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Award Wapsi Andolan: पुरस्कार की राजनीति, साहित्यकारों का विरोध और 2015 का आंदोलन
Award Wapsi Andolan: 2015 के पुरस्कार-वापसी आंदोलन ने साहित्य और राजनीति के रिश्ते पर बहस छेड़ी। जानिए लेखकों के विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्यिक पुरस्कारों की नैतिकता का विश्लेषण।
Puraskar Ki Rajniti Award Wapsi Andolan 2015 | Newstrack Hindi News | Latest Hindi News
Award Wapsi Andolan: मुंशी प्रेमचंद ने कभी एक प्रश्न के उत्तर में कहा था कि वे किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसके साथ स्वयं को जोड़ सकें। इस कथन का मूल संदर्भ और शब्दशः प्रमाण अलग से विचारणीय हो सकता है, लेकिन प्रेमचंद के साहित्य और उनके वैचारिक जीवन में राजनीति तथा समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता निर्विवाद रूप से दिखाई देती है। उन्होंने साहित्य को जीवन से अलग किसी मनोरंजन की वस्तु के रूप में स्वीकार नहीं किया था। उनके लिए साहित्य समाज की वास्तविकताओं, अन्याय, शोषण, असमानता और मनुष्य के संघर्षों को समझने तथा उन्हें बदलने की चेतना पैदा करने का माध्यम था। अप्रैल 1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने साहित्य के उद्देश्य पर जो विचार व्यक्त किए, वे आज भी साहित्यकारों की सामाजिक भूमिका को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
प्रेमचंद की दृष्टि में साहित्य केवल राजनीति के पीछे चलने वाली शक्ति नहीं था। वह समाज को दिशा दिखाने वाली स्वतंत्र बौद्धिक चेतना भी था। साहित्यकार का दायित्व किसी राजनीतिक दल की घोषणाओं को साहित्यिक भाषा में दोहराना नहीं, बल्कि समाज के सच को पहचानना और आवश्यकता पड़ने पर सत्ता सहित हर प्रकार की शक्ति से प्रश्न करना था। इसी विचार को उन्होंने साहित्य को राजनीति के आगे मशाल दिखाने वाली सच्चाई के रूप में अभिव्यक्त किया था। लेकिन अक्टूबर 2015 में जिस तरह देश के अनेक साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी सहित विभिन्न संस्थाओं से प्राप्त पुरस्कार लौटाने शुरू किए, उसने साहित्य, राजनीति और नैतिक प्रतिरोध के संबंध को एक बार फिर विवाद के केंद्र में ला दिया। प्रश्न केवल यह नहीं था कि साहित्यकार पुरस्कार क्यों लौटा रहे हैं। उससे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या पुरस्कार लौटाना साहित्यिक विवेक की स्वतंत्र अभिव्यक्ति थी अथवा उसमें राजनीतिक विरोध का भी कोई संगठित तत्व उपस्थित था? और यदि विरोध राजनीतिक था, तो क्या मात्र राजनीतिक होने के कारण उसकी नैतिक वैधता समाप्त हो जाती थी?
दरअसल, साहित्य और राजनीति का संबंध जितना पुराना है, उतना ही जटिल भी है। साहित्यकार समाज में रहता है, उसी की परिस्थितियों से प्रभावित होता है और उसके अनुभवों को अपनी रचनाओं में व्यक्त करता है। समाज में यदि अन्याय होगा, हिंसा होगी, सांप्रदायिक तनाव होगा अथवा नागरिक स्वतंत्रताओं पर आघात होगा, तो उसका प्रभाव साहित्य पर भी पड़ेगा। इस अर्थ में साहित्य का राजनीति से पूरी तरह अलग रहना संभव नहीं है। लेकिन साहित्य की अपनी स्वायत्तता भी होती है। यदि साहित्यकार किसी राजनीतिक दल का स्थायी प्रवक्ता बन जाए, तो उसकी रचनात्मक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। वह समाज की जटिलताओं को स्वतंत्र रूप से देखने के बजाय अपने पसंदीदा दल के पक्ष में और विरोधी दल के विरुद्ध तर्क तलाशने लग सकता है। तब साहित्य सत्ता की आलोचना करने वाली स्वतंत्र चेतना के स्थान पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का उपकरण बनने का जोखिम उठाता है। इसी संदर्भ में वर्ष 2015 का 'पुरस्कार-वापसी' आंदोलन गंभीर परीक्षण की माँग करता है। पुरस्कार लौटाने वालों के इरादों पर बिना प्रमाण संदेह करना उचित नहीं है, लेकिन उनके सार्वजनिक तर्कों, राजनीतिक संबंधों, विरोध के समय और आंदोलन के स्वरूप पर प्रश्न उठाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। साहित्यकार यदि समाज और सत्ता को आलोचना की कसौटी पर कसने का अधिकार रखते हैं, तो समाज भी साहित्यकारों की सार्वजनिक भूमिका का परीक्षण कर सकता है।
