Independence Day: 79 साल की आज़ादी : हम आख़िर कितने स्वतंत्र हैं?

India 79 Years of Independence: 15 अगस्त 2026 पर भारत की आज़ादी के 79 वर्षों का विश्लेषण। भ्रष्टाचार, परिवारवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता, मुफ्त योजनाओं और नागरिक स्वतंत्रता के बीच जानिए भारत की लोकतांत्रिक यात्रा कितनी पूरी हुई।

Yogesh Mishra
Published on: 15 Aug 2026 2:05 PM IST
India 79 Years of Independence
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India 79 Years of Independence

Independence Day 2026: 15 अगस्त फिर हमारे सामने है। लालकिले पर तिरंगा फहरा, राष्ट्रगान बजा, स्कूलों में बच्चे हाथों में झंडे लेकर निकलें, सरकारी इमारतें रोशनी से जगमगाईं, और हम गर्व से कह उठे कि भारत स्वतंत्र है। निस्संदेह भारत स्वतंत्र है। उसकी संसद है, उसका संविधान है, उसकी अपनी सरकार है, अपनी मुद्रा है, अपनी सेना है और अपना तिरंगा है। अब दिल्ली में बैठी सरकार के फैसले लंदन में बैठे शासक नहीं करते। लेकिन स्वतंत्रता के 79 वर्ष पूरे होने पर एक प्रश्न पूछना शायद राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सबसे बड़ी ईमानदारी है—हम वास्तव में कितने स्वतंत्र हुए हैं?

स्वतंत्रता का अर्थ यदि केवल विदेशी शासन की समाप्ति है तो हमारा उत्तर बहुत सरल है—हम पूरी तरह स्वतंत्र हैं। लेकिन यदि स्वतंत्रता का अर्थ उस भारतीय नागरिक की गरिमा भी है जिसकी कल्पना स्वतंत्रता आंदोलन ने की थी, तो उत्तर इतना आसान नहीं रह जाता। तब हमें पूछना पड़ेगा कि क्या वह किसान स्वतंत्र है जो मौसम, बाजार और कर्ज के बीच अपनी जिंदगी का हिसाब लगाता रहता है? क्या वह गरीब स्वतंत्र है जिसे गंभीर बीमारी पूरे परिवार को आर्थिक संकट में धकेल सकती है? क्या वह बच्चा स्वतंत्र है जिसका भविष्य उसके जन्मस्थान, माता-पिता की आय और उसे मिले स्कूल की गुणवत्ता से काफी हद तक तय हो जाता है? क्या वह नौजवान स्वतंत्र है जिसके पास डिग्री तो है लेकिन उसके अनुरूप रोजगार नहीं? क्या वह महिला व दलित स्वतंत्र है जिसे कानून बराबरी देता है लेकिन समाज के अनेक हिस्सों में आज भी अपनी सुरक्षा और निर्णय की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना पड़ता है? और क्या वह नागरिक पूरी तरह स्वतंत्र है जिसे कभी सत्ता, कभी समाज, कभी धर्म, कभी जाति, कभी भीड़ और कभी अपनी ही आर्थिक विवशता के सामने चुप रहना पड़ता है?

इसलिए 15 अगस्त को स्वतंत्रता की उपलब्धियों का उत्सव मनाते हुए उसकी अधूरी यात्रा का हिसाब करना भी आवश्यक है।

एक असाधारण यात्रा को नकारना भी अन्याय होगा

1947 के भारत और आज के भारत की तुलना करें तो उपलब्धियों को नकारना इतिहास के साथ अन्याय होगा। जिस देश के भविष्य को लेकर स्वतंत्रता के समय दुनिया के अनेक विद्वान आशंकित थे, उसने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकतंत्र चलाया। सत्ता अनेक बार शांतिपूर्ण ढंग से बदली। केंद्र में कांग्रेस हारी, जनता पार्टी आई, वह गई, कांग्रेस वापस आई, गठबंधन सरकारों का दौर आया, भारतीय जनता पार्टी का विस्तार हुआ और मतदाता ने जब चाहा राज्यों तथा केंद्र में शक्तिशाली सरकारों को भी पराजित किया। 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 98 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे और 64.6 करोड़ से अधिक लोगों ने मतदान किया। मतदान प्रतिशत 66.10 रहा। यह अपने आप में लोकतांत्रिक इतिहास की असाधारण घटना है।

