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Guru Shikshak Parampara: जानिए गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व, शिक्षक दिवस का इतिहास और राधाकृष्णन, अब्दुल कलाम, नेहरू समेत महान व्यक्तित्वों के जीवन में शिक्षकों की भूमिका। कॉपी
Guru Shikshak Parampara | Article Yogesh Mishra | Newstrack Hindi News
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
Guru Shikshak Parampara: संत कबीरदास ने सदियों पहले इस दोहे के माध्यम से गुरु की महिमा का जो प्रतिपादन किया था, वह केवल आध्यात्मिक अनुभूति नहीं, बल्कि भारतीय समाज की एक गहरी सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति भी है। कबीर के सामने गुरु और गोविंद दोनों खड़े हैं। प्रश्न यह है कि सबसे पहले किसके चरण स्पर्श किए जाएँ? कबीर गुरु को वंदनीय मानते हैं, क्योंकि उसी ने गोविंद का परिचय कराया। इस विचार में गुरु की महत्ता किसी देवता से प्रतिस्पर्धा करने में नहीं, बल्कि मनुष्य को ज्ञान, विवेक और सत्य तक पहुँचाने की क्षमता में निहित है। गुरु शब्द में ही गुरुत्व का भाव समाहित है। माता-पिता संतान को जन्म देते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और जीवन की प्रारंभिक समझ विकसित करते हैं, लेकिन शिक्षक उसके भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने, उन्हें दिशा देने और जीवन की कठिनाइयों से जूझने का विवेक प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जन्म लेना एक जैविक घटना है, लेकिन जीवन को सार्थक बनाना ज्ञान, अनुभव, संस्कार और निरंतर सीखने की प्रक्रिया का परिणाम है। भारतीय परंपरा ने गुरु को इतना ऊँचा स्थान इसीलिए दिया है कि वह व्यक्ति को केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि उसके व्यक्तित्व के निर्माण में सहभागी बनता है। संभवतः इसी कारण सार्वजनिक जीवन में अनेक बड़े नेताओं, विचारकों और राष्ट्राध्यक्षों के भीतर शिक्षक होने अथवा शिक्षक के रूप में पहचाने जाने की एक विशेष आकांक्षा दिखाई देती रही है। राजनीतिक सत्ता सीमित अवधि के लिए मिलती है, लेकिन शिक्षक के रूप में अर्जित प्रतिष्ठा कई पीढ़ियों तक जीवित रह सकती है। सत्ता व्यक्ति को अधिकार देती है, जबकि शिक्षा उसे दूसरे मनुष्यों के विचारों और जीवन को प्रभावित करने का अवसर प्रदान करती है। शायद यही वह आकर्षण है जो सार्वजनिक जीवन के अनेक महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों को कभी-कभी अध्यापक की भूमिका की ओर खींच ले जाता है।
भारत में शिक्षक दिवस का संबंध देश के दूसरे राष्ट्रपति, महान दार्शनिक और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से है। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था। उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज और मैसूर विश्वविद्यालय सहित अनेक शैक्षणिक संस्थानों में दर्शनशास्त्र पढ़ाया। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे, आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति बने तथा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी पूर्वी धर्म और नैतिक दर्शन के प्रतिष्ठित अध्येता के रूप में कार्य किया। स्वतंत्र भारत में वे पहले उपराष्ट्रपति और बाद में दूसरे राष्ट्रपति बने। वर्ष 1962 में राष्ट्रपति बनने के बाद जब उनके कुछ विद्यार्थियों और प्रशंसकों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने सुझाव दिया कि इसे व्यक्तिगत उत्सव के बजाय शिक्षकों के सम्मान के दिन के रूप में मनाया जाए। इसी भावना से भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा स्थापित हुई। यह अपने आप में एक असाधारण प्रसंग था। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचा व्यक्ति अपनी सार्वजनिक पहचान को राष्ट्रपति की प्रतिष्ठा से अधिक अध्यापक की भूमिका से जोड़कर देख रहा था। राधाकृष्णन के जीवन में यह भावना केवल औपचारिक नहीं थी। उनके दार्शनिक लेखन, शिक्षा संबंधी विचारों और सार्वजनिक वक्तव्यों में बार-बार यह मान्यता दिखाई देती है कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसके शिक्षकों और उसकी बौद्धिक परंपरा में निहित होती है।
शिक्षकों को सम्मान देने की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के अनेक देशों में अलग-अलग ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से शिक्षक दिवस मनाया जाता है। अमेरिका में मई के पहले पूर्ण सप्ताह को 'टीचर एप्रिसिएशन वीक' के रूप में मनाने की परंपरा है और उसी सप्ताह के मंगलवार को राष्ट्रीय शिक्षक प्रशंसा दिवस मनाया जाता है। मलेशिया में 16 मई को 'हारी गुरु' अर्थात शिक्षक दिवस मनाया जाता है। चिली में 16 अक्टूबर शिक्षकों के सम्मान का दिन है। रूस में 5 अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। सऊदी अरब, बहरीन, यमन और जॉर्डन सहित पश्चिम एशिया के अनेक देशों में भी शिक्षकों को सम्मानित करने की अपनी-अपनी परंपराएँ हैं। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन अर्थात यूनेस्को ने वर्ष 1994 से 5 अक्टूबर को 'विश्व शिक्षक दिवस' के रूप में मनाने की शुरुआत की। यह तिथि वर्ष 1966 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और यूनेस्को द्वारा शिक्षकों की स्थिति से संबंधित महत्त्वपूर्ण अनुशंसाएँ स्वीकार किए जाने की स्मृति से जुड़ी है। इन अनुशंसाओं में शिक्षकों के अधिकारों, दायित्वों, प्रशिक्षण, नियुक्ति, कार्य परिस्थितियों और सामाजिक प्रतिष्ठा से संबंधित सिद्धांत निर्धारित किए गए थे। इस प्रकार विश्व शिक्षक दिवस केवल गुरु की वंदना का अवसर नहीं है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि अच्छे शिक्षक तैयार करने और उन्हें सम्मानजनक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पूरे समाज तथा राज्य की है।
भारतीय परंपरा में गुरु का संबंध केवल औपचारिक विद्यालयी शिक्षा से नहीं रहा है। वैदिक आश्रमों, गुरुकुलों, बौद्ध विहारों, जैन उपाश्रयों, सूफी खानकाहों, संत परंपराओं और विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाओं में ज्ञान के हस्तांतरण की अलग-अलग विधियाँ विकसित हुईं। संगीत, नृत्य, रंगमंच, शिल्प और अनेक पारंपरिक कलाओं में गुरु-शिष्य संबंध आज भी महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 'गुरुदक्षिणा' की परंपरा रही है। संघ की विशिष्टता यह है कि वहाँ किसी व्यक्ति के बजाय भगवा ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इस परंपरा के पीछे संगठन का अपना सांस्कृतिक और वैचारिक दृष्टिकोण है। दूसरी ओर भारत की व्यापक आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्वरूप अनेक प्रकार का रहा है। कहीं वह आध्यात्मिक मार्गदर्शक है, कहीं ज्ञान का संरक्षक, कहीं साधना का शिक्षक और कहीं व्यक्ति को सामाजिक बंधनों से मुक्त करने वाला विचारक। सभी परंपराओं में गुरु की अवधारणा एक जैसी नहीं है, लेकिन उनमें एक साझा तत्व अवश्य दिखाई देता है—ज्ञान को केवल व्यक्तिगत संपत्ति न मानकर अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की जिम्मेदारी।
भारतीय समाज में बच्चों के साथ संबंध स्थापित करने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्वों की पहचान भी कई बार उनकी औपचारिक राजनीतिक भूमिका से अलग बनती रही है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ 'चाचा नेहरू' का संबोधन इसी प्रकार जुड़ा। उनकी जन्मतिथि 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू बच्चों के प्रति स्नेह और उनके भविष्य को आधुनिक भारत के निर्माण से जोड़ने के लिए जाने जाते थे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षक की प्रतिष्ठा के कारण स्मरण किए जाते हैं। डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति बनने के बाद भी विद्यार्थियों और शिक्षण संस्थानों से संवाद बनाए रखा। राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद उन्होंने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में अध्यापन और संवाद को प्राथमिकता दी। 27 जुलाई 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलांग में विद्यार्थियों को व्याख्यान देते समय ही उनका निधन हुआ। इस घटना ने उनके जीवन की उस विशेषता को और अधिक रेखांकित किया कि वैज्ञानिक, राष्ट्रपति और राष्ट्रीय व्यक्तित्व होने के बावजूद वे विद्यार्थियों के बीच रहना चाहते थे। राजनीति और विज्ञान के क्षेत्र में मिली उनकी प्रतिष्ठा के साथ शिक्षक की पहचान भी स्थायी रूप से जुड़ गई। नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती वर्षों में शिक्षक दिवस पर बच्चों से सार्वजनिक संवाद करने की जो परंपरा शुरू की, उसे इसी व्यापक पृष्ठभूमि में समझना चाहिए। हालाँकि उनका उद्देश्य और राजनीतिक संदर्भ नेहरू, राधाकृष्णन तथा कलाम से अलग थे, लेकिन नई पीढ़ी के मन तक पहुँचने की आकांक्षा इन सभी सार्वजनिक व्यक्तित्वों में किसी न किसी रूप में उपस्थित दिखाई देती है।
