काशी से वृंदावन तक: भारतीय भाषिक चेतना का मौन प्रस्थान

Indian Language Culture: “भाषिक सौंदर्य का मौन प्रस्थान” में गौतम चटर्जी भाषा, लोकबोलियों, कबीर की वाणी, शास्त्रीय संगीत और शब्दों के बदलते स्वरूप के जरिए भारतीय भाषिक सौंदर्य व मौन की गहरी अनुभूति पर विचार करते हैं।

Newstrack Network
Published on: 7 Jun 2026 4:32 PM IST
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Indian Language Culture: काशी या वृंदावन ही नहीं, ऐसा कहीं भी लग सकता है। भारतीय पृथ्वी के किसी भी स्थान पर, किसी भी देशकाल में। वह यह कि किसकी उपस्थिति से सूरज, चांद और ऋतु अपनी आभा और आंच हमें उपहार दे रहे हैं, किसकी अनुभूति से हमारे आसपास छोटे-बड़े वृक्षों की पत्तियां पुलकित हो रही हैं और किसके विशेष स्पर्श से हम अपनी अनुभूतियों को भाषा की गरिमा सौंप रहे हैं! स्पष्ट है कि इस अनुभूति को हम अरूप और असीम ही रहने देना चाहते हैं, तो कभी रूप में भी उद्घाटित होते देखना चाहते हैं। भाषा, विशेषकर कलाभाषा, उस अनुभूति, उस स्पर्श का प्रकट रूप ही है, जिसे हम अपनी दृष्टि के अनुसार सौष्ठव और वैशिष्ट्य दे रहे होते हैं। समाज इसी रूप को साहित्य और संगीत आदि कलाओं से लेता रहा है। क्या आज भी ऐसा ही है? समाज की भाषिक चेतना को देखकर तो नहीं लगता। उलटे इसका भ्रष्ट प्रभाव कलाभाषा पर पड़ता अधिक दिखाई देता है।

ऐसा क्यों होता गया कि समाज ने अपनी प्राचीन भाषिक समृद्धि इस शती में अधिक खोई है? अब प्रकाशित लेखों या विश्लेषणों में भाषिक अशुद्धि कोई विषय ही नहीं है। कबीर तत्कालीन समाज के लिए अनपढ़ थे, किंतु उनकी सधुक्कड़ी बोली में एक भी अक्षर अनुपयुक्त नहीं, बल्कि उस अपूर्व, अरूप अनुभूति के बारे में व्यक्त सभी सबद क्षरणहीन शब्दों में उत्कृष्ट पवित्रता की तरह अनुस्यूत हैं। स्वाभाविक है कि समय के साथ हम शब्दों के स्वरूप को बदलते और वरण करते हैं। लेकिन हृदय तो यही कहता है कि शब्दों को जस का तस ही रहने दिया जाए। जैसे, चींटी के पांव में मेहर बाजे, सो भी साहब सुनता है। आज इसे समझाने के लिए अक्सर अध्यापक मेहर की जगह घुंघरू कर देते हैं। शब्दों को न बदलकर यदि पद के अभिधेय संदेश और तलस्पर्शी अनुभूति को साझा किया जाए, तो यह मनुष्य के आत्यंतिक प्रकाश को भी छुएगा और शोभन वचन भी रहेगा, जिसे वैदिक भाषा में सूक्ति कहा गया है।

