Senior Citizens Life: जीने की अदम्य इच्छा का अनूठा आख्यान प्रस्तुत करें वरिष्ठ नागरिक

जीने की अदम्य इच्छा: बदलते परिवारों के बीच वरिष्ठ नागरिकों की चुनौतियां और नई उम्मीदें

Anshu Sarda Anvi
Published on: 20 July 2026 8:02 PM IST
Senior Citizens Life in India
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Senior Citizens Life in India

Senior Citizens Life in India: एक प्रवासी भारतीय बेटे के पिता का देहांत पिछले महीने हो गया। पिता की मृत्यु के बाद अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि अल्जाइमर की बीमारी से ग्रस्त मां को किसके भरोसे अकेला छोड़ जाए। बेटे के सामने एक तरफ उसका भविष्य यानी परिवार, बच्चे हैं तो दूसरी तरफ मां जो अब अकेले छोड़े जा सकने लायक स्थिति में नहीं है। अगर वह उन्हें विदेश ले जाता है तो वहां घर पर उचित देखभाल करने वाले सहायकों की अनुपलब्धता और एक अल्जाइमर पीड़ित रोगी को उसके इतने लंबे समय से रहवास रहे घर से दूर कर देने पर आने वाली मुश्किलें क्योंकि उनकी यादों में सिर्फ पुरानी बातें ही हैं, भी तो परेशानी के कारण हैं हीं। साथ ही वहां जाकर भी अकेलेपन की परेशानी क्योंकि पति-पत्नी दोनों नौकरीपेशा है और बच्चे उच्च शिक्षा के लिए शहर से बाहर रहते हैं। ऐसे में ‌अल्जाइमर पीड़ित मां एक बार फिर अकेली। टियर 2 शहर में रहने का भौतिक सुविधाओं से बहुत बड़ा नाता तो नहीं होता पर सबसे बड़ी बात यही होती है कि आसपास के लोग आज भी इतने अपनेपन वाले होते हैं कि वे पड़ोसी की खबर रखते हैं और दु:ख-बीमारी में उन्हें संभाल भी लेते हैं। बेटे ने यह फैसला लिया है कि वह या उसकी पत्नी या दोनों ही विदेश की नौकरी छोड़कर, धीरे-धीरे अपने शहर वापस आएंगे क्योंकि मां की संभाल करने के लिए वह अकेला उत्तरदायी है।

एक और प्रवासी बेटा परिवार सहित विदेश में सेटल है। माता-पिता अधेड़ावस्था में ही अपने-अपने अहम् के कारण देश के अलग-अलग टीयर 1 शहरों में, अलग-अलग रहने लग गए। ‌ अब उनकी वृद्धावस्था में बेटे के ऊपर अपने माता-पिता दोनों को संभालने का दायित्व है। वह भारत आकर दोनों को अलग-अलग शहरों में संभालता है। पिता वृद्धाश्रम में अकेले रहते हैं, तो उनकी देखभाल के लिए एक सहायक रखा गया है, जिसके ऊपर वह कैमरे से पूरी निगरानी रखता है। जबकि मां के लिए भी सहायिका है और शहर में रहने वाले परिजन उन्हें संभाल लेते हैं। वह उन दोनों का खर्च वहन करता है। इस बीच एक और प्रवासी भारतीय बेटा है जिसने अपने माता-पिता को उनके ही हाल पर छोड़ दिया है। न संभालता है, न खोज खबर लेता है, न ही वास्ता रखता है। कुछ ऐसे भी प्रवासी भारतीय बेटे- बेटी हैं जिनके माता-पिता या माता या पिता कुछ समय के लिए उनके पास विदेश रहकर आते हैं, शेष समय अपने देश, अपने शहर में बिताते हैं। और वर्ष में एक बार वे बेटा-बेटी अकेले या अपने परिवार सहित देश आते हैं और अपने परिवार से मिलकर चला जाते हैं।

