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जब तक असमानता रहेगी हम लक्ष्य नहीं पा सकते
Economic Inequality in India: कांग्रेस नेता वसंत साठे ने 1978 के लोकसभा भाषण में आर्थिक असमानता, मिश्रित अर्थव्यवस्था और गरीबी पर चिंता जताते हुए कहा कि असमानता रहते विकास का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता।
Economic Inequality in India (Photo - Newstrack AI)
Economic Inequality in India: हमें यह देखना है कि योजना से हम अपने सभी उद्देश्यों की पूर्ति कर सके हैं या नहीं। कांग्रेस सरकार ने समाजवादी दृष्टिकोण अपनाया था। ऐसा कोई विकासशील देश नहीं था, जो इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता था। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं था। हमने मिली-जुली अर्थव्यवस्था इसलिए अपनाई थी, ताकि चंद लोगों के हाथ में आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण को रोका जा सके। मगर इसका यह परिणाम निकला है कि अमीर तो और ज्यादा अमीर हो गया है तथा गरीब पहले से भी अधिक गरीब हो गया है। गरीबी के स्तर से नीचे स्तर परं जीवन-यापन करने वाले लोगों की संख्या और ज्यादा हो गई है, इसका क्या कारण है? यह इसलिए हुआ है, क्योंकि हमारे देश में पूंजीवाद का ढांचा बिगड़ता जा रहा है। उत्पादन अधिक्य कुछ लोगों के हाथ में ही है। हमारी सारी योजना. का यही दुर्भाग्य रहा है। हमने जो प्रयास किए हैं, उनसे तथा जो पूंजी निवेश किया है, उससे कुछ ही गृहों को सहायता मिली है। अतः मेरे कहने का तात्पर्य है कि जब तक यह असमानता बाकी रहेगी, तब तक हम चाहे कितना ही पूंजी निवेश क्यों न कर लें, योजनाओं में कितना अधिक धन क्यों न लगा दें, हम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकेंगे।'
यह भी बताया गया था कि सरकार अर्थव्यवस्था को कृषि अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर कर रही है। यह भी बताया गया था कि सरकार कृषि क्षेत्र में अधिक पूंजी निवेश करेगी, जिससे खेतिहर गरीब लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठेगा। मैं जानना चाहता हूं कि यह कैसे संभव है, क्योंकि पहले जो कुछ भी पूंजी निवेश किया गया है, वह कुछ ही ऐसे बड़े लोगों तक सीमित रहा है, जिनके हाथ में व्यापार और पूंजी है। ये सब चीजें इसी प्रणाली में अंतर्निहित हैं। यह किसी व्यक्ति विशेष का कसूर नहीं है। यह तो इस प्रणाली का कसूर है। अतः मेरी प्रार्थना है कि जब तक हम इस प्रणाली को नहीं बदलेंगे, तब तक हम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकेंगे।
योजना आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन व्यक्तियों की प्रति मास आय 200 रुपये और 1,000 रुपये के बीच है, उनकी संख्या कुल संख्या की 1.71 फीसदी है। 1,000 रुपये मासिक से अधिक आय वाले लोग 0.4 फीसदी हैं। आपको पता ही है कि प्रति मास 200 रुपये से कम आय वाला व्यक्ति अपने जीवन की आवश्यकताओं को कभी पूरा नहीं कर सकता। अतः आप देख ही रहे हैं कि हमारे देश में कितनी असमानता है। हमारे देश ने संसाधनों या उत्पादन गतिविधियों या वितरण प्रणाली पर कोई नियंत्रण नहीं है।
अतः हमारी ऐसी योजना से क्या लाभ, यदि हम उत्पादन और वितरण, दोनों मूलभूत आर्थिक प्रणालियों को नियमित नहीं कर सकते। अतः मेरा आप से निवेदन है कि आप इस पहलू पर गंभीरतापूर्वक विचार करें। सरकार को मूलभूत ढांचे अर्थात मिश्रित अर्थव्यवस्था के प्रश्न पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। इससे ऐसी बुराइयां पैदा हो गई हैं, जिन पर काबू नहीं पाया जा सकता। इससे काला धन और समांतर अर्थव्यवस्था पनप रही है। योजना की सारी संकल्पना ऐसी होनी चाहिए, जिससे उत्पादन और वितरण प्रणाली को नियमित किया जा सके। ऐसा लोकतंत्रीय प्रणाली के अंतर्गत किया जा सकता है।
( साभार ‘ अमर उजाला’। कांग्रेस नेता व सांसद के पांच मई 1978 को लोकसभा में दिए अंश।)
-वसंत साठे


