Modi Ki Appeal: सोना, व्यापार घाटा और भारत की अर्थव्यवस्था, क्यों गंभीरता से समझनी चाहिए ये अपील

Sona Mat Khareedo: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातों को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से भी समझने की आवश्यकता है।

Siddharth
Published on: 13 May 2026 9:37 PM IST
Sona Mat Khareedo
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Sona Mat Khareedo 

Modi Ki Appeal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातों को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से भी समझने की आवश्यकता है। भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा और पुराना संकट ‘व्यापार घाटा’ है। अर्थशास्त्र की सरल भाषा में कहें तो जब कोई देश जितना निर्यात करता है, उससे अधिक आयात करता है, तब विदेशी मुद्रा विशेषकर डॉलर देश से बाहर जाने लगते हैं। भारत के संदर्भ में सोना इस व्यापार घाटे का एक प्रमुख कारण बन चुका है।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्वर्ण उपभोक्ता देश माना जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 721 टन सोने का आयात किया, जिसकी कुल कीमत करीब 6,11,830 करोड़ रुपये रही। इसका अर्थ है कि भारत प्रतिदिन औसतन लगभग 1,676 करोड़ रुपये का सोना विदेशों से खरीद रहा है।

यह आंकड़ा केवल आर्थिक तथ्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। प्रतिदिन हजारों करोड़ रुपये देश से बाहर जा रहे हैं। यह धन स्विट्ज़रलैंड, दक्षिण अफ्रीका और दुबई जैसे देशों के व्यापार और खनन उद्योगों को मजबूत करता है, जबकि भारत की विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ाता है।

बढ़ता स्वर्ण आयात और गहराता व्यापार घाटा

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का स्वर्ण आयात लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह लगभग 58 अरब डॉलर था। यानी एक ही वर्ष में लगभग 24 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह स्थिति इसलिए गंभीर मानी जाती है क्योंकि इससे आयात और निर्यात के बीच की खाई और चौड़ी होती जा रही है।

किसी भी देश का विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक सुरक्षा कवच की तरह होता है। यही भंडार वैश्विक संकटों, मुद्रा अस्थिरता और आयात संबंधी चुनौतियों के समय अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में मदद करता है। ‘ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स’ (‘Trading Economics’) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार हाल के महीनों में उतार-चढ़ाव का सामना कर रहा है। फरवरी 2026 में यह लगभग 728 अरब डॉलर तक पहुँच गया था, लेकिन अप्रैल तक इसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई और यह करीब 690 अरब डॉलर के आसपास रह गया।

केवल दो महीनों में लगभग 38 अरब डॉलर की गिरावट यह संकेत देती है कि विदेशी मुद्रा पर दबाव लगातार बना हुआ है। इसी अवधि में स्वर्ण आयात का बढ़ना स्थिति को और गंभीर बनाता है, क्योंकि सोना डॉलर में खरीदा जाता है और उसका सीधा प्रभाव विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।

यदि एक वर्ष तक सोना न खरीदा जाए तो?

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देशवासी एक वर्ष तक सोने की खरीद सीमित कर दें या टाल दें, तो लगभग 72 अरब डॉलर तक की विदेशी मुद्रा देश के भीतर बचाई जा सकती है। यह राशि विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने और रुपये पर दबाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अर्थशास्त्र में इसे ‘डिमांड-साइड मैनेजमेंट’ (‘Demand-Side Management’) कहा जाता है। जब किसी वस्तु की मांग घटती है, तो उससे जुड़ी विदेशी मुद्रा की मांग भी कम होती है। चूँकि सोना डॉलर में खरीदा जाता है, इसलिए सोने की मांग कम होने से डॉलर की मांग भी घट सकती है। इससे रुपये की स्थिति मजबूत होने की संभावना बढ़ती है।

यह उसी सिद्धांत से जुड़ा है जिसे अर्थशास्त्री ‘विनिमय दर स्थिरीकरण’ (‘Exchange Rate Stabilization’) कहते हैं। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि यह केवल सरकारी नीति का विषय नहीं, बल्कि जन-जागरूकता और नागरिक भागीदारी का प्रश्न भी बन जाता है।

चालू खाता घाटा और आर्थिक निर्भरता

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के अनुसार वर्ष 2026 में भारत का ‘चालू खाता घाटा’ (‘Current Account Deficit’) लगभग 84.5 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। यह देश की ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (‘Gross Domestic Product – GDP’) का लगभग दो प्रतिशत माना जा रहा है।

चालू खाता घाटा किसी भी देश की आर्थिक निर्भरता का महत्वपूर्ण संकेतक होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश में आने वाले डॉलर से अधिक डॉलर बाहर जा रहे हैं। भारत के मामले में सोने का आयात इस घाटे में उल्लेखनीय योगदान देता है।

यदि सोने की खरीद में कमी आती है, तो चालू खाता घाटे पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों और विदेशी निवेशकों के बीच भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर भरोसा मजबूत हो सकता है।

सोने के बजाय निवेश के अन्य विकल्प

मार्च 2026 तक भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में स्वर्ण का हिस्सा बढ़कर लगभग 16.70 प्रतिशत तक पहुँच गया, जबकि सितंबर 2025 में यह लगभग 13.92 प्रतिशत था। यह आँकड़ा यह दर्शाता है कि लोगों का झुकाव सोने की ओर लगातार बढ़ रहा है।

हालांकि अर्थशास्त्री यह भी मानते हैं कि यदि यही धन ‘म्यूचुअल फंड’ (‘Mutual Fund’), लघु उद्योगों, ‘स्टार्टअप’ (‘Startup’) या स्वदेशी उत्पादों में निवेश किया जाए, तो वह देश के भीतर ही आर्थिक गतिविधियों को गति देगा। इससे रोजगार बढ़ेगा और पूंजी देश की अर्थव्यवस्था में ही घूमती रहेगी।

कच्चा तेल और सोना : दो बड़े आर्थिक दबाव

भारत के दो सबसे बड़े आयात हैं — कच्चा तेल और सोना। दोनों का भुगतान डॉलर में किया जाता है। दोनों विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालते हैं। यदि नागरिक ऊर्जा और सोने दोनों क्षेत्रों में संयम बरतें, तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिल सकती है। यह केवल सरकारी नीति का विषय नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी है।

अपील की ताकत आदेश से अलग होती है

प्रधानमंत्री की अपील की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह न कोई प्रतिबंध है, न जबरन नियंत्रण और न ही लोगों से सोना जमा कराने का आग्रह। यह नागरिकों की समझदारी, आर्थिक चेतना और देशहित की भावना पर आधारित एक स्वैच्छिक अपील है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी अपीलें केवल आर्थिक निर्णय नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक चेतना को भी प्रभावित करती हैं। जब समाज किसी आर्थिक चुनौती को सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में समझने लगता है, तब समाधान की दिशा स्वयं बनने लगती है।

(लेखक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं।)

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