Diwali 2026: कैसे मिटेगा रिश्तों का अंधेरा

Diwali 2026: दीपावली पर घर की सफाई के साथ रिश्तों में जमी नाराजगी, अहंकार और दूरियां भी मिटाएं। जानिए परिवार में प्रेम, संवाद और सम्मान क्यों जरूरी हैं।

Anshu Sarda Anvi
Published on: 1 Nov 2026 1:18 PM IST
how to improve family relationships | Diwali 2026 Latest Update | Newstrack Hindi News
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how to improve family relationships | Diwali 2026 Latest Update | Newstrack Hindi News

Diwali 2026: दीपावली पर हम घर का कोना-कोना खंगालते हैं। वर्षों से बंद अलमारियां खुलती हैं, अनुपयोगी सामान बाहर फेंका जाता है, दीवारों पर जमी धूल साफ होती है और घर को रोशनी से भरने की तैयारी होती है। लेकिन एक सफाई ऐसी भी है, जिसे करने की हिम्मत हम अक्सर नहीं जुटा पाते। यह सफाई है रिश्तों के भीतर जमी नफरत, मनमुटाव, अहंकार और स्वार्थ की। जिन अपनों के साथ कभी एक थाली में खाना खाते थे, आज उन्हीं के साथ बैठना मुश्किल हो गया है। एक ही परिवार के सदस्य एक-दूसरे से बात करने से बचते हैं, फिर भी दीपावली पर घर के दरवाजे पर रोशनी की झालर लगाकर हम दुनिया को बताते हैं कि हमारा घर खुशियों से भरा है। सवाल है कि जब घर के भीतर ही मन बुझा हुआ हो, रिश्तों में कड़वाहट हो और अपनों के बीच दूरियां बढ़ रही हों,तब इतने दीये जलाने का अर्थ क्या है? क्या दीपावली केवल घर को चमकाने का त्योहार है या अपने भीतर और अपने रिश्तों में पसरे अंधेरे को पहचानने का भी अवसर है?

आज जब परिवारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं और छोटे परिवारों में भी आपसी तनाव बढ़ रहा है, तब दीपावली का एक अर्थ यह भी होना चाहिए कि हम अपने जीवन की कॉपी खोलें। उसके पुराने पन्नों को पलटें, आज के पन्नों पर नजर डालें और ईमानदारी से देखें कि हमने रिश्तों के खाते में क्या जोड़ा है और क्या गंवाया है। अतीत के उन पन्नों को आज पलटने पर बहुत कुछ सुंदर दिखाई देता है। लेकिन यह भी सच है कि पुराने संयुक्त परिवारों में मतभेद और मनभेद भी थे। अधिकांशतः महिलाओं की इच्छाएं दबती थीं, व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित थी और परिवार की इज़्ज़त के नाम पर कई अन्याय भी सहे जाते थे। इसलिए अतीत के पन्ने हमेशा आदर्श वाले नहीं होते हैं, उनमें भी दुख, दर्द, खुशी और सहयोग सब कुछ होता है। आवश्यकता है कि उसमें जो गलतियां हुई है, उनसे सबक लें। कभी-कभी अतीत के पन्नों का इतना गौरव गान कर दिया जाता हैं कि उसके पीछे उस समय के अनावश्यक नियंत्रण को भी ढक दिया जाता है।

ऐसे में लियो टॉल्स्टॉय का एक उद्धरण याद आ रहा है -

'सभी सुखी परिवार एक जैसे होते हैं, जबकि प्रत्येक दुखी परिवार अपने-अपने तरीके से दुखी होता है।'

