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प्रेम में खोती जिंदगियां
Relationship Violence: ये कौन सा वायरस है, कौन सी बीमारी है जो हमारे भीतर इस गहराई से घुस चुकी है कि वह जानें लेती जा रही है।
Relationship Violence
Relationship Violence: प्रेम मिलाता है। प्रेम जागृत करता है। प्रेम बनाता है। प्रेम की यही खासियतें हैं। प्रेम बिन जीवन सूना है। यह भी स्थापित है। प्रेम से ही संबंध पनपते हैं और संबंध ही जीवन का आधार है। हमारा अस्तित्व ही प्रेम से है। ये सब काफी दार्शनिक और गहरी बातें हैं। लेकिन इन दिनों प्रेम सवालों के घेरे में है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रेम के दिखावे में नफरत इतनी गहरी हो सकती है कि किसी की जान ले ली जाए? वह भी तब जबकि उसकी कोई गलती न हो? सवाल हमारी स्थापित और प्राचीन संस्थाओं - परंपराओं पर भी हैं। संदेह इतना गहरा जा रहा है कि किस पर भरोसा करें और किस पर नहीं, क्या सही मानें और क्या गलत, तय कर पाना असंभव सा हो रहा है।
इन सवालों - संदेहों की पृष्ठभूमि में वह घटनाएं हैं जो पुणे से लेकर मेघालय और मेरठ से लेकर बंगलुरू तक घटी हैं। सुर्खियों में छाई इन घटनाओं और कहीं छिपी रह गईं अनजानी वारदातों में एक बेहद परेशान और बेचैन करने वाला सवाल है कि कोई करे तो क्या करे।
हम प्राचीनतम सभ्यता वाली सरजमीं हैं। हम भौतिक विकास के पथ पर बढ़ते मुसाफिर भी हैं। लेकिन जो हम आज देख, सुन-पढ़ रहे हैं वह हमारी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा कभी नहीं रहा और जिस विकास की मंजिल की हमारी तमन्ना है, उन्हें हासिल कर चुकी सभ्यताओं के भी शायद इतना बुरा इतिहास नहीं रहा है। जो हमारा इतिहास नहीं रहा और जो दूसरों का भी हिस्सा नहीं रहा, वह हममें आ कहाँ से गया?
हम पश्चिम को दोष देते हैं। लेकिन वहां तो ऐसा नहीं होता। नीले ड्रम वहां भी मिलते हैं। लेकिन ज्यादातर सीरियल किलर्स के यहां, आम घरों में नहीं। वहां तो निजी पसन्द सर्वोपरि मानी जाती है। नहीं पसन्द तो तुरंत अलगाव। किसी रिश्ते में घिसटना मंजूर नहीं। ये वहां की रवायत है। वह भी इवॉल्व हुई है। लेकिन कभी निजी रिश्तों में हिंसक नहीं रही। हम क्रांतिकारी नहीं हैं। हम सत्ता सिंहासन के आगे सिर झुकाने व सज़दा करने वाले समाज हैं। लेकिन निजी जीवन में हमसे ज्यादा बेसब्र और बेलिहाज भी कोई नहीं।
ये कौन सा वायरस है, कौन सी बीमारी है जो हमारे भीतर इस गहराई से घुस चुकी है कि वह जानें लेती जा रही है। हैरानी की बात यह भी कि इस बीमारी पर न चिंता है, न चर्चा, न गंभीरता। जो है वह बस एक घटना का रस ले लेकर उसका मजा लेना। रस खत्म होते ही सब खत्म फिर अगली घटना पर वही चक्र। सोनम, सिया, मुस्कान, ममता, शकुंतला .... नाम अनेक हैं। लेकिन तार सबके एक हैं। जिज्ञासा है कि क्यों हुआ यह सब? तात्कालिक कारण भी वहीं से उपजे दिखाई देते हैं - प्रेम से। प्रेम जो था किसी और से लेकिन सात जन्मों का बंधन जुड़ा कहीं और। या जुड़ने कहीं और जा रहा था। यानी बिना प्रेम के विवाह। तो क्या इसका सिला हत्या हो सकता है?
परेशान करने वाली बात यह भी है कि इन घटनाओं में जो कोई पकड़ा गया उनमें न कोई दुख दिखा, न पश्चाताप। ये कैसी मानसिकता है जिसमें अभियुक्त अपनी करनी पर रोता नहीं बल्कि आनंदित नज़र आता है। सीरियल किलर भी ऐसे ही होते होंगे। एकदम ठंडे, भावहीन, संवेदनहीन।
लेकिन हम भी कौन बड़े संवेदनशील हैं? मीडिया को ही देखिये। हर घटना की राई रत्ती कहानी पूरे रस के साथ परोसता है। वैसे ही जैसे किसी का पोस्टमार्टम किया जाता हो। मीडिया भी तो इसी समाज का हिस्सा है। उसके सामने धंधा पहले है, जिम्मेदारी बाद में। मीडिया मनोवैज्ञानिकों की राय भी परोसता है।मनोवैज्ञानिक इसे 'पजेसिवनेस' या 'पर्सनालिटी डिसऑर्डर' का नाम देकर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं, लेकिन सच यह है कि यह हमारी सामाजिक संरचना की सड़न है।लेकिन यह नहीं बता पाते कि यह सड़न रुकेगी कैसे? कौन है इनके लिए जिम्मेदार?सच्चाई तो यह है कि समाधान किसी के पास नहीं है। बताए भी तो कौन?
