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Modi Appeal: तपती रातों का नया भारत: क्या यही है भविष्य का रास्ता
Modi Appeal: हर आदमी के पास एसी कूलर नहीं होता उसके लिए घर का कमरा, घर की छत या घर के बाहर चबूतरे पर बैठका ही जिंदगी का अहम हिस्सा होता है।
Modi Appeal: कुछ दिनों से गर्मी से थोड़ी राहत जरूर महसूस हो रही है, लेकिन अप्रैल और मई की शुरुआत ने जिस तरह अपने तीखे तेवर दिखाए, उसने साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले वर्षों में हीटवेव केवल दोपहर की बेचैनी तक सीमित नहीं रहने वाली। यह हमारी रातों की नींद, शरीर की सहनशक्ति और जीवनशैली—तीनों को बदलने जा रही है। हालांकि बीच बीच में बारिश भी हुई आंधी भी आई बारिश की बौछारें भी पड़ीं लेकिन जब धूप निकलती है जो उसकी झुलसाने वाली अदा पर सब मुंह गमछे रुमाल या किसी और चीज से छुपा लेते हैं सूखते गले को तर करने के लिए ठंडा, लस्सी, पेप्सी, शिकंजी, गन्ने का रस फलों का रस तलाशने लग जाते हैं।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग पहले ही सामान्य से अधिक गर्मी और हीटवेव की चेतावनी दे चुका है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के बड़े शहरों में एक नई समस्या तेजी से उभरी है— गर्म रातों की कमी। दिल्ली, लखनऊ, नोएडा, नागपुर और हैदराबाद जैसे शहरों में अब रातें भी पहले जैसी ठंडी नहीं रह गईं। वैज्ञानिक इसे अर्बन हीट आइलैंड कहते हैं, जहां कंक्रीट, ट्रैफिक, एसी की बाहरी गर्म हवा और घटती हरियाली मिलकर शहरों को चौबीसों घंटे गर्म बनाए रखते हैं। हर आदमी के पास एसी कूलर नहीं होता उसके लिए घर का कमरा, घर की छत या घर के बाहर चबूतरे पर बैठका ही जिंदगी का अहम हिस्सा होता है।
यही वह दौर है जहां सवाल केवल मौसम का नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली का भी है। आधुनिक शहरों ने हमें सुविधाएं तो दीं, लेकिन प्रकृति से दूरी भी बढ़ा दी। बंद कमरों में लगातार चलने वाले एसी अब जरूरत बनते जा रहे हैं, मगर इसके साथ एक बड़ा विरोधाभास भी जुड़ा है। एसी कमरे को ठंडा करता है, लेकिन बाहर और ज्यादा गर्म हवा छोड़ता है। लाखों एसी मिलकर शहरों के तापमान को और बढ़ाते हैं। आम आदमी पसीने से लथपथ होकर हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी सुकून से सो नहीं पाता है।
यहीं पर पारंपरिक भारतीय जीवनशैली की समझ फिर प्रासंगिक दिखाई देती है। कभी गर्मियों की रातें छतों पर बीतती थीं। कूलर की ठंडी हवा, खुला आसमान, मच्छरदानी और हवा का प्राकृतिक प्रवाह—यह केवल एक खास सोच नहीं थी, बल्कि गर्म जलवायु के अनुरूप धीरे धीरे विकसित हुई जीवन पद्धति थी। कूलर बाहरी हवा को पानी के जरिए ठंडा करता है और क्रॉस वेंटिलेशन के साथ शरीर को अपेक्षाकृत प्राकृतिक राहत प्रदान करता है, जबकि एसी बंद कमरे की हवा को बार-बार घुमाता रहता है।
शायद यही कारण है कि आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि छत पर कूलर लगाकर सोने का सुख किसी एसी की बनावटी ठंडक से अलग होता है।
यह बहस केवल एसी और कूलर तक सीमित नहीं है। यही सोच हमारे परिवहन और उपभोग के तरीके पर भी लागू होती है। स्टेट्स सिम्बल के लिए महंगी कारें जो कि एक लीटर पेट्रोल या डीजल में दो तीन किलोमीटर चलती है हमारा इनसे मोहभंग होना चाहिए। साधारण कारें अपनाएं जो प्रदूषण की संवाहक भी नहीं हैं और जनता के लिए किफायती सवारी भी मानी जाती हैं। क्या यह दिखावा भविष्य की कीमत पर नहीं खड़ा है? एक लीटर ईंधन में दो-तीन किलोमीटर चलने वाली विशाल गाड़ियां केवल अधिक पेट्रोल-डीजल अधिक नहीं जलाती हैं, ये प्रदूषण, गर्मी और ऊर्जा संकट को भी बढ़ाती हैं। इनपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपील का असर होना आवश्यक है। आम आदमी पर इसका कोई असर नहीं होगा लेकिन इस आभिजात्य वर्ग पर होना चाहिए।
इन करोड़ों कारों की तुलना में छोटी, कम पेट्रोल डीजल खपत वाली और साधारण कारें केवल किफायती विकल्प नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रतीक हैं। दुनिया के तमाम विकसित देशों में जब सादगी और टिकाऊ जीवनशैली को आधुनिकता का नया रूप मानकर अपनाया जा रहा है तो भारत मे इससे मोहभंग कब होगा। ये एक बड़ा सवाल है।
ऐसे समय में जब Narendra Modi पेट्रोल-डीजल के सीमित उपयोग की अपील करते हैं और Yogi Adityanath सादगी और अनुशासित जीवनशैली की बात करते दिखाई देते हैं, तो यह केवल तात्कालिक संकट प्रबंधन का संदेश नहीं लगता। इसके भीतर बदलते समय की चेतावनी भी छिपी है।
हो सकता है इन अपीलों की पृष्ठभूमि आर्थिक या ऊर्जा संकट रही हो, लेकिन उनका व्यापक अर्थ यही निकलता है कि आने वाला समय संयम, संतुलन और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग का होगा।
जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की आशंका नहीं रहा। यह हमारे घरों, शहरों, नींद, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की आदतों तक पहुंच चुका है। ऐसे में शायद भविष्य का सबसे बड़ा “स्टेटस सिंबल” वही होगा जो कम संसाधनों में संतुलित जीवन जी सके। क्योंकि आने वाले वर्षों में समाज केवल यह नहीं देखेगा कि आपके पास कितनी बड़ी गाड़ी या कितना बड़ा एसी है, बल्कि यह भी देखेगा कि आपने पृथ्वी पर कितना कम बोझ डाला।