भारत अकाल और खाद्यान्न की भारी कमी से निकलकर बड़ा खाद्यान्न उत्पादक बना। हरित क्रांति हुई। अंतरिक्ष कार्यक्रम खड़ा हुआ। परमाणु क्षमता विकसित हुई। विशाल औद्योगिक और सेवा क्षेत्र बना। आईआईटी, आईआईएम, एम्स और दूसरे संस्थान बने। सूचना प्रौद्योगिकी की शक्ति विकसित हुई। करोड़ों लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया। सड़कें और राजमार्ग बढ़े। गांवों तक बिजली पहुंची और डिजिटल क्रांति ने शासन तथा रोजमर्रा के जीवन को बदल दिया। नीति आयोग के अनुसार बहुआयामी गरीबी 2015-16 के 24.8 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 14.96 प्रतिशत रह गई और 2022-23 के लिए 11.28 प्रतिशत तक।

यह भारत की उपलब्धि है। इसे केवल किसी एक प्रधानमंत्री, किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल की उपलब्धि कहना भी गलत होगा। आधुनिक भारत एक 79 वर्ष लंबी सामूहिक निर्माण-यात्रा है। नेहरू के समय बने संस्थान हों। हरित क्रांति हो। बैंकों का विस्तार हो। दूरसंचार क्रांति हो। आर्थिक उदारीकरण हो। ग्रामीण रोजगार गारंटी हो। आधार और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की संरचना हो। जीएसटी हो। डिजिटल भुगतान हो।ग्रामीण विद्युतीकरण हो या नल से जल पहुंचाने का अभियान—हर दौर ने पिछले दौर की किसी ईंट पर अगली ईंट रखी है। इसी तरह हर दौर अपनी गलतियों की विरासत भी अगले दौर को देकर गया है।

और यहीं से स्वतंत्रता का दूसरा हिसाब शुरू होता है।

हमने राजनीतिक स्वतंत्रता पाई, लेकिन क्या सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता पाई?

संविधान ने हमें राजनीतिक बराबरी बहुत पहले दे दी। अरबपति और मजदूर के वोट की संवैधानिक कीमत समान है। लेकिन मतदान केंद्र से बाहर निकलते ही दोनों के जीवन की वास्तविकता समान नहीं रहती। इलाज, शिक्षा, न्याय, आवास, रोजगार और सामाजिक प्रभाव तक पहुंच में बहुत बड़ी असमानता दिखाई देती है। यही वह विरोधाभास है जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर संविधान बनते समय देख रहे थे।

25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने ऐतिहासिक भाषण में आंबेडकर ने चेताया था कि केवल राजनीतिक लोकतंत्र पर्याप्त नहीं है। उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र होना चाहिए और स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व को जीवन के सिद्धांत बनना चाहिए। उन्होंने व्यक्ति-पूजा को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया और चेतावनी दी कि राजनीति में नायक-भक्ति अंततः तानाशाही की राह खोल सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह कही कि स्वतंत्रता मिलने के बाद यदि चीजें गलत होती हैं तो उन्हें अंग्रेजों के सिर डालने का बहाना हमारे पास नहीं रहेगा।

आज 79 वर्ष बाद यह चेतावनी पढ़िए। लगता है जैसे प्रश्न हमारे समय से पूछा जा रहा हो।

संविधान किताब में है लेकिन क्या हमारे आचरण में भी है?

हमने दुनिया के सबसे विस्तृत संविधानों में से एक बनाया। उसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की प्रतिज्ञा की। धर्म, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार किया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी। कानून के सामने समानता स्वीकार की। धार्मिक स्वतंत्रता दी। अस्पृश्यता समाप्त की। संवैधानिक उपचार का अधिकार दिया।

पर असली प्रश्न यह है कि क्या संविधान केवल सर्वोच्च न्यायालय और संसद की अलमारियों में रखा हुआ दस्तावेज है या वह हमारे राजनीतिक और सामाजिक व्यवहार का चरित्र भी बना?

