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India Moral Crisis: भारत के नैतिक संकट, भ्रष्टाचार, सामाजिक सोच और व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर प्रो. कमलेश मिश्रा का विश्लेषण। जानिए क्यों बदलाव सरकार से नहीं, व्यक्ति से शुरू होता है।
India Moral Crisis
India Moral Crisis: भारत चरम विरोधाभासों की भूमि है, और एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में किसी भी बदलाव या कदम के लिए कुछ वास्तविक परिवर्तनों की आवश्यकता होगी। यह बदलाव इस बात में नहीं होना चाहिए कि सरकारें कैसे काम करती हैं या हमारे नेता कैसा व्यवहार करते हैं—हमें वही सरकार और नेता मिलेंगे जिनके हम हकदार हैं।
भारत के नागरिकों के रूप में हममें और हमारी सोच में एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है। चोरी सिर्फ मंदिरों में ही नहीं, बल्कि भारत में जीवन के हर क्षेत्र में हो रही है। केवल 10 से 15 प्रतिशत आबादी ही भ्रष्टाचार से अछूती रही है, लेकिन इसे कोई स्वीकार नहीं करता। हम हमेशा अपने भ्रष्ट आचरण को सही ठहराते रहते हैं। पेपर लीक उन लोगों ने किया जिन्होंने पेपर सेट किए थे; मंदिर में चोरी उन लोगों ने की जो पैसे गिन रहे थे। हमें व्यक्ति के स्तर पर, फिर अपनी सोच में और फिर व्यवस्था में बदलाव लाने की जरूरत है। व्यक्ति, विचार और व्यवस्था में बदलाव लाना होगा।
मैं किसी गरीब को भ्रष्ट नहीं बता रहा हूँ, मैं केवल इस बात को रेखांकित कर रहा हूँ कि पूरी आबादी भ्रष्ट, मूल्यहीन और अनैतिक हो चुकी है। जो लोग ईमानदार हैं, वे अक्सर केवल वही हैं जिन्हें भ्रष्ट होने का अवसर नहीं मिला है।
हम राजनीतिक दलों, नौकरशाही की सड़न और संस्थागत विफलताओं पर उंगलियां उठाते हैं क्योंकि यह हमें जवाबदेही से मुक्त कर देता है। ट्रैफिक सिग्नल न तोड़ने, जल्दी काम कराने के लिए रिश्वत न देने या अपने फायदे के लिए किसी खामी का फायदा न उठाने की तुलना में एक भव्य राष्ट्रीय क्रांति की मांग करना कहीं अधिक आसान है। हम सिद्धांत रूप में ईमानदारी की पूजा करते हैं, लेकिन व्यावहारिक जीवन में अवसरवादिता को अपनाते हैं। हमने नैतिक पाखंड को एक हथियार बना लिया है: अपने से ऊपर रिश्वत लेने वाले की निंदा करते हैं और अपने से नीचे वाले व्यक्ति के हाथ में चुपचाप पैसे थमा देते हैं।
आर्थिक विकास, उच्च तकनीक वाले बुनियादी ढांचे और वैश्विक कद का कोई मतलब नहीं रह जाता यदि देश की नैतिक रीढ़ सामूहिक अवसरवादिता में पिघल चुकी हो। कोई भी राष्ट्र केवल विश्व स्तरीय राजमार्ग बनाकर विकसित नहीं बनता; वह तब विकसित बनता है जब उसके नागरिक सुविधा के ऊपर नैतिकता को चुनते हैं, तब भी जब उन्हें कोई न देख रहा हो।
यदि हम सचमुच एक विकसित भारत चाहते हैं, तो हमें सरकार में किसी मसीहा का इंतजार करना बंद करना होगा। यह सुधार हमें अपने व्यक्तिगत निर्णयों की खामोशी से शुरू करना होगा। जब तक हम अपने नैतिक पतन का सामना नहीं करते, अपनी स्वार्थी दलीलों को स्वीकार नहीं करते और सबसे पहले खुद से सख्त ईमानदारी की मांग नहीं करते, तब तक एक बदले हुए राष्ट्र का कोई भी सपना एक खोखला भ्रम बना रहेगा। सड़न की शुरुआत हमसे ही हुई थी—और इलाज भी ठीक वहीं से शुरू होना चाहिए।
(लेखक अमेरिकी विश्विद्यालयों में लंबे समय तक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं)


