House Sparrow Decline: गौरैया कहाँ चली गईं? शहरों से गायब होती चिड़िया की पूरी कहानी

House Sparrow Decline Explained: गौरैया जो कभी हर घर और आंगन में दिखाई देती थी, आखिर कम क्यों हो गई?

Prof. Kamlesh Mishra
Published on: 9 Sept 2026 4:57 PM IST
House Sparrow Decline: गौरैया कहाँ चली गईं? शहरों से गायब होती चिड़िया की पूरी कहानी
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House Sparrow Decline Explained: न्यूयॉर्क की एक साधारण-सी सड़क पर वह गौरैया बैठी थी। गौरैया भी बिल्कुल साधारण थी—कम-से-कम देखने में। न्यूयॉर्क आने के बाद मैंने ऐसी सैकड़ों गौरैयाएँ देखी थीं। फुटपाथों पर बेखौफ फुदकती हुईं, पार्कों में छोटे-छोटे झुंडों में इकट्ठी होती हुईं, सड़क की दरारों के बीच दाना तलाशती हुईं। और पेड़ों से पेड़ों तक उड़ती हुईं—मानो पूरा शहर उन्हीं का हो।

लेकिन उस दिन जब मैंने इस गौरैया को देखा, तो मैं अचानक रुक गया।

कुछ क्षणों के लिए न्यूयॉर्क का शोर कहीं खो गया।

मैं अपने गाँव में लौट गया था।

एक समय था जब गाँव में नजर जहाँ भी जाती, गौरैया दिखाई देती थी।

वे हमारे साथ रहती थीं।

हमारे घरों की छप्पर वाली छतों के नीचे वे अपने घोंसले बनाती थीं। कभी छत की किसी छोटी-सी दरार में, कभी खपरैल के कोने में, तो कभी भूसे और घास के बड़े-बड़े ढेरों के बीच वे अपना छोटा-सा संसार बसा लेती थीं। बाँस के झुरमुटों में भी उनके घोंसले झूलते दिखाई देते थे।

हमारे आँगन में बिखरे दानों को चुगते हुए वे इधर-उधर फुदकती रहतीं। कभी आपस में लड़तीं, कभी चहचहातीं और कभी अचानक पूरा झुंड एक साथ उड़ जाता।

उनकी सुबह हमारी सुबह से पहले होती थी।

हम उनकी चहचहाहट सुनकर जागते थे।

शायद इसलिए हमने कभी उनके होने पर ध्यान ही नहीं दिया।

वे हमारे लिए उतनी ही स्वाभाविक थीं जितनी सुबह की धूप, गीली मिट्टी की खुशबू, पशुओं का बाड़े में होना या रसोई से उठता हुआ धुआँ।

फिर हम गाँव छोड़कर शहरों की ओर निकल पड़े।

और गाँव भी धीरे-धीरे बदलने लगा।

छप्पर वाले घर गायब होने लगे और उनकी जगह पक्के मकान खड़े हो गए। भूसे के ढेर छोटे होते गए। बाँस के झुरमुटों की जगह दीवारें और सड़कें बनने लगीं। आँगन में बिखरा अनाज कम हो गया। पुराने घर, जिनकी छोटी-छोटी दरारों और कोनों में गौरैयाएँ अपना घर बना लिया करती थीं, धीरे-धीरे मिटने लगे।

और उनके साथ गौरैयाएँ भी गायब होने लगीं।

शुरुआत में मुझे इसका एहसास नहीं हुआ।

फिर एक दिन देखा—गौरैयाएँ पहले से कम हैं।

कुछ समय बाद वे केवल कभी-कभार दिखाई देती थीं।

और फिर एक दिन अचानक मुझे एहसास हुआ कि मुझे याद ही नहीं कि आखिरी बार मैंने अपने गाँव में गौरैया की चहचहाहट कब सुनी थी।

मैं सोचता रहा—

वे कहाँ चली गईं?

क्या किसी दूसरे गाँव में चली गईं?

क्या उन्हें अपना घर बनाने के लिए कोई और जगह मिल गई?

या फिर हमने ऐसी दुनिया बना दी, जिसमें उनके लिए कोई जगह ही नहीं बची?

साल बीतते गए।

लेकिन यह सवाल मेरे मन के किसी कोने में बना रहा।

फिर मैं न्यूयॉर्क आया।

और यहाँ वे थीं।

गौरैयाएँ।

हर जगह।

फुटपाथों पर। पार्कों में। कैफे के आसपास। पुलों के नीचे। इमारतों की दरारों और शहर के उन छोटे-छोटे कोनों में, जहाँ कंक्रीट, शीशे और लोहे से बने इस महानगर में भी उन्होंने अपना संसार खोज लिया था।

पहली बार जब मैंने यहाँ गौरैयाओं का एक बड़ा झुंड देखा, तो मुझे हँसी आ गई।

मैंने मन ही मन कहा—

“तो तुम यहाँ चली आईं!”

बेशक, मैं जानता था कि यह सच नहीं था।

वे मेरे गाँव से उड़कर मेरे पीछे-पीछे न्यूयॉर्क नहीं आई थीं।

वे मेरे गाँव को नहीं जानती थीं।

उन्हें न वह छप्पर याद था, न भूसे के ढेर, न बाँस के पेड़ और न वह छोटा-सा बच्चा, जो घंटों बैठकर उन्हें अपना घोंसला बनाते देखा करता था।

फिर भी, न्यूयॉर्क की उस सड़क पर खड़े होकर मुझे लगा कि वे अपने साथ मेरे गाँव का एक टुकड़ा लेकर आई हैं।

शायद गौरैयाएँ हमेशा से हमसे बेहतर यात्री रही हैं।

हम गाँव छोड़ते समय अपनी यादें सूटकेस में भरकर ले आए।

वे अपनी यादें पंखों पर लेकर उड़ गईं।

अब जब भी मुझे न्यूयॉर्क में कोई गौरैया दिखाई देती है, मैं कुछ पल के लिए रुक जाता हूँ।

उसे फुटपाथ पर दाना चुगते देखता हूँ। दूसरी गौरैयाओं से उसकी छोटी-सी लड़ाई देखता हूँ। उसकी वही जानी-पहचानी, बेचैन-सी चहचहाहट सुनता हूँ।

और फिर मेरे मन में एक तस्वीर उभरती है—

बहुत दूर, उस गाँव में जहाँ मैं बड़ा हुआ था, कोई पुरानी छप्पर वाली छत अब भी शायद उनका इंतज़ार कर रही है।

भूसे का कोई ढेर।

बाँस का कोई पेड़।

एक शांत-सा आँगन।

बस, गौरैयाएँ वापस नहीं आईं।

शायद वे गायब नहीं हुईं।

शायद वे बस ऐसी जगह की तलाश में निकल गईं, जहाँ आज भी उनके लिए थोड़ी-सी जगह बची हो।

और अजीब बात है—

मैंने उन्हें यहाँ पा लिया।

न्यूयॉर्क में।

शायद यही गौरैया की कहानी है।

और शायद, किसी न किसी रूप में, यह हमारी कहानी भी है।

(लेखक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री व विचारक हैं।)

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Prof. Kamlesh Mishra

Former Vice Chancellor, Academician and Economic Advisorprofessorkamleshmishra.newstrack.com@gmail.com
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