दूरियों के दौर में उम्मीद की तलाश

Crorepati Neta vs Common People: करोड़पति जनप्रतिनिधियों, एआई से डरे आईटी पेशेवरों और संघर्ष करती आम जनता के बीच बढ़ती सामाजिक दूरी पर आधारित योगेश मिश्रा का संवेदनशील विश्लेषण। बदलते भारत में भरोसे, असमानता और उम्मीद की तलाश की कहानी।

Yogesh Mishra
Published on: 13 May 2026 5:07 PM IST
Crorepati Neta vs Common People AI Impact Job Crisis in India Democracy
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Crorepati Neta vs Common People AI Impact Job Crisis in India Democracy 

Crorepati Neta vs Common People: हमारे चारों ओर कितना कुछ होता रहता है, चलता रहता है। कभी चीजों के तार जुड़ते नजर आते हैं तो कभी सब अलग अलग लगता है। कभी विरोधाभास की इंतिहा दिखती है तो कभी सब छिन्न भिन्न। अब देखिए, एक विश्लेषण आया है कि जिन पांच जगह अभी अभी चुनाव बीते हैं वहां के विजयी जन प्रतिनिधियों की क्या हैसियत है। पता चला कि कहीं तो 86 फीसदी विधायक करोड़पति हैं। कहीं तो एक एक के पास सैकड़ों करोड़ की संपत्ति है।

दौलत होना अच्छी बात है। फकीरी में रखा ही क्या है। लेकिन विरोधाभास भी एक चीज होती है, उसको कैसे नज़रंदाज़ कर सकते हैं। एक संदर्भ के लिए जरा 2025 हुरून इंडिया वेल्थ रिपोर्ट पर नजर दौड़ाते हैं। रिपोर्ट कहती है कि तमिलनाडु की 8 करोड़ की जनसंख्या में कोई 72 हजार करोड़पति परिवार हैं। यानी 0.09 फीसदी! लेकिन इन्हीं 0.09 फीसदी में इस राज्य के 83 फीसदी जन प्रतिनिधि हैं। पड़ोसी केरल को देखें। इस बार के 69 फीसदी जान प्रतिनिधि करोड़पति जबकि राज्य में 0.06 फीसदी परिवार करोड़पति हैं। असम पर ही नजर डाल लेते हैं। यहां भी 83 फीसदी जन प्रतिनिधि करोड़पति जबकि राज्य में मात्र और मात्र 0.02 सदी परिवार करोड़पति।

विरोधाभास गज़ब का। रोजी रोटी के लिए हजार जतन कर रही रियाया के प्रतिनिधि करोड़पति। चुनाव दर चुनाव इनकी तादाद कम नहीं बल्कि बढ़ती ही जा रही। अब एक दूसरे परिदृश्य पर भी नज़र डालते हैं। अंदाजा लगाइए, देश के आईटी गढ़ बंगलुरू की सड़कों पर झंडा बैनर लिए युवाओं का जुलूस। तनख्वाह बचाओ - नौकरी बचाओ के नारे और बैनर लहरा रहे आईटी प्रोफेशनल्स। याद आया कि यही मंजर तो नोएडा में दिखा था, फर्क इतना था कि वहां मजदूर थे।

क्या समझें और क्या नतीजा निकालें? मल्टी करोड़पति जन प्रतिनिधि, एआई से डरे आईटी पेशेवर, मजूरी बढ़ाने की आवाज उठाते मजदूर, किसी तरह गुजर बसर कर रही जनता। ये सब देख कर लगता है हम एक अजीबोगरीब मोड़ पर खड़े हैं। ऐसी जगह जहां समाज अपने ही अंदर कई परतों में बंटा हुआ है।

करोड़पति जनप्रतिनिधियों और करोड़ों की आबादी के बीच का ये अनुपात कोई आंकड़ा भर नहीं है बल्कि एक आईना है। आईना उस दरार का जो हम और हमारे प्रतिनिधियों के बीच अब एक रसताली खाई बन गई है।विरोधाभास अब सिर्फ रुपये पैसे का नहीं रहा बल्कि ये भरोसे का संकट बनता जा रहा है। एक तरफ लोकतंत्र की आत्मा यानी जन प्रतिनिधित्व है, यानी ऐसा कोई जो हमारी बात कहे। लेकिन दिक्कत है कि हमारी बात वो जाने भी कैसे? जब हमारे प्रतिनिधि ही उस 0.02 फीसदी वर्ग के होंगे जो हम से कई पीढ़ियों की आर्थिक हैसियत से कई आसमान ऊंचे हैं तो कैसे वो हमारी खाली जेबों, खाली सिलेंडरों और महीन धागे पर टिकी नौकरियों के सच और दर्द समझ पाएंगे?

और फिर ये आईटी पेशेवरों का मंज़र। ये बेचैनी इसीलिए तकलीफ देती है क्योंकि ये सफलता के मॉडल की बेचैनी है। क्या किसी ने कभी सोचा था कि आईटी सेक्टर की चमचमाती नौकरी भी एक दिन मजबूर हो कर सड़क पर उतरेगी? एआई का डर सिर्फ रोज़गार छिनने का डर नहीं है, ये उस सपने के टूटने का डर है जो हर मिडिल क्लास घर में पला बढ़ा है। पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब की कहावत अब चकनाचूर होती दिख रही है, गुहार लगा रही कि मेरी तनख्वाह बचा लो।

सबके सामने एक ही सवाल है,कल का भरोसा किस पर करें? नौकरी, मज़दूरी, फसल, सब अनिश्चित। और इस अनिश्चितता के बीच जब करोड़ों की संपत्ति वाले प्रतिनिधि फैसले लेते हैं तो ज़मीन और आसमान का फ़ासला और लम्बा हो जाता है।

यही तो इस दौर की सबसे बड़ा ट्रेजेडी है। एक ऐसी व्यवस्था की ट्रेजेडी जिसमें करोड़ों खर्च करके करोड़पति, जन प्रतिनिधि बनता है और उससे उम्मीद की जाती है कि वो सड़क किनारे ठेला लगाने वाले, नोएडा के फैक्ट्री फ्लोर पर पसीना बहाने वाले और आईटी कंपनी में रात रात भर कोड लिखने वाले की सोचे।

शायद इसीलिए लगता है कि जो दिख रहा है, वो सिर्फ राजनीति का संकट नहीं बल्कि भरोसे का भी संकट है।

शायद इस दौर की सबसे गहरी विडंबना यही है कि देश आगे बढ़ता दिखाई देता है लेकिन समाज भीतर से लगातार बिखरता महसूस होता है। बड़े बड़े आंकड़ों, गगनचुम्बी अट्टालिकाओं और शिखर के करीब की अर्थव्यवस्था के बीच हम आम आदमी अपने ही भविष्य को लेकर पहले से कहीं ज्यादा असुरक्षित देखता है।

और दूसरी तरफ वही लोकतंत्र जिसे बराबरी का अलमबरदार कहा जाता है वो अब ऐसा मंच बनता दिख रहा है जहां जन और उसके प्रतिनिधियों के बीच सिर्फ दूरी नहीं है बल्कि दो अलग अलग दुनियाएं बस गई हैं। शायद इसलिए बेचैनी इतनी गहरी है क्योंकि डर सिर्फ मुफलिसी का नहीं बल्कि गैरज़रूरी हो जाने का है।

कभी कभी लगता है कि बहुत दूर हम निकल आये हैं और वापस जाने के रास्ते मिट चुके हैं और मंजिल का कोई पता नहीं है।

( लेखक पत्रकार हैं।)

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