इंद्रा नूई के बहाने - कुछ बदलावों की बात

Indra Nooyi India: इंद्रा नूई के हालिया बयान के बहाने भारत में महिलाओं की कार्यस्थल पर चुनौतियां, लैंगिक समानता, कॉर्पोरेट नेतृत्व, मातृत्व, सामाजिक अपेक्षाएं और बदलती कार्यसंस्कृति पर आधारित एक विश्लेषणात्मक लेख।

Anshu Sarda Anvi
Published on: 7 July 2026 11:04 AM IST
Indra Nooyi India
X

 Indra Nooyi India (Image Credit-Social Media)

Indra Nooyi India: बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सि-को की पूर्व सीईओ इंद्रा नूई द्वारा हाल ही में दिए गए बयान एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने भारत की कार्यसंस्कृति और सामाजिक व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि अगर वे भारत में होतीं तो इतनी बड़ी कंपनी की सीईओ नहीं बन पाती। ‌‌इसके अतिरिक्त उन्होंने ‌भारत और चीन तथा भारत और अमेरिका की तुलना करते हुए भी विवादों को जन्म देते बयान दिए। जैसा कि होना था लोगों की नाराजगी फूट पड़ी। बहरहाल उन पर न जाते हुए हम अपने विषय पर आते हैं।

देश की आजादी के मात्र 7-8 साल बाद जन्मीं इंद्रा नूई को ‌अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन से तुरंत ही आजाद हुआ ‌एक नौजवान भारत देखने को मिला। उस समय में महिलाओं की सामाजिक स्थिति बहुत प्रभावशाली या ताकतवर नहीं थी और उनका जीवन पूर्णतः घरेलू था। ऐसे में उनके जैसी महिलाओं का प्रतिशत बहुत कम था, जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और उनके परिवारों में उन्हें दुनिया जीतने और बड़े सपने देखने का हौसला एवं साहस दिया।

उनके अनुभव में सच्चाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत में आज भी अनेक महिलाओं को करियर के दौरान परिवार की जिम्मेदारियों, मातृत्व अवकाश, सामाजिक अपेक्षाओं, सुरक्षा, नेतृत्व में कम प्रतिनिधित्व और कार्यस्थल पर पूर्वाग्रह जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचना महिलाओं के लिए औसतन पुरुषों की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है। जिस समय वे पेप्सिको की प्रमुख बनीं, उस समय भारत में क्या कोई ऐसी कामयाब महिला थी जो पारिवारिक सहारे या पहचान के बिना शिखर तक पहुंची हो? सच तो यह है कि उन्होंने भारत का और भारतीय स्त्रियों का नाम ऊंचा किया है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नूई का भारत से विदेश जाने का अनुभव उस दौर का है, जब भारत का कॉर्पोरेट वातावरण आज जितना विकसित नहीं था। लेकिन यह कहना कि भारत में कोई महिला शीर्ष वैश्विक नेतृत्व तक नहीं पहुँच सकती, बिल्कुल भी ईमानदार कथन नहीं होगा। इसलिए उनका बयान उनके व्यक्तिगत अनुभव और उस समय की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित माना जा सकता है। परिस्थितियाँ 1970–80 के दशक की तुलना में अब काफी बदली हैं। पिछले दो दशकों में भारतीय महिलाओं ने वैश्विक कंपनियों, बैंकों, टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप जगत में शीर्ष पद हासिल किए हैं। नायका की फाउंडर फाल्गुनी नायर, हिंदुस्तान यूनिलीवर की सीईओ प्रिया नायर, कोलगेट-पामोलिव इंडिया की सीईओ प्रभा नरसिम्हन, बायोकॉन की एग्जीक्यूटिव चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ, वेल्सपन इंडिया की मैनेजिंग डायरेक्टर दीपाली गोयनका, एचडीएफसी लाइफ इंश्योरेंस की एमडी

विभा पाडलकर, एडलवाइस म्यूचुअल फंड की सीईओ राधिका गुप्ता, अंतरिक्ष कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका में ऋतु करिधल, भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, ‌ भारतीय इस्पात प्राधिकरण की अध्यक्ष सोमा मंडल आदि ऐसे नाम हैं, जिन्होंने भारत में रहकर ही उच्च पदों पर अपना नाम स्थापित किया है। लेकिन किसी समाज का आकलन इन शीर्ष पर बैठी 1% सफल महिलाओं से नहीं, बल्कि उसकी सामान्य महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता से किया जाना चाहिए। ये सफल महिलाओं को पूरे भारत की महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, ये उनके लिए प्रेरणास्रोत अवश्य हो सकतीं हैं।