गुरु की महिमा का भारतीय आख्यानों में बार-बार उल्लेख मिलता है। रामायण की परंपरा में महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र भगवान राम के जीवन में अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं। वशिष्ठ राजगुरु के रूप में शिक्षा और संस्कार प्रदान करते हैं, जबकि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाकर उन्हें तप, साधना, युद्धकला और धर्मरक्षा के अनुभव से परिचित कराते हैं। महाभारत में द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों को शस्त्रविद्या की शिक्षा देते हैं। अर्जुन की धनुर्विद्या को निखारने में द्रोण की भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। कर्ण के जीवन में परशुराम का प्रसंग आता है। चंद्रगुप्त मौर्य के उत्थान में चाणक्य की भूमिका भारतीय इतिहास और परंपरा दोनों में विशेष स्थान रखती है। चाणक्य केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि राजनीतिक चिंतक, रणनीतिकार और सत्ता के संगठन की प्रक्रिया से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में भी स्मरण किए जाते हैं। हालांकि चंद्रगुप्त मौर्य से सम्राट अशोक तक की ऐतिहासिक यात्रा अनेक पीढ़ियों और राजनीतिक परिस्थितियों से होकर गुजरती है। इसलिए अशोक की उपलब्धियों को सीधे चाणक्य की व्यक्तिगत शिक्षा का परिणाम कहना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। इसी प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास के संबंधों को लेकर महाराष्ट्र की परंपराओं तथा आधुनिक इतिहासकारों के बीच अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं। समर्थ रामदास की आध्यात्मिक और सामाजिक विचारधारा का अपना महत्त्व है, लेकिन शिवाजी के सैन्य तथा राजनीतिक निर्माण का पूरा श्रेय किसी एक गुरु को देना उनके जीवन की जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया को सीमित कर देगा।
इन ऐतिहासिक सावधानियों के बावजूद यह सत्य है कि किसी असाधारण व्यक्तित्व के विकास में मार्गदर्शक की भूमिका अक्सर निर्णायक होती है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस और नरेंद्रनाथ दत्त का संबंध इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। नरेंद्रनाथ की बौद्धिक बेचैनी, तर्कशीलता और आध्यात्मिक जिज्ञासा को रामकृष्ण के सान्निध्य में नई दिशा मिली। वही नरेंद्रनाथ आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से विश्वविख्यात हुए। लेकिन विवेकानंद का व्यक्तित्व केवल गुरु से प्राप्त शिक्षा का निष्क्रिय परिणाम नहीं था। उसमें उनकी अपनी बौद्धिक क्षमता, अध्ययन, यात्राओं, सामाजिक अनुभवों और स्वतंत्र चिंतन की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इसी प्रकार स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन में मथुरा के स्वामी विरजानंद का महत्त्वपूर्ण योगदान था। मूलशंकर से दयानंद बनने की प्रक्रिया में वैदिक अध्ययन, तर्कशील दृष्टिकोण और धार्मिक सुधार की चेतना विकसित हुई। आगे चलकर दयानंद ने मूर्तिपूजा, कर्मकांड, सामाजिक रूढ़ियों और शिक्षा संबंधी प्रश्नों पर व्यापक विमर्श खड़ा किया। वर्ष 1875 में आर्य समाज की स्थापना के माध्यम से उन्होंने धार्मिक और सामाजिक सुधार के एक बड़े आंदोलन को जन्म दिया। इन उदाहरणों में गुरु की भूमिका व्यक्ति को तैयार कर देने वाले जादूगर की नहीं, बल्कि उसकी मौलिक संभावनाओं को दिशा देने वाले प्रेरक की दिखाई देती है।
गुरु-शिष्य परंपरा का गौरवगान करते समय उसके भीतर मौजूद सामाजिक विरोधाभासों को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। महाभारत में द्रोणाचार्य और अर्जुन का संबंध आदर्श शिक्षक तथा शिष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन उसी आख्यान में एकलव्य की कथा भी है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपना गुरु मानकर स्वयं अभ्यास किया, पर जब उसकी असाधारण धनुर्विद्या सामने आई तो गुरु-दक्षिणा के रूप में उससे दाहिने हाथ का अँगूठा माँगे जाने का प्रसंग मिलता है। यह कथा भारतीय समाज में गुरु की महिमा के साथ शिक्षा तक समान पहुँच के प्रश्न को भी सामने रखती है। एकलव्य की प्रतिभा, उसका श्रम और उसका समर्पण किसी औपचारिक गुरु की अनुपस्थिति में भी विकसित हुआ। इस प्रसंग की आधुनिक व्याख्याएँ सामाजिक भेदभाव, अवसरों की असमानता और ज्ञान पर नियंत्रण जैसे प्रश्न उठाती हैं। इसलिए गुरु-शिष्य परंपरा को केवल आदर्श संबंध मानकर उसका महिमामंडन करना पर्याप्त नहीं है। उसके भीतर न्याय, समानता और स्वतंत्र प्रतिभा के सम्मान की आवश्यकता को भी स्वीकार करना होगा। यदि गुरु का वास्तविक उद्देश्य प्रतिभा का विकास है, तो उसका सबसे बड़ा दायित्व यह होना चाहिए कि किसी बच्चे की जाति, वर्ग, भाषा, धर्म अथवा आर्थिक स्थिति उसके सीखने के अधिकार में बाधा न बने।
महाभारत और रामायण के अतिरिक्त श्रीकृष्ण तथा संदीपनि ऋषि का प्रसंग भी गुरु के सामाजिक महत्त्व को व्यक्त करता है। परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण और उनके मित्र सुदामा ने संदीपनि ऋषि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी। एक राजवंश से जुड़ा बालक और आर्थिक रूप से साधारण परिवार का बालक एक ही आश्रम में अध्ययन करते हैं—इस कथा में शिक्षा की समतामूलक संभावना का आदर्श दिखाई देता है। लेकिन भारत की वास्तविक ऐतिहासिक शिक्षा व्यवस्थाएँ हमेशा इतनी समतामूलक नहीं रहीं। जाति, लिंग, आर्थिक स्थिति और सामाजिक पदानुक्रम ने विभिन्न कालखंडों में शिक्षा की उपलब्धता को प्रभावित किया। इसलिए इन कथाओं का सबसे सार्थक उपयोग अतीत की पूर्ण समानता सिद्ध करने में नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए समान शिक्षा का आदर्श निर्मित करने में है। गुरु की महानता तभी सार्थक है जब वह भेदभाव घटाए, ज्ञान के द्वार खोले और शिष्य की स्वतंत्र प्रतिभा को विकसित होने दे। जिस व्यवस्था में ज्ञान कुछ वर्गों की विशेष संपत्ति बन जाए, वहाँ गुरु की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा और सामाजिक न्याय के बीच विरोधाभास उत्पन्न हो सकता है।
दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त करने से पहले या उसके बाद शिक्षक की भूमिका निभाई। डॉ. मनमोहन सिंह पंजाब विश्वविद्यालय और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से जुड़े रहे। वे अर्थशास्त्र के अध्यापक तथा विद्वान थे और बाद में वित्त मंत्री तथा प्रधानमंत्री बने। प्रणब मुखर्जी ने राजनीति में पूर्णकालिक रूप से सक्रिय होने से पहले अध्यापन किया था। पश्चिम बंगाल के विद्यानगर कॉलेज से उनका संबंध रहा। डॉ. मुरली मनोहर जोशी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकी के अध्यापक रहे। राजनाथ सिंह ने भी राजनीतिक जीवन में सक्रिय होने से पहले भौतिकी पढ़ाई। मुलायम सिंह यादव अध्यापन से राजनीति में आए। मायावती ने भी प्रारंभिक जीवन में शिक्षिका के रूप में कार्य किया। कल्याण सिंह का संबंध भी शिक्षा और अध्यापन के क्षेत्र से रहा। इन नेताओं के राजनीतिक विचार और दल अलग-अलग थे, लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन में शिक्षा से जुड़ा अनुभव एक साझा पक्ष था। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिक्षक रहे व्यक्ति अनिवार्य रूप से बेहतर राजनेता बनते हैं। राजनीति और अध्यापन के लिए अलग-अलग क्षमताएँ आवश्यक होती हैं। फिर भी अध्यापन का अनुभव व्यक्ति को संवाद, धैर्य, संगठन और जटिल विषयों को समझाने की कला से परिचित करा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शिक्षण और सार्वजनिक नेतृत्व का संबंध अनेक उदाहरणों में दिखाई देता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने शिकागो विश्वविद्यालय के लॉ स्कूल में संवैधानिक कानून पढ़ाया था। ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अध्यापन तथा शोध से जुड़े रहे और लंबे समय तक वहाँ गणित के ल्यूकेसियन प्रोफेसर पद पर कार्यरत रहे। प्रसिद्ध 'हैरी पॉटर' शृंखला की लेखिका जे. के. रोलिंग ने पुर्तगाल में अंग्रेजी पढ़ाने का काम किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर का जीवन भी सार्वजनिक सेवा और शिक्षा संबंधी गतिविधियों से जुड़ा रहा, हालांकि उन्हें न्यूयॉर्क में नियमित विज्ञान अध्यापक के रूप में प्रस्तुत करना प्रमाणित जीवनी संबंधी तथ्यों के अनुरूप नहीं है। इन उदाहरणों का वास्तविक महत्त्व यह नहीं कि हर महान व्यक्ति कभी शिक्षक रहा है, बल्कि यह कि ज्ञान और सार्वजनिक जीवन के बीच गहरा संबंध हो सकता है। कोई व्यक्ति शिक्षक रहते हुए वैज्ञानिक, साहित्यकार, विचारक या राजनेता बन सकता है और कोई सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बाद भी शिक्षक की भूमिका निभा सकता है। ज्ञान का प्रसार किसी एक पेशे तक सीमित नहीं है।
दरअसल, शिक्षक और शिक्षण के बीच अंतर समझना आवश्यक है। प्रत्येक शिक्षक विद्यालय या विश्वविद्यालय का वेतनभोगी अध्यापक नहीं होता और प्रत्येक सार्वजनिक वक्ता शिक्षक भी नहीं बन जाता। अध्यापन के लिए विषय का ज्ञान, सीखने वाले की स्थिति को समझने की क्षमता, धैर्य, प्रश्नों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति और स्वतंत्र विचार विकसित करने का दृष्टिकोण आवश्यक है। एक अच्छा अध्यापक केवल उत्तर नहीं बताता, वह प्रश्न करना सिखाता है। वह विद्यार्थी को अपनी बात मान लेने के लिए बाध्य नहीं करता, बल्कि उसे तर्क, अनुभव और प्रमाण के आधार पर निर्णय करना सिखाता है। गुरु का काम केवल जानकारी का हस्तांतरण नहीं है। वह सीखने वाले की जिज्ञासा को जीवित रखता है, उसकी गलतियों को समझता है और उसके भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है। इसी कारण इंटरनेट, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल शिक्षा के युग में भी शिक्षक का महत्त्व समाप्त नहीं हुआ है। जानकारी तक पहुँच पहले की तुलना में कहीं आसान हो गई है, लेकिन सही और गलत जानकारी के बीच अंतर करना, जटिल प्रश्नों को समझना, नैतिक विवेक विकसित करना और ज्ञान का सामाजिक उपयोग सीखना आज भी मानवीय मार्गदर्शन की माँग करता है।
इक्कीसवीं सदी में सूचना के स्रोतों की संख्या असाधारण रूप से बढ़ी है। एक विद्यार्थी मोबाइल फोन पर दुनिया के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के व्याख्यान सुन सकता है, डिजिटल पुस्तकालयों तक पहुँच सकता है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से कठिन विषयों की प्रारंभिक व्याख्या प्राप्त कर सकता है। लेकिन जानकारी की यह प्रचुरता अपने आप ज्ञान में परिवर्तित नहीं होती। जानकारी तथ्य उपलब्ध कराती है, जबकि ज्ञान उन तथ्यों के बीच संबंध समझने की क्षमता देता है। विवेक उस ज्ञान के उपयोग का नैतिक आधार प्रदान करता है। कोई विद्यार्थी इंटरनेट पर इतिहास की हजारों घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकता है, लेकिन इतिहास के स्रोतों की विश्वसनीयता, अलग-अलग व्याख्याओं के कारण और राजनीतिक दावों की तथ्यात्मक जाँच करना सीखने के लिए उसे गंभीर अध्ययन तथा मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार विज्ञान की जानकारी प्राप्त करना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं। शिक्षक का महत्त्व इसी दूसरे स्तर पर सामने आता है। वह विद्यार्थी को तथ्यों का उपभोक्ता भर नहीं रहने देता, बल्कि उसे प्रश्न करने और नए विचार उत्पन्न करने वाला स्वतंत्र व्यक्ति बनाने का प्रयास करता है।
इसी पृष्ठभूमि में नरेन्द्र मोदी का शिक्षक दिवस पर विद्यार्थियों के साथ संवाद करने का निर्णय राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। 5 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री बनने के लगभग सौ दिन बाद उन्होंने दिल्ली के मानेकशॉ केंद्र में विद्यार्थियों के साथ एक विशेष कार्यक्रम किया। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देश के विभिन्न विद्यालयों में किया गया। उपस्थित बच्चों के अतिरिक्त देश के कई क्षेत्रों के विद्यार्थियों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी प्रश्न पूछे। मोदी ने शिक्षक दिवस के अवसर को केवल औपचारिक भाषण और पुरस्कार वितरण तक सीमित न रखने की बात कही। उनका आग्रह था कि समाज में शिक्षक की प्रतिष्ठा को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। उन्होंने शिक्षा को राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ते हुए बच्चों से पढ़ाई, खेल, स्वच्छता, अनुशासन, कौशल विकास और सामाजिक जिम्मेदारी के विषयों पर बातचीत की। उनके संवाद में प्रश्नोत्तर का विशेष स्थान था। बच्चे अपनी जिज्ञासाएँ रखते थे और प्रधानमंत्री उन प्रश्नों का उत्तर अपने अनुभवों तथा उदाहरणों के माध्यम से देने का प्रयास करते थे।
यह कार्यक्रम भारतीय प्रधानमंत्रियों द्वारा विद्यार्थियों से किए गए पूर्ववर्ती संवादों से अपने स्वरूप और विस्तार में अलग था। लेकिन मोदी को विद्यार्थियों से संवाद करने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। उनसे पहले भी अनेक प्रधानमंत्रियों ने बच्चों तथा विद्यार्थियों को संबोधित किया था। नेहरू और बच्चों का संबंध तो भारतीय सार्वजनिक स्मृति का प्रसिद्ध हिस्सा है। मोदी की विशेषता यह थी कि उन्होंने शिक्षक दिवस पर सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग करके राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ बड़ी संख्या में विद्यार्थियों तक पहुँचने का प्रयास किया। इस आयोजन में प्रधानमंत्री और बच्चों के बीच सीधा संवाद सार्वजनिक कार्यक्रम का केंद्रीय तत्व था। संचार की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण प्रयोग था। इसके माध्यम से शिक्षक दिवस का कार्यक्रम राजनीतिक नेतृत्व, शैक्षणिक संस्थाओं और विद्यार्थियों के बीच बड़े सार्वजनिक संवाद का रूप लेने लगा। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी उठा कि क्या शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री का कार्यक्रम शिक्षकों की अपनी भूमिका और उनकी समस्याओं से ध्यान हटाकर राजनीतिक नेतृत्व के व्यक्तित्व को अधिक प्रमुख बना सकता है? यह प्रश्न किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। शिक्षा से जुड़े सार्वजनिक आयोजनों में शिक्षक, विद्यार्थी और ज्ञान की प्रक्रिया का केंद्र में रहना आवश्यक है।
वर्ष 2014 के कार्यक्रम में मोदी ने बच्चों से कहा कि वे अपने बचपन को केवल परीक्षा और प्रतियोगिता की दौड़ में समाप्त न कर दें। खेलना, सीखना, जिज्ञासु बने रहना और जीवन का आनंद लेना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने पुस्तकों के अध्ययन और महान व्यक्तियों की जीवनियों को पढ़ने पर जोर दिया। उनका तर्क था कि इंटरनेट से जानकारी मिल सकती है, लेकिन जीवन की गहरी समझ के लिए अध्ययन और अनुभव की आवश्यकता होती है। उन्होंने जापान की यात्रा के दौरान देखी गई शैक्षणिक व्यवस्थाओं का उल्लेख किया, जहाँ विद्यार्थी और शिक्षक मिलकर विद्यालय की सफाई जैसी गतिविधियों में भाग लेते हैं। इस उदाहरण के माध्यम से वे स्वच्छता को केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार बनाने की बात कर रहे थे। उन्होंने बच्चों से बिजली और पानी बचाने, स्वच्छता बनाए रखने और अपने आसपास की समस्याओं के समाधान में भाग लेने का आग्रह किया। शिक्षा उनके लिए केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि नागरिक चरित्र के निर्माण की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत हो रही थी।
