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हंगामा है क्यूँ बरपा
Planning Commission vs NITI Aayog: योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग बनाने का फैसला क्यों हुआ? जानिए पंचवर्षीय योजनाओं का इतिहास, नीति आयोग की उपलब्धियाँ, सीमाएँ और भारत की आर्थिक नियोजन व्यवस्था में आए बदलाव।
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Planning Commission vs NITI Aayog: मशहूर गजल गायक गुलाम अली ने अकबर इलाहाबादी की गजल 'हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है' गाकर दुनियाभर में शोहरत बटोरी थी। यह गजल केवल शराब पीने पर उठे हंगामे की बात नहीं करती, बल्कि समाज की उस प्रवृत्ति पर व्यंग्य भी करती है जिसमें किसी घटना के वास्तविक महत्त्व को समझने के बजाय उस पर शोर मचाना अधिक जरूरी समझा जाता है। जनवरी 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लगभग पैंसठ वर्ष पुराने योजना आयोग को समाप्त करके उसके स्थान पर 'नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' अर्थात नीति आयोग के गठन का फैसला किया, तब यह गजल एक बार फिर प्रासंगिक लगने लगी थी। विपक्ष के एक बड़े हिस्से ने इस फैसले को देश की स्थापित आर्थिक नियोजन व्यवस्था पर प्रहार बताया। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने सरकार पर जवाहरलाल नेहरू की विरासत को मिटाने का आरोप लगाया। लेकिन इस विरोध के बीच एक बुनियादी प्रश्न पीछे छूट गया कि जिस संस्था की स्थापना स्वतंत्र भारत की प्रारंभिक आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की गई थी, क्या उसका मूल स्वरूप इक्कीसवीं सदी की बदलती अर्थव्यवस्था के लिए अब भी उतना ही उपयोगी था? क्या किसी संस्था की ऐतिहासिक भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण हो सकती है कि बदलते समय में उसकी प्रासंगिकता की समीक्षा करना ही अनुचित मान लिया जाए? इतिहास से सबक लेने का अर्थ केवल अतीत की उपलब्धियों को याद करना नहीं, बल्कि यह भी समझना है कि समय के साथ संस्थाओं और व्यवस्थाओं में परिवर्तन क्यों आवश्यक हो जाता है।
कांग्रेस की राजनीति का यह विरोधाभास इसलिए और दिलचस्प था क्योंकि योजना आयोग की उपयोगिता पर सवाल स्वयं कांग्रेस के भीतर से उठते रहे थे। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1980 के दशक में योजना आयोग के कामकाज से असंतोष व्यक्त किया था। वर्ष 1985 में उन्होंने आयोग से जुड़े अधिकारियों के लिए 'बंच ऑफ जोकर्स' जैसी तीखी टिप्पणी की थी, जिसका उल्लेख बाद के राजनीतिक विमर्श में बार-बार हुआ। उस समय आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. मनमोहन सिंह थे, जो आगे चलकर देश के वित्त मंत्री बने और फिर दस वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे। मनमोहन सिंह की आर्थिक सोच का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि उन्होंने 1991 में वित्त मंत्री के रूप में उदारीकरण, निजी निवेश और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारत के गहरे संबंधों का रास्ता खोला। इन सुधारों ने उस आर्थिक ढाँचे को ही बदलना शुरू कर दिया था जिसके अनुरूप योजना आयोग बनाया गया था। मनमोहन सिंह सहित अनेक अर्थशास्त्री समय-समय पर बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप नियोजन व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता स्वीकार करते रहे। इसके बावजूद योजना आयोग की संस्थागत संरचना में उतने व्यापक परिवर्तन नहीं हुए जितने आर्थिक व्यवस्था में हो चुके थे। जिस संस्था की उपयोगिता पर कांग्रेस के अपने प्रधानमंत्रियों के दौर में सवाल उठ चुके थे, उसी को बदलने के फैसले पर कांग्रेस का तीखा विरोध स्वाभाविक रूप से बहस का विषय बना। हालाँकि यह भी समझना चाहिए कि किसी संस्था की कार्यशैली की आलोचना और उसे पूरी तरह समाप्त करने का समर्थन एक ही बात नहीं हैं। कांग्रेस की ओर से उठी आपत्तियों में योजना आयोग की कमियों को सुधारने के बजाय उसकी जगह नई संस्था बनाने की आवश्यकता पर भी सवाल शामिल थे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस प्रकार के प्रश्न पूछना अनुचित नहीं है, लेकिन उनका उत्तर संस्थागत उपलब्धियों और कमियों के आधार पर दिया जाना चाहिए, केवल राजनीतिक विरासत के आधार पर नहीं।
