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पुण्यतिथि पर विशेष: नेहरु का समाजवाद: विचार, संघर्ष और आज की प्रासंगिकता
नेहरू ने समाजवादी विचारधारा की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करने के लिए अनेक अभियानों का संचालन किया। उनके साहित्य और ऐतिहासिक भाषणों का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि उनकी गहरी आस्था समाजवाद में थी।
Nehru Death Anniversary (Social Media).
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ही नहीं, बल्कि भारतीय समाजवादी आंदोलन के जाज्वल्यमान इतिहास के भी पंडित जवाहरलाल नेहरू एक स्वयंसिद्ध अध्याय हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। दुःखद यह है कि नई पीढ़ी नेहरू द्वारा प्रतिपादित समाजवादी अवधारणाओं से अपेक्षाकृत कम परिचित है। नेहरू ने समाजवादी विचारधारा की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करने के लिए अनेक अभियानों का संचालन किया। उनके साहित्य और ऐतिहासिक भाषणों का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि उनकी गहरी आस्था समाजवाद में थी।
लखनऊ अधिवेशन और समाजवाद की उद्घोषणा
12 अप्रैल 1936 को लखनऊ में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए नेहरू ने समाजवाद को जीवन दर्शन बताया था। उन्होंने कहा था कि भारत की गरीबी, बेरोजगारी और दासता का समाधान केवल समाजवाद में निहित है। नेहरू के अनुसार समाजवाद केवल आर्थिक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन की व्यापक दृष्टि है।
इसके पूर्व 29 दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में भी उन्होंने स्वयं को समाजवादी और गणराज्यवादी घोषित किया था। नेहरू सामंतवाद और पूंजीवादी शोषण दोनों के आलोचक थे।
समाजवाद और कांग्रेस की दिशा
पचास के दशक में जब आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण कांग्रेस से अलग हुए तथा कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठने लगे, तब नेहरू ने 1955 के अवाड़ी सम्मेलन में “सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी” को अपनी सरकार और पार्टी का लक्ष्य घोषित किया।
उन्होंने योजना आयोग में समाजवादी चिंतक अशोक मेहता को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा। कांग्रेस संगठन में भी उन्होंने समाजवादी विचारधारा से जुड़े नेताओं को प्रमुख भूमिकाएं दीं।
नेहरू और समाजवादी चिंतकों का संबंध
नेहरू, लोहिया और सुभाषचंद्र बोस के बीच बाद के वर्षों में मतभेद अवश्य उभरे, लेकिन लंबे समय तक तीनों समाजवादी सोच के प्रतिबद्ध सहयोगी रहे। 1928 के कोलकाता युवक सम्मेलन में इनकी वैचारिक समानता स्पष्ट दिखाई दी।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भी राष्ट्रीय योजना समिति का गठन नेहरू की अध्यक्षता में किया था, ताकि गरीबी, अशिक्षा और बीमारी जैसी समस्याओं का समाजवादी आधार पर समाधान खोजा जा सके।
नेहरू का समाजवाद बनाम साम्यवाद
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि नेहरू का समाजवाद साम्यवादी विचारधारा से भिन्न था। वे हिंसक वर्ग संघर्ष के विरोधी थे और लोकतांत्रिक समाजवाद में विश्वास रखते थे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से उनके संबंध कभी सहज नहीं रहे।
दक्षिणपंथ और वामपंथ—दोनों ही उनके आलोचक रहे, लेकिन किसी ने भी उनके समाजवादी दृष्टिकोण पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया।
लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद
नेहरू समाजवाद जितनी ही गहरी आस्था धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र में रखते थे। वे गांधीजी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे और साधन की पवित्रता पर जोर देते थे।
भारत-चीन युद्ध के दौरान जब उन पर तीखे राजनीतिक हमले हो रहे थे, तब भी उन्होंने आपातकाल लगाने से इनकार करते हुए कहा था— “पंडित नेहरू तानाशाह नहीं बन सकता।”
आज के दौर में नेहरू की प्रासंगिकता
आज आर्थिक विषमता बढ़ रही है और केंद्रीकरण को लेकर नेहरू की आशंकाएं सच होती दिखाई दे रही हैं। ऐसे समय में नेहरू, लोहिया और सुभाष की समाजवादी सोच पर नए सिरे से विमर्श आवश्यक है।
नेहरू को किसी एक दल या राजनीतिक खेमे में सीमित कर देखना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाजवादी आंदोलन—दोनों के साथ अन्याय होगा। उनकी सफलताओं और असफलताओं का समग्र मूल्यांकन ही इतिहास के प्रति ईमानदार दृष्टिकोण होगा।