इस संवाद में विद्यार्थियों के प्रश्न भी विविध थे। बच्चों ने प्रधानमंत्री के कामकाज, उनके व्यक्तिगत अनुभवों, पढ़ाई, खेल, कौशल और जीवन के लक्ष्यों से संबंधित प्रश्न पूछे। मोदी ने बताया कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर काम करना जिम्मेदारी भरा दायित्व है। उन्होंने राजनीति को निजी लाभ कमाने का व्यवसाय मानने के बजाय सार्वजनिक सेवा की भावना से देखने की बात कही। बच्चों को उन्होंने जीवन में केवल कोई बड़ा पद प्राप्त करने की आकांक्षा तक सीमित न रहने का सुझाव दिया। उनके विचार में यदि व्यक्ति का ध्यान कुछ सार्थक करने पर हो, तो उसके जीवन का अर्थ अधिक व्यापक हो सकता है। उन्होंने सफलता से अधिक प्रयास और सीखने की प्रक्रिया के महत्त्व पर बल दिया। यह संदेश बच्चों के लिए उपयोगी था, क्योंकि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में सफलता की परिभाषा कई बार परीक्षा के अंकों, प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रतिष्ठित नौकरियों तक सीमित हो जाती है। ऐसे वातावरण में बच्चों को उनके काम, जिज्ञासा और प्रयास का महत्त्व समझाना सकारात्मक शैक्षिक दृष्टिकोण का हिस्सा माना जा सकता है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि इस प्रकार की प्रेरक बातें शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक समस्याओं का विकल्प न बन जाएँ। विद्यार्थियों को बेहतर जीवन के लिए प्रेरणा देने के साथ गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक और समान अवसर उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
मोदी ने शिक्षक दिवस से एक दिन पहले 4 सितंबर 2014 को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले लगभग 350 शिक्षकों से भी मुलाकात की थी। इस अवसर पर उन्होंने अध्यापन को केवल नौकरी या पेशा नहीं, बल्कि 'जीवन धर्म' कहा था। उनका विचार था कि शिक्षक कभी वास्तविक अर्थों में सेवानिवृत्त नहीं होता। औपचारिक सेवा समाप्त होने के बाद भी वह अनुभव, ज्ञान और मार्गदर्शन के माध्यम से समाज के लिए उपयोगी बना रह सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षक को अपने समय से आगे चलना चाहिए, क्योंकि उसका दायित्व भविष्य की पीढ़ी तैयार करना है। यदि अध्यापक स्वयं बदलती दुनिया की तकनीक, वैज्ञानिक विकास और सामाजिक परिस्थितियों से परिचित नहीं होगा, तो वह विद्यार्थियों को आने वाले समय के लिए प्रभावी ढंग से तैयार नहीं कर सकेगा। इस विचार में शिक्षक की भूमिका केवल परंपरा का संरक्षण करने वाले व्यक्ति की नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारी कराने वाले मार्गदर्शक की थी। यह शिक्षक दिवस की भावनात्मक परंपरा को आधुनिक शिक्षा की आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास था।
एक वर्ष बाद 4 सितंबर 2015 को मोदी ने शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर विद्यार्थियों से फिर संवाद किया। इस बार कार्यक्रम दिल्ली के मानेकशॉ सभागार में आयोजित हुआ। लगभग आठ सौ विद्यार्थी और साठ शिक्षक प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित थे, जबकि देश के नौ राज्यों से चुने गए विद्यार्थी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यक्रम से जुड़े। मोदी ने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की स्मृति में 125 रुपये का स्मारक सिक्का और 10 रुपये का प्रचलन सिक्का जारी किया। उन्होंने 'कला उत्सव' की वेबसाइट का भी शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यालयी स्तर पर कला, संगीत, नृत्य, नाटक और अन्य सृजनात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना था। इस प्रकार शिक्षक दिवस के कार्यक्रम में औपचारिक शिक्षा के साथ रचनात्मक प्रतिभा के विकास को भी स्थान दिया गया।
वर्ष 2015 में शिक्षक दिवस का अवसर एक विशेष सांस्कृतिक संयोग के कारण भी चर्चा में रहा। उसी वर्ष 5 सितंबर को जन्माष्टमी का पर्व भी पड़ा था। एक ओर भगवान श्रीकृष्ण की जयंती थी, जिन्हें भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में 'जगद्गुरु' कहा जाता है, दूसरी ओर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती थी, जिन्हें आधुनिक भारत में शिक्षक की प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। मोदी ने अपने संबोधन में इस संयोग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक ओर कृष्ण का जन्मोत्सव है और दूसरी ओर राधाकृष्णन का जन्मदिन। इस सांस्कृतिक संदर्भ के माध्यम से उन्होंने गुरु और शिक्षक की भूमिका पर बात शुरू की। उनका कहना था कि शिक्षक की पहचान उसके विद्यार्थियों की उपलब्धियों से होती है। विद्यार्थी अपने कार्य और उपलब्धियों से गुरु का नाम रोशन करता है। इस विचार में शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध परस्पर सम्मान तथा साझा उपलब्धि का था। गुरु की सफलता केवल स्वयं के ज्ञान या पद से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित होती है कि उसने कितने विद्यार्थियों को अपनी क्षमता विकसित करने में सहायता दी।
मोदी ने वर्ष 2015 के संवाद में शिक्षक के जीवन भर प्रासंगिक बने रहने का विचार भी दोहराया। उन्होंने कहा कि माँ बच्चे को जन्म देती है, लेकिन शिक्षक उसे जीवन की दिशा प्रदान करता है। उन्होंने शिक्षक की तुलना कुम्हार से की, जो मिट्टी को आकार देता है। यह भारतीय समाज में शिक्षक की भूमिका समझाने वाला पुराना और प्रभावशाली रूपक है। लेकिन इसे सावधानी से समझना चाहिए। विद्यार्थी निर्जीव मिट्टी नहीं है, जिसे शिक्षक मनचाहा आकार दे दे। प्रत्येक बच्चे का अपना व्यक्तित्व, संवेदना, प्रतिभा, रुचि और स्वतंत्र सोच होती है। शिक्षक का काम उसके व्यक्तित्व को अपनी आकांक्षा के साँचे में ढालना नहीं, बल्कि उसकी मौलिक क्षमताओं को विकसित होने में सहायता करना है। इसलिए शिक्षक की तुलना कुम्हार से करने में जितना महत्त्व आकार देने का है, उससे अधिक महत्त्व उस संवेदनशीलता का होना चाहिए जिसके माध्यम से शिक्षक समझ सके कि हर बच्चे की आवश्यकताएँ अलग हैं। अच्छी शिक्षा बच्चों को एक जैसी प्रतिकृतियों में नहीं बदलती। वह विविध प्रतिभाओं को विकसित होने का अवसर देती है।
मोदी के शिक्षक दिवस संवादों में एक बात बार-बार सामने आती थी कि बच्चों पर अभिभावकों की महत्वाकांक्षाएँ अनावश्यक बोझ न बनें। आधुनिक समाज में अनेक माता-पिता अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी या किसी प्रतिष्ठित पेशे में देखना चाहते हैं। कई बार वे बच्चों की रुचियों और क्षमताओं को समझे बिना उनके भविष्य का निर्णय करने लगते हैं। मोदी ने इस प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए बच्चों को स्वतंत्र रूप से विकसित होने देने का आग्रह किया। उनका कहना था कि प्रत्येक बच्चे में कोई न कोई विशिष्ट क्षमता होती है और उसे पहचानने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह विचार शिक्षा के आधुनिक बाल-केंद्रित दृष्टिकोण से जुड़ता है। बच्चे को केवल निर्देशों का पालन करने वाला विद्यार्थी नहीं, बल्कि जिज्ञासु, सृजनशील और स्वतंत्र व्यक्ति समझना आवश्यक है। हालाँकि बाल-केंद्रित शिक्षा का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है जब विद्यालयों की शिक्षण पद्धति, परीक्षा व्यवस्था और अभिभावकों की अपेक्षाओं में भी परिवर्तन आए। केवल प्रेरक भाषण से वह दबाव समाप्त नहीं होता जो प्रतिस्पर्धा-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था बच्चों पर डालती है।