प्रवासी भारतीयों की यह पीढ़ी जो कि विदेश में अपनी नौकरी के लिए सेटल है, उनके माता-पिता ने जरूर उन्हें वह पंख दिए होंगे कि वे अपनी उड़ान के लिए दूसरे देश चले गए। यह उस समय में रहा होगा, जब उनके माता-पिता युवा थे और वे अपनी संभाल खुद कर सकते थे। ‌वे इस बात पर गर्व करते हैं कि उनका बेटा-बेटी विदेश में एक अच्छी नौकरी में, अच्छे से सेटल है। पर ढलती उम्र में अब वे धीरे-धीरे अशक्त होने लगते हैं, उनका‌ शरीर जवाब देने लगता है पर यह स्थिति आ जाती है कि अब उनका बेटा-बेटी विदेश छोड़कर भारत नहीं आना चाहते या आ नहीं सकते और वह भी ऐसे समय में जब उनके माता-पिता को उनकी सबसे अधिक जरूरत होती है। माता-पिता से कॉल पर, वीडियो कॉल पर बात होती है, खोज- खबर ले ली जाती है, सहायक रख दिए जाते हैं पर जो एक शारीरिक- भावनात्मक स्पर्श होता है, वह इन संसाधनों से भरा तो नहीं जा सकता पर हां एक छोटे से प्रतिशत में उसको महसूस जरूर किया जा सकता है। सिर्फ ‌विदेश ही क्यों, ‌‌अपने गांव, अपने शहर को छोड़कर ‌बेहतर अर्थोपार्जन के लिए बाहर निकले बेटे-बेटियों के जाने से परिवार अब सिमट गए हैं, पहाड़ खाली हो रहें हैं और गांव सूनसान, शहर बढ़ते-बढ़ते इतने बढ़ गए हैं कि उन्होंने गांवों को भी खत्म करना चालू कर दिया है।

हिंदी साहित्य में बुजुर्गों की स्थिति और टूटते संयुक्त परिवारों को केंद्र में रखकर पर कई बेहतरीन उपन्यास लिखे गए हैं। काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त 'रेहन पर रग्घु' हो या कृष्णा सोबती का ‌'समय सरगम' या फिर चित्रा मुद्गल का 'गिलिगडु'। भूमंडलीकरण और आधुनिकता के दौर में टूटते पारिवारिक रिश्तों, बदलते ग्रामीण परिवेश और ‌बच्चों के शहरों की ओर विस्थापन से अकेले पड़ते बुजुर्गों की, ‌अपने ही घर में बेगाने हो जाने की पीड़ा को ये उपन्यास दिखाते हैं। जबकि कृष्णा सोबती के 'समय सरगम' का संदेश है कि उम्र और समय कभी किसी के लिए नहीं रुकते। जीवन के अंतिम पड़ाव में चिंताओं को छोड़कर हर पल को उमंग और सकारात्मकता के साथ जीना ही जीवन की सार्थकता है। चित्रा मुदगल के 'गिलिगडु' में संयुक्त परिवारों के बिखराव, परिवार में बुजुर्गों की भूमिका, वर्तमान पारिवारिक माहौल में उनकी वास्तविक स्थिति, बुढ़ापे का दर्द घर में उपेक्षित व्यवहार तथा दर-दर की ठोकरें खाते, घर से बाहर निकाले गए वृद्धों के जीवन की व्यथा को चित्रित किया गया है। ये उपन्यास हमारे बुजुर्गों की आज की स्थिति का आईना हैं।

यूं तो भारत हमेशा अपने बुजुर्गों को सम्मान देने वाले संस्कारों वाला देश रहा है, ‌ जहां पर परिवारों में बुजुर्गों की अपना प्रमुख स्थान रहा है, पर समय कभी भी एक जैसा नहीं रहता। ‌सिर्फ संयुक्त परिवारों का खत्म होना ही बुजुर्गों की आज की स्थिति का एकमात्र कारण नहीं है। सोशल मीडिया के दौर में लोग अब सोशली अनएवेलेबिल हो गएं हैं। पहले पास-पड़ोस का मोहल्ला भी वृहत्तर परिवार हुआ करता था। अब उनके बीच भी संपर्क कम होता जा रहा है। खत्म होते मोहल्ले, बंद फ्लैटों की दीवारों में सिमटती जिंदगी , वृद्धावस्था में अवसाद और शारीरिक स्वास्थ्य में कमी, भावनात्मक अकेलापन, अकेले गिरने, बीमार पड़ने का डर उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाता है तथा धीरे-धीरे उन्हें काम करने, कहीं आने-जाने कम इच्छुक बना देता है। कहीं-कहीं बच्चों, परिवार जनों का बुरा बर्ताव या बुजुर्गुआ होती पीढ़ी के अपने स्वयं सिद्ध उसूल या नियम-कायदे भी उनके अकेले रहने या हो जाने के कारण होते हैं।

