बहुसंख्य जेन-जी का ज़िक्र-फिक्र कहीं नहीं !

जेन-जी की बड़ी आबादी श्रम से जुड़ी है, लेकिन शिक्षा और रोजगार के साथ युवा मजदूरों की समस्याओं पर भी गंभीर चर्चा और समाधान जरूरी है।

Naved Shikoh
Published on: 11 Aug 2026 8:05 PM IST
remembrance of the majority Gen-ji is nowhere to be found
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बहुसंख्य जेन-जी का ज़िक्र-फिक्र कहीं नहीं ! (Photo- Social Media)

Gen-Z Workers: छात्र-छात्राओं का जिक्र और फिक्र सबको है लेकिन जेन-जी आयु के विशाल श्रमिक वर्ग की बात कौन करेगा ! इनकी चिंता और समस्याओं का समाधान निकालना भी लाजमी है। लेकिन इस विशाल वर्ग की युवा शक्ति का जिक्र कहीं नहीं होता। न सरकारें इनकी फिक्र करती हैं,न विपक्ष इनकी समस्याओं के मुद्दे उठाता है। समाज और मीडिया भी देश निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जैन-जी श्रमिक वर्ग के दर्द को महसूस नहीं करता। भारत माता की एक संतान छात्र जेन-जी है तो दूसरी श्रमिक जेन-जी। संतानों में भेदभाव नहीं होता तो इनमें भेदभाव क्यों ?

मजदूर जेन-जी

जेन-जी छात्रों की हुंकार ने सरकारों को हिला दिया पर यदि मजदूर जेन-जी अपना हक़ मांगने सड़क पर निकल आया तो इन्हें इनका हक दिए बिना इनको संभालना मुश्किल होगा।

जन-जी आयु वर्ग की आबादी करीब 37 करोड़ है जबकि इसमें श्रमिक संख्या लगभग 26 करोड़ है। कुल 37 करोड़ में 26 करोड़ श्रमिक हैं और संभावित 11 करोड़ छात्र-छात्राएं, पठन-पाठन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले व बेरोजगार युवा शामिल हैं।

यानी 11 करोड़ युवाओं की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनियमितताओं और बेरोजगारी की आवाज बुलंद होती दिख रही है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों की बदहाली, प्राइवेट स्कूलों में लूट, यूजीसी, उच्च शिक्षा में धर्म-जाति का जहर.. जैसी मुद्दों के आंदोलन आने वाले समय में केंद्र की एनडीए सरकार और राज्यों की भाजपा व गैर भाजपाई राज्यों की सरकारों के लिए मुसीबत बन सकते हैं। इसकी शुरुआत केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और पेपर लीक मामले के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरु हुई। कॉकरोच जनता पार्टी के इस प्रोटेस्ट में देश भर के युवाओं का हुजूम इकट्ठा हुआ। युवा आंदोलन बढ़ता और उग्रता की तरह बढ़ता देख केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पूरी की गई। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर का आंदोलन थमा ही था कि झारखंड में पेपर लीक के खिलाफ राची में युवाओं का आंदोलन शुरू हो गया। इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकारी स्कूलों की बदहाली के विरुद्ध मुहिम छेड़ने का एलान कर दिया।

इन दिनों शिक्षित जेन-जी की धूम मची है। इनकी शिक्षा-रोजगार की समस्याओं की सबको फिक्र है। ये आंदोलित हुए तो सरकारें बैकफुट पर आ गई। सत्ता-विपक्ष और सारा समाज इनकी जायज मांगों को सही ठहरा रहा है। इनकी ताकत का लोहा लिया जा रहा है। ये सच भी है कि पेपर लीक का सिलसिला जारी रहा, शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं हुई, सरकारें रोजगार का पर्याप्त इंतेजाम नहीं कर सकीं तो जेन-जी का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। इस अंधेरे में देश और समाज पिछड़ता जाएगा।

इसी लिए आक्रोशित और आंदोलित छात्र-छात्राओं की शैक्षिक और रोजगार की समस्याओं के लिए संपूर्ण समाज युवाओं के साथ खड़ा हैं।

जैन-जी का मतलब है युवा, नवयुवा, किशोर। इनका तसव्वुर करते ही छात्र-छात्राओं की तस्वीर निगाहों के सामने आ जाती है।