बदलाव की आवश्यकता का संकेत 'नीति' और 'योजना' शब्दों के अर्थ में भी खोजा जा सकता है। योजना का सामान्य अर्थ किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संसाधनों, समय और कार्यों का व्यवस्थित निर्धारण है। इसके विपरीत नीति व्यापक सिद्धांतों, प्राथमिकताओं और निर्णयों की वह दिशा निर्धारित करती है जिसके आधार पर विभिन्न योजनाएँ बनाई और लागू की जाती हैं। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। किसी देश के विकास के लिए नीतियाँ भी चाहिए और योजनाएँ भी। लेकिन जब अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदलता है तो दोनों के बीच संबंधों की पुनर्समीक्षा जरूरी हो जाती है। योजना आयोग के पुराने ढाँचे में केंद्र द्वारा राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ निर्धारित करने, पाँच वर्षों के विकास लक्ष्यों को तय करने और राज्यों के योजना व्यय के लिए संसाधनों के आवंटन का बड़ा महत्त्व था। आर्थिक नीति का निर्माण वित्त मंत्रालय तथा अन्य मंत्रालय भी करते थे और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी विभिन्न सरकारों तथा विभागों पर होती थी। नियोजन, नीति निर्माण, संसाधन वितरण और परिणामों की समीक्षा के बीच अनेक स्तरों पर समन्वय की कठिनाइयाँ सामने आती थीं। उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका, अंतरराष्ट्रीय पूँजी प्रवाह, तकनीकी परिवर्तन और राज्यों की विविध आर्थिक आवश्यकताओं ने इस व्यवस्था को अधिक जटिल बना दिया था। समस्या योजनाएँ बनाने में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में थी जो मानती थी कि देश के हर हिस्से की विकास संबंधी आवश्यकताओं का निर्धारण मुख्यतः दिल्ली में बैठकर किया जा सकता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विकास का कोई एक साँचा सभी राज्यों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले से अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में योजना आयोग की जगह नई व्यवस्था बनाने की घोषणा की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस समय योजना आयोग बना था, उस समय देश की आर्थिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं। अब राज्यों की भूमिका बढ़ चुकी है और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप एक नई संस्था की जरूरत है। इसके बाद सरकार ने नए ढाँचे के संबंध में सुझाव आमंत्रित किए। मुख्यमंत्रियों, विषय-विशेषज्ञों और विभिन्न संस्थाओं से भी विचार-विमर्श किया गया। 7 दिसंबर, 2014 को प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर योजना आयोग के स्थान पर बनने वाली संस्था के स्वरूप पर चर्चा की। अंततः एक जनवरी, 2015 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के संकल्प के माध्यम से नीति आयोग का गठन हुआ। यह संसद द्वारा पारित किसी नए अधिनियम के अंतर्गत बनाई गई संस्था नहीं थी। योजना आयोग भी 15 मार्च, 1950 को मंत्रिमंडल के प्रस्ताव से गठित हुआ था। इस दृष्टि से पुरानी संस्था को समाप्त करके नई संस्था बनाने के लिए संविधान संशोधन अथवा अलग संसदीय कानून की आवश्यकता नहीं थी। नए आयोग की स्थापना के पीछे सरकार का घोषित उद्देश्य केवल नाम बदलना नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच विकास संबंधी निर्णयों की प्रक्रिया में बदलाव लाना था। यह दावा कितना सफल हुआ, इसका मूल्यांकन बाद के वर्षों के अनुभवों से किया जा सकता है। लेकिन उस समय यह स्पष्ट था कि सरकार ने आर्थिक नियोजन की पुरानी व्यवस्था को मूल रूप से बदलने का राजनीतिक फैसला कर लिया था।
योजना आयोग की वैचारिक जड़ें स्वतंत्रता से पहले भारत में चल रही आर्थिक चिंतन की प्रक्रिया तक जाती हैं। जवाहरलाल नेहरू ने वर्ष 1927 में सोवियत संघ की यात्रा की थी। वहाँ नियोजित औद्योगिकीकरण और राज्य द्वारा आर्थिक संसाधनों के संगठित उपयोग के विचारों ने उन्हें प्रभावित किया। लेकिन भारत में आर्थिक नियोजन की अवधारणा को केवल सोवियत प्रभाव का परिणाम मानना इतिहास को अधूरा पढ़ना होगा। भारतीय उद्योगपति, अर्थशास्त्री और राष्ट्रीय आंदोलन के नेता भी यह समझने लगे थे कि व्यापक गरीबी, औद्योगिक पिछड़ेपन, कृषि संकट और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझते देश का विकास केवल बाजार की स्वाभाविक गतिविधियों पर नहीं छोड़ा जा सकता। 1934 में प्रसिद्ध इंजीनियर और प्रशासक एम. विश्वेश्वरैया ने अपनी पुस्तक 'प्लान्ड इकोनॉमी फॉर इंडिया' में नियोजित आर्थिक विकास का विचार प्रस्तुत किया। वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस की पहल पर राष्ट्रीय योजना समिति का गठन हुआ और जवाहरलाल नेहरू उसके अध्यक्ष बने। वर्ष 1944 में देश के प्रमुख उद्योगपतियों ने 'बॉम्बे प्लान' प्रस्तुत किया, जिसमें औद्योगिक विकास के लिए व्यापक सरकारी निवेश का समर्थन किया गया। इसी समय एम.एन. रॉय ने 'पीपुल्स प्लान' और श्रीमन्नारायण अग्रवाल ने गांधीवादी योजना का प्रारूप सामने रखा। इन प्रस्तावों की वैचारिक दिशाएँ अलग-अलग थीं, लेकिन एक बात साझा थी कि स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले भारत को आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए सुविचारित राष्ट्रीय प्रयास की आवश्यकता होगी।
