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Holidays: हमारी छुट्टियां भी गुलाम हैं! अंग्रेजों के नहीं, अपनी ऋतुओं के अनुकूल तय हों दिनचर्या
India Holidays System: "हमारी छुट्टियां हमें आनंद का वास्तविक उत्सव नहीं मनाने देतीं। वे हमें बेकार बैठकर महज़ समय काटने को मजबूर करती हैं।
India Holidays System British Rules
India Holidays System: "हमारी छुट्टियां हमें आनंद का वास्तविक उत्सव नहीं मनाने देतीं। वे हमें बेकार बैठकर महज़ समय काटने को मजबूर करती हैं। हमारे अवकाश के दिन और समय आज भी इस तरह तय किए गए हैं कि हम अपनी रचनात्मकता का न तो विकास कर सकते हैं और न ही आराम के ऐसे क्षण पा सकते हैं, जिससे 'रिचार्ज' होकर दोगुनी ऊर्जा के साथ दोबारा काम में जुट सकें।"
यह गंभीर चिंतन है केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी का। उनका मानना है कि आज आज़ादी के पांच दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हम अंग्रेजों के तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों और उनकी जीवन शैली पर आधारित दिनचर्या को अंगीकार करने के लिए अभिशप्त हैं। आज़ादी के उल्लास में हम इस कदर डूबे रहे कि अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार नियम-कानून, यहाँ तक कि अपनी दैनिक दिनचर्या तक तय नहीं कर सके। इसके विपरीत, अंग्रेजों ने भारत आने के बाद ब्रिटेन की प्राकृतिक व भौगोलिक स्थितियों के मद्देनजर ही अपने सारे कार्यक्रम और नियम तय किए थे; और परिणामतः उन्होंने भारतीय कार्यालयों व स्कूलों के समय को अपने देश के मुताबिक शिफ्ट कर दिया।
इसी का नतीजा है कि हमारे यहाँ सरकारी कार्यालय सुबह दस बजे खुलने लगे और स्कूलों का समय भी इसी के हिसाब से निर्धारित किया गया। यहाँ तक कि बाज़ारों के खुलने और बंद होने का समय भी अंग्रेजों ने ब्रिटेन के सूर्योदय और वहां के कामकाजी घंटों को ध्यान में रखकर तय किया था, और यह सब बिना किसी बदलाव के आज तक चला आ रहा है। अब तक किसी भी सरकार या आयोग ने इस बात पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत महसूस नहीं की कि आखिर यह आयातित व्यवस्था हमारे देश के मौसम और स्वास्थ्य के अनुकूल है भी या नहीं।
ऋतुचक्र और प्राचीन भारतीय कार्य-संस्कृति
अंग्रेजों के आगमन से पहले हमारे देश में अवकाश, स्कूल और कार्यालय के घंटे—सब कुछ विशुद्ध रूप से स्थानीय भौगोलिक स्थितियों और प्राकृतिक परिस्थितियों के आधार पर तय किए जाते थे। आर्यावर्त के विशाल भू-भाग में अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु भिन्न-भिन्न होती थी और ऋतुओं का चक्र भी अलग था। इसलिए, हर क्षेत्र की छुट्टियों का समय और कार्य-अवधि भिन्न रखी जाती थी। काम के अवसर भी पूरी तरह मौसम को ध्यान में रखकर निर्धारित होते थे। यही कारण था कि प्राचीन काल में बंगाल से लेकर कश्मीर तक स्कूलों की छुट्टियों का समय और अवधि एक समान न होकर अलग-अलग हुआ करती थी।
यदि हम भारत के समृद्ध आर्थिक इतिहास पर भी गौर करें, तो पाएंगे कि हमारे यहाँ दीपावली के पावन समय पर नया लेखा-बही (खाता) तैयार करने की सदियों पुरानी परंपरा रही है। यह वह समय होता है जब खरीफ की मुख्य फसल तैयार होकर किसान के घर तक पहुँच चुकी होती है और किसान रबी की बुवाई करके पूरी तरह खाली हो चुका होता है। ऐसे अनुकूल समय में उसके लिए अपनी कुल उपज और वास्तविक आय का सही अनुमान लगाना बेहद आसान होता है।
यही कारण है कि आज भी भारतीय औद्योगिक व व्यापारिक जगत में अपने वित्तीय हिसाब-किताब को शुरू करने तथा बंद करने के लिए दीपावली के दिन को ही सबसे उपयुक्त मानने का चलन है। यदि दीपावली से देश का मुख्य बजट बनाने की शुरुआत की जाए, तो धरातल पर काम करने के लिए पूरे 9 महीने का एक लंबा और निर्बाध समय मिल सकता है।
मानव संसाधन के सही उपयोग की आवश्यकता
अतः यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि हम अपनी प्राकृतिक ऋतुओं के हिसाब से अपने अवकाश के दिनों को पुनः व्यवस्थित करें। अगर हम इस दिशा में साहसिक कदम उठाने में सफल हो सके, तो हम अपने देश के विशाल मानव संसाधन का राष्ट्र निर्माण में भरपूर उपयोग कर सकते हैं। हमें अपनी बदलती ऋतुओं, कड़कड़ाती सर्दियों और भीषण गर्मियों के मद्देनजर ही अपने कार्यालय के घंटों, स्कूल के समय और अपनी संपूर्ण जीवन पद्धति को नए सिरे से व्यवस्थित करना चाहिए, ताकि देश अपनी वास्तविक आंतरिक क्षमता से काम कर सके।
(साभार जागरण उदय।मूल रुप से प्रकाशित दिनांक 12.6.2001)


