अभूतपूर्व संकट में उच्च शिक्षा; जब विश्वविद्यालय ज्ञान नहीं, गुटबाजी और चाटुकारिता के केंद्र बन जाएँ

Higher Education Crisis: देश के विश्वविद्यालयों में बढ़ती गुटबाजी, राजनीतिक हस्तक्षेप और चाटुकारिता उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के भविष्य को प्रभावित कर रही है। जानिए विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता, पारदर्शिता और जवाबदेही का संकट।

Vineet Singh
Published on: 15 Aug 2026 4:01 PM IST (Updated on: 15 Aug 2026 4:09 PM IST)
Higher Education Crisis
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Higher Education Crisis: दर्शन’ शब्द केवल सुदर्शन के लिए ही नहीं। बल्कि उस दृष्टि के लिए भी होना चाहिए जो समाज को दिशा दे। विश्वविद्यालय इसी सुदृष्टि के निर्माण के केंद्र हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि देश के अनेक विश्वविद्यालय अपनी मूल गरिमा, शैक्षणिक स्वायत्तता और ज्ञान की परंपरा से दूर होते दिखाई दे रहे हैं।उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा संकट केवल संसाधनों की कमी नहीं है। उससे कहीं गंभीर संकट लामबंदी, गुटबाजी, राजनीतिक हस्तक्षेप और चाटुकारिता का है। जब विश्वविद्यालय में योग्यता से अधिक गुट महत्वपूर्ण हो जाए, विचार से अधिक व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाए और सत्य बोलने से अधिक सत्ता के निकट रहना सफलता का माध्यम बन जाए, तब शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे अपने उद्देश्य से भटकने लगती है।

विश्वविद्यालय का शिक्षक समाज का प्रकाशपुंज माना जाता है। वह केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता। बल्कि विद्यार्थी के भीतर प्रश्न करने, तर्क करने और सत्य को पहचानने की क्षमता पैदा करता है। लेकिन आज अनेक स्थानों पर शिक्षक अपने अधिकारों, पदोन्नति, नियुक्ति, स्थानांतरण और प्रशासनिक संघर्षों में इतना उलझा दिखाई देता है कि उसके सामने अपने मूल कर्तव्य का प्रश्न गौण हो जाता है। अधिकारों की लड़ाई आवश्यक हो सकती है। लेकिन जब अधिकार कर्तव्य पर भारी पड़ जाएँ तो शिक्षा की आत्मा घायल होती है।

सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब विश्वविद्यालयों में गुटबाजी संस्थागत संस्कृति बन जाती है। एक गुट दूसरे को हटाने में ऊर्जा लगाता है। दूसरा अपने प्रभाव को बचाने में। और इस पूरी लड़ाई के बीच सबसे बड़ा नुकसान उस विद्यार्थी का होता है, जो विश्वविद्यालय में अपना भविष्य बनाने आया है। शिक्षक और अधिकारी यदि व्यक्तिगत समीकरणों और राजनीतिक संरक्षण के आधार पर खेमों में बँट जाएँ तो शोध, अध्यापन और प्रतिभा का मूल्यांकन निष्पक्ष कैसे रहेगा?

कुलपति जैसे पद विश्वविद्यालय की नैतिक रीढ़ होते हैं। इसलिए जब किसी विश्वविद्यालय के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति पर गंभीर प्रशासनिक या भ्रष्टाचार संबंधी आरोप लगते हैं, अथवा वह न्यायिक प्रक्रिया में उलझता है, तो केवल एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं होती,पूरे विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगता है। आरोप सिद्ध होना न्यायालय का विषय है। लेकिन आरोपों की गंभीरता विश्वविद्यालयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियुक्तियों की निष्पक्षता पर पुनर्विचार की आवश्यकता अवश्य पैदा करती है।

आज का युवा सब देख रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला नौजवान जानता है कि उसकी एक-एक वर्ष की मेहनत उसके जीवन की दिशा तय करती है। विश्वविद्यालय में यदि भर्ती वर्षों तक अटकी रहे, शोध का मूल्यांकन पक्षपात से प्रभावित हो, योग्य शिक्षक अवसर से वंचित हों और संस्थान आंतरिक राजनीति में उलझे रहें, तो इसका सीधा प्रहार युवा के भविष्य पर होता है।

यह मान लेना भूल होगी कि युवा हमेशा चुप रहेगा। वह अभी भी रुका नहीं है। जिस दिन नई पीढ़ी यह प्रश्न पूछने लगेगी कि “हमारे विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर हैं या गुटों की प्रयोगशाला?” उस दिन व्यवस्था को अपने भीतर झाँकना पड़ेगा।

शिक्षक को भी यह स्मरण करना होगा कि वह केवल कर्मचारी नहीं, गुरु है। गुरु का अर्थ अधिकारों से विमुख होना नहीं। बल्कि अधिकार और कर्तव्य दोनों का संतुलन स्थापित करना है। शिक्षक अपने अधिकार के लिए संघर्ष करे। लेकिन अपने विद्यार्थी के अधिकार को न भूले। विद्यार्थी का सबसे बड़ा अधिकार है,उसे निष्पक्ष शिक्षा, योग्य शिक्षक, पारदर्शी व्यवस्था और अवसर मिले।

उच्च शिक्षा को राजनीतिक प्रभाव से पूर्णतः मुक्त करना शायद व्यावहारिक रूप से कठिन हो। लेकिन उसे राजनीतिक गुटबाजी और चाटुकारिता से मुक्त करना अनिवार्य है। विश्वविद्यालय में पद योग्यता से मिलें, सम्मान ज्ञान से मिले, नेतृत्व क्षमता और चरित्र से तय हो तथा असहमति को अपराध न माना जाए।

देश का भविष्य संसदों में ही नहीं, कक्षाओं में भी लिखा जाता है। यदि कक्षा में बैठा युवा निराश हुआ तो आने वाले भारत की बौद्धिक शक्ति कमजोर होगी। इसलिए विश्वविद्यालयों को अपनी दीवारों पर केवल महान शिक्षाविदों के चित्र लगाने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें उनके आदर्शों को अपने प्रशासन और अध्यापन में उतारने की आवश्यकता है।

समय अभी भी हाथ से निकला नहीं है। नौजवानों ने प्रश्न पूछना शुरू किया है और प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी अपनी मेहनत से व्यवस्था को आईना दिखा रहे हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि विश्वविद्यालय अपने भीतर की लामबंदी, गुटबाजी, राजनीतिक संरक्षण और चाटुकारिता से ऊपर उठें।

क्योंकि शिक्षक जब प्रकाशपुंज होता है तो पीढ़ियाँ प्रकाशित होती हैं। और जब शिक्षक स्वयं गुटों की राजनीति में खो जाता है, तो अंधकार केवल कक्षा में नहीं, पूरे समाज में फैलता है। अब समय विश्वविद्यालयों को बचाने का है,पदों को नहीं, प्रतिष्ठा को; गुटों को नहीं, ज्ञान को; चाटुकारिता को नहीं, चरित्र को; और सबसे बढ़कर, युवा के भविष्य को।

( लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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