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Language: क्या शब्द हमें अस्तित्व से दूर ले जा रहे हैं?
Language and Consciousness: “‘भाषा की वर्षा-भंगिमा में भ्रम’ में गौतम चटर्जी भाषा, सत्य, चेतना, कबीर और अस्तित्व के गहरे संबंधों पर विचार करते हैं। जानिए भाषा की गरिमा और मनुष्य के भ्रम का दार्शनिक विश्लेषण।”
Language and Consciousness
Language and Consciousness: जीवन के अल्पतम सुख और अन्यतम आनंद की जिजीविषा हममें ऋतुओं की तरह है। इसे हम जब भाषा की गरिमा नहीं दे पाते, तो अपशब्द की दुर्नीति में गिर जाते हैं, घिर जाते हैं। इस दुर्नीति को राजनीति कह सकते हैं, मनुष्यता की अवनति तो कह ही सकते हैं। भाषिक संपदा का अपव्यय भारतीय धरती पर सबसे अधिक होता रहा है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि हम अपनी इस पवित्र संपदा के प्रति सचेतन रहना भूल गए हैं। हमें पता ही. नहीं कि हमारी भाषा सिर्फ बोलने या कहने तक ही सीमित नहीं है। यह सुनने के नए अर्थगर्भ रहस्य को किसी भी क्षण उद्घाटित कर सकती है, 'जीवन का पुनर्नवा’ कर सकती है।
अभी तो हम सिर्फ दो तरह की भाषा तक ही अपने को सीमित किए हुए हैं। एक, बोलचाल की भाषा और दूसरी, बोलचाल में मंतव्य की भाषा। ऐसी भाषा स्वयं प्रतीक है, क्योंकि भाषिक विन्यास में शब्द, प्रतीक या चित्र के अलावा और कुछ नहीं है। एक सहज उदाहरण से भाषा के अनर्थ को देखें। किसी भी तरह के संवाद के दौरान अक्सर हम कहते हैं कि वैदिक ऋषि, बुद्ध या कबीर अमुक काल में हुए, या फिर पंचम वेद या रामायण-महाभारत अमुक काल में रचा गया या अभी भी वैदिक काल अस्पष्ट है। अर्थात हम-वैदिक ऋषि, बुद्ध और कबीर को ऐतिहासिक व्यक्ति ही समझ कर रह गए। हमने इतने वर्षों में यह अनुभव ही नहीं किया कि ये इस तरह अभी हैं, जिस तरह वर्षा हो रही, या नदी बह रही।
मनुष्य मन का एक ही अर्थ और संदर्भ है अतीत। इसी के बूते वह मनुष्य देह में यह भ्रम तैयार करता है, मानो उसमें कोई व्यक्ति है और उस व्यक्ति का कोई व्यक्तित्व है। यह झूठा व्यक्ति अपने लिए एक झूठा संसार रचता रहता है। यह भाषा की वर्षा-भंगिमा का भ्रम है। मन को हृदय से यानी प्रेम से परहेज है। हम कबीर के बोल को उच्चार देते हैं और इशारा करते हैं, मानो वह अतीत में हुए। मंच से बोलते भी हैं कि आज से छह सौ साल पहले कबीर हुए या वह, मीरा, रविदास और अकबर के समय में हुए। हम स्वयं को देह समझते हैं, तो रामकृष्ण और रमन महर्षि को भी देह ही समझ लेते हैं। मन की यह अमानुषिक प्रवृत्ति है कि वह सत्य को भी गणित और राजनीति की तरह समझना चाहता है और अहंकार के अपारदर्शी पर्दे को और सघन करता रहता है। मन इस तरह व्यक्तित्व को अपशब्दों तक सीमित रखता है और प्रत्यक्ष सत्य को भाषिक गरिमा नहीं दे पाता। उसे अस्तित्व से परहेज है। उसे पता नहीं कि व्यक्तित्व की मृत्यु होती है, अस्तित्व की नहीं; हृदय की नहीं, जहां सत्य है, वैदिक मंत्र है, भारतीय मनीषा है, बुद्ध, कबीर और सद्गुरु का ज्ञान है। सत्य है। सत्य था नहीं। 'व्यक्ति कभी भी 'था' हो सकता है, सत्य नहीं।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जब हम कबीर के किसी पद को कहें, तो स्वयं कबीर कहे? ऐसा हो सकता है, यदि हम मन को शब्द न दें। मन बिना शब्द के जी नहीं सकता। काशी में ऐसा अपनी डायरी में लिखकर गए शैवसाधक पंडित गोपीनाथ कविराज । जयशंकर प्रसाद की किसी रचना को हम कालजयी क्यों कहते हैं, और फिर रामायण-महाभारत-वेद और नाट्यवेद का समय टटोलने लगते हैं। किसी भी ग्रंथ का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य हो सकता है और इसीलिए वैदिक ऋषियों ने आधुनिक इतिहासकारों से बहुत पहले हमारी इतिहास दृष्टि सुनिश्चित कर दी थी, ताकि हमें इतिहास देखना आए और हम मनमानी न कर सकें। यहां भाषा अपनी पवित्र गरिमा में है। वर्षा की तरह। आप गौर कर सकते हैं कि आकाश, वर्षा, हवा या आग इस पृथ्वी पर हो रही किसी भी घटना पर रिएक्ट नहीं करते। अप्रभावित रहते हैं।'
इस भाषा को जानने की जरूरत है। इसकी शुरुआत संबंधों से होती है। संबंधों की शुरुआत प्राप्त जीवन में इस तथ्य से होती है कि इस पृथ्वी पर सब कुछ एक-दूसरे से संबंधित हैं। आप चाहें, तो इसे अंतर्संबंधित कह लें। घास से लेकर आंकाश तक, जिराफ से लेकर चींटी तक और मनुष्य से लेकर अनुद्घाटितं मौन तक, सब कुछ एक दूसरे से अभिन्न ढंग से जुड़े हुए हैं। यह एक ही अव्यक्त मौन की व्यक्त गरिमा है। इसकी पवित्रता इसकी गोपनीयता में ही सुरक्षित है। इसलिए एक ही अस्तित्व के दो रूपों का संबंध क्रियाशील चेतना के पहले से ही प्रेम संबंध है यानी प्रेम में संबंधित है और ऐसे संबंध की पवित्रता और गरिमा इसकी गोपनीयता में ही शाश्वत है। मन यानी वह झूठा व्यक्ति शब्दों से, अपशब्द भाषा से इसे नष्ट करता रहता है और घृणा, क्रोध, भय और दुख के बादल को जीवन में विस्तार देता रहता है।
जो अभी नहीं, वह भ्रम है और जो अभी है, वही शाश्वत है। चेतना जब विदा लेती है, तो देह मृत है। फिर कुछ नहीं रहा। यह 'कुछ नहीं' चेतना के पहले से है, जब हमारा नहीं, देह का जन्म हुआ था समाप्त होने के लिए। यह 'कुछ नहीं' या विराट शून्य हम हैं, देह जन्म के पहले से, शक्ति की अकूत क्षमता और मौन भाषा की वर्षा-गरिमा में। यह रिएक्ट नहीं करता, ऐक्ट करता है। सृष्टि के प्रेम में।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। साभार ‘ अमर उजाला’।)
-गौतम चटर्जी