उनका कहना था कि अमेरिका का सिस्टम मेरिटोक्रेसी पर आधारित है क्योंकि मार्गदर्शक पुरुष या महिला में भेद करने की जगह काबिल लोगों को चुनते हैं और आगे बढ़ाते हैं। उनके पेप्सिको के सीईओ पद तक पहुंचने में उनकी येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की शानदार शिक्षा और असाधारण नेतृत्व क्षमता का विशेष योगदान रहा। उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण की भी आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अब शक्तिशाली पुरुषों आगे आएं, महिलाओं के लिए समान अवसर बना लैंगिक समानता को बढ़ावा दे। उन्होंने महिलाओं के प्रति ‌भेदभाव के लिए ‌सत्तासीन पुरुषों को ‌जवाबदेह ठहराते हुए कहा कि मानव संसाधन नीति आधी आबादी को बाहर करने के लिए नहीं बल्कि समान अवसर देने के लिए होती है। पर फिर एक प्रश्न उठता है कि क्या पुरुष लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए खुद आगे आएगा? प्रश्न भले ही साधारण हो पर उत्तर इतना आसान नहीं।

उन्होंने इस बात को भी उठाया कि पुरुषों के घर से बाहर जाकर काम करने में कोई आपत्ति नहीं होती लेकिन जब महिलाएं जाना चाहती हैं तो उनके ऊपर बच्चे पैदा करने और उनको बड़ा करने की जिम्मेदारी डाल कर रोका जाता है। उनका प्रश्न था कि मातृत्व जिम्मेदारी का पालन करने वाली महिलाओं को नौकरी से दूर करके क्या हम अपने आसपास मौजूद प्रतिभाओं को समान मान रहे हैं, उन्हें समान अवसर दे रहे हैं या कॉर्पोरेट को सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा से वंचित कर रहे हैं? उन्होंने गलत नहीं कहा। आज भी हमारे देश में एक स्त्री को मां और देवी का दर्जा देकर, मातृत्व उनकी ही जिम्मेदारी है, कहकर उन्हें घर से बाहर ‌ निकल कर काम करने से रोका जाता है‌। हमें यह समझना होगा कि हमारी नई पीढ़ी की महिलाएं मातृत्व को लेकर नौकरी छोड़ देने के दवाब के कारण कहीं इस दायित्व बोध से ही ‌पीछा न छुड़ाने लग जाएं।

इंद्रा नूई ने एक वास्तविक समस्या की ओर ध्यान दिलाया है कि भारत में महिलाओं के लिए शीर्ष नेतृत्व तक का रास्ता अब भी अपेक्षाकृत कठिन है। हम उनकी आलोचना को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकते हैं क्योंकि आज भी भारत में लैंगिक समानता स्थापित नहीं हुई है। ग्लास सीलिंग इंडेक्स यानी 2019 के लैंगिक असमानता सूचकांक में भारत 162 देशों में से 123वें स्थान पर है। महिलाओं की श्रम भागीदारी, वरिष्ठ प्रबंधन में प्रतिनिधित्व और वेतन असमानता जैसे मुद्दे मौजूद हैं। यह ठीक है कि भारत में महिलाओं की शिक्षा और उपलब्धियाँ तेजी से बढ़ी हैं पर सूचीबद्ध भारतीय कंपनियों में महिला CEOs का प्रतिशत लगभग 5% के आसपास है। संसद और कॉर्पोरेट बोर्डों में महिलाओं की भागीदारी पहले से बेहतर हुई है, लेकिन शीर्ष निर्णयकारी पदों पर पुरुषों का वर्चस्व अभी भी स्पष्ट है। ग्रामीण और शहरी भारत दोनों में लाखों महिलाएँ आज भी आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं और घरेलू निर्णयों में उनकी भूमिका सीमित रहती है। अगर कोई कहे कि देश में सभी महिलाओं के लिए समान अवसर उपलब्ध हैं, तो यह वास्तविकता नहीं है। देश में करोड़ों महिलाओं तक उच्च शिक्षा नहीं पहुंच पाती है, रोजगार में प्रवेश के तो अवसर ही नहीं है और अगर काम करती भी हैं तो उन्हें समान वेतन नहीं मिलता। वे घरेलू कार्यों का असमान बोझ उठाती हैं और सुरक्षा और सामाजिक प्रतिबंध भी उनके आगे बढ़ाने में अवरोध सिद्ध होते हैं। दरअसल हम ‌उस बात को आज तक स्वीकार्य ‌कर हीं नहीं पाएं हैं कि महिलाएं ‌दोनों दायित्व निभाना जानती हैं, निभा सकतीं हैं बशर्ते उन्हें पुरुष वर्ग का बराबर साथ मिल जाए।