हम संविधान की प्रस्तावना पढ़ते हैं। लेकिन जाति पूछकर रिश्ते बनाते हैं। समानता की शपथ लेते हैं। लेकिन चुनाव में जातीय गणित खोजते हैं। धर्मनिरपेक्ष राज्य की बात करते हैं। लेकिन राजनीतिक दल धार्मिक पहचान को चुनावी अंकगणित में बदलते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहते हैं। पर अक्सर केवल अपनी पसंद की अभिव्यक्ति के लिए। अपने नेता की आलोचना हमें राष्ट्र का अपमान लग सकती है और विरोधी नेता का अपमान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। हम कानून का राज चाहते हैं। लेकिन आरोपी यदि हमारी विचारधारा, जाति, धर्म या दल का हो तो कानून की परिभाषा बदलने लगती है।

यानी संविधान का संकट केवल सरकारों ने पैदा नहीं किया। उसका एक हिस्सा हमने नागरिकों ने भी पैदा किया है।

सरकारें बदलीं, सत्ता का स्वभाव कितना बदला?

यह प्रश्न किसी एक दल से नहीं पूछा जा सकता। कांग्रेस ने स्वतंत्र भारत पर सबसे लंबे समय तक शासन किया, इसलिए उसकी उपलब्धियां भी सबसे बड़ी सूची में आएंगी और ऐतिहासिक विफलताओं का बड़ा हिस्सा भी उसके खाते में जाएगा। संस्थाओं की स्थापना और लोकतांत्रिक परंपराओं की शुरुआत के साथ ही उसी कांग्रेस के इतिहास में 1975 का आपातकाल भी दर्ज है—जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर असाधारण प्रतिबंध लगे और भारतीय लोकतंत्र ने अपनी सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक दी।

बाद की गैर-कांग्रेसी सरकारें भी सत्ता में आने के बाद हमेशा उस आदर्श लोकतांत्रिक आचरण का उदाहरण नहीं बन सकीं जिसका दावा विपक्ष में रहते हुए करती थीं। क्षेत्रीय दलों ने भारतीय संघवाद को मजबूत किया, पिछड़े और उपेक्षित सामाजिक समूहों को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाई। लेकिन कई राज्यों में उन्हीं दलों के भीतर परिवारवाद, व्यक्तिवाद और सत्ता का केंद्रीकरण भी विकसित हुआ।

भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़कर राष्ट्रीय राजनीति में एक नया युग खड़ा किया, मजबूत राजनीतिक संगठन बनाया और कल्याणकारी योजनाओं, आधारभूत ढांचे तथा शासन के अनेक क्षेत्रों में बड़े कार्यक्रम चलाए। लेकिन उसके शासनकाल में भी विपक्ष, संस्थागत स्वायत्तता, जांच एजेंसियों के इस्तेमाल, राजनीतिक वित्तपोषण, संसद में पर्याप्त चर्चा, असहमति के प्रति सत्ता के व्यवहार और बहुसंख्यकवाद की आशंकाओं पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। इन प्रश्नों को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वे विपक्ष पूछ रहा है। ठीक उसी तरह जैसे सरकार के प्रत्येक कदम को केवल इसलिए अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता कि विपक्ष उसका विरोध कर रहा है।

राजनीतिक वित्तपोषण इसका अच्छा उदाहरण है। चुनावी बॉण्ड व्यवस्था को पारदर्शिता बढ़ाने का माध्यम बताया गया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2024 में इसे असंवैधानिक ठहराया और कहा कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन की जानकारी छिपाना नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन है। कंपनियों द्वारा असीमित राजनीतिक चंदे की अनुमति देने वाले बदलाव को भी मनमाना माना गया।

इसलिए समस्या केवल यह नहीं कि कौन सत्ता में है। भारतीय लोकतंत्र का एक स्थायी रोग यह भी है कि जो दल विपक्ष में रहते हुए जिस सरकारी शक्ति का विरोध करता है, सत्ता में आने पर अक्सर वही शक्ति उसे उपयोगी लगने लगती है।