अपनी शिक्षा के दौरान परीक्षा देकर वापस आते हुए कितनी बार यह भी सोचा होगा कि एक बार फिर से वह प्रश्न पत्र हल करने को मिल जाए तो जो गलती की है या जिन प्रश्नों के उत्तर जानते थे पर उस समय नहीं लिख पाए और रह गएं, उनको फिर से लिख दिया जाए पर ऐसा संभव नहीं होता। कई बार मेहनत के बाद भी परिणाम हमारे अनुसार नहीं होते, ऐसे में हताशा घेर लेती है, गुस्सा या खीझ भी आती है। समय निकल जाता है। अपने मन के मुताबिक परिणाम चाहने के लिए अपने मन मुताबिक उत्तर नहीं लिखना होता है बल्कि अपना उत्तर उन प्रश्नों के अनुसार ही लिखना होता है। हर परिस्थिति को अपने अनुसार ढालने की कोशिश में कितने ही लोग गलती कर बैठते हैं, जो कि उनकी नजर में सही हो सकती है पर यह हो सकता है वह गलती सारे माहौल को ही पलट दे। ऐसे में सब कुछ सही होने के बाद भी अगर कुछ कमी रह जाती है तो यही कमी आत्म चिंतन करने को मजबूर करती है, अपनी कमियों को पहचानने, गलतियों से सीखने को और स्वयं को बेहतर बनाने के लिए कहती है। अपनी कॉपी के पन्नों को ठीक से लिखना होगा क्योंकि इन पन्नों पर लिखे गए शब्दों को बिगाड़ने या हटाने के लिए कोई भी रबर नहीं बनी है। जिंदगी हमेशा सब कुछ अच्छे से चलते हुए दिखाने का नाम नहीं बल्कि ठहर कर उस पर भी विचार करने का प्रयास होती है कि अतीत को कैसे अच्छी तरह समझा जाए क्योंकि शिक्षा हमेशा सफलता या सुख में नहीं छिपी होती बल्कि दुख और असफलता से अधिक सीखने को मिलती है।

परिवारों में बदलते रिश्तों की चर्चा करते समय एक ऐसी पीढ़ी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो आज खुद एक अनकहे मानसिक संघर्ष से गुजर रही है। यह लगभग 40 से 60 वर्ष की उम्र के वह पीढ़ी हैं, जो न पूरी तरह घर के बड़े रह गए हैं और न ही घर के बच्चों की तरह अपनी जरूरतों और इच्छाओं के साथ जी पा रहे हैं। एक तरफ उम्रदराज होते माता-पिता हैं, जिनके स्वास्थ्य, अकेलेपन और भावनात्मक सुरक्षा की चिंता है। तो दूसरी तरफ युवा होते बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई, नौकरी, करियर, विवाह और भविष्य की जिम्मेदारियां हैं। आज की पीढ़ी आत्मनिर्भर है। उसके पास अपने सपने, अपनी प्राथमिकताएं हैं और निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी। यह सकारात्मक बदलाव है। लेकिन इसके साथ ही व्यक्तिगत अहंकार, अपेक्षाओं और आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों को जटिल भी बनाया है। इन दोनों पीढ़ियों के बीच खड़ी पीढ़ी से अपेक्षा की जाती है कि वे माता-पिता की तरह समझदार और धैर्यवान बनें, बच्चों के लिए दोस्त की तरह उपलब्ध रहें, आर्थिक रूप से मजबूत रहें और परिवार की हर समस्या का समाधान भी निकालें। लेकिन उनकी अपनी थकान, असुरक्षा, अधूरी इच्छाओं और मानसिक तनाव के बारे में पूछने वाला अक्सर कोई नहीं होता। माता-पिता के सामने वे अब भी बच्चे हैं, जिन्हें सलाह और निर्देश मिलते हैं, जबकि अपने बच्चों के सामने वे ऐसे अभिभावक हैं, जिनसे हर परिस्थिति में समझदारी और आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है।

यह पीढ़ी दो अलग-अलग पाटों के बीच पिस रही है। उसे अपने माता-पिता की परंपराओं पर भी चलना पड़ता है जबकि बच्चों की अपनी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्पेस को प्राथमिकता देनी होती है। इन दोनों के बीच मध्य आयु के लोग कई बार अपनी बात कहने से भी बचते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं किसी एक पक्ष की नाराजगी न झेलनी पड़े। कई बार सबको खुश रखने की कोशिश में खुद ही भीतर से टूटने लगते हैं। यह भी समझना होगा कि इस उम्र के लोगों को केवल जिम्मेदारियों की मशीन समझना गलत है। उनके भी सपने हैं, उन्हें भी आराम चाहिए, उन्हें भी किसी के सामने अपने मन की बात कहने का अधिकार है। उन्हें भी कभी-कभी यह सुनने की जरूरत होती है कि तुमने बहुत किया, अब अपने लिए भी थोड़ा जी लो। घर के बड़े-बुजुर्गों को भी इस पीढ़ी की स्वतंत्रता समझनी होगी, उनकी मानसिक और भावनात्मक जरूरतों को महत्व देना होगा।

