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Rajasthan News: बीमारी छुपाने वाला नया इलाज! राजस्थान के स्कूलों की बदहाली पर सवाल
Rajasthan Government Schools: राजस्थान के सरकारी स्कूलों की बदहाली, जर्जर इमारतों और बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सवाल उठ रहे हैं। क्या सच्चाई दिखाने पर रोक लगाने से समस्या खत्म हो जाएगी?
Disease Hiding Rajasthan Government Schools
Rajasthan Government Schools: एक कहावत शतुरमुर्ग की भी है कि वो बवंडर आते ही रेत में मुंह छिपा लेता है। और भी ऐसी कई कहावतें हैं जिनका मतलब एक ही है - समस्या से निपटने की बजाए उससे मुंह छिपा लेना। अब कोई कितना जतन करे, सब कचरा कालीन के नीचे कर दे, फ़टी चादर पर नया बेड कवर बिछा दे या ड्राइंग रूम चकाचक करके बाकी घर गन्दगी में सना रहने दे। लेकिन सच्चाई यही है कि कचरा, फ़टी चादर और गन्दगी वहीं की वहीं रहेगी। छिपाने से सफाई नहीं हो जाती। अगर घर में गंदगी है और कोई उसे दिखा दे तो क्या गंदगी दिखाने वाले पर ही पर्दा डाल दिया जाएगा?
राजस्थान में यही हो रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकारी स्कूलों की बदहाली को लाइमलाइट में लाने की 'स्कूल ठीक करो' मुहिम शुरू की है। स्कूलों का सोशल ऑडिट किया जा रहा है। राजस्थान में भी शुरू किया गया। एक स्कूल में जर्जर इन्फ्रास्ट्रक्चर की पोल खुली और स्कूल के बच्चों ने भी आवाज बुलंद कर दी।
लेकिन आननफानन में राजस्थान सरकार शतुरमुर्ग मोड में आ गई। फरमान जारी हो गया कि किसी भी स्कूल में किसी आउटसाइडर को घुसने की इजाजत नहीं होगी, वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी पर बैन लगा दिया गया, स्टूडेंट्स से बात करने पर रोक लगा दी।
इसे अब क्या ही कहें? बीमारी ठीक करने की बजाए मरीज को ही खत्म कर दो? क्या सच्चाई ढंकने से स्कूल चकाचक हो जाएंगे? ये कौन सा इलाज है?
कहने को राजस्थान सरकार ने पिछले बजट में जर्जर स्कूलों की हालत सुधारने के लिए दो हजार करोड़ रुपए रखे, समग्र शिक्षा अभियान के लिए 13 हजार करोड़ रुपए रखे। इस राज्य में कोई 70 हजार सरकारी स्कूल हैं जिनमें 67 लाख बच्चे पढ़ते हैं।
लेकिन यहां एक बात समझने की जरूरत है। राजस्थान के सरकारी स्कूलों की बदहाली कोई सोशल मीडिया पर बनाई गई कहानी नहीं है, जिसे वीडियो बंद कराकर खत्म किया जा सकता है। यह खुद सरकारी सर्वे और विधानसभा में दिए गए आंकड़ों में दर्ज हकीकत है। जनवरी, 2026 में राजस्थान विधानसभा में सरकार की ओर से बताया गया कि राज्य के 3,768 सरकारी स्कूल भवन जर्जर और असुरक्षित पाए गए हैं। करीब 41,178 स्कूलों में मरम्मत की जरूरत बताई गई। एक दूसरे सरकारी सर्वे में 5.14 लाख क्लासरूमों में से करीब 87 हजार को पूरी तरह जर्जर बताया गया था।
अब जरा इस तस्वीर और बजट को साथ रखकर देखिए। पैसा है, योजनाएं हैं, बजट है, सर्वे है, आंकड़े हैं और समस्या भी सरकार के अपने कागजों में दर्ज है। फिर भी डर है। क्यों?