स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू ने इसी व्यापक पृष्ठभूमि में योजना आयोग का गठन किया। 15 मार्च, 1950 को इसकी स्थापना हुई और प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष बने। आयोग को देश के उपलब्ध संसाधनों का आकलन करने, विकास की प्राथमिकताएँ तय करने तथा आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए योजनाएँ बनाने का दायित्व दिया गया। उस समय भारत की स्थिति आज से बिल्कुल अलग थी। देश विभाजन के घावों से जूझ रहा था। कृषि उत्पादकता कम थी, औद्योगिक आधार सीमित था, विदेशी मुद्रा की भारी कमी थी और बुनियादी ढाँचे का विस्तार अत्यंत आवश्यक था। निजी पूँजी इतनी सक्षम नहीं थी कि अपने बल पर इस विशाल देश के औद्योगिकीकरण और आधारभूत संरचना की जरूरतें पूरी कर सके। इसलिए सार्वजनिक निवेश तथा राज्य की सक्रिय आर्थिक भूमिका को प्राथमिकता देना उस समय की परिस्थितियों में समझा जा सकता था। पहली पंचवर्षीय योजना 1951 में शुरू हुई और इसका मूल सार्वजनिक परिव्यय लगभग 2,069 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया। इसमें कृषि, सिंचाई, बिजली और सामुदायिक विकास पर विशेष जोर था। दूसरी पंचवर्षीय योजना 1956 में प्रारंभ हुई और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री पी.सी. महालनोबिस के औद्योगिक विकास मॉडल के आधार पर भारी उद्योगों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार को प्राथमिकता दी गई। भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे इस्पात संयंत्र तथा अनेक बड़े सार्वजनिक उपक्रम उसी विकास-दृष्टि से जुड़े थे।
योजना आयोग के इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन करते समय इस बात को स्वीकार करना होगा कि उसने स्वतंत्र भारत के आर्थिक निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सिंचाई परियोजनाओं, विद्युत उत्पादन, इस्पात उद्योग, परिवहन, अनुसंधान संस्थानों और अनेक सार्वजनिक उपक्रमों के विकास में पंचवर्षीय योजनाओं की भूमिका रही। उस दौर में सार्वजनिक क्षेत्र को औद्योगिकीकरण का प्रमुख माध्यम माना गया था। लेकिन इसी व्यवस्था के साथ सरकारी नियंत्रण, औद्योगिक लाइसेंस, उत्पादन क्षमता निर्धारित करने की अनुमति और विदेशी व्यापार पर अनेक प्रतिबंध भी जुड़े। धीरे-धीरे 'लाइसेंस-परमिट-कोटा राज' नाम से चर्चित व्यवस्था ने उद्यमिता और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को सीमित किया। संसाधनों के आवंटन में प्रशासनिक विवेक का प्रभाव बढ़ा और सरकारी निर्णयों में अनावश्यक विलंब की शिकायतें सामने आने लगीं। सार्वजनिक उपक्रमों में से कुछ ने राष्ट्रीय विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया, जबकि अनेक अन्य अक्षमता और वित्तीय घाटे के उदाहरण बन गए। जिस नियोजन पद्धति ने एक दौर में देश के आर्थिक निर्माण को गति दी थी, वही बदलती परिस्थितियों में कई क्षेत्रों में विकास की गति को बाधित करने लगी। यह किसी एक नेता या सरकार की विफलता नहीं, बल्कि उस आर्थिक संरचना की सीमा थी जो समय के साथ पर्याप्त लचीली नहीं बन पाई।
पंचवर्षीय योजनाओं का इतिहास भी यह बताता है कि कागज पर बनाई गई योजनाएँ हमेशा परिस्थितियों के अनुसार लागू नहीं हो पातीं। पहली तीन पंचवर्षीय योजनाएँ 1951 से 1966 के बीच चलीं। तीसरी योजना 1961 में शुरू हुई थी, लेकिन 1962 के चीन युद्ध, 1965 के पाकिस्तान युद्ध, लगातार सूखे और आर्थिक संकटों ने इसके लक्ष्यों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसके बाद 1966 से 1969 के बीच तीन वार्षिक योजनाएँ लागू करनी पड़ीं। चौथी पंचवर्षीय योजना 1969 में प्रारंभ हुई। पाँचवीं योजना का निर्धारित समय पूरा होने से पहले ही 1978 में जनता पार्टी सरकार ने उसे समाप्त कर दिया। इसके बाद योजनाओं के स्वरूप और अवधि में फिर परिवर्तन हुआ। राजनीतिक अस्थिरता के कारण 1990 से 1992 तक भी वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं और आठवीं पंचवर्षीय योजना 1992 में शुरू हो सकी। वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों ने विकास की प्राथमिकताओं में बड़ा परिवर्तन किया। निजी निवेश, प्रतिस्पर्धा, विदेशी पूँजी, निर्यात और सेवा क्षेत्र की भूमिका बढ़ने लगी। नौवीं पंचवर्षीय योजना 1997 में प्रारंभ हुई। हालाँकि निजी क्षेत्र का विस्तार उससे पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन उसके बाद आर्थिक विकास की रणनीति में राज्य और बाजार के बीच नए संबंधों को अधिक महत्त्व मिलने लगा। बारहवीं पंचवर्षीय योजना 2012 से 2017 की अवधि के लिए बनाई गई थी और अंततः वही भारत की आखिरी पंचवर्षीय योजना सिद्ध हुई। इस प्रकार योजना आयोग के समाप्त होने के बाद भी पंचवर्षीय योजना की प्रक्रिया तत्काल एक झटके में नहीं रुकी। बारहवीं योजना की अवधि पूरी होने के साथ अप्रैल 2017 से देश औपचारिक रूप से पंचवर्षीय योजनाओं की पुरानी व्यवस्था से बाहर आ गया।