मोदी के जीवन में गुरु और मार्गदर्शक की भूमिका पर विचार करें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मणराव माधवराव ईनामदार का नाम प्रमुखता से सामने आता है। संघ के कार्यकर्ताओं के बीच वे 'वकील साहब' के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने गुजरात में संघ के संगठनात्मक विस्तार और कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण में लंबा समय लगाया। मोदी अपने शुरुआती जीवन में संघ की शाखाओं और गतिविधियों से जुड़े। ईनामदार के साथ उनके संपर्क का संबंध इसी बाल्यावस्था और युवावस्था के संगठनात्मक अनुभव से था। मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था। इसलिए वर्ष 1967 में उनकी आयु आठ वर्ष होने का दावा सही नहीं है। उस समय वे लगभग सत्रह वर्ष के थे। आठ वर्ष की आयु के आसपास उनके संघ से शुरुआती संपर्क और बाद के वर्षों में ईनामदार के मार्गदर्शन को अलग-अलग ऐतिहासिक प्रसंगों के रूप में समझना चाहिए। ईनामदार ने युवा मोदी के संगठनात्मक विकास और सार्वजनिक जीवन की दिशा तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्ष 2008 में प्रकाशित अपनी गुजराती पुस्तक 'ज्योतिपुंज' में मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक कार्यकर्ताओं और प्रचारकों के जीवन का वर्णन किया। इसमें लक्ष्मणराव ईनामदार के प्रति उनका विशेष आदर दिखाई देता है। ईनामदार संघ की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जो व्यक्तिगत प्रचार और सार्वजनिक प्रतिष्ठा से अधिक संगठनात्मक कार्य तथा कार्यकर्ताओं के निर्माण को महत्त्व देती थी। मोदी ने उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, आत्मीयता, संगठन क्षमता और कार्यकर्ताओं को पहचानने की योग्यता को विशेष रूप से रेखांकित किया। यह संबंध पारंपरिक विद्यालयी गुरु-शिष्य संबंध से अलग था। यहाँ शिक्षा किसी पाठ्यपुस्तक या औपचारिक पाठ्यक्रम के माध्यम से नहीं, बल्कि संगठनात्मक जीवन, अनुशासन, व्यवहार और राजनीतिक-सामाजिक दृष्टिकोण के विकास के माध्यम से हो रही थी। मोदी के जीवन में ईनामदार की भूमिका को इसी रूप में समझना चाहिए। यह कहना उचित होगा कि ईनामदार उनके महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शकों में थे, लेकिन किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति का पूरा व्यक्तित्व केवल एक गुरु के प्रभाव से निर्मित नहीं होता। पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक वातावरण, व्यक्तिगत अनुभव, संगठनात्मक अवसर और स्वयं व्यक्ति के निर्णय भी उसकी जीवनयात्रा को आकार देते हैं।
मोदी के प्रारंभिक संगठनात्मक जीवन में एकनाथ रानाडे का नाम भी उल्लेखनीय है। रानाडे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और स्वामी विवेकानंद की स्मृति में कन्याकुमारी के विवेकानंद शिला स्मारक के निर्माण में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। बाद में उन्होंने विवेकानंद केंद्र की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सेवा, शिक्षा, व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्रीय चेतना के माध्यम से समाज में कार्य करना था। मोदी के प्रारंभिक जीवन से संबंधित विवरणों में रानाडे के संपर्क और विवेकानंद केंद्र के कार्यों में उनकी रुचि का उल्लेख मिलता है। इसे उनके वैचारिक विकास के एक प्रसंग के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन केवल इन संपर्कों से यह निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि रानाडे ने उनके पूरे राजनीतिक भविष्य की पहले से कल्पना कर ली थी। किसी व्यक्ति की बाद की सफलता को देखकर उसके शुरुआती जीवन की प्रत्येक घटना में भविष्यवाणी खोजने की प्रवृत्ति इतिहास लेखन में अक्सर दिखाई देती है। जीवनी और इतिहास के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। मोदी के संगठनात्मक जीवन में ईनामदार और रानाडे जैसे व्यक्तित्वों का प्रभाव महत्त्वपूर्ण था, लेकिन उस प्रभाव की वास्तविक प्रकृति को उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ही समझना चाहिए।
मोदी की राजनीतिक संप्रेषण शैली पर ध्यान दें तो उसमें शिक्षक जैसी कुछ विशेषताएँ अवश्य दिखाई देती हैं। वे सामान्यतः किसी विषय को सीधे निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उदाहरणों, प्रश्नों, तुलना और दोहराव के माध्यम से समझाने का प्रयास करते हैं। उनकी चुनावी सभाओं में श्रोताओं से प्रश्न पूछना, हाथ उठवाना, किसी वाक्य को दोहराने के लिए कहना और भीड़ की प्रतिक्रिया के अनुसार भाषण की गति बदलना एक परिचित शैली रही है। यह केवल मोदी की व्यक्तिगत विशेषता नहीं है। अनेक जननेताओं ने सार्वजनिक संप्रेषण में ऐसी विधियों का उपयोग किया है। लेकिन मोदी ने आधुनिक जनसंचार, दृश्य माध्यमों और व्यापक राजनीतिक प्रचार के साथ इस शैली को विशेष रूप से जोड़ा। वे किसी राजनीतिक आरोप को सामान्य नैतिक कहानी में बदल सकते हैं, जटिल आर्थिक मुद्दे को घरेलू उदाहरण से समझा सकते हैं और किसी सरकारी अभियान को सार्वजनिक संकल्प का रूप दे सकते हैं। ऐसी शैली में अध्यापन का एक तत्व मौजूद हो सकता है। लेकिन राजनीतिक भाषण और शिक्षण के बीच एक बुनियादी अंतर भी है। राजनीतिक भाषण प्रायः किसी विचार के पक्ष में जनसमर्थन प्राप्त करना चाहता है, जबकि आदर्श शिक्षण विद्यार्थी को विभिन्न विचारों की आलोचनात्मक जाँच करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
यही अंतर मोदी की शिक्षक-सदृश भूमिका को समझने के लिए आवश्यक है। एक नेता जब जनता से बार-बार प्रश्न पूछता है, तो वह कभी-कभी संवाद की प्रक्रिया आरंभ कर सकता है। लेकिन यदि प्रश्नों के उत्तर पहले से निर्धारित हों और श्रोताओं की भूमिका केवल सहमति प्रकट करने तक सीमित रह जाए, तो वह वास्तविक शिक्षण नहीं रह जाता। इसी प्रकार किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध आरोपों को व्यापक जनसमूह तक पहुँचाने के लिए बार-बार दोहराना प्रभावी राजनीतिक प्रचार हो सकता है, लेकिन उसे अपने आप ज्ञान का प्रसार नहीं कहा जा सकता। ज्ञान के लिए प्रमाण, संदर्भ, वैकल्पिक दृष्टिकोण और स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक हैं। मोदी ने कांग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों तथा प्रशासनिक विफलताओं को जनता के सामने बार-बार उठाया। उनके चुनावी अभियान में इन मुद्दों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन राजनीतिक प्रचार की इस क्षमता को अध्यापन की नैतिकता के बराबर मानने से पहले यह भी देखना होगा कि क्या उसमें असहमति, जिज्ञासा और स्वतंत्र निष्कर्ष के लिए पर्याप्त स्थान है। लोकप्रिय शिक्षक वह नहीं जो अपने हर शिष्य को अपने जैसा सोचने के लिए तैयार करे, बल्कि वह है जो शिष्य को अपने से भी आगे सोचने की क्षमता प्रदान करे।
नरेन्द्र मोदी के शिक्षक दिवस संवादों में बच्चों से जुड़े सामाजिक प्रश्नों को महत्त्व देने की प्रवृत्ति दिखाई देती थी। स्वच्छता, जल संरक्षण, बिजली की बचत, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी, खेलकूद और स्वास्थ्य जैसे विषय उनके संबोधनों में बार-बार आते थे। उन्होंने छोटे बच्चों को भी राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी के रूप में प्रस्तुत किया। स्वच्छ भारत अभियान के संदर्भ में उन्होंने बच्चों को स्वच्छता के संदेशवाहक के रूप में देखा। इसके पीछे यह विचार था कि बच्चे घर और समाज के व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं। अनेक सामाजिक अभियानों में ऐसा देखा गया है कि विद्यालयों में विकसित आदतें परिवारों तक पहुँच सकती हैं। स्वच्छता, टीकाकरण, पर्यावरण संरक्षण और जल बचत जैसे विषयों पर बच्चों की भागीदारी उपयोगी हो सकती है। लेकिन यहाँ भी यह समझना आवश्यक है कि बच्चों पर समाज की संरचनात्मक समस्याओं को हल करने की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। स्वच्छता के लिए नागरिकों का व्यवहार महत्त्वपूर्ण है, परंतु सुरक्षित जल, कचरा प्रबंधन, शौचालय, सीवर व्यवस्था और स्थानीय निकायों की क्षमता भी आवश्यक है। शिक्षक बच्चों में जिम्मेदारी की भावना विकसित कर सकता है, लेकिन वह प्रशासन की संस्थागत जिम्मेदारियों का स्थानापन्न नहीं हो सकता।
मोदी की राजनीतिक भाषा में सामाजिक समानता और जातिवाद के प्रश्न भी समय-समय पर उपस्थित रहे हैं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर जातिगत भेदभाव समाप्त करने, सामाजिक सद्भाव और विकास में सबकी भागीदारी की बात की है। लेकिन भारतीय राजनीति में जाति केवल सामाजिक कुरीति का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, ऐतिहासिक वंचना, राजनीतिक संगठन और संसाधनों के वितरण से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए जातिवाद के विरुद्ध भाषण देने और जाति आधारित राजनीतिक गठबंधनों का उपयोग करने के बीच तनाव अनेक राजनीतिक दलों के व्यवहार में दिखाई देता है। भाजपा सहित लगभग सभी बड़े दल चुनावी राजनीति में सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व और जातीय समीकरणों पर विचार करते हैं। मोदी की राजनीति भी इस व्यापक भारतीय चुनावी यथार्थ से अलग नहीं रही। इसलिए बच्चों के माध्यम से जातिगत भेदभाव समाप्त करने की आकांक्षा को एक सकारात्मक सामाजिक उद्देश्य के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन उसके लिए शिक्षा में समान अवसर, सामाजिक न्याय, भेदभाव-विरोधी संस्थाएँ और संवैधानिक मूल्यों का व्यावहारिक पालन आवश्यक है। किसी नई पीढ़ी को जातिवाद से मुक्त बनाने का अर्थ उसे जाति के ऐतिहासिक अन्याय से अनभिज्ञ रखना नहीं, बल्कि उसे समानता और मानव गरिमा के आधार पर समाज को समझने की क्षमता देना है।
