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राख में तलाश
Human Social Behavior: हादसे के बाद जली बस की राख में सामान तलाशते लोग, सड़क हादसों में लूट और वाराणसी में मृत बुजुर्गों की संपत्ति पर दावेदारी क्या बताती है? पढ़िए इंसानी व्यवहार और सामाजिक विकृति पर सवाल उठाता लेख।
Human Greed Social Behavior Psychology
Human Social Behavior: काफी कुछ देख लेने के बावजूद इंसानी व्यवहार अब भी हमें अचंभित करना नहीं छोड़ता। तमाम घटनाएं देख, सुन पढ़ लेने के बावजूद अब भी निःस्पृहता नहीं बन पाई है। अब बेचैनी नहीं होती लेकिन विस्मय अवश्य होता है कि अब कितनी गहराई और देखनी बाकी बची है।
दो खबरें इधर पढ़ीं जिन्होंने इस विस्मयता को और बढ़ाया और कुछ सवालों के जवाब भी दिखा दिए।
पहली घटना यमुना एक्सप्रेस वे की थी। आगरा से नोएडा को जोड़ने वाले इस एक्सप्रेस वे पर एक्सिडेंटों की कोई कमी नहीं रही है सो एक और हादसे की खबर रूटीन सी लगी। एक चलती स्लीपर बस में आग लग गई और कई लोग जलकर मारे गए। ऐसे हादसे कोई नई बात नहीं। ये भी अब दहलाते नहीं हैं।
लेकिन घटना के 3 दिन बाद अखबार के किसी कोने में पड़ी खबर पढ़ी जिसमें जिक्र था कि सड़क किनारे खड़ी जली बस की राख में आसपास के गांव के लोग, आते जाते राहगीर ढूंढ रहे हैं कि कुछ काम का सामान मिल जाये। उस अभागी बस के अभागे यात्री जो मर गए, जल गए या दहशत में बदहवासी में चले गए, उनका समान बस में पड़ा रहा गया। कुछ साबुत, कुछ जला और कुछ अधजला। वैसे ही जैसे चिता की राख में शरीर का कुछ अंश, अस्थियां और कुछ अन्य चीजें बच रहती हैं।
बस की चिता रूपी राख में वैसे ही कुछ न कुछ रह गया था। लोग उसी में ढूंढने में जुटे थे कि कहीं कुछ काम का, कुछ कीमती सामान मिल जाये। कुछ नहीं तो बस में जले पड़े तांबे या अलुमिनियम के तार भी लोग बोरों में भर कर ले गये। कहीं बेचने के लिए। चंद रुपयों के लिए।
कहा जाता है कि अगले 20 साल में हम विकसित राष्ट्र हो जाएंगे। ये भी बताया जाता है कि हम अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो चुके हैं। ये भी सुनते आए हैं कि हम धर्म, शांति, संस्कृति और आध्यात्मिक भूमि के लोग हैं।
लेकिन फिर भी चिता की राख से सोने का टुकड़ा ढूंढने की मजबूरी?
मन परेशान कतई नहीं लेकिन विस्मय में है।
उस रील को देख कर भी विस्मय होता है जिसमें किसी पलट गए ट्रक से सामान लूटते लोग दिखाए जाते हैं। हाइवे पर फैल गए घी को कटोरों में भर भर कर भागते लोग दिखते हैं। उलट गए टैंकर से रिसते डीज़ल को बाल्टियों में भर कर ले जाते लोग दिखते हैं। विस्मय टैब भी होता है जब किसी कचरे के ढेर में फेंके गए एक्सपायर्ड मिठाई के डिब्बे कार-बाइक वाले भी उठा कर ले जाते दिखते हैं।
दसियों साल पहले सुना करते थे कि इलाहाबाद शहर के भीतर कालका मेल पटरी से उलट गई थी और आसपास की बस्तियों कालोनियों के लोग ही नहीं बल्कि पुलिसवाले भी मर चुके, मरणासन्न या घायल पड़े यात्रियों के पर्स, जेवर, समान लूट ले गए थे।
ये किस्सा सुन कर उस समय और बहुत लंबे समय तक मन परेशान रहताथा कि भला ऐसे कैसे मुमकिन है? क्या ऐसा भी कोई कर सकता है?
कई दशक बीत चुके हैं। अब मन परेशान नहीं होता। अब ऐसा सब नॉर्मल लगता है। अब सिर्फ विस्मय है। विद्रूप है। ट्रैजिक कॉमेडी है।
इसी विस्मय की दूसरी खबर पढ़ने को मिली जो वाराणसी की थी। मोक्ष की नगरी। शिव की नगरी। जहां आज भी तमाम वृद्ध लोग जिंदगी की शाम इस आशा में बिताते हैं कि यहीं चिरकालीन निद्रा में लीन होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लेंगे। ऐसे ही किसी एक आश्रय स्थल की जानकारी बताती है दर्जनों वृद्धों की मृत्यु नितांत अकेले में हुई। अंत समय में कोई परिजन, कोई अपना नहीं। लेकिन मरने के बाद उन्हीं के अपने सगे पूरी मुस्तैदी से आ जाते हैं। शोक के लिए नहीं, डेथ सर्टिफिकेट के लिए, कुछ माल-मता बचा हो तो उसे कब्जे में लेने के ये।
क्या फर्क है वाराणसी के आश्रम में मुर्दों की गठरी, दस्तावेज पर हक जमाने वालों, चिता बनी बस की राख को कुरेदते राहगीरों और कालका मेल की मृतप्राय सवारियों की घड़ी-चेन-अंगूठी लूटते लोगों में?
अब फर्क नज़र नहीं आता। आना भी नहीं चाहिए। फर्क सिर्फ मौके का है। कोई आम की नुमाइश से आम लूटता है तो कोई सड़क किनारे सजे गमले। मौके अलग अलग हैं। वृत्ति वही है।
ये भी समझ में आता है कि मामला गरीबी का नहीं है। ऐसा नहीं कि गरीबी की मजबूरी राख कुरेदने को विवश करती है। तो फिर क्या है वजह?
क्या 1769 से लेकर 1943 तक अलग अलग वर्षों में आये दुर्भिक्ष इस जीन का कारण हैं? क्या पैसे और अवसरों में घोर असमानता इसकी वजह है?
क्या है वजह कि मुफ्त रेवड़ी वाली स्कीमें हमें खरीद लेती हैं। एक पौव्वे में वोट बिक जाता है।
पता नहीं इस पर रिसर्च हुई है कि नहीं लेकिन होनी तो चाहिए। हम भी कारण जानें क्योंकि भीतर से हम सब भी शायद किसी न किसी रूप में उसी विकृति को जी रहे होंगे। क्या पता वो कब सामने आ जाये?
( लेखक पत्रकार हैं।)


