आज़ादी के आठ पड़ाव और जेन ज़ी

Gen Z Voters 2029: आज़ादी के 79वें वर्ष में भारतीय राजनीति एक बड़े पीढ़ीगत बदलाव की ओर बढ़ रही है। जानिए Gen Z वोटर, 2029 चुनाव, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी और नई पीढ़ी की बदलती राजनीतिक सोच का असर।

Yogesh Mishra
Published on: 11 Aug 2026 6:46 PM IST
Gen Z Voters 2029 Lok Sabha Election
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Gen Z Voters 2029 Lok Sabha Election

Gen Z Voters 2029: आज़ादी के 79 वर्ष हो गए। हर साल तो किसी की जिंदगी में कोई बदलावपूर्ण पड़ाव आता नहीं, सो देश के लिए भी 79 पड़ावों की बात करना बेमानी होगी। लेकिन फिर भी हम दशकों के हिसाब से कोई आठ पड़ावों की बात तो कर ही सकते हैं। तकनीक के नजरिए से कई पड़ाव हासिल कर लिए। सामाजिक तौर पर भी पड़ाव हासिल किए हैं, हालांकि वे अच्छे रहे हैं कि बुरे, यह विवाद का विषय है। फिर भी बदलाव हुआ है, जिसे रोका नहीं जा सकता। और बदलाव जरूरी भी है और अनिवार्य भी।

राजनीतिक तौर पर देखें तो सात पड़ावों तक कोई क्रांतिकारी परिवर्तन तो नहीं आया। लेकिन अब आठवें पड़ाव में भारतीय राजनीति एक दोराहे पर खड़ी दिख रही है, जिसमें पहली बार पीढ़ीगत बदलाव से सामना हो रहा है। एक ओर जेन ज़ी है और दूसरी ओर गैर-जेन ज़ी।

हम सुनते तो बहुत आए हैं कि भारत युवाओं का देश है और यहां बड़ी आबादी युवा है। सुनने में यह सिर्फ एक आंकड़ा लगता था।लेकिन अचानक यह आंकड़ा भारी लगने लगा है।और चूंकि इसका राजनीतिक पहलू भी है, सो इससे एक बदलाव दिखने लगा है। बदलाव से कतई यह नहीं समझना चाहिए कि बात किसी सत्ता परिवर्तन की हो रही है। बात इससे कहीं आगे की है। राजनीति के ढांचे की है। इस ढांचे के एक छोर पर राहुल गांधी और उनकी राजनीतिक शैली नजर आती है। दूसरे छोर पर नरेन्द्र मोदी और उनकी शैली नजर आती है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही जेन ज़ी को आकर्षित करने में लगे हुए हैं।

यह एक राजनीतिक मजबूरी भी है क्योंकि एक अनुमान है कि अगले आम चुनाव यानी 2029 में देश का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग जेन ज़ी का होगा यानी कोई 28 फीसदी। चूंकि जेन अल्फा में 18 वर्ष से कम उम्र वाले लोग हैं और उनके पास अभी वोट का अधिकार नहीं है, इसलिए आबादी में उनकी बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद वे चुनावी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बन पाएंगे। ऐसे में 2029 तक जेन ज़ी का मतदाता वर्ग राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगा। सबकी निगाह इसी नए मतदाता वर्ग पर होगी।

भारत के राजनीतिक परिदृश्य में बदलते फोकस के बीच 62 से 80 वर्ष वाले ‘बेबी बूमर्स’, 46 से 61 वर्ष वाले ‘जेन एक्स’ और 81 से 98 वर्ष वाली ‘साइलेंट जनरेशन’ की राजनीतिक प्राथमिकता अपेक्षाकृत पीछे जाती हुई दिखाई दे सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ये मतदाता हाशिये वाले हो गए हैं। ये आज भी चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण हैं और कई चुनावों का परिणाम तय करने की स्थिति में रहेंगे। फर्क सिर्फ इतना है कि आने वाले बरसों की राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे नई पीढ़ियों की ओर खिसक रहा है।

23 से 45 वर्ष वाले मिलेनियल करीब 24 फीसदी हैं और उम्र व डिजिटल अनुभव के लिहाज से जेन ज़ी के ज्यादा करीब हैं। इसलिए जेन ज़ी के उभार को मात्र एक नए वोटर चंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके साथ एक ऐसी पीढ़ी भी खड़ी है जिसकी राजनीतिक सोच, सूचना हासिल करने का तरीका और नेताओं के प्रति नज़रिया पिछली पीढ़ियों से काफी अलग है।