बचत और संसाधनों के सदुपयोग की आदत पर मोदी का जोर भी उनके सार्वजनिक संवाद का हिस्सा रहा है। बच्चों को बिजली और पानी बचाने, अनावश्यक खर्च से बचने तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदार बनने की सलाह उन्होंने विभिन्न अवसरों पर दी। यह दृष्टिकोण व्यक्तिगत अनुशासन को राष्ट्रीय विकास से जोड़ता है। किसी एक व्यक्ति की छोटी बचत का आर्थिक प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन करोड़ों लोगों के व्यवहार में परिवर्तन सामूहिक स्तर पर महत्त्वपूर्ण परिणाम पैदा कर सकता है। फिर भी बचत का प्रश्न केवल व्यक्तिगत नैतिकता से नहीं जुड़ा है। कम आय वाले परिवारों के लिए बचत करना आर्थिक विवशताओं के कारण कठिन हो सकता है। दूसरी ओर बड़े औद्योगिक और प्रशासनिक ढाँचों में संसाधनों का अपव्यय व्यक्तिगत उपभोग से कहीं अधिक व्यापक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए बच्चों को संसाधनों के प्रति संवेदनशील बनाते समय सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं की जिम्मेदारी को भी समझाना आवश्यक है। यही शिक्षा का समग्र दृष्टिकोण होगा।
वर्ष 2015 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी शिक्षक दिवस के अवसर पर अध्यापक की भूमिका स्वीकार की। 4 सितंबर को उन्होंने राष्ट्रपति भवन परिसर स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद सर्वोदय विद्यालय में कक्षा ग्यारह और बारह के विद्यार्थियों को भारत के राजनीतिक इतिहास के बारे में पढ़ाया। दिल्ली सरकार के 'बी ए टीचर' कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित इस कक्षा में प्रणब मुखर्जी ने विद्यार्थियों के साथ अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने अपने अध्यापन जीवन को याद किया और सार्वजनिक पद की औपचारिकता से अलग होकर छात्रों से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि विद्यार्थी उन्हें राष्ट्रपति के बजाय 'मुखर्जी सर' कहकर संबोधित करें। इस प्रसंग का विशेष महत्त्व था। देश के राष्ट्रपति पद पर आसीन व्यक्ति विद्यार्थियों के बीच शिक्षक की भूमिका में स्वयं को अधिक सहज अनुभव कर रहा था। उनके लिए उस क्षण संवैधानिक पद की प्रतिष्ठा से अधिक महत्त्व ज्ञान साझा करने और बच्चों की जिज्ञासाओं से जुड़ने का था।
प्रणब मुखर्जी और मोदी के इन कार्यक्रमों में एक समानता और एक अंतर दोनों दिखाई देते थे। प्रणब मुखर्जी का संवाद एक औपचारिक कक्षा के निकट था, जिसमें उन्होंने राजनीतिक इतिहास पढ़ाया। मोदी का कार्यक्रम अधिक व्यापक सार्वजनिक संवाद और प्रेरक संबोधन का रूप लिए हुए था। दोनों ही नेताओं ने शिक्षक दिवस पर बच्चों से संपर्क स्थापित किया, लेकिन उनके अनुभव और भूमिकाएँ अलग थीं। प्रणब मुखर्जी स्वयं अध्यापन के पेशे से सार्वजनिक जीवन में आए थे। मोदी औपचारिक अर्थों में विद्यालय या विश्वविद्यालय के शिक्षक नहीं रहे थे। इसलिए दोनों की शिक्षक-सदृश भूमिका का स्वरूप भी अलग था। यह अंतर महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सार्वजनिक मंच पर बच्चों से बात कर लेना और किसी विषय का व्यवस्थित अध्यापन करना एक ही बात नहीं है। फिर भी दोनों कार्यक्रमों ने एक साझा विचार को सामने रखा—ज्ञान साझा करना केवल पेशेवर शिक्षकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के अनुभवी लोगों का भी दायित्व हो सकता है।
भारतीय धार्मिक परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को 'जगद्गुरु' कहा जाता है। उनकी वंदना में प्रचलित श्लोक है—
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥"
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद भारतीय दर्शन की सबसे प्रभावशाली गुरु-शिष्य परंपराओं में गिना जाता है। युद्धभूमि में अर्जुन अपने कर्तव्य, नैतिकता और कर्म के प्रश्नों को लेकर गहरे संशय में पड़ जाते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें केवल युद्ध करने का आदेश नहीं देते, बल्कि कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मा, प्रकृति, धर्म और कर्तव्य से जुड़े व्यापक दार्शनिक विचार प्रस्तुत करते हैं। गीता का महत्त्व इस बात में भी है कि उसमें संवाद और प्रश्नोत्तर की पद्धति है। अर्जुन प्रश्न पूछते हैं, संशय व्यक्त करते हैं और अपने सामने उपस्थित नैतिक कठिनाइयों को समझने का प्रयास करते हैं। श्रीकृष्ण विभिन्न दृष्टिकोणों से उत्तर देते हैं। धार्मिक आस्था के संदर्भ से अलग भी इस संवाद में शिक्षक और शिष्य के संबंध की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता दिखाई देती है—सीखने की प्रक्रिया प्रश्न से शुरू होती है। जहाँ प्रश्न करने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, वहाँ शिक्षण केवल आदेश का पालन बनकर रह सकता है।
यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्र में शिक्षक की भूमिका को किसी धार्मिक या आध्यात्मिक परंपरा की हूबहू प्रतिकृति के रूप में नहीं समझा जा सकता। लोकतांत्रिक शिक्षा का आधार स्वतंत्र चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक समानता और विचारों की बहुलता है। शिक्षक को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन उसे प्रश्नों से परे मान लेना शिक्षा के उद्देश्य के विरुद्ध होगा। गुरु की महानता अपने शिष्य की स्वतंत्रता को समाप्त करने में नहीं, बल्कि उसे अधिक सक्षम और विवेकशील बनाने में है। कबीर की गुरु-वंदना को भी इस अर्थ में पढ़ा जा सकता है कि गुरु सत्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। वह स्वयं सत्य का अंतिम और एकमात्र स्वामी नहीं बन जाता। यदि शिक्षक के प्रति श्रद्धा प्रश्न करने की क्षमता समाप्त कर दे, तो श्रद्धा अंधानुकरण में बदल सकती है। इसलिए गुरु परंपरा की वास्तविक आधुनिक सार्थकता ज्ञान और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने में है।
नरेन्द्र मोदी के शिक्षक दिवस संवादों का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर किया जाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों के साथ आत्मीयता स्थापित करने का प्रयास किया। अपने निजी अनुभव साझा किए, पढ़ाई और खेल के बीच संतुलन की बात की, बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालने का आग्रह किया और स्वच्छता तथा बचत जैसे व्यावहारिक विषयों को महत्त्व दिया। ये सभी विषय शिक्षा के व्यापक सामाजिक उद्देश्य से जुड़े थे। लेकिन प्रधानमंत्री की भूमिका शिक्षक से अलग होती है। शिक्षक का मुख्य दायित्व विद्यार्थी के ज्ञान और व्यक्तित्व का विकास है, जबकि प्रधानमंत्री का दायित्व नीतियाँ बनाना, सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करना और संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत शासन चलाना है। कोई प्रधानमंत्री बच्चों के सामने शिक्षक जैसी आत्मीय भूमिका निभा सकता है, लेकिन उस भूमिका की सार्थकता तभी होगी जब उसकी सरकार शिक्षा व्यवस्था को वास्तविक रूप से मजबूत करने के लिए भी काम करे। सार्वजनिक संवाद और संस्थागत सुधार दोनों आवश्यक हैं।
वर्ष 2014 और 2015 में मोदी ने बच्चों से जिन विषयों पर संवाद किया था, वे आगे चलकर भारतीय शिक्षा व्यवस्था में होने वाले बड़े नीतिगत परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए। 29 जुलाई 2020 को केंद्र सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को मंजूरी दी। इसने वर्ष 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, जिसे 1992 में संशोधित किया गया था, के स्थान पर शिक्षा सुधारों की नई रूपरेखा प्रस्तुत की। नई नीति में प्रारंभिक बाल्यावस्था की शिक्षा, मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं में प्रारंभिक शिक्षण, बुनियादी साक्षरता और गणितीय दक्षता, कौशल विकास, बहुविषयक अध्ययन, रचनात्मकता और आलोचनात्मक चिंतन को महत्त्व दिया गया। इसमें शिक्षक प्रशिक्षण और पेशेवर विकास को भी केंद्रीय स्थान मिला। शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता, निरंतर प्रशिक्षण और नई शिक्षण पद्धतियों के उपयोग से संबंधित कई प्रस्ताव सामने आए। यह परिवर्तन उस व्यापक धारणा से जुड़ा था कि इक्कीसवीं सदी की शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों और परीक्षाओं पर आधारित नहीं रह सकती। उसे विद्यार्थियों को बदलती तकनीकी तथा सामाजिक परिस्थितियों के लिए तैयार करना होगा।
