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पिछले दरवाजे से पैठ
Jammu and Kashmir Politics: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में 2014 के चुनाव, PDP-BJP गठबंधन, राज्यपाल शासन, अनुच्छेद 370 और 2024 के चुनाव ने सत्ता के समीकरण कैसे बदले? जानिए पूरा राजनीतिक घटनाक्रम।
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Jammu Kashmir Politics: पाकिस्तानी आतंकवादियों की बुलेट का जवाब बैलट से देकर जम्मू-कश्मीर के अवाम ने लोकतंत्र की एक नयी गाथा लिखी। उसे बिल्कुल इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि उसकी लिखी इबारत को पढ़ने में लोकतंत्र के पंडित-पुरोधा बुरी तरह नाकामयाब होंगे। यह उनकी नाकामयाबी का ही नतीजा था कि जम्मू-कश्मीर को एक बार फिर राज्यपाल शासन में साँस लेनी पड़ी। जिस राज्य में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने के लिए दशकों से संघर्ष चल रहा था, वहाँ चुनाव के बाद सरकार गठन की राजनीतिक खींचतान ने जनता की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। आज़ादी के बाद लगभग सत्रह साल तक 'धरती के स्वर्ग' कहे जाने वाले इस इलाके में संविधान के अनुच्छेद 356 और 357 का प्रयोग शेष भारत की तरह नहीं किया जा सकता था। अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक व्यवस्था के कारण इन प्रावधानों के विस्तार के लिए अलग प्रक्रिया आवश्यक थी। 21 दिसंबर, 1964 को राष्ट्रपति के संवैधानिक आदेश द्वारा अनुच्छेद 356 और 357 जम्मू-कश्मीर पर कुछ संशोधनों के साथ लागू किए गए। इसके जरिए संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति में केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार मिला। हालाँकि यहाँ एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक अंतर समझना आवश्यक है। जम्मू-कश्मीर के अपने संविधान की धारा 92 के तहत पहले छह महीने तक राज्यपाल शासन की व्यवस्था थी। इसके बाद आवश्यकता पड़ने पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता था। जनवरी 2015 में जो व्यवस्था लागू हुई, वह तकनीकी रूप से राष्ट्रपति शासन नहीं, बल्कि राज्यपाल शासन थी। यह अंतर मामूली नहीं था, क्योंकि जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संवैधानिक पहचान इसी प्रकार के प्रावधानों में अभिव्यक्त होती थी।
जम्मू-कश्मीर में पता नहीं क्यों, इतिहास खुद को बार-बार दोहराता रहा है। यहाँ के सियासतदान भी एक ही तरह की गलतियाँ दोहराने के आदी दिखते हैं। इसकी बानगी पिछली घटनाओं में साफ तौर पर देखी जा सकती है। जिस तरह दिसंबर 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी के बीच सत्ता के बँटवारे तथा नीतिगत समझौते को लेकर गतिरोध पैदा हुआ, कुछ वैसी ही स्थिति 2002 में भी बनी थी। तब चुनाव हार चुके नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहने से इनकार कर दिया था। कांग्रेस और पीडीपी के बीच सरकार गठन में विलंब के कारण 18 अक्टूबर से 2 नवंबर, 2002 तक राज्यपाल शासन लागू रहा। उस समय राज्यपाल गिरिश चंद्र सक्सेना थे। जनवरी 2015 में फारूक के बेटे और तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी राज्यपाल एन.एन. वोहरा से मिलकर कार्यवाहक मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने की इच्छा जताई। नई सरकार के गठन की अनिश्चितता के बीच 9 जनवरी, 2015 को राज्य में फिर राज्यपाल शासन लागू हो गया। इसी प्रकार जुलाई 2008 में अमरनाथ भूमि विवाद के कारण पीडीपी द्वारा कांग्रेस के नेतृत्व वाली गुलाम नबी आजाद सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद सरकार गिर गई थी और राज्यपाल शासन लगाना पड़ा था। तब भी राज्यपाल एन.एन. वोहरा ही थे। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के संदेश को ठीक से न पढ़कर राजनीतिक दल एक ऐसा इतिहास दोहरा रहे थे, जो जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए सहज स्वीकार्य नहीं हो सकता था। साल 2002 में पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस के साथ समझौते में काफी समय लगाया था और 2014 के चुनाव के बाद भी लगभग वैसी ही स्थिति पैदा हुई। इन घटनाओं में एक साझा प्रवृत्ति दिखाई देती है। जनता चुनाव के माध्यम से प्रतिनिधि सरकार चाहती थी, लेकिन राजनीतिक दल अपने-अपने हितों को सुरक्षित करने में इतने उलझ जाते थे कि प्रशासन की बागडोर निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय राज्यपाल के हाथों में पहुँच जाती थी। लोकतंत्र की यही विडंबना थी कि जनता की सक्रिय भागीदारी कभी-कभी राजनीतिक नेतृत्व की निष्क्रियता में बदल जाती थी।
दिसंबर 2014 के विधानसभा चुनाव ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक नया समीकरण पैदा कर दिया था। पीडीपी 28 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई, जबकि भाजपा को 25 सीटें मिलीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस 15 और कांग्रेस 12 सीटों पर सिमट गईं। लेकिन इस चुनाव का सबसे दिलचस्प तथ्य सीटों के बजाय मत-प्रतिशत में छिपा था। पीडीपी को 22.67 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 22.98 प्रतिशत। अर्थात पीडीपी से तीन सीटें कम जीतने के बावजूद भाजपा का मत-प्रतिशत उससे 0.31 प्रतिशत अंक अधिक था। भाजपा को कुल 11,07,194 वोट और पीडीपी को 10,92,203 वोट मिले। इस प्रकार भाजपा ने मत-प्रतिशत के दाँव पर कई स्थापित सियासी पहलवानों को चित कर दिया। जम्मू संभाग की 37 सीटों में से भाजपा ने 25 पर कब्जा किया, जबकि पीडीपी ने घाटी की 46 सीटों में से 25 और जम्मू संभाग की तीन सीटें जीतीं। चार सीटों वाले लद्दाख में कांग्रेस तीन सीटें जीतने में कामयाब रही। कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू और लद्दाख की तीनों सीटें जीती थीं, जबकि पीडीपी को घाटी की तीनों सीटें मिली थीं। इस लिहाज से राजनीति घाटी और गैर-घाटी के विभाजन का शिकार होती दिखाई दी। लगभग 66 प्रतिशत मतदान ने स्पष्ट कर दिया था कि आतंकवाद, अलगाववाद और पाकिस्तान के हस्तक्षेप के बावजूद जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा वर्ग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहता है। मतदान में भाग लेने वाले सभी नागरिकों की राजनीतिक आकांक्षाएँ एक जैसी नहीं थीं, लेकिन यह चुनाव प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की उनकी इच्छा का महत्त्वपूर्ण प्रमाण था।
कुछ निहित स्वार्थों ने यहाँ तक बहस छेड़ दी कि राज्य को तीन हिस्सों—कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख—में बाँट दिया जाए। इसके समर्थन में विकास का पुराना तर्क दोहराया गया। यह दावा करते समय वे भूल गए कि किसी राज्य का छोटा होना अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होता। उत्तर प्रदेश से अलग उत्तराखंड, बिहार से अलग झारखंड और मध्य प्रदेश से अलग छत्तीसगढ़ के गठन का अनुभव बताता है कि छोटे राज्यों की आर्थिक उपलब्धियाँ एक जैसी नहीं रही हैं। कुछ क्षेत्रों में नए राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया तो कुछ क्षेत्रों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। विकास दर भी समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही है। केवल राज्य का आकार घटा देने से आर्थिक प्रगति, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक कुशलता सुनिश्चित नहीं हो जाती। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक क्षमता, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और स्थानीय जनता की भागीदारी आवश्यक होती है। जम्मू-कश्मीर जैसे सीमावर्ती और संवेदनशील राज्य को केवल विकास की आड़ में छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटने की माँग को तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता था। यह राजनीतिक हित साधने के लिए रचा गया एक प्रकार का बौद्धिक मायावाद भी हो सकता था। हालाँकि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को केवल राजनीतिक स्वार्थ बताकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख की भौगोलिक, सांस्कृतिक तथा विकास संबंधी आवश्यकताएँ अलग-अलग रही हैं। इन असमानताओं का समाधान बेहतर प्रशासन और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व से भी निकाला जा सकता है। सवाल यह था कि क्षेत्रीय असंतोष को दूर करने के लिए प्रशासनिक पुनर्गठन ही एकमात्र रास्ता है या एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है जिसमें राज्य की एकता और विभिन्न क्षेत्रों की आकांक्षाएँ साथ-साथ सुरक्षित रहें।
