जनेश्वर मिश्र: सच्चे समाजवादी नेता

जनेश्वर मिश्र की सादगी, सहजता और समाजवादी विचारों को याद करता यह संस्मरण 1997 की एक यादगार गांव यात्रा के जरिए उनके व्यक्तित्व और आम लोगों से जुड़ाव की कहानी सामने लाता है।

Ratibhan Tripathi
Published on: 13 Sept 2026 6:10 PM IST
Ram Manohar Lohia and Janeshwar Mishra
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Ram Manohar Lohia and Janeshwar Mishra

बात 1997 की है। केंद्र में देवगौड़ा की सरकार थी और प्रखर समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र जी उस सरकार में जल संसाधन मंत्री। मैं उन दिनों दैनिक जागरण इलाहाबाद में क्राइम रिपोर्टर हुआ करता था लेकिन राजनीतिक पत्रकारिता में अभिरुचि के नाते बीच-बीच में राजनीतिक रिपोर्टिंग भी किया करता था। दैनिक जागरण कार्यालय के सामने ही ब्वायज हाईस्कूल है। वहां शाम को एक खेल समारोह था जिसमें जनेश्वर जी मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे। उस समय मैं अपने ऑफिस में काम कर रहा था। जनेश्वर जी के निजी सचिव शिव प्रसाद मिश्र जी मेरे ऑफिस आए और बोले, आपको जनेश्वर जी याद कर रहे हैं। मैंने पूछा कहां हैं तो बोले आपके सामने के स्कूल में। खबर लिखकर जैसे ही मैं फुर्सत हुआ, शिव प्रसाद जी के साथ ब्वायज हाईस्कूल पहुंचा। खेल समारोह खत्म हो चुका था। जनेश्वर जी मंच से नीचे आकर कुछ लोगों के साथ बैठे थे। वह बहुत लोकप्रिय नेता थे इसलिए लोग उन्हें घेरे ही रहते थे, मंत्री रहें, न रहें।

पहुंचते ही शिव प्रसाद जी ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा, सर, रतिभान जी आ गए हैं। उन्होंने हाथ से इशारा करते हुए पास बुलाया और बगल की कुर्सी पर बैठा लिया। हाल चाल पूछा। शिकायत भी दर्ज कराई कि आजकल आप हमसे कम मिलते हैं। मैंने भी तपाक से जवाब दिया कि आप केंद्रीय मंत्री हैं, आपके पास फुर्सत ही कहां। जनेश्वर जी निश्चिंत भाव के नेता थे। बहुत तनाव मोल लेना उनके स्वभाव

में नहीं था। अक्सर जाॅली मूड में ही रहते थे। बातचीत करते हुए मुझसे बोले, सर परसों आपके गांव चलना है। तो मैंने कहा जरूर जाइए। ऐसे पिछड़े गांवों में जाता ही कौन है। उन्हें लगा कि मैं यह कहना चाहता हूं कि वह अकेले जाएं तो शिव प्रसाद जी से कहने लगे कि देख रहे हो शिव प्रसाद, मैं केंद्र सरकार का मंत्री हूं और ये मुझे अकेले ही अपने गांव जाने को कह रहे हैं। अरे भाई वहां चाय-पानी कौन कराएगा। इनसे पूछिए। मैं उनका बहुत मुंहलगा था। मैंने कहा पंडित जी, आपको वहां चाय-पानी सब मिलेगा। बेचारे शिव प्रसाद जी बीच में पड़े। कहने लगे अरे यार मंत्री जी आपके गांव बिना आपके कहे अपने से जाना चाहते हैं और आप साथ में जाएंगे भी नहीं? मैंने कहा जाऊंगा भाई। वहीं गांव का पता नोट हुआ और रातों-रात बांदा के जिलाधिकारी को प्रोटोकॉल भेजा गया।

दरअसल जनेश्वर जी को बांदा में एक डिग्री कॉलेज के छात्रसंघ के शपथग्रहण समारोह में जाना था, इसी दरम्यान मेरे गांव जाना चाहते थे जो रास्ते में पड़ता है। तब बांदा चित्रकूट का बंटवारा नहीं हुआ था। अब मेरा गांव चित्रकूट जिले में आता है। बहरहाल, प्रोटोकॉल जारी होते ही प्रशासन हरकत में आ गया। अगले ही दिन जिलाधिकारी बांदा आलोक कुमार लाव-लश्कर के साथ मेरे गांव अर्जुनपुर-खंडेहा पहुंच गए। गांव की सड़क कच्ची थी तो बीच-बीच में गड्ढा भराई की गई। बिजली का ट्रांसफार्मर महीनों से खराब पड़ा था, बदला गया। मरा-गिरा टाइप का प्राइमरी स्कूल रंग-पोतकर सफेद झकाझक्क कर दिया गया। पूरा गांव हैरत में कि यहां हो क्या रहा है और क्यों हो रहा है। ये डीएम यहां कैसे आए। जब एसडीएम मऊ मेरे बड़े भाई इंद्रभवन जी के पास पहुंचे और बताया कि आपके घर कल केंद्र सरकार के मंत्री आ रहे हैं, तब उन्हें पता चला। तब गांवों में टेलीफोन तो थे नहीं और न ही मोबाइल का जमाना था कि एक मिनट में गांव-शहर एक कर दो। बहरहाल मेरे दूसरे नंबर के बड़े भाई चंद्र भवन जी जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नौकरी करते थे, वह शाम को घर पहुंचे तब सबको पता चला कि कौन आ रहा है।