नई शिक्षा नीति के अंतर्गत 'निपुण भारत' मिशन जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों में पढ़ने, लिखने और सामान्य गणित समझने की बुनियादी क्षमता विकसित करना था। इस अभियान के पीछे एक गंभीर शैक्षिक समस्या थी। भारत में विद्यालयों में नामांकन बढ़ने के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने और गणना करने की क्षमता विकसित नहीं कर पाते। कई बार बच्चा विद्यालय में वर्षों बिताने के बाद भी सामान्य पाठ को समझने या दैनिक जीवन की गणितीय समस्याएँ हल करने में कठिनाई अनुभव करता है। इसका प्रभाव आगे की पूरी शिक्षा पर पड़ता है। यदि प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ने और समझने की क्षमता विकसित नहीं हुई, तो इतिहास, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों का अध्ययन भी कठिन हो जाता है। इसलिए बुनियादी साक्षरता और गणितीय दक्षता पर जोर देना शिक्षा सुधार का आवश्यक पक्ष था। वर्ष 2022 में शुरू की गई 'पीएम श्री' विद्यालय योजना का उद्देश्य चयनित सरकारी विद्यालयों को नई शिक्षा नीति के अनुरूप आदर्श संस्थानों के रूप में विकसित करना था। लेकिन इन योजनाओं की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन उनके अंतर्गत चयनित विद्यालयों की संख्या या खर्च की गई राशि से अधिक बच्चों की सीखने की क्षमता, शिक्षकों की उपलब्धता और विद्यालयों की गुणवत्ता के आधार पर किया जाना चाहिए।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता और उनके प्रशिक्षण का प्रश्न भी शामिल है। किसी देश में शिक्षक दिवस मनाना, शिक्षकों को राष्ट्रीय पुरस्कार देना और सार्वजनिक भाषणों में उनकी प्रशंसा करना महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इससे शिक्षक की वास्तविक समस्याएँ अपने आप समाप्त नहीं होतीं। अनेक सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, एक ही शिक्षक पर कई कक्षाओं का दायित्व, गैर-शैक्षणिक कार्यों का दबाव, स्थानांतरण संबंधी कठिनाइयाँ और प्रशिक्षण के अवसरों की असमानता जैसी समस्याएँ बनी रही हैं। दूसरी ओर निजी विद्यालयों में कार्यरत अनेक शिक्षकों को अपेक्षाकृत कम वेतन और सीमित सामाजिक सुरक्षा का सामना करना पड़ता है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी स्थायी नियुक्तियों, शोध के संसाधनों और अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्न मौजूद हैं। यदि शिक्षक को समाज का निर्माता मानते हैं, तो उसकी पेशेवर गरिमा, आर्थिक सुरक्षा और बौद्धिक स्वतंत्रता की रक्षा भी करनी होगी। केवल गुरु-वंदना पर्याप्त नहीं होगी। जिस शिक्षक से समाज नई पीढ़ी को स्वतंत्र और विवेकशील बनाने की अपेक्षा करता है, उसे स्वयं भी सम्मानजनक और स्वतंत्र शैक्षिक वातावरण उपलब्ध होना चाहिए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेजी से विस्तार ने शिक्षक की भूमिका को और अधिक जटिल बना दिया है। आज विद्यार्थी किसी भी विषय पर तत्काल उत्तर प्राप्त कर सकता है। मशीन अनुवाद, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन व्याख्यान और एआई आधारित शिक्षण साधन शिक्षा की उपलब्धता बढ़ाने की क्षमता रखते हैं। लेकिन इनके साथ कुछ नई समस्याएँ भी पैदा हुई हैं। विद्यार्थी बिना समझे तैयार उत्तर लिख सकता है, गलत सूचनाओं को सही मान सकता है अथवा अपनी मौलिक सोच विकसित करने के बजाय तकनीकी साधनों पर अत्यधिक निर्भर हो सकता है। इसलिए भविष्य के शिक्षक का दायित्व केवल जानकारी उपलब्ध कराना नहीं होगा। उसे विद्यार्थियों को सिखाना होगा कि किसी जानकारी की सत्यता कैसे परखी जाए, विभिन्न स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन कैसे किया जाए और ज्ञान का उपयोग नैतिक तथा रचनात्मक कार्यों में कैसे हो। इस दृष्टि से शिक्षक का महत्त्व कम होने के बजाय बढ़ सकता है। मशीन उत्तर दे सकती है, लेकिन उत्तर की विश्वसनीयता, उसका संदर्भ और उसके सामाजिक परिणाम समझने की क्षमता विकसित करने में मानवीय शिक्षक की भूमिका बनी रहेगी।
इसीलिए शिक्षक को केवल 'गूगल गुरु' या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रतिस्पर्धी के रूप में देखना गलत होगा। तकनीक और शिक्षक के बीच संबंध विरोध का नहीं, सहयोग का होना चाहिए। जिस प्रकार पुस्तक के आविष्कार ने गुरु की आवश्यकता समाप्त नहीं की, उसी प्रकार इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी वास्तविक अध्यापन का अंत नहीं कर सकते। वे अध्यापन की विधियों को बदल सकते हैं। भविष्य का शिक्षक तकनीक का उपयोग करके प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति और आवश्यकता समझने में अधिक सक्षम हो सकता है। लेकिन इसके लिए शिक्षकों को नियमित प्रशिक्षण, विश्वसनीय डिजिटल संसाधन और शैक्षणिक निर्णय लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता देनी होगी। यदि तकनीक केवल निगरानी और प्रशासनिक नियंत्रण का माध्यम बन गई, तो वह शिक्षक की रचनात्मकता को सीमित भी कर सकती है। इसलिए शिक्षा में तकनीकी विकास के साथ मानवीय संवेदना, संवाद और स्वतंत्र चिंतन को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व में शिक्षक की भूमिका को लेकर जो आकर्षण वर्ष 2014 और 2015 में दिखाई दिया था, वह आगे चलकर विद्यार्थियों के साथ उनके अन्य सार्वजनिक संवादों में भी उपस्थित रहा। वर्ष 2018 से 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम ने इस संपर्क को एक नया स्वरूप दिया। इसके अंतर्गत प्रधानमंत्री विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों से परीक्षा के तनाव, समय प्रबंधन, आत्मविश्वास, प्रतियोगिता, तकनीक और जीवन के लक्ष्यों पर बातचीत करते रहे। यह शिक्षक दिवस के कार्यक्रम से अलग पहल थी, लेकिन उसके पीछे संवाद की एक समान शैली दिखाई देती थी। प्रधानमंत्री विद्यार्थियों से प्रश्न लेते हैं, अपने अनुभवों तथा उदाहरणों से उत्तर देते हैं और तनावमुक्त अध्ययन का संदेश देते हैं। इस कार्यक्रम ने परीक्षा से जुड़े मानसिक दबाव को राष्ट्रीय सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाने में भूमिका निभाई। लेकिन यहाँ भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि परीक्षा का तनाव केवल विद्यार्थियों की व्यक्तिगत मानसिकता से पैदा नहीं होता। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, सीमित अवसर, परीक्षा प्रणाली, पारिवारिक अपेक्षाएँ और शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता भी उसे प्रभावित करती हैं। इसलिए प्रेरक संवाद के साथ परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा में अवसरों की असमानता को दूर करने के प्रयास भी आवश्यक हैं।
मोदी के लिए इन कार्यक्रमों का राजनीतिक महत्त्व भी स्पष्ट था। भारत की विशाल युवा आबादी देश की सामाजिक और आर्थिक दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बच्चों और किशोरों से संवाद करने वाला राजनीतिक नेता उन परिवारों तक भी पहुँचता है जिनसे वे बच्चे जुड़े होते हैं। एक बच्चे से किया गया संवाद उसके माता-पिता, शिक्षकों और आसपास के समाज में चर्चा का विषय बन सकता है। इस दृष्टि से ऐसे कार्यक्रम व्यापक सार्वजनिक संप्रेषण का माध्यम भी होते हैं। लेकिन यह किसी एक राजनीतिक दल या नेता के लिए विशिष्ट घटना नहीं है। दुनिया के विभिन्न देशों में सार्वजनिक नेता विद्यालयों में जाते हैं, बच्चों से मिलते हैं और शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। प्रश्न यह नहीं कि कोई नेता बच्चों के बीच क्यों जाता है, बल्कि यह है कि उस संवाद की प्रकृति क्या है। क्या बच्चों को स्वतंत्र प्रश्न पूछने का अवसर मिलता है? क्या उनके वास्तविक अनुभवों और समस्याओं को सुना जाता है? क्या उनकी बातों का नीति निर्माण में कोई प्रभाव दिखाई देता है? और क्या शिक्षा के कार्यक्रमों में राजनीतिक प्रचार तथा स्वतंत्र शिक्षण के बीच आवश्यक मर्यादा बनी रहती है?
