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गिरिजा कुमार माथुर: नई कविता के प्रतिनिधि कवि
Girija Kumar Mathur: गिरिजा कुमार माथुर के कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें प्रत्येक ने उनकी काव्य-यात्रा के विभिन्न पड़ावों को दर्शाया। आइये विस्तार से उनके बारे में जानते हैं।
Girija Kumar Mathur (Image Credit-Social Media)
Girija Kumar Mathur: ‘हम होंगे कामयाब’ जैसे अति प्रचलित गीत के रचयिता गिरिजा कुमार माथुर (1918-1994) आधुनिक हिंदी कविता के उन प्रमुख स्तंभों में से एक हैं, जिन्होंने न केवल अपनी कविताओं से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि 'तार सप्तक' जैसे महत्वपूर्ण संकलन का हिस्सा बनकर नई कविता के आंदोलन को भी गति दी। उनका साहित्यिक सफर प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति, सामाजिक चेतना और समय के द्वंद्वों को अपनी कविताओं में समाहित करता है। उनकी रचनाएं भावुकता और बौद्धिकता का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत करती हैं, जिससे वे हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।
जीवन और साहित्यिक यात्रा
गिरिजा कुमार माथुर का जन्म 22 अगस्त, 1918 को मध्य प्रदेश के अशोकनगर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई और बाद में उन्होंने झांसी से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कानून की पढ़ाई करने के बाद भी उनका मन साहित्य में ही रमा रहा। उन्होंने आकाशवाणी में भी काम किया और बाद में दूरदर्शन के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए।
उनकी साहित्यिक यात्रा का आरंभ 'तार सप्तक' (1943) के प्रकाशन के साथ हुआ, जिसमें वे अज्ञेय, मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल जैसे कवियों के साथ शामिल थे। इस संकलन ने हिंदी कविता को एक नई दिशा दी और प्रयोगवाद का सूत्रपात किया। माथुर जी की कविताएँ इस नए आंदोलन की ध्वजवाहक बनीं।
उनकी कविताओं में एक विशेष प्रकार की गेयता (musicality) और बिंब-विधान (imagery) देखने को मिलता है। वे शब्दों के माध्यम से ऐसे चित्र बनाते हैं जो सीधे पाठक के मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। उनकी शुरुआती कविताओं में प्रेम और प्रकृति का सहज और सरल चित्रण मिलता है, जबकि बाद की कविताओं में वे सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की ओर भी मुड़ते हैं।
प्रमुख रचनाएँ और उनकी विशेषताएं
गिरिजा कुमार माथुर के कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें प्रत्येक ने उनकी काव्य-यात्रा के विभिन्न पड़ावों को दर्शाया।
1. 'मंजीर' (1941):
यह उनका पहला कविता संग्रह है, जिसमें प्रेम और सौंदर्य के कोमल भावों का चित्रण है। इस संग्रह की कविताएँ अपनी सरलता, सहजता और भावुकता के लिए जानी जाती हैं।
2. 'नाश और निर्माण' (1946):
इस संग्रह में माथुर जी ने प्रेम और जीवन के द्वंद्वों को व्यक्त किया है। यहाँ वे जीवन की अनिश्चितता और उसके पुनर्निर्माण के आशावादी दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं।
3. 'धूप के धान' (1955):
यह संग्रह माथुर जी की परिपक्वता को दर्शाता है। इसमें वे प्रकृति और मानवीय भावनाओं को एक साथ पिरोते हैं। इस संग्रह की सबसे प्रसिद्ध कविता ‘जो फूल खिलता है’ है, जो जीवन के क्षणभंगुरता और सौंदर्य को दर्शाती है।
4. 'शिलापंख चमकीले' (1961):
इस संग्रह में उनकी कविताओं में एक नई ताजगी और बिंबात्मकता दिखाई देती है। यहाँ वे आधुनिक जीवन की विसंगतियों और शहरीकरण के प्रभावों को भी दर्शाते हैं।
5. 'मैं वक्त के सामने हूँ' (1991):
यह कविता संग्रह माथुर जी को उनकी साहित्यिक ऊंचाइयों पर ले गया। इसके लिए उन्हें 1991 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस संग्रह में जीवन की जटिलताओं, समय के प्रवाह और आत्म-चिंतन का गहरा चित्रण है।
6. 'छाया मत छूना'
यह कविता संग्रह सबसे अधिक लोकप्रिय और चर्चित रहा। इसकी शीर्षक कविता ‘छाया मत छूना’ आज भी हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और पाठकों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। यह कविता अतीत की मधुर स्मृतियों को भुलाकर वर्तमान में जीने का संदेश देती है।
काव्यगत विशेषताएँ
* बिंब-विधान (Imagery): माथुर जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका बिंब-विधान है। वे अपनी कविताओं में ऐसे दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जो सीधे पाठक की कल्पना में उतर जाते हैं। उदाहरण के लिए, 'धूप के धान' में वे सूर्य की किरणों को धान के समान दर्शाते हैं।
* संगीत और लय (Music and Rhythm): उनकी कविताओं में एक आंतरिक लय और संगीत है। शब्दों का चयन और वाक्य-विन्यास ऐसा है कि कविता को पढ़ते ही एक मधुरता का एहसास होता है।
* प्रतीक और उपमाएँ (Symbols and Similes): माथुर जी ने अपनी कविताओं में कई प्रतीकों और उपमाओं का प्रयोग किया है। उन्होंने प्रकृति के विभिन्न उपादानों को मानवीय भावनाओं से जोड़ा है।
* द्वंद्व और यथार्थ (Duality and Reality): उनकी कविताओं में व्यक्ति के आंतरिक द्वंद्व, जीवन की आशा-निराशा और सामाजिक यथार्थ का सुंदर चित्रण मिलता है।
उनकी कविताओं से कुछ उदाहरण
- "छाया मत छूना" कविता की कुछ पंक्तियाँ:
- दुःख है न चाँद खिला, रात आने पर क्या हुआ?
- जो मिला भूल उसे कर, तू भविष्य का वरण कर।
- इन पंक्तियों में माथुर जी अतीत के दुखों को भूलकर वर्तमान को स्वीकार करने का संदेश देते हैं।
- एक और प्रसिद्ध कविता "मैं वक्त के सामने हूँ" की पंक्तियाँ:
- मैं वक्त के सामने हूँ
- और वक्त मेरे सामने
- न मैं उसे पार कर सकता हूँ
- न वह मुझे...
यह पंक्तियाँ समय के साथ मनुष्य के संघर्ष और जीवन की क्षणभंगुरता को दर्शाती हैं।
गिरिजा कुमार माथुर ने अपनी कविताओं के माध्यम से हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी। वे न केवल एक उत्कृष्ट कवि थे, बल्कि एक चिंतक भी थे । जिन्होंने अपनी रचनाओं में जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने का प्रयास किया। उनका योगदान केवल उनकी कविताओं तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने हिंदी साहित्य के आलोचक और पत्रकार के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कविताएँ आज भी प्रासंगिक हैं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी।