एक और विषय पर उन्होंने ध्यानाकर्षित किया। वह था कि उच्च पधीनस्थ अकेलेपन की शिकार हो जाती हैं। उनका कहना था कि‘अकेलापन’ उनका नाम-उपनाम के बीच आकर कहीं समा जाता है। पुरुषों के क्लब होते हैं. उनका कंपनी के भीतर और बाहर अच्छा खासा नेटवर्क होता है। लेकिन महिलाओं के साथ ऐसा नहीं होता. कंपनी के बड़े पदों पर पहुंचने के बाद वे अपनी बात सभी से साझा नहीं कर सकतीं। कंपनी की तमाम गोपनीय चीजें होती हैं, जो उन्हें अपने तक रखनी पड़ती हैं। पति से भी अगर रोज-रोज इस पर बात करें, तो वे बोर हो जाते हैं। इस समस्या के लिए महिलाएं खुद भी जिम्मेदार हैं, हालांकि। क्योंकि उनके कुछ संगठन या क्लब जो बने भी, वे उन्हें जल्द छोड़कर पुरुषों-महिलाओं की संयुक्त सदस्यता वाले संगठनों में चली जाती हैं,फिर वहां उपेक्षित होती रहती हैं। वे यहां भी पूरी तरह गलत नहीं हैं। आज भी जब कोई महिला एक अलग क्षेत्र या प्रोफेशन में कार्य करती है तो परिजनों द्वारा उसे इस बात का डर दिखाया जाता है कि वह अब दूसरों से कट जाएगी और उसका पारिवारिक व सामाजिक दायरा खत्म हो जाएगा। उसे पारिवारिक और सामाजिक गैदरिंग में भी एक अलग तरह के व्यक्तित्व के रूप में रखा जाता है। यदि व्यक्ति के पास मजबूत पारिवारिक संबंध, मित्र और मार्गदर्शक हों, तो यह जोखिम काफी कम हो जाता है। महिलाओं के लिए कार्य-जीवन संतुलन का दबाव औसतन अधिक पाया गया है, लेकिन इसका परिणाम हर व्यक्ति में अलग-अलग होता है। पर इसे यह कहकर सामान्यीकृत करना कि 'उच्च पद पर पहुँचने वाली हर महिला अकेली हो जाती है', तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। इंद्रा नूई का रह कहना एक व्यक्तिगत और कई अन्य महिलाओं के साझा अनुभव का प्रतिबिंब हो सकता है, इसलिए इसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता। उच्च पदस्थ चाहे वह स्त्री हो, चाहे वह पुरुष हो वे दोनों ही अकेलेपन के शिकार हो सकते हैं क्योंकि अकेलापन किसी एक लिंग को देखकर नहीं होता है। चूंकि उच्च पदस्थ व्यक्तियों का जीवन बहुत अनुशासित , अत्यधिक कार्य दवाब वाला और अपने स्टेटस को बनाए रखने वाला होता है, इसमें ‌ उनके आसपास लोगों की संख्या भी कम हो जाती है लेकिन सफलता का अर्थ अनिवार्य रूप से अकेलापन ही हो, यह आवश्यक नहीं।

बहरहाल जो भी हो इंद्रा नूई के इन बयानों ने एक चर्चा अवश्य छेड़ दी है। हमें इसे रचनात्मक, विचारात्मक दृष्टिकोण से लेना होगा कि हम क्या बदल सकते हैं, हमें क्या बदलाव करने चाहिए बनस्पत इसके कि हम उनके बयानों को प्रति टीका-टिप्पणी करें। हमें अपने खुद के अंदर झांकना होगा कि अन्य देश और यहां तक की भारतवंशी भी भारत के बारे में यहां की सांस्कृतिक, सामाजिक व्यवस्था के बारे में क्या सोचते हैं। यह ठीक है कि भारत की पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था अन्य देशों से एकदम अलग है पर क्या उसे भविष्य के अनुकूल बदलना नहीं चाहिए?

Anshu Sarda Anvi
ABOUT THE AUTHOR

Anshu Sarda Anvi

anshusardaanvi.newstrackpr@gmail.com
Next Story