सुरक्षा के लिहाज से जम्मू-कश्मीर की अलग हैसियत रही है। यहाँ निर्णय लेते समय विदेश नीति, पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के साथ-साथ आतंकी मंसूबों और सीमा पार से संचालित गतिविधियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है। इसके बावजूद पीडीपी और भाजपा के बीच बनते रिश्तों में दरार का बड़ा कारण दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएँ थीं। पीडीपी के नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती राज्य की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते मुख्यमंत्री की कुर्सी अपनी पार्टी के पास रखना चाहते थे। इसके अतिरिक्त पीडीपी की राजनीतिक प्राथमिकताओं में अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के साथ संवाद, पाकिस्तान से बातचीत और कश्मीर संबंधी नीतियों में स्थानीय राजनीतिक संवेदनशीलताओं का सम्मान शामिल था। दूसरी ओर भाजपा राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा और अलगाववाद के प्रति कठोर रुख को अपनी राजनीतिक पहचान का आधार मानती थी। उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद का वातावरण भी अनुकूल नहीं था। अगस्त 2014 में पाकिस्तानी उच्चायुक्त द्वारा हुर्रियत नेताओं से मुलाकात किए जाने के बाद भारत सरकार ने विदेश सचिव स्तर की प्रस्तावित वार्ता रद्द कर दी थी। स्वाभाविक था कि पाकिस्तान और हुर्रियत से बातचीत के सवाल पर दोनों दलों के बीच मतभेद पैदा होते। विकास के एजेंडे पर न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर सरकार बनाना कठिन नहीं था, लेकिन घाटी की राजनीतिक समस्याओं पर भाजपा को लगभग खामोश रखने की अपेक्षा ऐसे दल के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती थी, जिसके राजनीतिक आदर्शों में 'कश्मीर से कन्याकुमारी' तक राष्ट्रीय एकता का विचार शामिल रहा है और जिसके प्रतीक पुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक व्यवस्था के विरोध में आंदोलन किया था। उन्हें मई 1953 में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करते समय हिरासत में लिया गया और 23 जून, 1953 को श्रीनगर में हिरासत के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर लंबे समय तक विवाद बना रहा।
पीडीपी और भाजपा का मतभेद केवल मुख्यमंत्री पद या मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी तक सीमित नहीं था। दोनों दल जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को अलग-अलग राजनीतिक दृष्टियों से देखते थे। भाजपा के लिए राष्ट्रीय एकीकरण और आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति प्राथमिक थी, जबकि पीडीपी अपने जनाधार के अनुरूप राजनीतिक संवाद, क्षेत्रीय पहचान और कश्मीर घाटी की विशिष्ट संवेदनशीलताओं पर जोर देती थी। दोनों के बीच समझौता संभव था, लेकिन उसके लिए केवल सत्ता बाँटना पर्याप्त नहीं था। आवश्यक यह था कि दोनों एक-दूसरे की राजनीतिक सीमाओं को समझते हुए शासन का ऐसा व्यावहारिक रास्ता निकालते जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को परस्पर विरोधी मानने के बजाय संतुलित किया जाता। बाद की घटनाओं ने भी सिद्ध किया कि केवल साझा सरकार बना लेने से वैचारिक टकराव समाप्त नहीं हो जाता।