वर्ष 2015 में पुरस्कार-वापसी का आंदोलन अचानक शून्य से पैदा नहीं हुआ था। इसके पीछे कुछ ऐसी घटनाएँ थीं जिन्होंने देश में वैचारिक असहमति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सद्भाव को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा की थीं। 20 अगस्त 2013 को महाराष्ट्र के पुणे में अंधविश्वास-विरोधी आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। दाभोलकर लंबे समय से अंधविश्वास, चमत्कारों के नाम पर शोषण और विभिन्न प्रकार की अवैज्ञानिक प्रथाओं के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। 16 फरवरी 2015 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में वामपंथी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद पानसरे तथा उनकी पत्नी उमा पानसरे पर गोलीबारी हुई। गंभीर रूप से घायल पानसरे की 20 फरवरी को मृत्यु हो गई। 30 अगस्त 2015 को कर्नाटक के धारवाड़ में प्रसिद्ध कन्नड़ विद्वान और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक एम. एम. कलबुर्गी की उनके घर पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। इन तीनों घटनाओं ने तर्कवादी विचारों, सामाजिक आलोचना और वैचारिक असहमति रखने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई। इन हत्याओं की परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में उन्हें वैचारिक असहिष्णुता और हिंसा की व्यापक समस्या से जोड़कर देखा गया।
इसी बीच 28 सितंबर 2015 की रात उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले के बिसाहड़ा गाँव में मोहम्मद अखलाक की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। उनके घर में गोमांस रखे होने और खाने की अफवाह फैलने के बाद भीड़ ने परिवार पर हमला किया था। अखलाक के पुत्र दानिश को भी गंभीर चोटें आई थीं। इस घटना ने पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा और अफवाहों के आधार पर कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति पर व्यापक बहस पैदा कर दी। यह केवल एक व्यक्ति की हत्या का मामला नहीं था। प्रश्न यह था कि क्या किसी नागरिक के घर में रखे भोजन के बारे में अफवाह फैलाकर भीड़ को हिंसा करने का अधिकार मिल सकता है? भारतीय संविधान और कानून के अंतर्गत इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक है। किसी अपराध का संदेह होने पर जाँच और कार्रवाई राज्य की वैधानिक संस्थाओं का दायित्व है। किसी समूह को स्वयं न्याय करने का अधिकार नहीं है। अखलाक की हत्या ने इसी बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत को चुनौती देने वाली सामाजिक मानसिकता पर प्रश्न खड़े किए। इस घटना के बाद कई साहित्यकारों ने अपने विरोध को और मुखर किया। उन्होंने कहा कि देश में असहमति व्यक्त करने वाले लेखकों, तर्कवादियों और अल्पसंख्यकों के लिए भय का वातावरण बन रहा है।
पुरस्कार-वापसी की शुरुआती घटनाओं में हिंदी लेखक उदय प्रकाश का नाम महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने सितंबर 2015 में कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की। इसके बाद अक्टूबर में अंग्रेजी की प्रसिद्ध लेखिका नयनतारा सहगल ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया। उन्हें वर्ष 1986 में अंग्रेजी उपन्यास 'रिच लाइक अस' के लिए यह सम्मान मिला था। सहगल ने अपने वक्तव्य में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरों की चिंता व्यक्त की। उनके बाद अशोक वाजपेयी, कृष्णा सोबती, काशीनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, केकी एन. दारूवाला और विभिन्न भारतीय भाषाओं के अनेक लेखकों ने पुरस्कार लौटाने अथवा साहित्य अकादमी के पदों से त्यागपत्र देने जैसे कदम उठाए। आंदोलन धीरे-धीरे हिंदी और अंग्रेजी के साहित्यिक संसार से आगे बढ़कर उर्दू, पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, कोंकणी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों तक पहुँचा। दिसंबर 2015 में संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार साहित्य अकादमी को पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों की संख्या 39 तक पहुँच चुकी थी। इस प्रकार आंदोलन केवल कुछ प्रसिद्ध लेखकों की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं रह गया था। उसने साहित्यिक संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन में असहमति की भूमिका पर राष्ट्रीय बहस खड़ी कर दी।
लेकिन इसी आंदोलन के साथ अनेक ऐसे प्रश्न भी उठे जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता था। सबसे पहला प्रश्न था विरोध की निरंतरता और उसकी राजनीतिक निष्पक्षता का। नरेंद्र दाभोलकर की हत्या अगस्त 2013 में हुई थी। उस समय केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार थी और महाराष्ट्र में कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की गठबंधन सरकार थी। गोविंद पानसरे पर हमला फरवरी 2015 में हुआ, जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार थी और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा सरकार थी। एम. एम. कलबुर्गी की हत्या अगस्त 2015 में कर्नाटक में हुई, जहाँ सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार थी। मोहम्मद अखलाक की हत्या उत्तर प्रदेश में हुई, जहाँ अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। इन घटनाओं का राजनीतिक और प्रशासनिक संदर्भ एक जैसा नहीं था। इसलिए प्रश्न उठना स्वाभाविक था कि यदि लेखकों का विरोध मुख्य रूप से हिंसा, असहिष्णुता और राज्य की विफलता के विरुद्ध था, तो उस विरोध में विभिन्न राज्य सरकारों तथा केंद्र सरकार की अलग-अलग जिम्मेदारियों का मूल्यांकन किस प्रकार किया गया? किसी घटना के लिए केवल उस समय सत्ता में मौजूद सरकार को अपराध का प्रत्यक्ष जिम्मेदार घोषित करना उचित नहीं होता, लेकिन कानून-व्यवस्था, अपराध की रोकथाम, निष्पक्ष जाँच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जिम्मेदारी से संबंधित सरकारों को अलग भी नहीं किया जा सकता।