योजना आयोग की एक बड़ी समस्या केंद्र और राज्यों के संबंधों में उसकी भूमिका को लेकर भी थी। भारत का संविधान संघीय व्यवस्था की स्थापना करता है, लेकिन आर्थिक संसाधनों और विकास संबंधी निर्णयों में लंबे समय तक केंद्र सरकार की निर्णायक स्थिति बनी रही। योजना आयोग राज्यों की वार्षिक योजनाओं के आकार और केंद्रीय सहायता से जुड़े निर्णयों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता था। राज्यों के मुख्यमंत्रियों को योजनागत सहायता और विशेष परियोजनाओं के लिए आयोग तथा केंद्र सरकार के समक्ष अपनी आवश्यकताएँ रखनी पड़ती थीं। वित्त आयोग संवैधानिक संस्था था, जबकि योजना आयोग किसी संवैधानिक प्रावधान के अंतर्गत स्थापित नहीं हुआ था। इसके बावजूद संसाधनों के वितरण में योजना आयोग की बड़ी भूमिका थी। इसी कारण अनेक मुख्यमंत्रियों ने समय-समय पर शिकायत की कि आर्थिक संसाधनों के आवंटन में राजनीतिक प्राथमिकताएँ और केंद्र का प्रभाव दिखाई देता है। विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की शिकायतें विशेष रूप से मुखर रहती थीं। हालाँकि ऐसी शिकायतें सभी मामलों में पक्षपात का प्रमाण नहीं थीं, लेकिन उनसे यह स्पष्ट होता था कि विकास संबंधी वित्तीय अधिकारों के बँटवारे में अधिक पारदर्शिता और संस्थागत संतुलन की आवश्यकता थी।
योजना आयोग की कार्यप्रणाली का सबसे बड़ा विवाद गरीबी रेखा के निर्धारण को लेकर सामने आया। जुलाई 2013 में आयोग ने वर्ष 2011-12 के लिए तेंदुलकर समिति की पद्धति के आधार पर गरीबी के अनुमान जारी किए। इनके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति मासिक उपभोग व्यय की गरीबी रेखा 816 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 1,000 रुपये निर्धारित की गई थी। इसका अर्थ प्रतिदिन लगभग 27.20 रुपये ग्रामीण तथा 33.33 रुपये शहरी उपभोग व्यय था। इन आँकड़ों के सामने आने पर देशभर में हंगामा मच गया। लोगों ने सवाल उठाया कि इतनी कम राशि में भोजन, कपड़े, आवास, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति आखिर कैसे हो सकती है। आयोग की गणना के अनुसार वर्ष 2011-12 में देश की 21.9 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी, जबकि 2004-05 में यह अनुपात 37.2 प्रतिशत था। इस प्रकार सरकारी आँकड़ों में गरीबी कम हुई थी, लेकिन गरीबी मापने की पद्धति ही बड़े विवाद का विषय बन गई। यह समझना भी आवश्यक है कि गरीबी रेखा किसी व्यक्ति के समुचित जीवनयापन के लिए आवश्यक आय का प्रमाणपत्र नहीं थी। वह उपभोग व्यय के आधार पर गरीबी का सांख्यिकीय अनुमान लगाने की सीमा थी। इसके बावजूद इतनी कम राशि को गरीबी के मानदंड के रूप में प्रस्तुत किए जाने से आम जनता में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक था। बाद में सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने वर्ष 2014 में ऊँची गरीबी रेखा का सुझाव दिया। उसने 2011-12 के लिए ग्रामीण क्षेत्र में 972 रुपये और शहरी क्षेत्र में 1,407 रुपये प्रतिमाह प्रतिव्यक्ति की सीमा प्रस्तावित की। इस पूरे विवाद ने यह साबित किया कि केवल आर्थिक आँकड़ों के आधार पर देश की सामाजिक वास्तविकताओं को समझना आसान नहीं है। किसी व्यक्ति का गरीबी रेखा से ऊपर होना और सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम होना दो अलग बातें हैं। नीति निर्माण में यह अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है।
वर्ष 1991 में डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा प्रारंभ किए गए आर्थिक सुधारों और उसके बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था से भारत के बढ़ते संबंधों ने योजना आयोग के पुराने ढाँचे की सीमाओं को लगातार उजागर किया। सरकार की भूमिका अब केवल संसाधनों की प्रत्यक्ष प्रदाता और उत्पादन गतिविधियों की नियंत्रक रहने तक सीमित नहीं थी। उसे निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाना था, उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाना था, सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप करना था और आर्थिक विकास का लाभ समाज के कमजोर वर्गों तक पहुँचाना था। सरकार के 'प्रोवाइडर' से 'एनेबलर' बनने की धारणा इसी परिवर्तन को व्यक्त करती है। इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य को आर्थिक गतिविधियों से पूरी तरह पीछे हट जाना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, बुनियादी ढाँचे और क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने जैसे क्षेत्रों में राज्य की भूमिका अब भी निर्णायक है। लेकिन सरकार का हर आर्थिक गतिविधि को सीधे नियंत्रित करना और सरकार द्वारा ऐसी नीतिगत व्यवस्था बनाना जिसमें समाज तथा निजी क्षेत्र की क्षमताओं का उपयोग हो सके, दोनों अलग दृष्टिकोण हैं। नीति आयोग का गठन इसी बदली हुई सोच का संस्थागत रूप माना गया।