खंडित जनादेश ने स्पष्ट कर दिया था कि पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच सहज राजनीतिक साझेदारी की संभावना सीमित थी। कांग्रेस समर्थन दे भी देती तो पीडीपी और कांग्रेस की कुल सीटें 40 होतीं, जबकि 87 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 44 विधायकों की आवश्यकता थी। दूसरी ओर पीडीपी और भाजपा की सम्मिलित सीटें 53 थीं, जो स्थिर बहुमत का आधार बन सकती थीं। ऐसे में पीडीपी की जिम्मेदारी बढ़ जाती थी कि वह जनादेश को समझे और सरकार गठन की दिशा में तेजी से पहल करे। लेकिन मुफ्ती मोहम्मद सईद इस अवसर को केवल सत्ता प्राप्ति के बजाय अधिकतम राजनीतिक लाभ हासिल करने के मौके के रूप में भी देख रहे थे। भाजपा के लिए भी यह साधारण गठबंधन नहीं था। जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भागीदारी उसके लिए राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ घाटी में अपने राजनीतिक प्रभाव के विस्तार का अवसर बन सकती थी। राजनीतिक गतिरोध बढ़ने का परिणाम यह हुआ कि राज्यपाल एन.एन. वोहरा के हाथों में शासन की बागडोर चली गई। राज्यपाल शासन को प्रायः केंद्र का 'छाया शासन' कहा जाता है। ऐसे समय में केंद्र सरकार का प्रभाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। यह स्थिति भाजपा को सुशासन की क्षमता प्रदर्शित करने और घाटी के लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का अवसर भी दे सकती थी।
क्योंकि जम्मू में भाजपा का विस्तार केवल हिन्दुत्व या भगवा छवि के कारण नहीं हुआ था। अमरनाथ भूमि विवाद के बाद हुए 2008 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को केवल 11 सीटें मिली थीं। वर्ष 2014 में उसकी सीटें बढ़कर 25 हो गईं। इस परिवर्तन के पीछे राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उभार, जम्मू क्षेत्र की क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस से असंतोष तथा विकास के प्रति बढ़ती उम्मीदें जैसे अनेक कारण मौजूद थे। भाजपा का 'मिशन 44 प्लस' विधानसभा में अपने बूते बहुमत हासिल करने का प्रयास था, लेकिन परिणाम उस लक्ष्य से काफी दूर रहा। 'घर वापसी' और 'लव जिहाद' जैसे मुद्दों को लेकर उस समय उठी बहसों ने भी उसके विकास-केंद्रित राजनीतिक संदेश के सामने चुनौती पैदा की। लोकसभा चुनाव में राज्य के स्तर पर भाजपा को लगभग 32.65 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि विधानसभा चुनाव में उसका मत-प्रतिशत 22.98 रह गया। यह लगभग 9.67 प्रतिशत अंकों की गिरावट थी। दोनों चुनावों की प्रकृति अलग होने के कारण इस परिवर्तन को केवल सांस्कृतिक विवादों का परिणाम नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना स्पष्ट था कि विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में किसी राष्ट्रीय दल की स्थायी राजनीतिक सफलता के लिए केवल भावनात्मक मुद्दों का सहारा पर्याप्त नहीं हो सकता था। सड़क, बिजली, शिक्षा, रोजगार, पर्यटन, प्रशासनिक पारदर्शिता और सुरक्षा जैसे प्रश्नों पर ठोस काम करना आवश्यक था। जम्मू में चुनावी सफलता को कश्मीर घाटी में सामाजिक स्वीकार्यता समझ लेना भी एक गंभीर राजनीतिक भूल होती। दोनों क्षेत्रों की ऐतिहासिक स्मृतियाँ और राजनीतिक अपेक्षाएँ अलग थीं।
राज्यपाल शासन जारी रहने की स्थिति में विकास कार्यों का राजनीतिक श्रेय स्वाभाविक रूप से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा को मिल सकता था। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में केंद्र सरकार के लिए यह केवल प्रशासनिक अवसर नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास अर्जित करने की चुनौती भी थी। यदि इस अवधि में जनता को बेहतर शासन, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का अनुभव होता तो उसका लाभ भाजपा को मिलना स्वाभाविक था। दूसरी ओर यदि मुफ्ती मोहम्मद सईद और पीडीपी कुछ सप्ताह बाद गठबंधन सरकार बनाने के लिए आगे बढ़ते तो अधिक समय तक चली अनिश्चितता उनकी राजनीतिक सौदेबाजी को कमजोर कर सकती थी। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ भाजपा के अनुभव से भी यह संकेत मिला था कि गठबंधन की राजनीति में सबसे बड़े दल की निर्णायक स्थिति छोटे सहयोगी की शर्तें मनवाने की क्षमता को प्रभावित करती है। पीडीपी के सामने कठिनाई यह थी कि वह कश्मीर घाटी में अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता भी बचाए रखना चाहती थी और भाजपा के साथ सत्ता में भागीदारी का अवसर भी नहीं छोड़ना चाहती थी। विलंब बढ़ने के साथ उसकी 'बिग ब्रदर' बनने की आकांक्षा और राजनीतिक हैसियत, दोनों के सामने चुनौती खड़ी हो सकती थी।