विपक्ष में लोकतंत्र, सत्ता में अधिकार—यह बीमारी लगभग सबमें

भारत के राजनीतिक इतिहास की शायद सबसे बड़ी विडंबना यही है। विपक्ष में रहने वाला दल राज्यपाल की सक्रियता को संघवाद पर हमला बताता है। सत्ता समीकरण बदलने पर वही व्यवस्था सुविधाजनक लगने लगती है। विपक्ष में जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता की मांग की जाती है। सरकार में आने के बाद विरोधी दल एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाने लगते हैं। विपक्ष संसद और विधानसभा में चर्चा चाहता है। सत्ता में पहुंचकर अध्यादेश, संख्या-बल और त्वरित विधायी प्रक्रिया आकर्षक लग सकती है।

दल-बदल को रोकने के लिए कानून बनाया गया।लेकिन राजनीति ने उसके भीतर भी रास्ते खोज लिए। निर्वाचित सरकारें गिराने-बचाने में विधायक संख्या बन गए। विचारधारा के नाम पर चुनाव लड़ने वाला प्रतिनिधि कभी दूसरी विचारधारा में पहुंच जाता है और मतदाता देखता रह जाता है।

हमने लोकतंत्र को कई बार लोक की सत्ता से अधिक चुनाव जीतने की कला बना दिया।

लेकिन चुनाव लोकतंत्र का केवल प्रवेश-द्वार है, पूरा मकान नहीं।

लोकतंत्र का अर्थ है—चुनाव के बाद भी नागरिक की आवाज सुनना। संसद में बहस। मजबूत विपक्ष। स्वतंत्र न्यायपालिका। निष्पक्ष प्रशासन। जवाबदेह पुलिस। निर्भीक मीडिया। सूचना तक नागरिक की पहुंच। विश्वविद्यालयों में प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता। और सबसे बढ़कर ऐसी सरकार जो यह स्वीकार करे कि आलोचक शत्रु नहीं होता।

क्या नागरिक स्वतंत्रता का अर्थ हमने केवल ‘मेरी स्वतंत्रता’ समझ लिया?

सरकारों से प्रश्न करना आसान है। कठिन प्रश्न स्वयं से पूछना है।

हम अधिकारों की बात खूब करते हैं, कर्तव्यों की कितनी करते हैं?

हमें सड़क चाहिए लेकिन कर चोरी को कभी-कभी चतुराई समझते हैं। हमें साफ शहर चाहिए लेकिन कूड़ा सार्वजनिक स्थान पर फेंक देते हैं। हमें भ्रष्टाचार-मुक्त शासन चाहिए लेकिन अपना काम जल्दी कराने के लिए ‘कुछ देकर’ रास्ता निकालना सुविधाजनक लगता है। हमें ईमानदार नेता चाहिए लेकिन चुनाव में जाति, धर्म, निजी संबंध और तात्कालिक लाभ भी हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं। हमें कानून चाहिए, लेकिन यातायात नियम स्वयं पर लागू होने लगें तो असुविधा होती है।

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व स्वतंत्रता दी। लेकिन हमने उस स्वतंत्रता को कई बार अपमान, झूठ, अफवाह, चरित्र-हनन और सांप्रदायिक उत्तेजना का औजार भी बनाया। बिना सत्यापन किसी के बारे में कुछ लिख देना हमें अधिकार लगता है। भीड़ पहले फैसला सुनाती है, तथ्य बाद में आते हैं।

स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि मैं जो चाहूं करूं। स्वतंत्रता का अर्थ है कि मैं वह कर सकूं जिसका अधिकार मुझे है। और उतनी ही गंभीरता से दूसरे के उसी अधिकार की रक्षा करूं।

यहीं स्वतंत्रता और स्वच्छंदता का अंतर है।

पानी : 79 वर्ष बाद भी नल तक पहुंचना उपलब्धि क्यों है?