साइकोलॉजी की किताबों में जवाब मिलने से रहा। रही बात बड़े बुजुर्गों की तो वह भी क्या बात पायेंगे, लेकिन वह जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। हम सीखते तो अपने परिवार से ही हैं। पहला और सबसे मजबूत स्कूल घर ही होता है। परिवेश ही हमें गढ़ता है। सिनेमा, रील, वीडियो सब बाद में आते हैं।
तो करें क्या? प्रेम में कोई प्रेमिका के टुकड़े टुकड़े कर डाल रहा है तो कोई होने वाले पति को पहाड़ से नीचे फेंक दे रहा है, तो कोई पति को मरवा दे रहा है। यह कैसा प्यार, कैसा संबंध है। कैसे बदलेंगे हैं? बदलेंगे भी कि नहीं?
अगर हम सचमुच ऐसी घटनाओं को रोकना चाहते हैं तो कानून से पहले अपने घरों में, परवरिश में, रिश्तों की समझ में बदलाव लाना होगा। वरना आज सोनम है, कल मुस्कान होगी, परसों कोई और। नाम बदलते रहेंगे, तरीके बदलते रहेंगे, तस्वीरें बदलती रहेंगी लेकिन समाज की आत्मा पर लगने वाले ये घाव कभी नहीं भरेंगे।
क्योंकि यह उस 'इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन' (तुरंत सब कुछ पा लेने की चाह) और आधुनिक जीवनशैली का ज़हरीला असर है, जहाँ रिश्तों को एक खेल समझ लिया गया है। इस खेल में जब किसी को अपनी मर्ज़ी चलती हुई नहीं दिखती, तो वह सामने वाले को तबाह करने पर आमादा हो जाता है। चाहे वह किसी पुरुष का हिंसक व्यवहार हो या किसी स्त्री का प्रतिशोधात्मक कदम—मूल समस्या हमारे भीतर खत्म होती जा रही 'सहनशीलता' और 'ठहराव' की है। हमने एक ऐसा समाज बना दिया है जहाँ सोशल मीडिया की चमक-दमक ने लोगों की उम्मीदों को अवास्तविक ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया है। जब असल ज़िंदगी की हकीकतें और रिश्तों की ज़िम्मेदारियाँ सामने आती हैं, तो यह भ्रम टूटता है। इस भ्रम के टूटने से जो कुंठा और गुस्सा पैदा होता है, वही बाद में अखबारों की हिंसक सुर्खियाँ बनता है।
सवाल यह भी है कि हमारी शिक्षा और परवरिश में वह कौन सी कमी रह गई है, जो युवाओं को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना नहीं सिखा पाती? हम बच्चों को करियर की दौड़ में अव्वल आना तो सिखाते हैं, लेकिन एक इंसान के तौर पर 'ना' (रिजेक्शन) को गरिमा के साथ स्वीकार करना नहीं सिखाते। जीवन में हर चीज़ हमारी योजना के अनुसार नहीं चलेगी, इस कड़वे सच से हम भागते हैं। नतीजतन, चाहे कोई लड़का हो या लड़की, जैसे ही उनके आत्मसम्मान या इच्छा को ठेस पहुँचती है, वे अपना विवेक खो बैठते हैं। यह एक सामूहिक मानसिक दिवालियापन है, जिसका खामियाजा आज की पूरी पीढ़ी भुगत रही है।
अगर हम वाकई इस दलदल से बाहर निकलना चाहते हैं, तो हमें किसी एक पक्ष को कटघरे में खड़ा करने के बजाय इस पूरी सड़न को समझना होगा। कानून केवल घटना के बाद की प्रक्रिया है, वह किसी के भीतर सुलगती नफरत को नहीं बदल सकता। बदलाव के लिए हमें अपने घरों के माहौल को बदलना होगा, जहाँ बेटों को भी अपनी भावनाएँ खुलकर व्यक्त करने की आज़ादी हो और बेटियों को भी ज़िम्मेदारी व जवाबदेही का पाठ पढ़ाया जाए। जब तक हम रिश्तों को 'अधिकार' की तराजू पर तौलना बंद करके उन्हें 'परस्पर सम्मान' की बुनियाद पर नहीं टिकाएंगे, तब तक यह खूनी सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा और समाज अंदर ही अंदर खोखला होता जाएगा।
यही वजह है कि हम हर बार हत्यारे का चेहरा खोज लेते हैं लेकिन उस समाज का चेहरा देखने से कतराते हैं जिसने उसे गढ़ा। हम अदालतों से फांसी मांगते हैं, टीवी स्टूडियो में बहसें करते हैं, सोशल मीडिया पर गुस्सा उंडेलते हैं और फिर अगली सनसनी का इंतजार करने लगते हैं। सच तो यह है कि अगर प्रेम के नाम पर हत्या अब हमें विचलित करने के बजाय सिर्फ कुछ दिनों का रोमांच देने लगी है तो कटघरे में सिर्फ कोई अभियुक्त नहीं बल्कि पूरा समाज खड़ा है। यह किसी एक सोनम, मुस्कान या किसी एक अपराधी की कहानी नहीं होती। हमारी सामूहिक असफलता की गाथा होती है। जिस दिन हम अपने बच्चों को यह सिखा देंगे कि किसी का साथ पाना अधिकार नहीं है बल्कि सौभाग्य है। और किसी का साथ छूट जाना अपमान नहीं बल्कि जीवन का प्राकृतिक सच है। शायद उसी दिन प्रेम के नाम पर बहता यह खून रुकना शुरू होगा। उससे पहले हर नई घटना हमें यही बताती रहेगी कि मर सिर्फ एक इंसान नहीं रहा। मर तो हमारे भीतर का समाज रहा है।
(लेखक पत्रकार हैं।)