जम्मू-कश्मीर के लोकतांत्रिक इतिहास में राज्यपाल और राष्ट्रपति शासन के कई दौर आए हैं। इनमें सबसे लंबा केंद्रीय शासन जनवरी 1990 से अक्टूबर 1996 तक चला। उस समय आतंकवाद ने घाटी में भयावह रूप धारण कर लिया था। फारूक अब्दुल्ला के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे और जगमोहन की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति के बाद जनवरी 1990 में राज्यपाल शासन लागू हुआ। जुलाई 1990 में राष्ट्रपति शासन लगा, जो अक्टूबर 1996 में विधानसभा चुनावों के बाद समाप्त हुआ। यह लगभग छह वर्ष और नौ महीने का दौर था। हालाँकि पूरे कालखंड को जगमोहन का राज्यपाल कार्यकाल मानना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। जगमोहन उससे पहले 1984 से 1989 तक भी जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रह चुके थे। उनकी प्रशासनिक शैली ने उन्हें राज्य की राजनीति में विशिष्ट स्थान दिया। उन्होंने श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के गठन में निर्णायक भूमिका निभाई। वर्ष 1986 में गठित इस बोर्ड ने बाद के वर्षों में तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं के विस्तार, यात्रा मार्ग के विकास और प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जम्मू क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था के विस्तार का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी पड़ा। जगमोहन बाद में भाजपा में शामिल हुए और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी बने। लेकिन जगमोहन के प्रशासनिक योगदान का मूल्यांकन करते समय उनके कार्यकाल से जुड़े राजनीतिक विवादों और घाटी में केंद्र सरकार के प्रति पैदा हुए अविश्वास की उपेक्षा नहीं की जा सकती। जम्मू-कश्मीर में किसी प्रशासनिक मॉडल की सफलता का आकलन केवल निर्माण कार्यों या तीर्थयात्रा सुविधाओं से नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, सुरक्षा, स्थानीय विश्वास और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति से भी किया जाना चाहिए।
वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा कश्मीर घाटी में भी कुछ मत प्राप्त करने में सफल रही, हालाँकि वहाँ उसे विधानसभा की एक भी सीट नहीं मिली। घाटी में उसका मत-प्रतिशत लगभग दो प्रतिशत के आसपास रहा। सितंबर 2014 में जम्मू-कश्मीर में आई विनाशकारी बाढ़ के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति और केंद्र सरकार द्वारा राहत एवं पुनर्वास के प्रयासों ने एक राजनीतिक संदेश अवश्य दिया था। भाजपा नेतृत्व को उम्मीद थी कि विकास और मानवीय सहायता के माध्यम से घाटी में उसके प्रति मौजूद संदेह कम किए जा सकते हैं। तत्कालीन राज्यपाल एन.एन. वोहरा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अनुभवी अधिकारी रहे थे। इसलिए यह अपेक्षा निराधार नहीं थी कि राज्यपाल शासन में प्रशासनिक दक्षता और विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन का कोई नया उदाहरण सामने आ सकता है। यदि जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख में विकास तथा सहायता की योजनाएँ समान संवेदनशीलता से लागू होतीं तो राजनीतिक अविश्वास की दीवारें कुछ नीची पड़ सकती थीं। राज्यपाल शासन के माध्यम से विकास की धारा को प्रभावी बनाया जाता तो भाजपा इसे स्थायी सद्भाव और राजनीतिक पैठ में बदलने की कोशिश कर सकती थी। लेकिन किसी राजनीतिक दल को यह भी समझना आवश्यक था कि जनता के मन में जगह बनाने और चुनावी लाभ अर्जित करने के बीच एक बड़ा अंतर होता है। विकास का वास्तविक उद्देश्य लोगों का जीवन बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक विस्तार।