यहाँ संवैधानिक व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। भारत में पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था मुख्यतः राज्य सूची के विषय हैं। इसलिए किसी राज्य में हुई हत्या की प्राथमिक जाँच और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार तथा उसकी पुलिस व्यवस्था पर होती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि केंद्र सरकार की कोई राजनीतिक या नैतिक जिम्मेदारी नहीं होती। प्रधानमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व पूरे देश में सामाजिक सद्भाव तथा संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए सार्वजनिक संदेश दे सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर किसी घटना के प्रभाव को देखते हुए उनसे प्रतिक्रिया की अपेक्षा भी की जा सकती है। दूसरी ओर राज्य सरकारों की प्रत्यक्ष प्रशासनिक जिम्मेदारी को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि राजनीतिक बहस का केंद्र केंद्र सरकार हो। वर्ष 2015 के पुरस्कार-वापसी आंदोलन की आलोचना करने वालों का एक प्रमुख तर्क यही था कि लेखकों की नाराजगी का राजनीतिक निशाना अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट था, जबकि घटनाओं से संबंधित विभिन्न सरकारों की जिम्मेदारियों पर उतनी समान तीव्रता से चर्चा नहीं हुई। इस आलोचना में विचारणीय प्रश्न अवश्य था, लेकिन इससे उन हत्याओं के विरोध की वैधता समाप्त नहीं होती। सामाजिक प्रतिरोध के समय और स्वरूप में चयनात्मकता हो सकती है; वह चयनात्मकता प्रश्नों से मुक्त नहीं होनी चाहिए, लेकिन किसी अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के अधिकार को भी समाप्त नहीं करती।
पुरस्कार-वापसी के विरोधियों ने एक दूसरा प्रश्न भी उठाया। यदि देश में असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले की चिंता थी, तो क्या भारतीय इतिहास में ऐसी घटनाएँ पहले कभी नहीं हुई थीं? वर्ष 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए, राजनीतिक विरोधियों को जेलों में बंद किया गया और नागरिक अधिकारों को सीमित किया गया। नवंबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली सहित अनेक स्थानों पर सिख विरोधी हिंसा हुई, जिसमें हजारों निर्दोष नागरिक मारे गए। वर्ष 1989 में भागलपुर के सांप्रदायिक दंगे हुए। वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में हिंसा हुई। वर्ष 2002 में गुजरात में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई। कश्मीर में आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों के विस्थापन ने भी देश की सामूहिक स्मृति पर गहरे घाव छोड़े। इन सभी घटनाओं ने अलग-अलग समय पर भारतीय लोकतंत्र की सहिष्णुता, नागरिक सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की क्षमता को चुनौती दी। इसलिए वर्ष 2015 में असहिष्णुता के विरुद्ध आवाज उठाने वाले साहित्यकारों से यह पूछना अनुचित नहीं था कि अतीत की इन घटनाओं पर उनकी भूमिका क्या रही थी।
लेकिन यह प्रश्न पूछते समय ऐतिहासिक तथ्यों के साथ न्याय करना भी आवश्यक है। ऐसा नहीं था कि आपातकाल, 1984 की हिंसा, बाबरी मस्जिद के विध्वंस या गुजरात के दंगों के समय पूरे साहित्यिक और बौद्धिक समाज ने चुप्पी साध ली थी। विभिन्न कालखंडों में अनेक लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सत्ता तथा हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाई। कई लोगों ने सार्वजनिक विरोध किया, संस्थागत पद छोड़े, लेख लिखे, गिरफ्तारियाँ झेलीं अथवा सरकारी नीतियों से असहमति व्यक्त की। यह संभव है कि किसी विशेष लेखक ने किसी समय पर्याप्त प्रतिरोध न किया हो। लेकिन पूरे साहित्यिक समाज पर सामूहिक मौन का आरोप लगाने से पहले व्यक्तिगत और संस्थागत इतिहास की जाँच आवश्यक है। इसी प्रकार यह तर्क भी पर्याप्त नहीं कि किसी लेखक ने वर्ष 1984 में विरोध नहीं किया था, इसलिए उसे वर्ष 2015 में विरोध करने का नैतिक अधिकार नहीं है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की पूर्व चुप्पी उसके वर्तमान विरोध को आलोचना के दायरे में अवश्य ला सकती है, लेकिन उसका विरोध करने का अधिकार समाप्त नहीं करती। अधिक सार्थक प्रश्न यह होगा कि क्या साहित्यकार अपनी नैतिक कसौटी सभी सरकारों और सभी प्रकार की हिंसा पर समान रूप से लागू करने के लिए तैयार हैं?