नई संस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण घोषित सिद्धांत 'सहकारी संघवाद' था। इसके अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकारों को विकास प्रक्रिया में साझेदार के रूप में काम करना था। पुरानी 'टॉप-डाउन प्लानिंग' अर्थात ऊपर से नीचे तक निर्णय थोपने की पद्धति के बजाय 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने की बात कही गई। गाँव, जिले और राज्य की वास्तविक आवश्यकताओं को समझकर राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ तय करने का विचार सामने आया। यह परिवर्तन इसलिए आवश्यक था क्योंकि भारत के विभिन्न राज्यों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं हैं। पंजाब की कृषि संबंधी समस्याएँ राजस्थान की जल-संकट संबंधी चुनौतियों से अलग हैं। बिहार की आधारभूत संरचना की आवश्यकताएँ महाराष्ट्र की औद्योगिक जरूरतों से भिन्न हैं। उत्तर-पूर्व के पहाड़ी राज्यों की विकास संबंधी बाधाएँ दक्षिण भारत के विकसित औद्योगिक राज्यों जैसी नहीं हैं। जब समस्याएँ अलग हैं तो उनके समाधान भी एक जैसे कैसे हो सकते हैं? एक ही नीति को सभी राज्यों पर समान रूप से लागू करने की मानसिकता से हटकर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएँ बनाना नई व्यवस्था का मूल उद्देश्य था।
नीति आयोग की संरचना भी इसी सोच के अनुरूप तैयार की गई। प्रधानमंत्री को इसका अध्यक्ष बनाया गया। उपाध्यक्ष की नियुक्ति प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। आयोग में पूर्णकालिक और अंशकालिक सदस्यों, पदेन सदस्यों तथा विशेष आमंत्रित विशेषज्ञों की व्यवस्था की गई। प्रशासनिक नेतृत्व के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी अर्थात सीईओ का पद रखा गया। इसकी गवर्निंग काउंसिल में राज्यों के मुख्यमंत्री, विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल या प्रशासक शामिल होते हैं। आवश्यकता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जा सकता है। विशेष समस्याओं के समाधान के लिए क्षेत्रीय परिषदें बनाने का भी प्रावधान किया गया। नई संस्था का उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं का प्रारूप तैयार करना नहीं, बल्कि एक 'थिंक टैंक', 'नॉलेज बैंक' और सुशासन के लिए विशेषज्ञ सलाह देने वाले केंद्र के रूप में काम करना था। इसके माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सफल नीतियों का अध्ययन करके उन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाने की कल्पना की गई। नीति आयोग की पहली गवर्निंग काउंसिल बैठक 8 फरवरी, 2015 को हुई। इसमें मुख्यमंत्रियों की भागीदारी के साथ केंद्र प्रायोजित योजनाओं के युक्तिकरण, कौशल विकास, स्वच्छ भारत अभियान, कृषि विकास और गरीबी उन्मूलन जैसे विषयों पर काम करने की दिशा तय की गई।
नीति आयोग और योजना आयोग के बीच सबसे बड़ा व्यावहारिक अंतर संसाधनों के वितरण संबंधी अधिकारों में था। योजना आयोग के पास राज्यों की योजनागत सहायता से जुड़े निर्णयों में प्रभावशाली भूमिका थी, जबकि नीति आयोग को ऐसा वित्तीय आवंटन अधिकार नहीं दिया गया। इसका काम नीति संबंधी सलाह देना, कार्यक्रमों की निगरानी करना, विकास के परिणामों का मूल्यांकन करना और केंद्र तथा राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाना था। चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर वित्त वर्ष 2015-16 से केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत की गई। बाद में पंद्रहवें वित्त आयोग ने इसे 41 प्रतिशत निर्धारित किया, जिसका एक कारण जम्मू-कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद संघीय वित्तीय संरचना में आया परिवर्तन था। इन बदलावों ने राज्यों के वित्तीय संसाधनों और केंद्र के साथ उनके संबंधों को नया स्वरूप दिया। हालाँकि इस वृद्धि का श्रेय सीधे नीति आयोग को देना सही नहीं होगा, क्योंकि करों के बँटवारे की सिफारिश वित्त आयोग करता है। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि नीति आयोग की स्थापना और राज्यों को अधिक कर हिस्सेदारी देने के निर्णय एक ऐसे दौर में हुए जब केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास चल रहा था।