इसके बाद की घटनाओं ने इस राजनीतिक गतिरोध को एक बिल्कुल नया मोड़ दिया। लगभग दो महीने की बातचीत के बाद पीडीपी और भाजपा ने 'एजेंडा ऑफ अलायंस' नाम से साझा कार्यक्रम तैयार किया। एक मार्च, 2015 को मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और भाजपा पहली बार जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भागीदार बनी। जिस गठबंधन को चुनाव परिणाम के तुरंत बाद असंभव या अत्यंत कठिन समझा जा रहा था, वही अंततः सरकार बनाने का आधार बन गया। लेकिन यह समझौता दोनों दलों के वैचारिक अंतर्विरोधों को समाप्त नहीं कर सका। पाकिस्तान से बातचीत, अलगाववाद, सुरक्षा नीति, राज्य की विशेष संवैधानिक स्थिति और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे। मुफ्ती मोहम्मद सईद का 7 जनवरी, 2016 को निधन हो गया। इसके बाद फिर राज्यपाल शासन लागू हुआ। करीब तीन महीने के गतिरोध के बाद 4 अप्रैल, 2016 को महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और वह जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। यह सरकार भी स्थिर नहीं रह सकी। 19 जून, 2018 को भाजपा ने गठबंधन से समर्थन वापस ले लिया और महबूबा मुफ्ती सरकार गिर गई। अगले दिन फिर राज्यपाल शासन लागू हुआ। दिसंबर 2018 में राष्ट्रपति शासन लगा। इस घटनाक्रम ने सिद्ध किया कि सत्ता का गणित मिल जाने से राजनीतिक दृष्टियों का अंतर अपने आप समाप्त नहीं होता।
जम्मू-कश्मीर के इतिहास में सबसे बड़ा संवैधानिक परिवर्तन 5 अगस्त, 2019 को हुआ, जब केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के अंतर्गत लागू विशेष संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की। इसके साथ जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के माध्यम से तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया। यह नई व्यवस्था 31 अक्टूबर, 2019 से प्रभावी हुई। इस निर्णय ने उस बहस को भी नया अर्थ दे दिया जो 2014 में राज्य को अलग-अलग हिस्सों में बाँटने के पक्ष और विपक्ष में चल रही थी। अंतर यह था कि अब विभाजन केवल किसी राजनीतिक प्रस्ताव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संवैधानिक और प्रशासनिक वास्तविकता बन गया। केंद्र सरकार और भाजपा ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण, बेहतर प्रशासन तथा विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और अन्य आलोचकों ने इसे जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता, राज्य की पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए गंभीर आघात माना। 11 दिसंबर, 2023 को सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने अनुच्छेद 370 से संबंधित राष्ट्रपति के संवैधानिक आदेशों को वैध ठहराया। न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने का निर्देश दिया और राज्य का दर्जा शीघ्र बहाल किए जाने की आवश्यकता भी रेखांकित की। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति भारतीय राजनीति के सबसे महत्त्वपूर्ण और विवादित प्रश्नों में बनी रही।
करीब दस वर्ष के अंतराल के बाद सितंबर-अक्टूबर 2024 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए। इस बार राजनीतिक समीकरण बदल चुके थे। पुराना राज्य विभाजित हो चुका था, लद्दाख अलग केंद्रशासित प्रदेश था और जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में 90 निर्वाचित सीटें थीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल का स्थान प्राप्त किया। भाजपा को 29 सीटें मिलीं, कांग्रेस ने छह और पीडीपी ने केवल तीन सीटें जीतीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के चुनावी गठबंधन को बहुमत मिला तथा 16 अक्टूबर, 2024 को उमर अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वर्ष 2014 में 28 सीटें जीतकर सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने वाली पीडीपी का तीन सीटों पर सिमट जाना जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत था। दूसरी ओर भाजपा ने जम्मू क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ कायम रखी और विधानसभा में दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई। यह परिणाम इस तथ्य की भी याद दिलाता है कि जम्मू-कश्मीर के मतदाता अलग-अलग चुनावों में बदलती परिस्थितियों के आधार पर अपना निर्णय करते हैं। किसी एक चुनाव की सफलता को स्थायी राजनीतिक स्वीकृति मान लेना हमेशा जोखिम भरा होता है।