अगर कोई बाहर का आदमी स्कूल में जाकर टूटी दीवार, गिरती छत, खराब शौचालय, पानी की कमी या बच्चों की परेशानी का वीडियो बना देता है तो उससे न स्कूल की दीवार ढह जाती है, न कोई वीडियो कचरा फैला देता है। कैमरा बीमारी नहीं है बल्कि वो तो थर्मामीटर है। थर्मामीटर तोड़ देने से बुखार खत्म नहीं होता।
सबसे बड़ा सवाल है कि अगर सरकार सचमुच स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है और उसे अपने काम पर भरोसा है और अगर स्कूलों की हालत सुधर रही है, तो उसे फोटो-वीडियो से डरना कैसा? होना तो ये चाहिए कि सरकार खुद ही कहे कि आइए देखिए, जहां कमी है जरूर बताइए, फोटो खींचिए, सवाल पूछिए और हमें जवाबदेह बनाइए।
लोकतंत्र में जनता दुश्मन नहीं होती। वह तो व्यवस्था की मालिक होती है। सरकारी स्कूल किसी मंत्री, अधिकारी या विभाग की निजी संपत्ति नहीं हैं। वे जनता के बच्चों के स्कूल हैं और उनमें लगा पैसा जनता की जेब से आता है। इसलिए जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उसका पैसा कहाँ, कैसे और किस तरह इस्तेमाल हो रहा है और बच्चों को उसका कितना फायदा मिल रहा है।
इस प्रकरण का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि बच्चों के सामने हम कैसी मिसाल रख रहे हैं। उन्हें किताबों में ईमानदारी पढ़ाई जाएगी, महापुरुषों के कारनामें बताये जायेंगे, नागरिकों की जिम्मेदारियां और अधिकार बताये जायेंगे। लेकिन जब वे बच्चे स्कूल से बाहर निकलेंगे तो देखेंगे कि सवाल पूछने वाले को ही स्कूल के गेट से बाहर कर दिया गया।
बच्चों को यह सिखाना है कि समस्या दिखे तो उसे ठीक करो या फिर ये कि समस्या दिखे तो पर्दा डाल दो? पारदर्शिता से डरने वाली व्यवस्था बच्चों को कैसी नागरिकता सिखाएगी?
खबरों में ये भी आता है कि हजारों स्कूली बिल्डिंगें जर्जर हाल में हैं, टीचरों की भारी कमी है। स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या घट रही है। स्कूल मर्ज किए जा रहे हैं। लेकिन कोई सच्चाई सामने लाने की कोशिश करे तो उसका स्वागत करने की बजाए स्कूल में एंट्री ही बन्द करा दो!
हमारे ही टैक्स के पैसे से सब काम हो, बंदरबांट हो और स्कैम भी हो लेकिन हमें ही जानने का हक न हो, ये कैसा तंत्र है? कैसे इसे कोई जस्टिफाई कर सकता है?
बात सिर्फ एक राजस्थान की नहीं है और न सिर्फ स्कूलों की। बीमारी व्यापक है, अंगों – अंगों में बैठी हुई है। हम इलाज की बजाये उसे छिपाने में ऊर्जा लगाये हुए हैं। यही हम सबके बीच की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। दोष किसी एक को देना व्यर्थ होगा, दोष तो हम सबका है क्योंकि हम भी उसी बीमारी छिपाने वाली व्यवस्था का हिस्सा हैं।
सवाल बड़ा है। विकसित समाज वह नहीं होता जहां गंदगी दिखाई नहीं देती। विकसित समाज वह होता है जहां गंदगी दिखाने वाले को रोका नहीं जाता। बल्कि प्रोत्साहित किया जाता है और गंदगी साफ की जाती है। एम्पावरमेंट यही है कि सबको सब जानने का हक हो, बताने का हक हो। सवाल पूछने को प्रोत्साहित किया जाए और ईमानदार जवाब दिए जाएँ, यही असली विकसित समाज की निशानी होगी।
(लेखक पत्रकार हैं।)