नीति आयोग की स्थापना के एक दशक बाद अब इस बात का मूल्यांकन करना संभव है कि जिस संस्था को आधुनिक भारत की विकास संबंधी आवश्यकताओं का समाधान बताकर प्रस्तुत किया गया था, उसने वास्तव में क्या उपलब्धियाँ हासिल कीं। इस दौरान आयोग ने अनेक क्षेत्रों में नई कार्यपद्धतियाँ विकसित कीं। इनमें सबसे उल्लेखनीय पहल जनवरी 2018 में शुरू किया गया 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' रहा। इसके अंतर्गत देश के 112 अपेक्षाकृत पिछड़े जिलों में स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि, जल संसाधन, वित्तीय समावेशन, कौशल विकास और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े संकेतकों पर सुधार लाने का प्रयास किया गया। इस कार्यक्रम की विशेषता यह थी कि जिलों की प्रगति का मूल्यांकन केवल खर्च की गई राशि के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाने लगा। जिलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने के लिए नियमित रैंकिंग की व्यवस्था की गई। स्थानीय अधिकारियों को बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों के अनुभवों से सीखने के अवसर दिए गए। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने वर्ष 2021 में किए गए स्वतंत्र मूल्यांकन में इस पहल की अनेक उपलब्धियों और सकारात्मक प्रयोगों की सराहना की। यह प्रयास इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण था कि विकास के राष्ट्रीय लक्ष्यों को जिलों के स्थानीय प्रशासन और वास्तविक समस्याओं से जोड़ने का प्रयास किया गया।
आकांक्षी जिला कार्यक्रम के अनुभवों के आधार पर जनवरी 2023 में 'आकांक्षी विकासखंड कार्यक्रम' प्रारंभ किया गया। इसमें 27 राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों के 500 विकासखंडों को शामिल किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विकास की प्रक्रिया को जिला मुख्यालयों से आगे बढ़ाकर उन इलाकों तक पहुँचाना था जहाँ बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता कमजोर थी। स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि, आधारभूत संरचना और सामाजिक विकास के संकेतकों के आधार पर स्थानीय प्रशासन के प्रदर्शन की निगरानी की जाने लगी। यह उस 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास था जिसकी चर्चा नीति आयोग के गठन के समय की गई थी। हालाँकि इन कार्यक्रमों की उपलब्धियों का आकलन केवल सरकारी रैंकिंग से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि जिन जिलों और विकासखंडों को बेहतर स्थान मिला, वहाँ आम नागरिकों के जीवन में कितना स्थायी परिवर्तन हुआ और क्या स्थानीय संस्थाओं की अपनी कार्यक्षमता वास्तव में बढ़ी।
नीति आयोग ने विकास के परिणामों को मापने के लिए आँकड़ा-आधारित मूल्यांकन की संस्कृति को भी आगे बढ़ाया। इसका 'एसडीजी इंडिया इंडेक्स' संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के संदर्भ में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रगति का तुलनात्मक आकलन करता है। वर्ष 2018 में भारत का समग्र स्कोर 57 था, जो 2020-21 में 66 और 2023-24 में 71 दर्ज किया गया। इस अवधि में गरीबी उन्मूलन, आर्थिक विकास, रोजगार और जलवायु संबंधी संकेतकों में सुधार सामने आया। उत्तर प्रदेश ने 2018 से 2023-24 के बीच अपने स्कोर में 25 अंकों की वृद्धि दर्ज की, जो इस अवधि में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे अधिक थी। लेकिन इस प्रकार की रैंकिंग का महत्त्व केवल राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा करना नहीं होना चाहिए। उसका बड़ा उद्देश्य उन क्षेत्रों की पहचान करना है जहाँ विकास के लाभ अभी पर्याप्त रूप से नहीं पहुँचे हैं। गरीबी, भूख, शिक्षा की गुणवत्ता, पोषण और लैंगिक समानता जैसी चुनौतियाँ आज भी भारत के सामने मौजूद हैं। इसीलिए किसी सूचकांक में बेहतर स्थान प्राप्त करना विकास की अंतिम मंजिल नहीं माना जा सकता। यह केवल उस दिशा में हुई प्रगति का एक संकेत है।
गरीबी के आकलन के क्षेत्र में भी नीति आयोग ने पुरानी व्यवस्था से अलग दृष्टिकोण अपनाया। योजना आयोग के समय गरीबी का प्रमुख मापदंड प्रतिव्यक्ति उपभोग व्यय था। नीति आयोग ने 'बहुआयामी गरीबी सूचकांक' के माध्यम से स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़ी विभिन्न वंचनाओं को एक साथ मापने की पद्धति को महत्त्व दिया। जनवरी 2024 में जारी आयोग के एक अध्ययन के अनुसार भारत में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 2013-14 के अनुमानित 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में अनुमानित 11.28 प्रतिशत रह गया। अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि इस अवधि में लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक लगभग 5.94 करोड़ लोगों के बहुआयामी गरीबी से बाहर आने का अनुमान प्रस्तुत किया गया। यह एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत था, लेकिन इन आँकड़ों की प्रकृति समझना भी जरूरी है। वर्ष 2013-14 और 2022-23 के आँकड़ों के लिए प्रत्यक्ष सर्वेक्षण परिणामों के बजाय सांख्यिकीय अनुमानों का भी उपयोग किया गया था। बहुआयामी गरीबी में कमी का अर्थ यह नहीं कि उतने ही लोग आय या उपभोग के आधार पर निर्धारित गरीबी रेखा से भी ऊपर आ गए। दोनों पद्धतियाँ गरीबी के अलग-अलग पहलुओं को मापती हैं। फिर भी यह परिवर्तन इस बात को रेखांकित करता है कि आधुनिक आर्थिक नीतियों के मूल्यांकन में केवल आय नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं को भी महत्त्व देना आवश्यक है।