1947 के भारत में हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना कल्पना जैसा था। इस क्षेत्र में पिछले वर्षों में बड़ी प्रगति हुई है। अगस्त 2019 में केवल 3.23 करोड़, यानी लगभग 16.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास नल का जल कनेक्शन होने की सूचना थी। 31 मई, 2026 तक यह संख्या लगभग 15.86 करोड़ अर्थात 81.92 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों तक पहुंच गई। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

लेकिन इसी उपलब्धि के भीतर अधूरी स्वतंत्रता का प्रश्न छिपा है। नल लगा होना और सुरक्षित, पर्याप्त तथा नियमित पानी मिलना एक बात नहीं है। 2024 के सरकारी कार्यक्षमता आकलन में सर्वेक्षित नल-कनेक्शन वाले परिवारों में 87 प्रतिशत ने पिछले सप्ताह पानी मिलने की बात कही। 84 प्रतिशत को निर्धारित समय के अनुसार पानी मिला। 80 प्रतिशत को न्यूनतम निर्धारित मात्रा मिली और मात्रा, गुणवत्ता तथा नियमितता जैसे मानकों को मिलाकर 76 प्रतिशत कनेक्शन कार्यशील पाए गए।

इसलिए अगला भारत केवल ‘कितने नल लगे’ न गिने। वह यह भी पूछे—उन नलों में पीने योग्य पानी कितने दिन और कितने घंटे आया?

बिजली : कनेक्शन की लड़ाई से गुणवत्ता की लड़ाई तक

बिजली के क्षेत्र में भी भारत ने बहुत लंबा रास्ता तय किया है। सौभाग्य योजना के अंतर्गत 2.86 करोड़ घरों को बिजली कनेक्शन दिया गया और राज्यों ने चिन्हित इच्छुक परिवारों के विद्युतीकरण की व्यापक उपलब्धि दर्ज की।

लेकिन अब प्रश्न केवल बिजली का तार घर तक पहुंचने का नहीं है। अगला प्रश्न है—क्या बिजली चौबीस घंटे विश्वसनीय है? उसकी कीमत वहनीय है? वितरण कंपनियां आर्थिक रूप से स्वस्थ हैं? ग्रामीण और शहरी उपभोक्ता को समान गुणवत्ता मिलती है? स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण कितना तेज है?

विकास का पहला चरण ‘कनेक्शन’ है। दूसरा चरण ‘गुणवत्ता’ है। तीसरा ‘समान गुणवत्ता’ है। भारत पहले चरण में बड़ी छलांग लगा चुका है। असली परीक्षा दूसरे और तीसरे चरण की है।

शिक्षा : स्कूल पहुंच गए, लेकिन शिक्षा कितनी पहुंची?

भारत ने शिक्षा के प्रसार में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है। विद्यालयों का विशाल नेटवर्क है। प्राथमिक स्तर पर नामांकन बहुत बढ़ा है। नीति आयोग के अनुसार प्राथमिक शिक्षा में समायोजित शुद्ध नामांकन दर 2021-22 में 96.5 प्रतिशत तक पहुंची थी।

लेकिन बच्चे का स्कूल में नाम लिखा होना और शिक्षित होना दो अलग बातें हैं।

2024-25 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने की दर लगभग 11.5 प्रतिशत थी। शिक्षा का अगला प्रश्न इससे भी बड़ा है—बच्चा आठ-दस साल विद्यालय में रहने के बाद कितना पढ़ सकता है, कितना समझ सकता है, कितना गणित कर सकता है, कितना वैज्ञानिक ढंग से सोच सकता है और कितनी स्वतंत्रता से प्रश्न पूछ सकता है?

हमारी शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा आज भी परीक्षा, अंक, डिग्री और नौकरी के बीच फंसा हुआ है। शिक्षा यदि मनुष्य को प्रश्न पूछना न सिखाए, असहमति का सम्मान न सिखाए, संविधान न समझाए और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित न करे तो वह साक्षर कर्मचारी तो बना सकती है, स्वतंत्र नागरिक नहीं।

स्वास्थ्य : बीमारी से स्वतंत्रता भी स्वतंत्रता है

राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ उस गरीब परिवार के लिए कितना है जिसे एक गंभीर बीमारी वर्षों की बचत से वंचित कर दे?

