब किक।
सही कहें तो क्रिकेट अफीम है। फैन्स के लिए, दर्शकों के लिए। इसके इतर जो भी है वो दर्द है। भयानक दर्द है और क्रोनिक है। उस दर्द की एक मुफीद दवा है अफीम रूपी क्रिकेट। हम 140 करोड़ के देश जहां क्रिकेट खेलने वाले मुट्ठी भर, पर क्रिकेटी पिनक में चूर अनगिनत। उनमें भी ज्यादातर युवा। हमारे कर्णधार, जिन्हें देश को आगे ले जाना है। जो हमारे भविष्य हैं।
और अफीम? नौकरी, बेरोजगारी, महंगाई, डिप्रेशन, प्रेम विफलता - सब भुला दे, सुला दे, दिमाग सुन्न कर दे।गाफिल बनाये रहे। अफीम के भी कई रूप। अभी क्रिकेट, तो कभी चुनाव, कभी धरम व जाति तो कभी कुछ और। खैर, अभी अभी आईपीएल 2026 सीज़न खत्म हुआ है। क्या गाफिल बनाये रखा। और इस सीजन के आंकड़े? वो तो अफीम का पूरा चिठ्ठा बताते हैं।
गणित बड़ी हैरतअंगेज चीज है
जरा सोचिए। आईपीएल 2026 को 220 अरब मिनट देखा गया।
220 अरब मिनट यानी 3,666,666,666.67 घंटे
यानी 15.28 करोड़ दिन!
यानी 4.18 लाख वर्ष।
सिर चकरा जाए।
यानी युग बीत गए आईपीएल के सिर्फ सीजन देखने में। और अफीम ऐसी कि पता ही नहीं चला। दुनिया कहाँ घूम गई, हम आईपीएल में ही गाफिल रहे। कितने लोग रहे? टीवी और डिजिटल प्लेटफार्मों पर 1.12 अरब। स्टेडियम में 65 लाख।
अभी तो और भी आंकड़े हैं, ज़रा उन पर भी ध्यान दीजिए
सिर्फ अरबों मिनट ही नहीं। अरबों रुपये का भी वारा न्यारा हो गया। ये अफीम यूं ही नहीं है। खेल तो अलग चीज है। यहां बॉटम लाइन और कुछ नहीं, सिर्फ और सिर्फ पैसा है।
जब विज्ञापनों से कमाई हो गई हो 7,500 करोड़ रुपये की। जब दसों टीमों को मिलाकर खिलाड़ियों पर कुल 1,510 करोड़ रुपए खर्च हुए हों। जब एक-एक खिलाड़ी को प्रति मैच साढ़े सात लाख रुपये की मैच फीस अलग से मिली हो तो फ़िज़ा में अफीम क्यों न घोली जाए।
अफीमी क्रिकेट का एक और पहलू भी है। अगर स्टेडियम, टीवी, डिजिटल, विज्ञापन वगैरह ओवरवर्ल्ड हैं तो सट्टेबाजी इसका अंडरवर्ल्ड है। एक एक मैच, एक एक गेंद पर लगते दांव। भले ही ऐप बन्द हो गए हों। लेकिन कारोबार कहां बन्द होता है जिसमें हजारों हजार करोड़ का वारा न्यारा हो जाता है, जो अफीम का एक और पहलू है।
क्रिकेट वाकई अफीम है। ऐसी लत लगी हुई है कि छूटना असम्भव लगता है। छुड़वाने की किसी को पड़ी भी क्या है? आखिर कोई छुड़वाए भी क्यों? तमाम दर्दों की इतनी आसान दवा भला मिलेगी भी कहां?
एक बात और। अफीम का सबसे बड़ा कमाल यही है कि वह आदमी को सहभागी नहीं, सिर्फ दर्शक बना देती है। हम खेलते कम हैं, देखते ज्यादा हैं। खेलें भी तो कहां? मैदान बचे नहीं हैं। जो हैं वहां खिलाने का बिजनेस है। खेलने का टाइम भी कहां बचा है? टाइम है तो चिंताएं इतनी हैं कि खेलने का दिल डूब जाता है।
सच्चाई ये है कि खेल अब शरीर का नहीं बल्कि उपभोग का हिस्सा है। कुछ लोग खेलकर करोड़पति बन रहे हैं, कुछ लोग खिलवा कर अरबपति बन रहे हैं और करोड़ों लोग खेल होते हुए देखकर अपना समय खर्च कर रहे हैं। यही अफीम का असली कमाल है।
और शायद यही अफीम की सबसे बड़ी कामयाबी है। हम खेल को नहीं, खेल के तमाशे को जी रहे हैं। करोड़ों आंखें स्क्रीन पर टिकी हैं, जबकि ज़मीन पर कुछ और ही खेल चल रहा है। सवाल क्रिकेट का नहीं है, सवाल उस समाज का है जो भागीदारी से ज्यादा दर्शक बने रहने में सहज महसूस करने लगा है। जब तक हम खेल को खेलने से ज्यादा देखने में और जीवन को बदलने से ज्यादा भूलने में आनंद खोजते रहेंगे, तब तक यह अफीम बिकती रहेगी, चढ़ती रहेगी, गाफिल करती रहेगी। और हमें यह एहसास भी नहीं होने देगी कि नशे में हैं हम, क्रिकेट नहीं।
( लेखक पत्रकार हैं।)


