"नई पीढ़ी के सवाल और पुरानी सोच की दीवारें"

Gen Z — सवालों से डरता समाज सही मायने देखा जाए तो, Gen Z के बच्चों में ऊर्जा है, आत्मविश्वास है और अपनी बात कहने का साहस है।

Nidhi Mishra
Published on: 19 Jun 2026 8:25 PM IST
नई पीढ़ी के सवाल और पुरानी सोच की दीवारें
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"स्कूलों में, घरों में, और अपने आसपास के वातावरण में अक्सर ऐसी परिस्थितियाँ देखने को मिलती हैं जो मन में कई प्रश्न खड़े कर देती हैं। कई बार बच्चों के सवालों को जिज्ञासा नहीं, बल्कि अवज्ञा समझ लिया जाता है। उन्हें सुनने से पहले ही उनके विचारों पर निर्णय सुना दिया जाता है। ऐसे अनुभवों ने मुझे बार-बार सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर सही क्या है और गलत क्या? शायद इसका कोई एक उत्तर किसी के पास नहीं है।

हम अक्सर बिना सोचे-समझे उन मान्यताओं और परंपराओं का अनुसरण करते रहते हैं जिन्हें समाज ने वर्षों से स्वीकार कर रखा है। एक व्यक्ति दूसरे को देखकर वही करता है, और धीरे-धीरे प्रश्न पूछने की जगह अनुसरण करने की आदत बन जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति अलग है। उसकी सोच, उसकी भावनाएँ, उसकी क्षमताएँ, उसके संघर्ष और उसके सपने अलग हैं। फिर हम सभी से एक जैसा व्यवहार, एक जैसी प्रतिक्रिया और एक जैसे निर्णयों की अपेक्षा क्यों करते हैं?

इन्हीं सवालों ने मुझे नई पीढ़ी और समाज के बीच बढ़ती इस दूरी पर सोचने के लिए प्रेरित किया।"

Gen Z — सवालों से डरता समाज सही मायने देखा जाए तो, Gen Z के बच्चों में ऊर्जा है, आत्मविश्वास है और अपनी बात कहने का साहस है। लेकिन समाज इसे साहस नहीं, असभ्यता कह देता है। क्योंकि यह समाज आज भी चुप रहने वालों को अच्छा बच्चा या इंसान मानता है।


हमारा समय ऐसा था जहाँ माँ-बाप की बात पर सवाल करना बदतमीज़ी था, शिक्षक के सामने तर्क रखना गुस्ताख़ी, और अपनी भावनाएँ ज़ाहिर करना कमज़ोरी। पर आज की पीढ़ी अलग है। यह पीढ़ी आदेश नहीं, कारण पूछती है। यह सहन नहीं, सम्मान चाहती है।

समस्या Gen Z में नहीं, समस्या उस सोच में है जो आज भी बच्चों को “कंट्रोल” करना चाहती है, समझना नहीं। आज भी घरों में कहा जाता है। “हमारे समय में ऐसा नहीं होता था।” लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि हमारे समय में डिप्रेशन क्यों छुपाया जाता था?

डर को संस्कार क्यों कहा जाता था? और बच्चों की चुप्पी को सफलता? स्कूलों में नंबर ज़रूरी हैं, पर मन की हालत नहीं। बच्चा शांत है तो “अच्छा” कहलाता है, लेकिन सवाल करे तो “समस्या” बन जाता है।


Gen Z को ज़रूरत है.. डाँट की नहीं, संवाद की। तुलना की नहीं, समझ की। और सबसे ज़्यादा उस अपनेपन भरे माहौल की जहाँ वे बिना डर कह सकें, “मुझे समझाइए, दबाइए मत।” अगर आज हमने इस पीढ़ी को सिर्फ़ अनुशासन के नाम पर खामोश कर दिया, तो कल समाज को एक और चुप, टूटा हुआ इंसान मिलेगा। अब समय है बदलने का, क्योंकि सवाल करने वाली पीढ़ी समाज को तोड़ती नहीं,

उसे बेहतर बनाती है। क्या हम अपने बच्चों को सफल बनाना चाहते हैं, या सिर्फ़ आज्ञाकारी? जब हम कहते हैं "हमारे समय में ऐसा नहीं होता था", तो क्या हम यह भी स्वीकार करते हैं कि हमारे समय में बहुत कुछ ऐसा था जिसे बदलना चाहिए था?

क्या सम्मान केवल बड़ों के लिए है, या बच्चों का भी अधिकार है? क्या हर पीढ़ी को अपनी बात कहने और अपनी गलतियों से सीखने का अवसर नहीं मिलना चाहिए? क्या हम बच्चों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, या केवल उन्हें अपने अनुसार ढालना चाहते हैं? अगर एक बच्चा अपने मन की बात घर में नहीं कह पाएगा, तो वह आखिर कहाँ जाएगा?

(लेखिका एवं शिक्षिका)

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