अक्टूबर 2026 तक जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार की वापसी को दो वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार लगातार राज्य का दर्जा लौटाने की माँग करती रही है। सितंबर 2026 में विधानसभा ने भी इस माँग के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। राज्य का दर्जा बहाल करने, निर्वाचित सरकार के अधिकार बढ़ाने और केंद्र तथा उपराज्यपाल के बीच शक्तियों के संतुलन का प्रश्न आज भी राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है। इस स्थिति में 2014 के चुनाव के बाद उठे सवाल एक नए रूप में सामने खड़े हैं। तब प्रश्न यह था कि निर्वाचित दल सरकार बनाने में असफल क्यों हो रहे हैं। आज प्रश्न यह भी है कि निर्वाचित सरकार को शासन चलाने के लिए कितनी संवैधानिक और प्रशासनिक स्वायत्तता मिलनी चाहिए। लोकतंत्र के लिए दोनों प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं। चुनाव के माध्यम से सरकार बनना लोकतंत्र की आवश्यक शर्त है, लेकिन निर्वाचित सरकार का प्रभावी ढंग से काम कर पाना भी उतना ही आवश्यक है।
जम्मू-कश्मीर की राजनीति का यह पूरा सफर एक और सच्चाई उजागर करता है। किसी संवेदनशील क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए विकास, सुरक्षा और प्रशासनिक दक्षता महत्त्वपूर्ण साधन अवश्य हैं, लेकिन वे जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक सहभागिता का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकते। भाजपा ने 2014 में जम्मू क्षेत्र में ऐतिहासिक सफलता हासिल की और उसके बाद सत्ता में भागीदारी के माध्यम से पूरे राज्य में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बढ़ाने का अवसर प्राप्त किया। वर्ष 2019 के संवैधानिक निर्णय ने जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक संरचना बदल दी। वर्ष 2024 के चुनाव ने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को फिर स्थापित किया। लेकिन इन सभी घटनाओं के बीच सबसे स्थायी प्रश्न वही रहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों का भरोसा किस तरह जीता जाए। यह भरोसा केवल प्रशासनिक निर्णयों, आर्थिक पैकेजों या चुनावी अभियानों से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण शासन, राजनीतिक संवाद, सुरक्षा और नागरिक गरिमा के प्रति समान प्रतिबद्धता से पैदा होता है।
इसलिए 'पिछले दरवाजे से पैठ' की राजनीति की अपनी सीमाएँ हैं। राज्यपाल शासन अथवा केंद्र के प्रत्यक्ष प्रशासन से किसी दल को अस्थायी राजनीतिक अवसर मिल सकता है। योजनाओं का क्रियान्वयन तेज करके जनता के बीच उसकी छवि भी बेहतर बनाई जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र में स्थायी स्वीकार्यता का रास्ता अंततः जनता के बीच से ही होकर गुजरता है। जम्मू-कश्मीर का इतिहास बार-बार यही बताता है कि सत्ता प्राप्त करने और जनता का विश्वास अर्जित करने में अंतर है। जिस अवाम ने आतंकवाद की धमकियों और राजनीतिक अनिश्चितता के बीच मतदान केंद्रों तक पहुँचकर लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की, उसकी आकांक्षाओं को समझना किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विजय तब होगी जब जम्मू-कश्मीर की जनता को यह अनुभव होगा कि उसका भविष्य न केवल सीमा पार की बंदूकों से सुरक्षित है, बल्कि सत्ता के गलियारों में होने वाले राजनीतिक सौदों से भी स्वतंत्र है।
जम्मू-कश्मीर में सच्ची राजनीतिक पैठ पिछले दरवाजे से नहीं, जनता के विश्वास के दरवाजे से ही संभव है।