नीति आयोग के गठन के समय जिस सहकारी संघवाद की बड़ी चर्चा हुई थी, उसकी प्रगति भी मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण विषय है। अक्टूबर 2026 तक आयोग की गवर्निंग काउंसिल की ग्यारह बैठकें हो चुकी हैं। ग्यारहवीं बैठक 11 जून, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई। इसका विषय 'विकसित भारत 2047 के लिए समावेशी मानव विकास' था। इस बैठक में सभी 28 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया। यह उल्लेखनीय था क्योंकि गवर्निंग काउंसिल की पिछली बैठकों में कई बार राजनीतिक मतभेदों के कारण कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री अनुपस्थित रहे थे। बैठक में मानव संसाधन विकास, भविष्य की कौशल आवश्यकताओं, उत्पादक रोजगार, उद्यमिता, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक समानता जैसे विषयों पर चर्चा हुई। यह एजेंडा दर्शाता है कि आयोग का ध्यान केवल पारंपरिक आर्थिक नियोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानव विकास और दीर्घकालीन राष्ट्रीय लक्ष्यों की ओर भी बढ़ा है।
लेकिन नीति आयोग की उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाओं को समझना भी आवश्यक है। जिस संस्था को केंद्र और राज्यों के बीच नए संबंधों का प्रतीक बताया गया, उसके पास स्वयं राज्यों को वित्तीय संसाधन आवंटित करने की शक्ति नहीं है। वह नीतिगत सुझाव दे सकता है, कार्यक्रमों की समीक्षा कर सकता है और विभिन्न सरकारों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास कर सकता है, लेकिन उसकी सिफारिशें सरकारों पर सामान्यतः बाध्यकारी नहीं होतीं। राज्यों के लिए वित्तीय संसाधनों के प्रमुख स्रोत वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार मिलने वाला कर हिस्सा, केंद्र सरकार के अनुदान, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ और उनकी अपनी आय हैं। इसलिए नीति आयोग से यह अपेक्षा करना कि वह अकेले आर्थिक असमानताओं या केंद्र-राज्य वित्तीय विवादों को दूर कर देगा, उसकी वास्तविक शक्तियों को बढ़ा-चढ़ाकर देखना होगा। इसके विपरीत यह भी प्रश्न उठता है कि जिस संस्था को राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करने की जिम्मेदारी दी गई है, उसके पास अपने नीतिगत सुझावों को लागू कराने के सीमित साधन होने से उसकी प्रभावशीलता कितनी प्रभावित होती है। योजना आयोग के पास वित्तीय आवंटन से जुड़ा जो प्रभाव था, वह नीति आयोग को नहीं मिला। इस परिवर्तन ने राज्यों को पुरानी योजनागत स्वीकृति की प्रक्रिया से कुछ हद तक मुक्त किया, लेकिन नई संस्था की नीतिगत सलाह और वास्तविक सरकारी निर्णयों के बीच दूरी भी उत्पन्न की।
एक दूसरी चुनौती आयोग की संस्थागत स्वायत्तता और विशेषज्ञता से जुड़ी है। किसी भी राष्ट्रीय थिंक टैंक की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह सरकार को केवल उसकी उपलब्धियाँ बताने वाली संस्था बनकर न रह जाए, बल्कि आवश्यक होने पर सरकारी नीतियों की कमियों की ओर भी स्पष्ट संकेत कर सके। आर्थिक विकास के आँकड़ों, रोजगार, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे विषयों पर स्वतंत्र तथा विश्वसनीय मूल्यांकन किसी भी सरकार के लिए उपयोगी होता है। यदि नीति आयोग सरकारी नीतियों का केवल समर्थन करने वाला संस्थान बन जाए तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा। इसके विपरीत यदि वह दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए तथ्यों पर आधारित निष्पक्ष सलाह दे, तो उसका योगदान किसी एक सरकार के कार्यकाल से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है। आयोग की सफलता का वास्तविक मापदंड यही होना चाहिए कि उसकी सिफारिशों ने नीति निर्माण की गुणवत्ता और प्रशासनिक परिणामों को कितना बेहतर बनाया।
