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Girls Safety India: मंदिर से सड़क तक बच्चियों की सुरक्षा पर सवाल, आखिर डर का साया कहां तक है फैला?
Girls Safety in India: पुणे के मंदिर में बच्ची के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटना ने बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
Girls Safety in India
Girls Safety in India: पुणे के निगड़ी इलाके के एक शिव मंदिर की सीसीटीवी फुटेज अक्टूबर के मध्य में वायरल हुई, एक मंदिर में भगवान के दर्शन करने अकेले आई हुई थी एक छोटी-सी बच्ची। अचानक एक आदमी, जो कि किसी विभाग का कर्मचारी था, मंदिर में घुसकर बच्ची के साथ गलत हरकत करता है। बच्ची अपने हाथ-पैर मारकर, चीख कर उसकी हरकत का विरोध करती है। वह व्यक्ति का वहां से चला जाता और फिर बच्ची का भगवान के सामने हाथ जोड़ती है, अपने कपड़े ठीक करती है और मंदिर से बाहर निकल जाती है। सीसीटीवी कैमरे में दर्ज इस तरह के वीभत्स दृश्य को देखकर मन में कई सवाल उठते हैं, आक्रोश होता है। सबसे पहला सवाल उस आदमी की मानसिकता को लेकर है, कितनी घिनौनी मानसिकता वाला होगा वह व्यक्ति। लेकिन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण सवाल जो मन में आता है वह है उस बच्ची के मन को लेकर। वह बच्ची जिसकी उम्र अभी दुनिया को समझने की भी नहीं हुई है, वह बच्ची जो कि शिव मंदिर में भगवान के सिर्फ हाथ जोड़ने आई थी, उसके अभिभावकों ने उसे यह सोचकर मंदिर नहीं भेजा होगा कि उसे वहां इस तरह की गंदी, बेहुदा हरकत का सामना करना पड़ेगा। बल्कि यह सोचकर भेजा होगा कि वह मंदिर जा रही है, सुरक्षित है। उसे बच्ची का घर जरूर आस-पास ही रहा होगा, इसीलिए उसे अकेले भेज दिया गया। वह बच्ची तो शायद जान भी नहीं रही होगी कि ऐसा क्यों हुआ?
वह सीसीटीवी फुटेज दिखाती है कि आखिरी में उस बच्ची ने भगवान के सामने हाथ जोड़े। उस समय उस विचलित मन वाली बच्ची ने भगवान के सामने हाथ क्यों जोड़ होंगे? क्या वह प्रार्थना कर रही थी, खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी या यह उसके लिए एक सहज धार्मिक क्रिया थी? या वह भगवान को एक तरह से धन्यवाद दे रही थी कि वह सिर्फ दुष्कर्म की कोशिश मात्र में ही बच गई? हो सकता है कि उसके मन की स्थिति को निश्चित रूप से कोई नहीं जान सकता है। लेकिन इस दृश्य के बहाने उस मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर जरूर विचार किया जा सकता है, कि यौन उत्पीड़न की कोशिश जैसी ऐसी घटनाएं किसी बच्ची के मन पर भविष्य के लिए क्या दुष्प्रभाव छोड़ सकती हैं। और इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जब देश में मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर भी बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है, तब वहां घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं और लड़कियों की मानसिक स्थिति कैसी होगी?