वर्ष 2015 के आंदोलन में नयनतारा सहगल की भूमिका विशेष चर्चा में रही। वे पंडित जवाहरलाल नेहरू की भांजी और विजयलक्ष्मी पंडित की पुत्री थीं। इस कारण उनका संबंध स्वतंत्र भारत के सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक परिवारों में से एक से था। लेकिन उनकी पहचान केवल पारिवारिक पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं थी। वे अंग्रेजी की प्रतिष्ठित लेखिका थीं और उनके साहित्य में सत्ता, राजनीतिक नैतिकता, स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत संबंधों के अनेक प्रश्न उपस्थित होते रहे। आपातकाल के दौरान उन्होंने इंदिरा गांधी की नीतियों की आलोचना की थी। इस तथ्य का महत्त्व इसलिए है कि वर्ष 2015 में पुरस्कार-वापसी आंदोलन के आलोचकों द्वारा उन्हें केवल नेहरू परिवार से जुड़े होने के कारण कांग्रेस समर्थक मान लेना उनके सार्वजनिक जीवन का अधूरा चित्र प्रस्तुत करता था। किसी लेखक का किसी राजनीतिक परिवार से संबंध उसकी प्रत्येक राजनीतिक प्रतिक्रिया को स्वतः अवैध या पक्षपातपूर्ण नहीं बना देता। लेकिन यह भी सच है कि प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवारों और सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े साहित्यकारों के सार्वजनिक हस्तक्षेपों का राजनीतिक अर्थ अधिक व्यापक हो सकता है। नयनतारा सहगल के विरोध का मूल्यांकन उनके कथनों, राजनीतिक अनुभव और वास्तविक आचरण के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल पारिवारिक संबंध के आधार पर।
सहगल ने पुरस्कार लौटाते समय देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उनका आरोप था कि सामाजिक वातावरण में असहमति रखने वालों के प्रति भय और असुरक्षा बढ़ रही है। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि पुरस्कार-वापसी का उनका निर्णय वापस लेने का प्रश्न नहीं है। जनवरी 2016 में उन्होंने इस आंदोलन को व्यापक सार्वजनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न करने वाला बताया। उनकी दृष्टि में आंदोलन का उद्देश्य किसी एक साहित्यिक संस्था से विवाद करना भर नहीं था, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलतावादी समाज को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चेतावनी देना था। दूसरी ओर आंदोलन के विरोधियों का तर्क था कि लेखकों की कुछ प्रतिक्रियाएँ वास्तविक घटनाओं की तुलना में व्यापक राजनीतिक आरोपों का स्वरूप ग्रहण कर रही थीं। यही वह बिंदु था जहाँ साहित्यिक विरोध और राजनीतिक व्याख्या एक-दूसरे से टकराने लगे। साहित्यकार अपने विरोध को नैतिक चेतावनी मान रहे थे, जबकि आलोचक उसके राजनीतिक समय और चयनात्मकता पर प्रश्न उठा रहे थे।
हिंदी के प्रसिद्ध कवि और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अशोक वाजपेयी भी पुरस्कार-वापसी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए। उन्हें वर्ष 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उन्होंने कलबुर्गी की हत्या और देश के बदलते सामाजिक वातावरण के विरोध में यह सम्मान लौटाने का निर्णय किया। अशोक वाजपेयी का प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं से लंबा संबंध रहा है। वे मध्य प्रदेश की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत रहे और भारत भवन जैसी महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास से जुड़े। सार्वजनिक सांस्कृतिक संस्थाओं और सरकारों के बीच उनके लंबे संबंधों को लेकर भी समय-समय पर बहस होती रही। उनके आलोचकों ने भोपाल गैस त्रासदी के समय प्रशासनिक तथा राजनीतिक प्रतिष्ठान की भूमिका के संदर्भ में उनकी सार्वजनिक संवेदनशीलता पर प्रश्न उठाए। लेकिन किसी विशेष कथन को उनके नाम से जोड़कर प्रस्तुत करने के लिए उसका प्रमाणित स्रोत आवश्यक है। भोपाल गैस त्रासदी दिसंबर 1984 में हुई थी और हजारों लोगों के जीवन तथा स्वास्थ्य पर उसका दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा। उस त्रासदी के प्रति तत्कालीन सरकार, प्रशासन और समाज के प्रभावशाली वर्गों की प्रतिक्रिया की आलोचना पूरी तरह उचित विषय है। यदि किसी लेखक अथवा प्रशासनिक अधिकारी के आचरण में विरोधाभास दिखाई देता है, तो उस पर प्रमाण सहित प्रश्न उठाए जाने चाहिए। लेकिन केवल आरोपों और व्यक्तिगत संकेतों के आधार पर उसकी साहित्यिक संवेदना को असत्य घोषित करना उचित नहीं होगा।