बस यहीं हमसे चूक हो रही है।

भारत के जैन-जी सिर्फ छात्र-छात्राएं ही नहीं। जेन-जी मजदूर भी हैं, असंगठित मजदूरी के पेशे से जुड़े करोड़ों भारतीय मजदूरों मे सत्तर फीसद से ज्यादा जैन-जी हैं। यानी 14 से 29 वर्ष की आयु तक के लोग श्रम से जुड़े कामों से जुड़े हैं। दस्तकार, किसान, मकैनिक,हस्त शिल्पी, ठेले वाले, रिक्शे वाले, फुटपाथ के होटलों,ढाबों में बर्तन धोने वाले भी जैन-जी हैं। इनकी समस्याएं शिक्षित जैन-जी से अधिक हैं।

इसमें बड़ी संख्या बाल मजदूरों की हैं। जैन-जी को लेकर सरकारों की सबसे बड़ी उदासीनता ये भी है कि 18 वर्ष से कम के किशोर गैर कानूनी तौर से मजदूरी करने को मजबूर क्यों हैं ?

इनकी मजबूरी के समाधान पर कोई काम नहीं कर रहा। निर्माण हो, फैक्ट्रियां, होटल,ढाबे, दुकानें,रिक्शा,ठेला..हर जगह आपको बाल श्रमिक दिख जाएगा।

बच्चों के बचपन और शिक्षा के अधिकारों को वंचित रखने वाले हमारे सिस्टम को बदलने के लिए न कोई आंदोलित है, न सरकारें, न समाज और न कानून सख्त दिखाई देता है। गरीब बच्चों को शिक्षा देने और कौशल विकास जैसी तमाम सरकारी योजनाओं का कुशलता से संचालन हो रहा होता तो देश में करोड़ों बाल मजदूरों की संख्या नहीं बढ़ती।

जैन-जी की बढ़ी संख्या खेतों में खेती करती दिखेगी, भूमिहीन किसान और खेतों में मजदूरी करके रोजी रोटी चलाने वाले किसानों में भी 14 से 29 की उम्र के युवा किसानों की बड़ी संख्या है। फैक्ट्रियों में काम करने वालों, ईंटे , गिट्टी, गारा, लोहा ढोने वालों से लेकर ठेला खींचने, रिक्शा खींचने, दस्तकारों, कारीगरों में भी यही आयु वर्ग सबसे अधिक है। खेल की दुनिया में तो यही आयु वर्ग सबसे महत्वपूर्व है।

यानी मजदूरी से लेकर श्रम से जुड़े तमाम काम हों, बाल मजदूरी हो, खेती हो, खेल हों, दस्तकारी, कारीगरी,कुली, कला का क्षेत्र हो मकैनिक हो...इन क्षेत्रों में भी जेन-जी की संख्या सार्वाधिक है। ये सब जेन-जी यदि अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर सामने आ जाएं तब तो जेन-जी आंदोलन शायद दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन साबित हो।

अभी हाल ही में जंतर-मंतर पर छात्र-छात्राओं और शिक्षित युवाओं के आंदोलन में दर्द बयां करता एक अशिक्षित युवा खूब वायरल हुआ। मोहम्मद इरफान नाम का ये युवा न छात्र था न शिक्षित और न ही शिक्षा नीति में इसमें कोई समझ थी, फिर भी शिक्षित युवाओं के बीच ये खूब दहाड़ा। गरीब, अशिक्षित, पढ़ाई से वंचित, मजदूरों, मेहनतकश जेन-जी के दर्द को बयां करने वाला मोहम्मद इरफान बर्फ बेचता है, मजदूरी करता है और सिस्टम के खिलाफ बोलने का मौका तलाशने ये दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहुंचा था। उसने बताया कि शिक्षित नौजवानों के इस विरोध प्रदर्शन के अलावा भी तमाम विरोध प्रदर्शनों में वो जाता रहा है।

हालांकि आंदोलनों के मुद्दों से अलग उसकी बात बे-मौज़ू (विषय से अलग) होती है, पर वो अकेला बोलता है। युवा मजदूरों की बात करता है। असंगठित श्रमिकों के शोषण की बात करता है। गटर साफ करते हुए जहरीली गैस से मर जाने वाले युवा श्रमिकों का दर्द बयां करता है।

कुल मिलाकर शिक्षित युवाओं के आंदोलनों में कोई अनपढ़ इरफान अपवाद नहीं बल्कि ऐसा अहसास है जो ये सोचने पर मजबूर करता है कि शिक्षा के क्षेत्र मे ही नहीं जे-जी हर क्षेत्र में ठगे जा रहे हैं। देश के भविष्य को संवारना है तो युवा शक्ति को अनदेखा मत करें।

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