Paper Crisis in India:: सरकार कागज के दुरुपयोग की ओर भी ध्यान दे

Paper Crisis in India: कम्युनिस्ट नेता इंद्रजीत गुप्त ने 1974 के लोकसभा भाषण में कागज की कमी, बढ़ती कीमतों और शिक्षा संस्थानों पर उसके असर को लेकर सरकार से जवाब मांगा।

Newstrack Network
Published on: 11 Jun 2026 5:04 PM IST
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Paper Shortage India: मैं औद्योगिक विकास तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री (सौ सुब्रह्मण्यम) का ध्यान अविलंबनीय लोकमहत्व के इस विषय की और दिलाना चाहता हूं कि देश में कागज की भारी कमी, उसके ऊंचे मूल्यों के परिणामतः स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों को पाठ्य पुस्तकें तथा कॉपियां उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।

कागज भी अन्न और कपड़े की तरह एक अनिवार्य वस्तु है। पाठ्यपुस्तकों और कॉपियों की भारी कीमतें भी देश में विद्यार्थी असंतोष का एक कारण है। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में कॉपियां और पाठ्यपुस्तकें प्रथम तो मिलती ही नहीं और यदि मिलती भी हैं, तो बहुत मंहगे दामों पर।

मैं जानना चाहता हूं कि क्या सरकार कागज उद्योग के मालिकों पर इस प्रकार का अंकुश नहीं रख सकती, ताकि कागज की कीमतें न बढ़ सके। मैं जानना चाहता हूं कि इस बारे में योजना मंत्रालय और योजना आयोग क्या कर रहा है? चेतावनी मिलने के बावजूद भी सरकार ने इस विषय में पहले ही क्यों कोई कार्यवाही नहीं की? कहा गया है कि कागज उद्योग दो लाख टन कागज बनाएगा, जिसमें से 80 हजार टन सरकार लेगी और 1.2 लाख टन शिक्षा क्षेत्र के लिए रह जाएगा। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि कागज उद्योग दो लाख टन कागज अवश्य बनाएगा। मंत्री महोदय ने कागज की उत्पादन क्षमता के बारे में अपने वक्तव्य में कुछ नहीं कहा है। संयुक्त क्षेत्र में कागज के उद्योग स्थापित करने का भी प्रस्ताव है, जिसके लिए वित्त की व्यवस्था सरकार करेगी और इनका प्रबंध गैर-सरकारी हाथों में रहेगा। इस बारे में भी सरकार को स्पष्टीकरण देना चाहिए। यदि आपूर्ति काफी मात्रा में रहे, तो मूल्य नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। आपूर्ति कम होने के कारण ही मूल्य बढ़ते जा रहे हैं। ऐसा भी ज्ञात हुआ है कि उत्पादन क्षमता के केवल 35 फीसदी भाग का ही उपयोग किया जाता है, जिसका कारण बिजली की कमी तथा परिवहन कठिनाइयां बताया जाता है। लेकिन उत्पादक ऐसा जान-बूझकर करते हैं। तीन वर्ष पूर्व सफेद प्रिंटिंग पेपर की दर 1,600 रुपये प्रति टन थी, जो बढ़कर 5,850 रुपये प्रति टन हो गई है और खुले बाजार में यह कागज 7,000 रुपये प्रति टन मिलता है। मंत्री महोदय ने कहा है कि शिक्षा क्षेत्र के लिए कागज 2,750 रुपये प्रति टन की दर से दिया जाएगा। मेरे विचार में सरकार को मूल्य निश्चित करके यह काम स्वयं ही करना चाहिए, अन्यथा शिक्षा संस्थाएं संकट में पड़ जाएंगी।

सूचना और प्रसारण मंत्री ने कहीं कहा है कि समाचार पत्रों को उनके निश्चित कोटे के अतिरिक्त सफेद प्रिंटिंग पेपर दिया जाएगा। समाचार पत्र अपने विज्ञापन परिशिष्टों के लिए सफेद प्रिंटिंग पेपर का उपयोग कर रहे हैं और शिक्षा संस्थाओं को इस मामले में भुलाया जा रहा है। मैं जानना चाहता हूं कि कागजों के मूल्य नियंत्रण को किस प्रकार लागू किया जाएगा और उत्पादन लक्ष्य की किस प्रकार प्राप्त करेंगे, जिसके लिए उत्पादक सहमत हो गए हैं? कागज का सरकारी दफ्तरों तथा एजेंसियों में दुरुपयोग होता है। इस ओर भी सरकार का ध्यान जाना चाहिए। सरकार को यह स्पष्ट निर्णय करना चाहिए कि उसकी सहानुभूति कागज कारखानों के मालिकों के साथ है अथवा देश के बच्चों के साथ?

( साभार ‘ अमर उजाला’। कम्युनिस्ट नेता व सांसद के नौ अगस्त, 1974 को लोकसभा में दिए भाषण के अंश।)

-इंद्रजीत गुप्त

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