वास्तविक प्रश्न किसी एक लेखक तक सीमित नहीं था। भारत में साहित्य, कला और सांस्कृतिक संस्थाओं का सरकारी संरचनाओं से लंबे समय से संबंध रहा है। साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और अनेक राज्य स्तरीय संस्थाएँ सार्वजनिक संसाधनों से संचालित होती हैं। उनके पदों पर नियुक्तियों, पुरस्कारों के चयन और संस्थागत प्राथमिकताओं को लेकर समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं। विभिन्न सरकारों पर अपने अनुकूल व्यक्तियों को सांस्कृतिक संस्थाओं में स्थान देने के आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों का मूल्यांकन प्रत्येक संस्था और नियुक्ति के संदर्भ में अलग-अलग होना चाहिए, लेकिन व्यापक समस्या वास्तविक है। यदि साहित्यिक संस्थाओं में राजनीतिक निकटता, गुटबाजी या वैचारिक पक्षधरता पुरस्कार चयन को प्रभावित करने लगे, तो इससे साहित्य की प्रतिष्ठा कमजोर होती है। पुरस्कार किसी लेखक की रचना और योगदान के आधार पर मिलना चाहिए, न कि राजनीतिक सत्ता से उसकी निकटता के आधार पर। इसी प्रकार किसी साहित्यकार को सरकारी सांस्कृतिक संस्था में पद मिलने मात्र से उसे सत्ताधारी दल का प्रतिनिधि नहीं मान लेना चाहिए। मुद्दा नियुक्ति या पुरस्कार की प्रक्रिया की पारदर्शिता और उसके पीछे की वास्तविक योग्यता है।
वर्ष 2015 में पुरस्कार लौटाने वालों में ऐसे लेखक भी थे जिनकी प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधियों का इतिहास मौजूद था। मलयालम की प्रसिद्ध लेखिका सारा जोसेफ वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में केरल के त्रिशूर संसदीय क्षेत्र से आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार रह चुकी थीं। कोंकणी लेखक एन. शिवदास का कांग्रेस संगठन से भी संबंध रहा था। कुछ अन्य लेखकों ने भी विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों, दलों या विचारधारात्मक अभियानों में सक्रिय भागीदारी की थी। इन तथ्यों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उनका पुरस्कार-वापसी आंदोलन किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर चल रहा था। लेकिन यह अवश्य स्पष्ट होता है कि पुरस्कार लौटाने वाले सभी साहित्यकार स्वयं को राजनीति से पूर्णतः अलग रखने वाले व्यक्ति नहीं थे। कई लोगों के सार्वजनिक राजनीतिक विचार और सक्रियताएँ पहले से ज्ञात थीं। लोकतंत्र में साहित्यकार को राजनीतिक दल से जुड़ने का भी अधिकार है और किसी सरकार का विरोध करने का भी। इसलिए समस्या राजनीतिक संबंध की उपस्थिति मात्र नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब कोई व्यक्ति अपने राजनीतिक विचारों को साहित्यिक निष्पक्षता का एकमात्र प्रतिनिधि घोषित करने लगे और दूसरों के विरोध को असहिष्णुता अथवा नैतिक पतन का प्रमाण मानने लगे।
यहाँ एक और प्रश्न उठता है। यदि कोई साहित्यकार चुनाव के दौरान किसी राजनीतिक नेता का सार्वजनिक विरोध करता है, तो क्या चुनाव के बाद उसे उस नेता की सरकार की आलोचना नहीं करनी चाहिए? लोकतंत्र में ऐसा प्रतिबंध नहीं हो सकता। किसी उम्मीदवार के विरुद्ध चुनाव प्रचार करना और उसके प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाना दोनों लोकतांत्रिक अधिकार हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक डॉ. यू. आर. अनंतमूर्ति ने नरेन्द्र मोदी को लेकर तीखी टिप्पणियाँ की थीं। उन्होंने मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना के प्रति सार्वजनिक असहमति व्यक्त की थी। बाद में उनके कुछ कथनों को लेकर राजनीतिक विवाद भी हुआ। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि अनंतमूर्ति का अगस्त 2014 में निधन हो गया था। इसलिए वर्ष 2015 के पुरस्कार-वापसी आंदोलन को उनके प्रत्यक्ष नेतृत्व अथवा उस समय की सक्रिय राजनीतिक भूमिका से जोड़ना उचित नहीं होगा। वे भारतीय साहित्य और सार्वजनिक वैचारिक विमर्श के महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व थे। उनके राजनीतिक विचारों से असहमति हो सकती है, लेकिन किसी लेखक के साहित्यिक योगदान और राजनीतिक वक्तव्य का मूल्यांकन अलग-अलग स्तरों पर किया जाना चाहिए।
पुरस्कार-वापसी आंदोलन का सबसे नाटकीय प्रसंग उर्दू के प्रसिद्ध शायर मुनव्वर राणा से जुड़ा था। वर्ष 2014 में उन्हें उर्दू काव्य संग्रह 'शहदाबा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। अक्टूबर 2015 में जब कई लेखक अपने सम्मान लौटा रहे थे, तब राणा ने शुरुआत में पुरस्कार लौटाने को समस्या का समाधान मानने पर संदेह व्यक्त किया। लेकिन 18 अक्टूबर 2015 को उन्होंने एक टेलीविजन बहस के दौरान अचानक साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी। वे पुरस्कार से जुड़ा सम्मान-चिह्न और एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि लौटाने के लिए चेक लेकर आए थे। उनके इस कदम का व्यापक प्रसारण हुआ और घटना तत्काल राष्ट्रीय चर्चा में आ गई। उन्होंने घोषणा की कि भविष्य में किसी भी सरकार से पुरस्कार स्वीकार नहीं करेंगे। उस समय उनके निर्णय में आए परिवर्तन और टेलीविजन मंच के चयन को लेकर गंभीर प्रश्न उठे।