जेन योलेन ने अपनी किताब 'सिस्टर लाइट, सिस्टर डार्क' में लिखा है -

' अपने बच्चे से बहुत अधिक अपेक्षा न रखें, वह आपके प्यार में पलेगा-बढ़ेगा... लेकिन अगर आप उस पर बहुत अधिक दबाव डालेंगे, तो वह आपसे दूर हो जाएगी। बच्चा आपका अपना नहीं, बल्कि पालन-पोषण का अधिकार है। हो सकता है वह वैसा न बने जैसा आप उसे बनाना चाहते हैं, लेकिन वह वैसा ही बनेगा जैसा उसे बनना चाहिए। याद रखें, कहावत है कि 'लकड़ी बीस साल तक पानी में पड़ी रहे, फिर भी मछली नहीं बनती।'

उन्हें यह समझना होगा कि कहीं उन्होंने एक ऐसी पीढ़ी तो तैयार नहीं कर दी है, जो अपने माता-पिता के सामने हमेशा छोटी है और अपने बच्चों के सामने हमेशा बड़ी है। उसे दोनों तरफ समझदार होना है। लेकिन उसके अपने मन को समझने वाला कोई नहीं है। परिवार का अर्थ यह नहीं कि कोई एक सदस्य सबकी खुशियों के लिए अपनी पूरी जिंदगी और समय दे दे। परिवार का अर्थ है कि हर सदस्य दूसरे के लिए थोड़ी जगह बनाए।

दीपावली पर घरों में हजारों दीये जलेंगे। मिठाइयां बंटेंगी, उपहारों का आदान-प्रदान होगा और सोशल मीडिया पर खुशहाल परिवारों की तस्वीरें दिखाई देंगी। लेकिन इस बार कोशिश करें कि उत्सव की चमक के पीछे कोई अपना उदास न रह जाए। घर के बड़ों की खामोशी को सुनें, किसी भाई की नाराजगी को समझें, किसी बहन की शिकायत को जगह दें और बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, अपना समय भी दें। यह संभव नहीं कि हर पुराना विवाद इसी दीपावली खत्म हो जाए, लेकिन रिश्तों को सुधारने की शुरुआत तो की ही जा सकती है।

जीवन की कॉपी के पुराने पन्नों पर लिखे हर्फ अब बदले नहीं जा सकते। उनमें दर्ज अच्छी और कड़वीं दोनों तरह की यादें किसी की भी पूंजी हैं। और उन कड़वी यादों और गलतियों से मिला सबक सबसे बड़ी सीख। लेकिन आज का पन्ना अभी खाली है। उस पर क्या लिखना है, यह प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में है। क्यों न इस दीपावली पर सभी अपने अहंकार की कुछ पंक्तियां मिटाएं, शिकायतों के कुछ हिसाब बंद करें और प्रेम, संवाद तथा सम्मान के कुछ नए अध्याय जोड़ें। घर की दीवारों पर जमी धूल तो झाड़ू से साफ हो जाती है। लेकिन रिश्तों पर जमी धूल हटाने के लिए संवेदनशीलता, धैर्य, साहस के साथ-साथ इच्छा चाहिए। दीये बुझ जाएंगे, झालरें उतर कर वापस अंदर चलीं जाएंगी और त्योहार की रौनक भी कुछ दिनों में खत्म हो जाएगी। लेकिन अपनों को दिया गया सम्मान और उनके साथ बांटा गया अपनापन ही जीवनभर याद रहेगा।

( लेखिका प्रतिष्ठित स्तंभकार हैं।)

Anshu Sarda Anvi
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Anshu Sarda Anvi

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