इस तरह की घटनाओं में चोट केवल शरीर पर नहीं लगती बल्कि मन पर अधिक लगती है। यौन उत्पीड़न की कोशिश का अर्थ सिर्फ किसी की शारीरिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं है। बल्कि यह किसी के के भीतर सुरक्षा और विश्वास की भावना को भी चोट पहुंचा सकता है। खासकर छोटी उम्र के बच्चे कई बार यह समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ क्या हुआ, क्यों हुआ और उन्हें किससे मदद मांगनी चाहिए। वे डर सकते हैं, चुप हो सकते हैं या सामान्य दिखने की कोशिश भी कर सकते हैं। इस उम्र में बच्चों के मन में अपने माता-पिता का भी डर होता है क्योंकि वे बच्चे न तो पूरी तरह से अपनी बात समझा पाते हैं और न ही माता-पिता इस बात पर विश्वास भी कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं माता-पिता उन्हीं नहीं डांटे और उनका ही बाहर आना जाना बंद न कर दें। इसलिए वे इस तरह की घटनाओं को छिपा भी जाती हैं। हो सकता है कि यह घटना अगर सीसीटीवी फुटेज के माध्यम से बाहर नहीं आती तो वह बच्ची अपने घर जाकर बताती भी नहीं।
किसी बच्चे के व्यवहार में घटना के बाद बदलाव दिखाई दे सकता है। वह अकेले रहने से डर सकता है, किसी परिचित या अपरिचित व्यक्ति के पास जाने में असहज महसूस कर सकता है, नींद में परेशानी का भी अनुभव कर सकता है या बार-बार उसी घटना को याद कर सकता है। बच्चों के अवचेतन मन में वह कहीं ना कहीं बड़े होने के बाद भी दबी रह जाती है और उसको वह बार-बार आगे भी परेशान करती है। बच्चियों ऐसी घटनाओं में आगे जाकर बहुत सहमी हुई और असुरक्षित सी भी होतीं हैं। किसी के भी विशेषकर पुरुष के हाथ का स्पर्श उन्हें उस घटना पर ही वापस ले आता है। उसे घटना को वह भले ही याद न कर रही हो पर जो अशोभनीय स्पर्श उन्हें उनके बचपन में मिला था, वह स्पर्श उन्हें आगे भी किसी भी स्पर्श से छिटक देने के लिए काफी होता है। आगे चलकर भी वे हो सकता है कि किसी को इस घटना के बारे में न बताएं लेकिन उनका व्यवहार कुछ न कुछ अलग जरूर होता है। कुछ बच्चों में तत्काल कोई स्पष्ट बदलाव दिखाई नहीं देता, जबकि कुछ को लंबे समय तक भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है। हर बच्चे की अपनी प्रतिक्रिया अलग होती है।
इसलिए उस बच्ची का चुपचाप वहां से निकल जाना यह प्रमाणित नहीं करता है कि वह उस घटना से अप्रभावित रही होगी। उसी तरह, उसका रोना या घबराना भी जरूरी नहीं कि वह उसके अनुभव की पूरी गंभीरता बता दे। बच्चों की भावनाओं को समझने के लिए संवेदनशीलता चाहिए होती है, अनुमान से काम नहीं चलता। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी घटना के बाद बच्ची को दोषी महसूस नहीं कराया जाना चाहिए। उसे यह समझाने की जरूरत है कि उसके साथ गलत हरकत करने वाला व्यक्ति ही इसके लिए जिम्मेदार है, वह नहीं। उसके कपड़े, उसका व्यवहार, उसका अकेले मंदिर जाना या किसी व्यक्ति पर पहले भरोसा कर लेना किसी दूसरे को उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने का अधिकार कभी भी नहीं देता।
हम अक्सर कहते हैं कि बच्चियों को घर में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। लेकिन क्या घर में सुरक्षा का अर्थ केवल उन्हें बाहर जाने से रोक देना है? कई परिवारों में लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि अकेले मत जाओ, किसी से ज्यादा बात मत करो, देर से घर मत लौटो, अनजान व्यक्ति पर भरोसा मत करो और अपने कपड़ों का ध्यान रखो। यह बिल्कुल सही भी है। आज की इस अधिक क्रूर होती दुनिया में इनमें से कुछ सावधानियां परिस्थितियों के अनुसार बिल्कुल उचित हो सकती हैं। लेकिन क्या सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी लड़की के व्यवहार पर ही होती है? अगर ऐसा है तो सावधानी धीरे-धीरे भय और आत्म-संदेह में बदल सकती है। उस लड़की को हर किसी व्यक्ति से भय भी होगा और वह किसी से बात करते हुए संदेह में भी रहेगी। सबने समय को बदलते भी देखा है। पहले जहां लड़कियां एक तरफ बैग को