मुनव्वर राणा का यह प्रसंग पुरस्कार-वापसी की राजनीति को समझने के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण था। यदि कोई साहित्यकार किसी सम्मान को अपने नैतिक विरोध के कारण लौटाना चाहता है, तो वह संबंधित संस्था को पत्र लिखकर, सम्मान-चिह्न और राशि लौटाकर अपना निर्णय सार्वजनिक कर सकता है। इसके लिए टेलीविजन स्टूडियो में नाटकीय घोषणा करना अनिवार्य नहीं है। दूसरी ओर सार्वजनिक विरोध का उद्देश्य ही यदि समाज का ध्यान आकर्षित करना है, तो मीडिया का उपयोग अपने आप अनुचित नहीं कहा जा सकता। गांधी के सत्याग्रह से लेकर आधुनिक सामाजिक आंदोलनों तक सार्वजनिक प्रतीकों और दृश्यमान विरोध की भूमिका रही है। इसलिए मुनव्वर राणा के निर्णय की आलोचना का वास्तविक आधार केवल उसका टेलीविजन पर होना नहीं, बल्कि उस निर्णय की निरंतरता, पूर्व वक्तव्यों से उसका संबंध और पुरस्कार लौटाने के औपचारिक स्वरूप की स्पष्टता होना चाहिए। घटना से एक बुनियादी प्रश्न अवश्य उठता था। क्या साहित्यिक सम्मान लौटाने का कार्य नैतिक प्रतिरोध था अथवा उसकी सार्वजनिक प्रस्तुति में राजनीतिक प्रदर्शन का तत्व इतना बढ़ गया था कि मूल मुद्दा पीछे छूटने लगा? इस प्रश्न का उत्तर हर लेखक के मामले में एक समान नहीं हो सकता।
मुनव्वर राणा को व्यक्तिगत रूप से सुनने और विभिन्न राजनीतिक मंचों पर उनके वक्तव्यों से परिचित रहने वालों के मन में भी उनकी सार्वजनिक भूमिका को लेकर प्रश्न उठ सकते थे। मैंने स्वयं एक समय लखनऊ के गन्ना संस्थान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उन्हें मायावती की प्रशंसा करते सुना था। बाद के वर्षों में समाजवादी पार्टी के नेताओं के प्रति उनके अनुकूल वक्तव्य भी चर्चा में रहे। इस तरह की घटनाएँ सार्वजनिक व्यक्तित्वों के राजनीतिक संबंधों की बदलती प्रकृति की ओर संकेत करती हैं। लेकिन किसी राजनीतिक नेता की प्रशंसा करना ही साहित्यकार की स्वतंत्रता समाप्त होने का प्रमाण नहीं है। साहित्यकार सरकारों की प्रशंसा भी कर सकता है और उनकी आलोचना भी। विचार बदलना अपने आप में अवसरवाद नहीं है। अवसरवाद का प्रश्न तब उठता है जब विचारों के परिवर्तन के पीछे घोषित सिद्धांतों के बजाय तत्कालीन राजनीतिक लाभ या व्यक्तिगत सुविधा का प्रमाण दिखाई दे। मुनव्वर राणा के पुरस्कार-वापसी प्रसंग पर भी इसी आधार पर विचार होना चाहिए। केवल उनका निर्णय बदलना उन्हें दोषी सिद्ध नहीं करता, लेकिन उस परिवर्तन के कारणों और सार्वजनिक प्रस्तुति पर प्रश्न उठाना पूरी तरह उचित था।
मुनव्वर राणा का निधन 14 जनवरी 2024 को लखनऊ में हुआ। वे उर्दू शायरी के उन लोकप्रिय नामों में शामिल थे जिन्होंने माँ, घर, परिवार, विस्थापन और सामान्य मनुष्य की भावनाओं को अपनी कविता का महत्त्वपूर्ण विषय बनाया। उनकी शायरी का पाठक और श्रोता वर्ग व्यापक था। राजनीतिक विवादों के बावजूद उनका साहित्यिक योगदान अलग महत्त्व रखता है। निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनके उर्दू साहित्य में योगदान को याद करते हुए शोक व्यक्त किया। यह प्रसंग एक व्यापक लोकतांत्रिक सत्य की ओर संकेत करता है। राजनीतिक मतभेद और साहित्यिक योगदान का सम्मान एक साथ संभव है। किसी लेखक की राजनीतिक स्थिति से असहमति रखने के कारण उसकी साहित्यिक उपलब्धियों को नकारना आवश्यक नहीं है। इसी प्रकार साहित्यिक प्रतिभा किसी व्यक्ति के प्रत्येक राजनीतिक निर्णय को आलोचना से परे भी नहीं बना देती।
पुरस्कार-वापसी के विवाद में साहित्य अकादमी की स्वायत्तता भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न था। साहित्य अकादमी की स्थापना वर्ष 1954 में भारतीय भाषाओं और साहित्य के विकास तथा प्रोत्साहन के उद्देश्य से हुई थी। यह केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली स्वायत्त संस्था है। इसके पुरस्कारों का चयन साहित्यिक विशेषज्ञों और निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है। इसलिए साहित्य अकादमी पुरस्कार को सीधे प्रधानमंत्री अथवा किसी राजनीतिक दल द्वारा दिया गया सम्मान कहना उचित नहीं है। पुरस्कार सार्वजनिक संसाधनों से समर्थित संस्था देती है, लेकिन उसका उद्देश्य साहित्यिक उपलब्धि को मान्यता देना है। पुरस्कार प्राप्त करने वाला लेखक किसी सरकार का राजनीतिक ऋणी नहीं बन जाता। यही कारण है कि वर्ष 2015 में आलोचकों ने प्रश्न उठाया कि यदि लेखकों का विरोध केंद्र सरकार के विरुद्ध है, तो वे एक स्वायत्त साहित्यिक संस्था का सम्मान क्यों लौटा रहे हैं? क्या इससे उस संस्था की प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं होगी जिसने उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया था?