कार्यक्रम में अनुसार हम लोग जनेश्वर जी के साथ इलाहाबाद से गांव के लिए चल पड़े। इलाहाबाद से अनेक समाजवादी नेता भी थे। शुरुआत में पांच-सात गाड़ियों में बीस-पच्चीस लोग ही थे लेकिन अपने क्षेत्र में अपार लोकप्रियता वाले जनेश्वर जी के पीछे कारों-जीपों का काफिला बढ़ता ही गया। गांव की तीन किलोमीटर कच्ची सड़क पर जब काफिला पहुंचा तो कार हिल डुल रही थी। जैसे कि पहले ही कह चुका हूं कि जाॅली नेचर के जनेश्वर जी मौज लेने लगे। मैं तो उनके साथ ही था। बोले क्या सर, बांभन लोगों के यहां जा रहे हैं इसलिए सड़क बराबर नहीं हुई। कुर्मी लोगों के घर जा रहे होते तो वो लोग रातों-रात खुद ही सड़क प्लेन कर देते। मैं भी कहां चुप रहने वाला था। मैंने कहा कि आपकी सरकार, आपका सिस्टम जब सड़क पक्की नहीं करा पा रहा है तो इसमें हमारी क्या गलती।

जनेश्वर जी काफिला गांव पहुंचा तो पच्चीस तीस कारें जीपें थीं। सबको बैठाया जाने लगा। मैंने पच्चीस तीस कुर्सियां लगवाने को कहा था। मुझे क्या पता था कि जनेश्वर जी के काफिले में सवा सौ लोग हो जाएंगे। लेकिन जैसा गांव में होता है। फटाफट चारपाइयां बिछाई गईं। सब लोग बैठे। गांव का मजमा भी जुटा। आसपास के गांवों के लोग भी आए थे। जिस गांव में सिपाही-दरोगा और बीडीओ तक कभी न जाता रहा हो, वहां केंद्रीय मंत्री का पहुंचना 15 गांवों वाली हमारी गांव सभा के लिए किसी बड़े कौतूहल से कम नहीं था। हर कोई जनेश्वर जी को देखने मिलने को आतुर था। सभी सम्मानित लोग बिना बुलाए ही पहुंचे थे। सुखद जमावड़ा था।

अब शुरू हुआ चाय पानी का दौर। इंतजाम तो तीस ही लोगों के लिए था, पहुंच गए सवा सौ। अब क्या हो? भइया ने मुझे बुलाया। बोले इतने लोग हो जाएंगे, तुमने तो बताया नहीं था। मैंने कहा मुझे भी क्या पता कि इतने लोग हो जाएंगे। फिर भी चिंता की बात नहीं है। गांव में खोआ-चीनी की तो कमी नहीं है ना। फौरन मंगाइए दस किलो खोआ। सबको खोआ-चीनी खिलाइए। इससे बढ़िया और शुद्ध मिठाई और भला क्या हो सकती है। फिर क्या था। वही हुआ। सारे इलाहाबादियों और मौजूद लोगों ने खोआ चीनी खाकर जलपान किया। जनेश्वर जी भी खाने के बहुत शौकीन थे। उन्होंने खोए को बिस्कुट में सैंडबिच की तरह लिया। चाय पी गई। भद्र जनों ने केंद्रीय मंत्री को क्षेत्र की समस्याएं लिखकर दीं। उन्होंने उनके समाधान का आश्वासन दिया।

मेहमाननवाजी करीब एक घंटे में पूरी हुई तो काफिला वापस बांदा के लिए निकल पड़ा। जब गांव से बाहर निकले तो जनेश्वर जी ने उस खोआ-चीनी वाले नाश्ते की जमकर तारीफ की। फिर मुझसे उसी जाॅली नेचर में बोले, क्या सर, कुछ हवा-पानी बना। मैंने कोई जवाब तो नहीं दिया लेकिन मन ही मन सोचने लगा कि जनेश्वर जी मेरे गांव मेरा रुतबा बढ़ाने आए थे। वह मुझसे स्नेह करते थे, इसलिए चाहते थे कि वह मेरे गांव जाकर मेरा रुतबा बढ़ा दें। मैं तो उनका कार्यकर्ता भी नहीं था। विशुद्ध पत्रकार की तरह व्यवहार करता था, फिर भी वह मेरे लिए अच्छा सोचते थे। यह बड़ी बात होती है।

जनेश्वर जी 5 अगस्त को जन्में थे। आज सोशल मीडिया पर उनके लिए सैकड़ों पोस्ट देखी तो मेरे ज़ेहन पुरानी यादें कौंधने लगी। इसीलिए सोचा कि यह संस्मरण आपसे साझा करूं। जनेश्वर जी सच्चे अर्थों में समाजवादी नेता थे। उन्होंने समाजवाद का लबादा नहीं ओढ़ रखा था। वह छह प्रधानमंत्रियों के साथ मंत्री रहे हैं। संचार, रेल और पेट्रोलियम जैसे अहम विभागों के मंत्री रहे थे, ऐसे में उन्हें आज के समाजवादियों की तरह अरबपति होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं है। जनेश्वर जी ने सिद्धांतों और विचारों को जिया था। ऐसे सच्चे समाजवादी नेता को उनके जन्मदिन पर मैं हृदय से स्मरण कर रहा हूं।

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