भारत की लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए यह संतुलन अत्यंत आवश्यक है। संविधान नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो इन अधिकारों का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग कर सकें। उन्हें राष्ट्र की ऐतिहासिक उपलब्धियों पर गर्व करना चाहिए, लेकिन इतिहास की त्रुटियों का अध्ययन करने से भयभीत नहीं होना चाहिए। उन्हें अपनी संस्कृति से परिचित होना चाहिए, लेकिन दूसरी संस्कृतियों के प्रति सम्मान भी रखना चाहिए। उन्हें संविधान और लोकतंत्र की संस्थाओं को समझना चाहिए, लेकिन सरकारों की नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए। किसी राजनीतिक नेता का शिक्षक-सदृश संवाद तभी व्यापक शैक्षिक आदर्श के निकट पहुँचेगा जब वह बच्चों को केवल निर्धारित राष्ट्रीय लक्ष्यों के प्रति प्रेरित न करे, बल्कि उन्हें उन लक्ष्यों के अर्थ और साधनों पर प्रश्न करने की स्वतंत्रता भी दे। स्वतंत्र चिंतन से डरने वाली व्यवस्था में शिक्षक की प्रतिष्ठा केवल औपचारिक सम्मान बनकर रह जाती है।
भारतीय गुरु परंपरा की सबसे सुंदर विशेषताओं में एक यह भी है कि उसमें ज्ञान को जीवन से अलग नहीं माना गया। कबीर के लिए ज्ञान केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं था। वह मनुष्य के व्यवहार, अनुभव और सत्य की खोज से जुड़ा था। बुद्ध की शिक्षाओं में प्रश्न और अनुभव का महत्त्व था। महावीर की परंपरा में आत्मसंयम और अहिंसा के साथ ज्ञान की भूमिका थी। उपनिषदों में गुरु और शिष्य के संवाद के माध्यम से अस्तित्व, आत्मा और ब्रह्म से जुड़े प्रश्न उठाए गए। आधुनिक भारत में महात्मा गांधी ने शिक्षा को श्रम, स्वावलंबन और चरित्र निर्माण से जोड़ने का प्रयास किया। रवींद्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा को प्रकृति, कला और स्वतंत्र सृजनशीलता से संबंधित किया। सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति और समानता का साधन बनाया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को वंचित समुदायों के आत्मसम्मान और अधिकारों की प्राप्ति का महत्त्वपूर्ण माध्यम माना। इन विभिन्न परंपराओं और विचारकों के बीच मतभेद थे, लेकिन वे शिक्षा को मनुष्य और समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में देखते थे। किसी आधुनिक प्रधानमंत्री की शिक्षक-सदृश भूमिका का मूल्यांकन करते समय शिक्षा की इस व्यापक भारतीय विरासत को ध्यान में रखना आवश्यक है।
विशेष रूप से सावित्रीबाई फुले का उदाहरण गुरु की महिमा को नया सामाजिक अर्थ देता है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब स्त्रियों और वंचित समुदायों की शिक्षा के सामने गहरे सामाजिक अवरोध थे, तब सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने विद्यालयों की स्थापना और शिक्षण के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का कार्य किया। सावित्रीबाई फुले को भारत की आधुनिक महिला शिक्षा की अग्रदूतों में गिना जाता है। उन्होंने सामाजिक विरोध का सामना करते हुए बालिकाओं को शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया। इस दृष्टि से शिक्षक केवल किसी विद्यार्थी का व्यक्तिगत मार्गदर्शक नहीं, बल्कि समाज की अन्यायपूर्ण संरचनाओं को बदलने वाला व्यक्ति भी हो सकता है। शिक्षक की कालजयी प्रतिष्ठा का आधार यही है कि उसने कितने लोगों को ज्ञान और गरिमा के ऐसे अवसर उपलब्ध कराए, जिनसे वे पहले वंचित थे। ज्ञान का वास्तविक लोकतंत्रीकरण शिक्षण की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है।
नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2015 के शिक्षक दिवस संवाद में कहा था कि शिक्षक की पहचान उसके विद्यार्थियों की उपलब्धियों से होती है। यह विचार किसी भी शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन करने के लिए उपयोगी कसौटी हो सकता है। यदि शिक्षक की सफलता विद्यार्थी के विकास में निहित है, तो सरकार की शिक्षा नीति की सफलता भी बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता, स्वतंत्रता और अवसरों में दिखाई देनी चाहिए। केवल विद्यालयों की संख्या, डिजिटल उपकरणों का वितरण, ऑनलाइन कार्यक्रमों के दर्शकों की संख्या अथवा प्रचार अभियानों की लोकप्रियता पर्याप्त नहीं है। यह देखना अधिक महत्त्वपूर्ण होगा कि बच्चे कितना समझ रहे हैं, कितने स्वतंत्र रूप से सोच पा रहे हैं और शिक्षा उन्हें अपने जीवन की परिस्थितियाँ बदलने में कितनी सहायता दे रही है। यह कसौटी मोदी सरकार पर भी लागू होती है और उससे पहले की सभी सरकारों पर भी। शिक्षा का प्रश्न किसी एक राजनीतिक दल की उपलब्धि या विफलता तक सीमित नहीं है। वह राष्ट्रीय विकास की दीर्घकालीन जिम्मेदारी है।
वर्ष 2014 और 2015 के उन दो शिक्षक दिवस आयोजनों को आज अक्टूबर 2026 के संदर्भ में देखने पर उनकी राजनीतिक तथा सामाजिक महत्ता और स्पष्ट होती है। एक नया प्रधानमंत्री राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों से संवाद की शैली स्थापित करने का प्रयास कर रहा था। वह बच्चों के बीच शिक्षक की तरह उपस्थित होकर अपने अनुभव साझा कर रहा था और उनके सामने जीवन के कुछ सामान्य लेकिन महत्त्वपूर्ण प्रश्न रख रहा था। उसका संदेश था कि केवल बड़े पद प्राप्त करना ही जीवन की सफलता नहीं है, बल्कि सार्थक काम करना अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह बच्चों को प्रश्न पूछने, खेलकूद में भाग लेने, स्वच्छता अपनाने और अपनी रुचियों के अनुसार जीवन की दिशा तलाशने के लिए प्रेरित कर रहा था। इसी के साथ एक अनुभवी राजनेता अपने सार्वजनिक व्यक्तित्व को ऐसी भूमिका से जोड़ रहा था जिसका सामाजिक सम्मान राजनीतिक पद से कहीं अधिक स्थायी हो सकता है। इन दोनों प्रक्रियाओं को एक साथ देखना आवश्यक है। केवल राजनीतिक रणनीति मानकर इस संवाद के उपयोगी शैक्षिक पक्षों को नकारना उचित नहीं होगा और केवल शिक्षक की महानता के संदर्भ में देखकर उसके राजनीतिक अर्थ को अनदेखा करना भी सही नहीं होगा।
राजनीतिक व्यक्तित्व की लोकप्रियता और शिक्षक की प्रतिष्ठा के बीच एक बुनियादी अंतर होता है। लोकप्रिय नेता अपनी बात पर लोगों की सहमति प्राप्त करता है। प्रभावशाली शिक्षक अपने विद्यार्थियों के भीतर ऐसी क्षमता विकसित करता है जिससे वे शिक्षक से असहमत होने का साहस भी प्राप्त कर सकें। लोकप्रिय नेता चाहता है कि उसके संदेश को व्यापक समर्थन मिले। शिक्षक चाहता है कि विद्यार्थी सत्य तक पहुँचने के लिए स्वतंत्र रूप से विचार कर सके। राजनीति में अनुयायियों की संख्या महत्त्वपूर्ण हो सकती है, जबकि शिक्षा में स्वतंत्र विचारकों की संख्या अधिक महत्त्वपूर्ण है। कोई राजनेता जब शिक्षक की भूमिका स्वीकार करता है, तो उसके सामने यही सबसे कठिन नैतिक चुनौती आती है। क्या वह बच्चों को अपने विचारों का अनुयायी बनाना चाहता है या उन्हें स्वतंत्र चिंतन की क्षमता प्रदान करना चाहता है? इस प्रश्न का उत्तर केवल भाषणों से नहीं, बल्कि शिक्षा संबंधी नीतियों, संस्थाओं की स्वतंत्रता और विद्यार्थियों के प्रति सार्वजनिक व्यवहार से मिलता है।
नरेन्द्र मोदी की 'प्रधानमंत्री' से 'शिक्षक-सदृश मार्गदर्शक' की भूमिका में दिखाई देने वाली यह यात्रा इसी व्यापक प्रश्न को जन्म देती है। क्या सार्वजनिक जीवन में अर्जित शक्ति को अगली पीढ़ी के स्वतंत्र बौद्धिक निर्माण का माध्यम बनाया जा सकता है? यदि ऐसा होता है, तो उसका प्रभाव किसी चुनावी विजय या राजनीतिक पद की अवधि से कहीं आगे तक जा सकता है। लेकिन यदि शिक्षा केवल किसी व्यक्तित्व, विचारधारा या सत्ता के प्रति निष्ठा विकसित करने का साधन बन जाए, तो गुरु की महान परंपरा अपने वास्तविक अर्थ से दूर हो जाएगी। शिक्षक का गुरुत्व इस बात में है कि वह अपने शिष्य को अपने कंधों पर खड़ा करके उससे आगे का संसार देखने की क्षमता दे। गुरु का सबसे बड़ा सम्मान उसकी जय-जयकार में नहीं, बल्कि शिष्य की स्वतंत्र उपलब्धि में निहित है। राजनीति में कालजयी होने की आकांक्षा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस अंतर को समझना होगा। क्योंकि इतिहास महान पदों पर बैठे व्यक्तियों को याद रख सकता है, लेकिन मनुष्यता उन शिक्षकों के प्रति विशेष कृतज्ञ रहती है जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान, विवेक, साहस और स्वतंत्रता का मार्ग दिखाया। कबीर का गुरु इसी अर्थ में गोविंद तक पहुँचाने वाला है—वह स्वयं मंजिल नहीं, मंजिल तक पहुँचने की चेतना है।