यह प्रश्न गंभीर था, लेकिन पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों का तर्क भी समझना आवश्यक है। उनमें से अनेक का कहना था कि साहित्य अकादमी ने एम. एम. कलबुर्गी की हत्या और लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे को लेकर अपेक्षित तीव्रता से प्रतिक्रिया नहीं दी। उनके अनुसार साहित्यकारों की प्रतिनिधि संस्था का दायित्व केवल पुरस्कार देना नहीं, बल्कि लेखकों की सुरक्षा और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पक्ष में सार्वजनिक रूप से खड़ा होना भी है। इस प्रकार पुरस्कार-वापसी का एक पक्ष सरकार के विरुद्ध विरोध था, जबकि दूसरा पक्ष स्वयं साहित्य अकादमी से नैतिक अपेक्षा का था। इसलिए यह कहना कि पुरस्कार लौटाकर लेखक केवल अपने साहित्यिक समुदाय को कटघरे में खड़ा कर रहे थे, विवाद के दूसरे पक्ष को अनदेखा करना होगा। वे सचमुच साहित्यिक संस्था पर दबाव बना रहे थे, लेकिन उनका दावा था कि यह दबाव संस्था की स्वायत्तता और उसके नैतिक दायित्व को मजबूत करने के लिए है। आलोचक मानते थे कि इससे संस्था राजनीतिक विवाद में खिंच रही है, जबकि समर्थकों के अनुसार लेखक किसी संस्था की निष्क्रियता का विरोध करने के लिए भी स्वतंत्र हैं।
23 अक्टूबर 2015 को साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी ने विशेष बैठक की। इस बैठक में कलबुर्गी और अन्य विचारकों की हत्याओं की कड़ी निंदा करते हुए लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया गया। अकादमी ने केंद्र और राज्य सरकारों से दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने तथा लेखकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग की। उसने भारतीय संस्कृति की बहुलतावादी परंपरा की रक्षा और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का वातावरण बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। साथ ही पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया गया। अकादमी ने अपने प्रस्ताव में स्पष्ट किया कि उसके पुरस्कारों के निर्णय लेखक और साहित्यिक विशेषज्ञों की प्रक्रियाओं के माध्यम से लिए जाते हैं। इसलिए संस्था की स्वायत्तता को बनाए रखना भी आवश्यक है।
इस घटनाक्रम ने साहित्य अकादमी की भूमिका को लेकर चल रही बहस को एक नया मोड़ दिया। संस्था ने हिंसा की निंदा की और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी स्थिति स्पष्ट की। इसके बावजूद सभी लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस लेने का निर्णय नहीं बदला। कुछ लोगों के लिए विरोध का उद्देश्य केवल अकादमी से बयान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक वातावरण पर असहमति दर्ज कराना था। जनवरी 2016 में नयनतारा सहगल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपना विरोध वापस नहीं लिया है। बाद में साहित्य अकादमी की ओर से यह भी बताया गया कि उसके नियमों में एक बार प्रदान किए गए पुरस्कार को वापस लेने की औपचारिक व्यवस्था नहीं थी। कुछ लेखकों ने सम्मान-चिह्न भेजे थे, कुछ ने पुरस्कार राशि के चेक दिए थे और कुछ ने सार्वजनिक घोषणा की थी। इसलिए सभी मामलों को एक जैसी औपचारिक 'पुरस्कार वापसी' मानना भी सही नहीं था। विरोध की राजनीतिक तथा नैतिक घोषणा और संस्थागत अभिलेखों में पुरस्कार का निरस्तीकरण दो अलग प्रक्रियाएँ थीं।
यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। साहित्यकार जिस सम्मान को लौटाकर अपनी असहमति व्यक्त करता है, वह सम्मान उसके साहित्यिक इतिहास से पूरी तरह मिट नहीं जाता। नयनतारा सहगल को वर्ष 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था, यह ऐतिहासिक तथ्य पुरस्कार-वापसी की घोषणा के बाद भी बना रहा। अशोक वाजपेयी, मुनव्वर राणा अथवा किसी अन्य लेखक के साहित्यिक योगदान और पुरस्कार प्राप्ति का अभिलेख भी समाप्त नहीं हुआ। इसलिए आलोचकों का यह प्रश्न कि पुरस्कार लौटाने वाले लेखक क्या उससे प्राप्त प्रतिष्ठा भी लौटा सकते हैं, अपने भीतर एक विचारणीय तर्क रखता था। वास्तव में प्रतिष्ठा कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे चेक या स्मृति-चिह्न की तरह संस्था को वापस भेज दिया जाए। लेकिन पुरस्कार-वापसी के समर्थकों का उद्देश्य भी संभवतः अपनी साहित्यिक उपलब्धि मिटाना नहीं था। वे उसी प्रतिष्ठा का उपयोग सार्वजनिक विरोध को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कर रहे थे। सम्मान लौटाने की क्रिया का प्रतीकात्मक अर्थ यही था कि लेखक अपनी साहित्यिक पहचान से जुड़े एक प्रतिष्ठित चिह्न का त्याग करके विरोध को गंभीरता प्रदान करना चाहता है। इस दृष्टि से पुरस्कार-वापसी को समझने के लिए सम्मान, प्रतिष्ठा और प्रतीकात्मक त्याग के बीच अंतर करना आवश्यक है।