भारत की आबादी करीब 1.4 अरब है। नेशनल कमीशन ऑन पॉपुलेशन की टेक्निकल ग्रुप रिपोर्ट के मुताबिक, 2036 तक भारत में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या करीब 23 करोड़ हो सकती है जो कि कुल आबादी में बुज़ुर्गों की हिस्सेदारी लगभग 14.9 प्रतिशत होगी। पिछली जनगणना के अनुसार लगभग 1.5 करोड़ वरिष्ठ नागरिक अकेले रहने को मजबूर हैं , जिसमें से तीन चौथाई महिलाएं हैं। करीब 40 प्रतिशत बुजुर्गों की आर्थिक हालत कमजोर है तथा कई लोगों के पास नियमित आय का स्रोत नहीं है।

यह साफ संकेत है कि आने वाले समय में बुज़ुर्गों की देखभाल और सुरक्षा एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनने वाली है। संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग ने अनुमान लगाया है कि भारत का वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात 9/100 (2015) से बढ़कर 11/100 (2025) होने का भी अनुमान लगाया है। बढ़ती जनसंख्या का अर्थ है आजीविका कमाने की बढ़ती मांग और युवा पीढ़ी का अपने घर छोड़कर दूर-दराज के शहरी इलाकों की ओर पलायन। वृद्ध होती पीढ़ी विभिन्न चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक समस्याओं व स्वाद से संबंधित समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है ‌और अवसाद ग्रस्त विकारों से घिर जाती है। अपने जीवन साथी को खो देने के बाद परिवार में पूरी तरह से अकेले हो जाने के कारण यह स्थिति और बिगड़ जाती है।

अकेले रहने की बुढ़ापे की चुनौतियों के बावजूद ‌ 46.9 प्रतिशत बुजुर्गों ने अपने जीवन से खुशी व्यक्त की, जबकि 41.5 प्रतिशत ने असंतोष स्वीकार किया। समाज अब एक अलग बदलाव ‌की और चल पड़ा है। जो लोग सक्षम हैं वे पहले से वृद्धावस्था के लिए वृद्धाश्रमों में अपनी व्यवस्था कर लें रहे हैं। परिवार से अलग अकेले बुढ़ापा बिताने की ओर इस बदलाव का एक प्रमुख कारण वित्तीय और सामाजिक दोनों प्रकार की स्वतंत्रता के लिए बढ़ती प्राथमिकता है। 31 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग स्वतंत्रता के लिए अकेले रहना पसंद करते हैं, जबकि 26.7 प्रतिशत इसके लिए युवा पीढ़ी के पलायन और एकल परिवारों के उदय जैसे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों की ओर इशारा करते हैं। बहरहाल आंकड़ों से अलग यह सच्चाई है कि

परिवार के स्तर पर, युवा पीढ़ी को घर के बुजुर्गों का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। यदि उन्हें काम के लिए शहर या गांव से बाहर जाना पड़ता है, तो उन्हें बुजुर्गों को अपने साथ ले जाना चाहिए। बुजुर्गों को अपने परिवार का साथ अच्छा लगता है पर बड़े शहरों के छोटे-छोटे घर और वहां की दिनचर्या ‌हो सकता है उन्हें रास न आए अतः वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए ताकि वे घर पर अकेले न रहे और उपेक्षा और दुर्व्यवहार का शिकार न हो। नियमित स्वास्थ्य जांच और दवाइयों की आवश्यकता का ध्यान रखा जाए। समाज को भी बुजुर्गों के प्रति अधिक मित्रवत बनाने की आवश्यकता है। यह समझना आवश्यक है कि जीवन के इस पड़ाव से हर किसी को एक दिन गुजरना पड़ता है। समाज में बुजुर्गों के लिए एक समर्पित स्थान या क्लबहाउस होना चाहिए जहाँ वे मिल सकें, बातें कर सकें, गपशप कर सकें और अपने विचार साझा कर सकें। उनके लिए मनोरंजन की, शाम को टहलने की व्यवस्था भी की जा सकती है। एक पीढ़ी आती है, एक पीढ़ी जाती है और इसी से ही नया समाज बनता है। पर हर आने वाली पीढ़ी के लिए पुरानी पीढ़ी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए क्योंकि वे उनकी जड़े हैं। वरिष्ठ नागरिकों को भी जीने की अदम्य इच्छा का एक अनूठा आख्यान प्रस्तुत करना चाहिए, ‌ दूसरों पर न्यूनतम आश्रित हुए उन्हें अपनी छूट गई इच्छाओं को पूरा करने का साहस करना चाहिए।

( लेखिका प्रख्यात स्तंभकार हैं।)

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