लोक अनुश्रुत बोलियों का माधुर्य इसी आशय से जनगृहीत है। लोकगीतों और गायन में शब्दों का बनाव अपनी मिट्टी से जुड़कर ही हृदयांकित होता रहा है। चैती हो या ठुमरी, श्रोता पश्चिम की नहीं, पूरब अंग की ही सुनना चाहते हैं, जैसे टप्पा पंजाब अंग का। आप प्रभा अत्रे और सिद्धेश्वरी देवी से चैती और ठुमरी सुनिए, अंतर दिख जाएगा। इसके बावजूद शब्दों के उच्चारण में अंतर होता रहता है। लोकप्रिय चैती है, एहीं उइयां मोतिया हेराइल हो रामा…। पूरब अंग, विशेषकर बनारस में भोजपुरी काशिका और अवधी के शब्दों के साथ विकसित हुई है। ‘हेराइल’ की जगह ‘हेरा गइल’ का प्रयोग चलता है, लेकिन ‘एहीं’ की जगह ‘यहीं’ का प्रयोग बताता है कि हम भोजपुरी से खड़ी बोली में कब आ गए, हमें ही पता नहीं। यही वह जगह है, जहां मेरा मोती खोया या मेरा मोती यहीं पर कहीं खोया, इस भाषा में सोचते हुए हमने कब ‘एहीं’ को ‘यहीं’ कर दिया, हम खुद भूल बैठे। यदि ठइयां बोल रहे हैं, तो ‘एहीं’ को ‘यहीं’ क्यों कर रहे हैं? सिद्धेश्वरी देवी और रसूलन बाई ‘एहीं’ गाती थीं। सविता देवी दिल्ली गईं, तो ‘यहीं’ हो गया। निर्मला देवी मुंबई गईं, तो भी ‘एहीं’ बदलकर ‘यहीं’ हो गया। ऐसे बदलाव की ओर हमारा ध्यान प्रायः नहीं जाता। सिद्धेश्वरी देवी की प्रिय शिष्या कौमुदी मुंशी ‘याही’ गाती थीं, क्योंकि उनके उच्चारण में गुजराती प्रभाव था। बनारस में तबला-शिल्पी लच्छू महाराज के घर एक बार निर्मला देवी से मैंने यह पूछ लिया था, तो उन्होंने बड़े प्यार से कहा था कि क्या करें, जब तक बनारस में रहे, तो एहीं ठइयां गाते रहे और अब मुंबई चले गए, तो यहीं ठइयां हो गया। अब हम आपन हेराइल मोतिया ओही ठइयां न ढूंढब!

इस प्रसंग में वैदिक आर्यभाषा या कबीर की संध्याभाषा दुर्निवार या प्रत्यग्र लग सकती है। लेकिन इसके पीछे जो अक्षर है, अक्षत तत्व की अरूप अनुभूति का अहर्निश स्पर्श है, उसे हम कैसे विस्मृत कर सकते हैं? विचार या मन तो चाहेगा ही, हम इस शाश्वत और अक्षुण्ण मौन को शब्दों से दूर रखें। लेकिन हम इस तथ्य से विदा नहीं ले सकते कि सारे शब्द मौन के प्रणव आकाश से ही प्रकट हैं और शब्दों की घर-वापसी मौन में ही विश्राम लेने से हो सकती है। नाट्यशास्त्र में आचार्य भरत यही सिखाते हैं कि शब्दों का उच्चारण ऐसा हो कि श्रोताओं में मौन का प्रभाव फैल जाए। क्या ऐसा शास्त्रीय या लोक गायन से हम कर पाते हैं? भाषिक सौंदर्य का जो मौन प्रस्थान हम समाज में देख रहे हैं, वह मौन प्रस्थान नहीं, बल्कि ऐसी चुप्पी है, जो शव या मृत्यु के साथ चलती है। मौन प्रस्थान हम उसे कह रहे हैं, जिसे ऋषि-मुनिगण अपने ध्यान (या रचयित्री शक्ति) को शब्दों से हटाकर मौन पर केंद्रित करने का सुझाव देते हैं। और यह कहीं भी हो सकता है। इसके लिए काशी या वृंदावन में रहना जरूरी नहीं। मन के प्रति मरना जरूरी है। मगहर कबीर के लिए ऐसा ही मन बना। यह प्रतीक-भाषा या स्वयं वैदिक या कबीर साहब की संध्याभाषा ही है। इस आनुष्ठानिक मृत्यु के क्षण ही प्रेम की यह अनुभूति हमें नए सिरे से रचती है, किसी शाश्वत अभिप्राय के लिए हमारा पुनर्नवा करती है।

गौतम चटर्जी

(साभार ‘अमर उजाला’)

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