भारत में सरकारी स्वास्थ्य व्यय बढ़ा है और नागरिकों की जेब से होने वाले स्वास्थ्य खर्च का हिस्सा पहले की तुलना में कम हुआ है। फिर भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा 2021-22 के अनुसार कुल स्वास्थ्य व्यय का 39.4 प्रतिशत सीधे परिवारों की जेब से आया। इसकी राशि लगभग 3.56 लाख करोड़ रुपये थी।

इसका अर्थ है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में यात्रा अभी लंबी है। अस्पताल बनाना पर्याप्त नहीं। डॉक्टर, नर्स, दवाएं, जांच, आपात सेवा और गुणवत्तापूर्ण उपचार भी चाहिए। भारत को ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जिसमें गंभीर बीमारी का अर्थ आर्थिक बर्बादी न हो।

जिस देश का नागरिक इलाज इसलिए टालता है कि उसके पास पैसे नहीं हैं, उसकी स्वतंत्रता का एक हिस्सा अभी अधूरा है।

गरीबी घटी है लेकिन गरिमा की मंजिल गरीबी रेखा से बहुत आगे

भारत ने गरीबी कम करने में उल्लेखनीय सफलता पाई है। इसे स्वीकार करना चाहिए। लेकिन गरीबी से बाहर निकलना और सुरक्षित मध्यवर्गीय जीवन हासिल करना अलग-अलग अवस्थाएं हैं। कोई परिवार आज गरीबी की परिभाषा से बाहर हो सकता है। लेकिन नौकरी जाने, फसल खराब होने, बीमारी आने या घर में किसी दुर्घटना के बाद फिर संकट में जा सकता है।

इसलिए भविष्य की बहस केवल यह नहीं होनी चाहिए कि कितने करोड़ लोग गरीबी से निकले। प्रश्न यह भी हो कि कितने परिवार गरीबी में वापस गिरने के खतरे से स्थायी रूप से बाहर निकले।

यही कल्याणकारी राज्य की अगली परीक्षा है।

जाति से हम कितने स्वतंत्र हुए?

संविधान ने अस्पृश्यता समाप्त कर दी। लेकिन क्या समाज ने जाति समाप्त कर दी?

पर 79 वर्ष बाद भी चुनावों में उम्मीदवार चुनते समय जातीय समीकरण गिने जाते हैं। विवाह में जाति जीवित है। सामाजिक नेटवर्क में जाति जीवित है। कई क्षेत्रों में अवसरों और सामाजिक प्रतिष्ठा में जाति का प्रभाव जीवित है। दूसरी ओर आरक्षण ने ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महत्वपूर्ण अवसर दिए, लेकिन आरक्षण स्वयं लगातार राजनीतिक संघर्ष का विषय बना रहा।

जाति के प्रश्न पर भारत ने एक विचित्र समझौता कर लिया है—हम सार्वजनिक रूप से जातिविहीन समाज चाहते हैं और राजनीतिक रूप से जातियों की संख्या गिनते हैं।

जब तक किसी बच्चे के जीवन की संभावनाएं उसके उपनाम और जन्म से प्रभावित होती रहेंगी, तब तक सामाजिक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।

धर्म : अपनी आस्था की स्वतंत्रता या दूसरे की आस्था पर अधिकार?

भारत की महानता इस बात में नहीं कि यहां कोई एक धर्म सुरक्षित रहे। उसकी महानता इस बात में है कि यहां हर धर्म सुरक्षित रहे और जिसे किसी धर्म में विश्वास न हो, वह भी उतना ही सुरक्षित रहे।

धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग रखना भारत जैसे समाज में कभी आसान नहीं रहा। कांग्रेस पर तुष्टीकरण के आरोप लगे, भाजपा पर बहुसंख्यकवादी राजनीति के आरोप लगते हैं, क्षेत्रीय दलों ने भी धार्मिक समुदायों को वोट समूहों की तरह इस्तेमाल किया है। अलग-अलग समय में अलग दलों ने धार्मिक पहचान का चुनावी लाभ उठाया।

लेकिन संविधान का प्रश्न सीधा है—क्या राज्य नागरिक को पहले नागरिक मानेगा उसकी धार्मिक पहचान को?