इस पूरे परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पक्ष भी है। योजना आयोग को समाप्त करने का विरोध मुख्यतः कांग्रेस की ऐतिहासिक विरासत के संदर्भ में हुआ था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू की आर्थिक दृष्टि को समझने का अर्थ यह नहीं कि उनके समय की प्रत्येक प्रशासनिक व्यवस्था हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय मान ली जाए। नेहरू स्वयं वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक संस्थाओं और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने के समर्थक थे। जिस भारत में उन्होंने योजना आयोग बनाया था, वह मुख्यतः कृषि आधारित, सीमित औद्योगिक क्षमता वाला और विदेशी पूँजी तथा तकनीक के अभाव से जूझता देश था। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसके पास विशाल निजी क्षेत्र, विकसित वित्तीय बाजार, वैश्विक व्यापारिक संबंध, डिजिटल अर्थव्यवस्था और तकनीकी उद्यमिता की नई संभावनाएँ हैं। ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक नियोजन की पद्धति का बदलना स्वाभाविक है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसे अतीत की संस्थाओं के योगदान को केवल इसलिए खारिज नहीं करना चाहिए कि उनकी स्थापना किसी दूसरी राजनीतिक विचारधारा के नेतृत्व में हुई थी। संस्थागत निरंतरता और आवश्यक परिवर्तन के बीच संतुलन ही परिपक्व शासन की पहचान है।
वर्ष 2015 में नीति आयोग के गठन को लेकर उठे हंगामे को अब एक दशक से अधिक समय के अनुभवों की कसौटी पर परखा जा सकता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि योजना आयोग ने देश को कुछ नहीं दिया या उसका पूरा इतिहास असफलताओं से भरा था। इसी प्रकार यह दावा करना भी जल्दबाजी होगी कि नीति आयोग ने भारतीय विकास व्यवस्था की सभी समस्याओं का समाधान कर दिया है। योजना आयोग ने उस समय देश को आर्थिक निर्माण की दिशा दी जब राष्ट्रीय संसाधनों के संगठित उपयोग की अत्यंत आवश्यकता थी। नीति आयोग ने उस दौर में नई दिशा देने का प्रयास किया जब राज्यों की भूमिका, निजी निवेश, तकनीकी विकास और वैश्विक आर्थिक संबंधों ने पुराने नियोजन मॉडल की सीमाएँ स्पष्ट कर दी थीं। दोनों संस्थाओं को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में देखना अधिक उचित है। एक ने स्वतंत्र भारत के आर्थिक ढाँचे की नींव मजबूत करने में योगदान दिया, जबकि दूसरे को उस ढाँचे को बदलती चुनौतियों के अनुरूप अधिक लचीला और परिणामोन्मुखी बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
आने वाले वर्षों में नीति आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य के संदर्भ में होगी। भारत को केवल अपनी अर्थव्यवस्था का आकार नहीं बढ़ाना है, बल्कि आर्थिक प्रगति को व्यापक सामाजिक समृद्धि में बदलना है। इसके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ, कृषि उत्पादकता, जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, आधुनिक बुनियादी ढाँचा और क्षेत्रीय असमानताओं में कमी जैसे विषय निर्णायक होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, ऊर्जा परिवर्तन और विश्व अर्थव्यवस्था में बदलते शक्ति संतुलन नई चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी राष्ट्रीय नीति संस्थान का महत्त्व पहले से अधिक बढ़ जाता है। उसे वर्तमान समस्याओं के तात्कालिक समाधान के साथ-साथ उन संकटों की भी पहचान करनी होगी जो अगले दस, बीस या तीस वर्षों में देश के सामने आ सकते हैं। यदि नीति आयोग भविष्य की चुनौतियों का समय रहते आकलन करके सरकारों को उपयोगी रणनीतियाँ दे सके और राज्यों को विकास की प्रक्रिया में वास्तविक साझेदार बना सके, तभी उसका गठन एक ऐतिहासिक संस्थागत सुधार के रूप में अपनी सार्थकता सिद्ध करेगा।
आखिरकार किसी संस्था का नाम, उसका भवन या उसका इतिहास अपने आप में राष्ट्र के विकास की गारंटी नहीं होता। महत्त्वपूर्ण यह है कि वह देश की जरूरतों को कितना समझती है और उनका समाधान खोजने में कितनी सक्षम है। जो संस्था बदलते समय के साथ स्वयं को नहीं बदलती, वह धीरे-धीरे अपनी उपयोगिता खोने लगती है। और जो सरकार केवल पुरानी व्यवस्था को समाप्त कर देने को ही सुधार मान लेती है, वह भी अधूरा काम करती है। वास्तविक सुधार का अर्थ है पुरानी व्यवस्था के उपयोगी अनुभवों को सुरक्षित रखते हुए उसकी कमियों को दूर करना और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नई संस्थागत क्षमता विकसित करना।
योजना आयोग का इतिहास बन जाना कोई राष्ट्रीय दुर्घटना नहीं थी। लेकिन नीति आयोग का गठन अपने आप में राष्ट्रीय उपलब्धि भी नहीं माना जा सकता। उसका औचित्य उसके काम से सिद्ध होना था और आज भी उसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि योजना आयोग क्यों समाप्त किया गया। असली प्रश्न यह है कि उसके स्थान पर बनाई गई संस्था भारत को कितनी बेहतर दिशा दे सकी है। जब बहस इस प्रश्न पर केंद्रित होगी, तब राजनीतिक शोर की जगह सार्थक विमर्श ले सकेगा। और तब अकबर इलाहाबादी की वही मशहूर पंक्ति फिर याद आएगी—'हंगामा है क्यूँ बरपा...'