टांग कर लेकर जाया करतीं थीं, चाहे वे विद्यालय जा रही हों या अपनी कोचिंग। समय के साथ बदलाव आया। वे लड़कियां पिट्ठू बैग को अपनी पीठ पर लड़कों के जैसे ले जाने लगीं । पर अब आप देखिएगा कि कितनी बार हम लड़कियों को देखते हैं कि वे अपने पिट्ठू बैग को अपनी छाती पर आगे लगा कर चलती हैं, विशेषकर जब वे पैदल चल रहीं होतीं हैं। क्या आपने कभी इसका कारण सोचा है? समाज के अच्छे-अच्छे घरों के पुरुषों की उनकी छतिया को घूरतीं हुईं निगाहों से बचने के लिए और वे किसी गली से अगर निकल रही हैं, तो कहीं कोई सिरफिरा या मानसिक रूप से विक्षिप्त या आजकल तो मजे लेने के लिए कहीं कोई उनकी छाती पर हाथ मारते हुए न निकल जाए। यह वह बहुत बड़ा भय होता है जो उनके आगे की जिंदगी के लिए उन्हें असुरक्षित महसूस कराता है। वे इस तरह की घटनाओं को हर समय किसी को बयान भी नहीं कर सकती हैं, न ही वे इस तरह की घटनाओं से बचकर रह पाती हैं, न ही इन घटनाओं के कारण वे बाहर आना- जाना छोड़ सकती हैं क्योंकि तब उनके ऊपर में और अधिक बंदिशें से लग जाएंगी। उन्हें बाहर भी निकलना है, उन्हें इस तरह के माहौल में अपने आप को संभालना भी है और उन्हें अपने कदमों को रोकना भी नहीं है तो उन्होंने इससे बचने के लिए यह उपाय निकाल लिया है पर वे निरंतर आगे बढ़ रहीं हैं।
लड़कों को अक्सर बाहर की दुनिया का अनुभव लेने, अकेले आने-जाने और जोखिम उठाने की अधिक स्वतंत्रता मिलती है। दूसरी ओर, लड़कियों की स्वतंत्रता के साथ परिवार की चिंता और सामाजिक प्रतिष्ठा की शर्तें भी जुड़ जाती हैं। यहीं से ही असमानता मनोवैज्ञानिक रूप लेने लगती है। लड़की सोचने लगती है कि कहीं उसकी किसी छोटी-सी गलती से परिवार की बदनामी तो नहीं हो जाएगी। और इस तरह की उत्पीड़न की घटना के बाद तो यह डर और गहरा सकता है। ऐसे में परिवार वालों का काम केवल बच्ची को सावधान करना नहीं, बल्कि उसे विश्वास देना भी है कि वह किसी भी खराब तरह के अनुभव के बारे में बिना डरे बता सकती है और उसकी बात सुनी जाएगी। माता-पिता और परिवार का विश्वास ही उसके लिए वह भावनात्मक सुरक्षा बन सकता है।
कितनी मुश्किल बात है कि घर से बाहर की दुनिया एक अदृश्य मानसिक बोझ के नीचे ला देती है। घर की दहलीज पार करते ही महिलाओं और लड़कियों के सामने सुरक्षा का एक दूसरा प्रश्न खड़ा हो जाता है। सड़क, सार्वजनिक परिवहन, विद्यालय, कॉलेज, कार्यस्थल, बाजार, धार्मिक स्थल और मनोरंजन के सार्वजनिक स्थान ऐसी किसी भी जगह उत्पीड़न की आशंका उन्हें अतिरिक्त सतर्क रहने के लिए विवश कर देती है। कई महिलाएं , लड़कियां रास्ते में पीछे मुड़कर देखती हैं कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा। वे सुनसान रास्तों से बचती हैं, देर रात यात्रा करते समय किसी परिचित को अपनी लोकेशन भेजती हैं, फोन हाथ में रखती हैं और किसी अनजान व्यक्ति के व्यवहार पर लगातार नजर बनाए रखतीं हैं, आकलन करती रहती हैं। इन उपायों में व्यावहारिक समझ हो सकती है, लेकिन लगातार खतरे की आशंका के साथ जीना कितनी मानसिक परेशानी का सबब भी बन जाता है।
यदि कोई बच्चा , वह लड़का- लड़की कोई भी हो सकता है,ऐसी घटना से गुजरता है, तो उससे बार-बार सवाल पूछकर या दूसरों के सामने घटना दोहराने के लिए कहकर उसे और परेशान नहीं करना चाहिए। उसकी बात शांतिपूर्वक सुननी चाहिए, उसे दोष नहीं देना चाहिए। सुरक्षा का अर्थ केवल अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना भी है जिसमें पीड़ित को सहायता मिले। हमें ऐसी दुनिया बनानी है जिसमें बच्ची मंदिर में हाथ जोड़े तो वह श्रद्धा का क्षण हो, भय से उबरने की कोशिश नहीं। वह सड़क पर चले तो उसे हर कदम पर अपनी सुरक्षा का हिसाब न लगाना पड़े। वह घर लौटे तो उससे यह न पूछा जाए कि उसके साथ ऐसा हुआ ही क्यों? आखिर सवाल यह नहीं है कि लड़कियों को कितना सतर्क रहना चाहिए। सवाल यह है कि समाज को इतना संवेदनशील और जिम्मेदार बनने में अभी कितना समय लगेगा कि किसी बच्ची का बचपन इस तरह के डर के हवाले न हो जाए।