यदि किसी हिंदू को अपनी आस्था के कारण डरना पड़े तो भारत अधूरा है। यदि किसी मुसलमान को अपनी पहचान के कारण डरना पड़े तो भारत अधूरा है। यदि सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, आदिवासी परंपराओं के अनुयायी अथवा नास्तिक को अपनी मान्यता के कारण संदेह की दृष्टि से देखा जाए तो भारत अधूरा है।

स्वतंत्र भारत की आत्मा बहुमत की विजय नहीं, नागरिक की समानता है।

मीडिया स्वतंत्र है—लेकिन कितना?

लोकतंत्र में मीडिया सरकार का प्रचार विभाग भी नहीं है और विपक्ष का राजनीतिक हथियार भी नहीं। उसका पहला दायित्व नागरिक के प्रति है।

भारतीय मीडिया ने सत्ता के बड़े-बड़े घोटाले उजागर किए, युद्ध और आपदाओं में जोखिम उठाया, भ्रष्टाचार सामने लाया और लोकतंत्र को मजबूत किया। लेकिन आज मीडिया के सामने कई प्रकार के दबाव हैं—आर्थिक निर्भरता, राजनीतिक निकटता, स्वामित्व का केंद्रीकरण, विज्ञापन का दबाव और दर्शक संख्या की होड़। दूसरी तरफ डिजिटल माध्यम ने सूचना का लोकतंत्रीकरण किया तो झूठी सूचनाओं और बिना उत्तरदायित्व वाले प्रचार को भी असाधारण शक्ति दे दी।

सरकार यदि केवल अनुकूल पत्रकारिता पसंद करे तो लोकतंत्र कमजोर होगा। मीडिया यदि तथ्य छोड़कर राजनीतिक खेमों का सैनिक बन जाए तो लोकतंत्र फिर भी कमजोर होगा।

स्वतंत्र प्रेस का अर्थ सरकार-विरोधी प्रेस नहीं; सत्ता से स्वतंत्र प्रेस भी हैं।

और सत्ता केवल सरकार की नहीं होती—कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन, सामाजिक समूह और स्वयं मीडिया-मालिक भी सत्ता के केंद्र हो सकते हैं।

न्याय : अधिकार तभी वास्तविक है जब न्याय समय पर मिले

संविधान हमें अधिकार दे सकता है। लेकिन अधिकार का वास्तविक मूल्य तब है जब उसके उल्लंघन पर न्याय व दंड मिले। न्याय में अत्यधिक देरी स्वयं अन्याय में बदल सकती है। साधन-संपन्न व्यक्ति बड़े वकील, लंबी कानूनी प्रक्रिया और अपील का खर्च उठा सकता है; गरीब नागरिक के लिए थाना, तहसील और अदालत तक की यात्रा ही कठिन हो सकती है। स्वतंत्र भारत की अगली बड़ी क्रांति न्यायिक होनी चाहिए—सस्ता, सरल और समयबद्ध न्याय।

एक नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि चाहे सामने सरकार हो, उद्योगपति हो, पुलिस हो, नेता हो या कोई प्रभावशाली व्यक्ति—कानून अंततः उसके साथ बराबरी का व्यवहार करेगा। यही ‘कानून का शासन’ है।

पुलिस से नागरिक डरता क्यों है?

अंग्रेजों ने पुलिस व्यवस्था मुख्यतः औपनिवेशिक शासन की रक्षा के लिए विकसित की थी। स्वतंत्र भारत में उसका चरित्र नागरिक सेवा का होना चाहिए था। बदलाव हुआ भी है। लेकिन पुलिस सुधार की बहस दशकों से अधूरी है।

थाने में सामान्य नागरिक सम्मान से जाए, उसकी प्राथमिकी सहजता से दर्ज हो, जांच निष्पक्ष हो, हिरासत कानून के अनुसार हो और पुलिस राजनीतिक दबाव से मुक्त हो—ये किसी आदर्श राज्य की विलासिता नहीं बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकताएं हैं।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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