भारत की राजनीति में यह बदलाव तो सिर्फ शुरुआत भर है, जिसकी परिणति मात्र सत्ता परिवर्तन के रूप में देखना गलती होगी। असली बदलाव शायद राजनीति की भाषा, शैली और प्राथमिकताओं में दिखाई देगा। 2029 तक जेन ज़ी का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका होगा। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए यह सिर्फ एक नया मतदाता ग्रुप नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।

जेन ज़ी को सिर्फ युवा मतदाता मानना चीजों को बहुत छोटा करके देखना होगा। असलियत में यह एक ऐसी पीढ़ी है जिसकी राजनीतिक जागरूकता इंटरनेट, सामाजिक इंटरेक्शन, दुनिया की जानकारी और लगातार बदलते डिजिटल यूनिवर्स में बनी है। यह पीढ़ी अखबार, टीवी चैनल या किसी एक नेता के जरिये राजनीति को नहीं समझती। यह अलग नजरिए से नेताओं को देखती है, उनकी बातों की तुलना करती है, सवाल पूछती है और अपना रिएक्शन भी तत्काल व्यक्त करती है। इसके लिए नेता के भाषण से ज्यादा उसका व्यवहार, उसकी भाषा और लोगों से उसका मेल-जोल ज्यादा मायने रखता है। यह पीढ़ी जवाब चाहती है, संवाद चाहती है।

नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी दोनों के सामने यह पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक चुनौती और अवसर के रूप में मौजूद है। दोनों अलग पीढ़ियों के नेता हैं और उनकी राजनीतिक स्टाइल भी अलग है। लेकिन दोनों को ही उस पीढ़ी तक पहुंचना है जिसकी राजनीतिक यादें और अनुभव उनकी अपनी पीढ़ी से बहुत अलग हैं। राहुल गांधी उम्र के लिहाज से जेन ज़ी के कुछ करीब हैं, जबकि नरेन्द्र मोदी उससे कई दशक दूर की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जेन ज़ी को किसी एक पार्टी या नेता का स्वाभाविक समर्थक मानना भारी गलती होगी क्योंकि यह पीढ़ी एक रंग में रंगा राजनीतिक ग्रुप नहीं है और न ही कभी हो सकता है। इसकी असली राजनीतिक ताकत किसी एक दल की तरफ खड़े होने में नहीं बल्कि राजनीतिक दलों को अपनी भाषा, स्टाइल और अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के तरीके को बदलने के लिए मजबूर करने में होगी।

यहीं से भारतीय राजनीति का अगला बड़ा बदलाव दिखाई देता है। इसका मतलब यह नहीं है कि 2029 में सिर्फ जेन ज़ी चुनाव का फैसला करेगी। बल्कि इसका मतलब यह है कि पहली बार इतनी बड़ी तादाद में ऐसे मतदाता राजनीतिक सिस्टम में आ रहे हैं जिनकी दुनिया, सूचना हासिल करने का तरीका और राजनीति को देखने का नजरिया पिछली पीढ़ियों से एकदम अलग है।

इसलिए आजादी के 79वें वर्ष का यह आठवां पड़ाव मात्र इस सवाल से नहीं जुड़ा है कि अगली सरकार किसकी होगी। असली सवाल इससे बड़ा है कि क्या भारतीय राजनीति उस पीढ़ी के साथ तालमेल बैठा पायेगी, बदल पाएगी जो अब सिर्फ वोट देने वाली पीढ़ी नहीं बल्कि राजनीति की भाषा और उसकी प्राथमिकताएं तय करने वाली पीढ़ी बनने की ओर बढ़ रही है। भारत की राजनीति में अगला बड़ा बदलाव यह नहीं होगा कि कौन सत्ता में आता है। असली बदलाव यह होगा कि सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने वाला कौन है। 79 साल की आजादी के बाद भारत अब उस पीढ़ी के सामने खड़ा है जो सिर्फ वोट नहीं देना चाहती बल्कि राजनीति से जवाब भी चाहती है और जरूरत पड़ने पर राजनीति की शर्तें बदलने का बूता भी रखती है।

( लेखक पत्रकार है।)

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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