पुरस्कार लौटाने की इस पद्धति पर एक दूसरी आपत्ति भी थी। आलोचकों का कहना था कि जिन साहित्यकारों ने लंबे समय तक सरकारी संस्थाओं से पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए, वे अचानक एक विशेष राजनीतिक परिस्थिति में सार्वजनिक नैतिकता के प्रतिनिधि कैसे बन गए? साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया को लेकर यदि गुटबाजी, पक्षपात और राजनीतिक निकटता के आरोप पहले से मौजूद थे, तो पुरस्कार प्राप्त करते समय उन प्रश्नों पर व्यापक विरोध क्यों नहीं हुआ? क्या साहित्यकारों ने अपने साहित्यिक समुदाय की आंतरिक समस्याओं—पुरस्कारों के चयन में पारदर्शिता, भाषाई असमानता, संस्थाओं में गुटबाजी और विचारधारात्मक पक्षधरता—पर भी उतना ही जोर दिया जितना किसी सरकार की आलोचना पर दिया? यह प्रश्न केवल पुरस्कार-वापसी आंदोलन के विरुद्ध नहीं, बल्कि भारतीय साहित्यिक संस्थाओं की विश्वसनीयता के पक्ष में भी उठाया जा सकता है। किसी साहित्यकार का नैतिक अधिकार तब अधिक प्रभावशाली होता है जब वह अपने निकट के संस्थागत वातावरण की कमियों पर भी उतनी ही स्पष्टता से बोलने को तैयार हो।
सरकारी सम्मानों को लेकर उठने वाले विवाद साहित्य अकादमी तक सीमित नहीं रहे हैं। पद्म पुरस्कारों, सांस्कृतिक संस्थाओं और विभिन्न राष्ट्रीय सम्मानों के चयन को लेकर समय-समय पर राजनीतिक तथा वैचारिक पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। अलग-अलग सरकारों पर अपने निकट समझे जाने वाले व्यक्तियों को पुरस्कार देने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। कभी किसी उद्योगपति को सम्मान दिए जाने पर सवाल उठे, कभी किसी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा कलाकार के चयन पर विवाद हुआ। पर्यावरण कार्यकर्ता वंदना शिवा और उद्योग जगत की प्रसिद्ध हस्ती इंद्रा नूयी जैसे व्यक्तियों को दिए गए सम्मानों को भी अलग-अलग वैचारिक दृष्टियों से देखा गया। लेकिन किसी कंपनी के उत्पादों अथवा व्यावसायिक नीतियों पर आलोचना होने से उसके किसी अधिकारी को मिले सम्मान की वैधता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। उसका मूल्यांकन पुरस्कार के घोषित मानदंडों और संबंधित व्यक्ति के योगदान के आधार पर होना चाहिए। इसी प्रकार किसी सौंदर्य प्रसाधन कंपनी, व्यावसायिक समूह अथवा लोकप्रिय कलाकार को सम्मान मिलने पर आलोचना की जा सकती है, लेकिन केवल किसी व्यक्ति के व्यावसायिक क्षेत्र के आधार पर उसे पुरस्कार के अयोग्य घोषित करना भी उचित नहीं है।
वास्तविक समस्या पुरस्कार चयन की पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता की है। यदि पुरस्कारों की प्रक्रिया स्पष्ट हो, निर्णायक मंडल की विश्वसनीयता बनी रहे और राजनीतिक हस्तक्षेप सीमित हो, तो विवादों की तीव्रता कम हो सकती है। लेकिन यदि पुरस्कार किसी व्यक्ति के साहित्यिक, वैज्ञानिक या सामाजिक योगदान के बजाय सत्ता से निकटता के आधार पर दिए जाने लगें, तो संस्थाओं की नैतिक प्रतिष्ठा कमजोर होगी। यह खतरा किसी एक दल की सरकार तक सीमित नहीं है। सत्ता बदलने के साथ यदि पुरस्कारों और सांस्कृतिक संस्थाओं की दिशा भी बदलने लगे, तो साहित्य और कला की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। इसलिए पुरस्कार-वापसी आंदोलन से निकला एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी था कि भारत में सार्वजनिक सांस्कृतिक संस्थाओं को राजनीतिक सत्ता से पर्याप्त दूरी और स्वतंत्रता किस प्रकार प्रदान की जाए।
वर्ष 2015 में पुरस्कार-वापसी को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी तीखी थीं। भाजपा के कुछ नेताओं ने इसे 'सुनियोजित' और राजनीतिक प्रेरित अभियान बताया। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने का आरोप लगाया। दूसरी ओर अनेक लेखकों ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उनका विरोध स्वतःस्फूर्त था और अलग-अलग भाषाओं तथा क्षेत्रों के लेखक अपने विवेक के आधार पर निर्णय कर रहे थे। नयनतारा सहगल ने भी कहा था कि आंदोलन में भाग लेने वाले अनेक लेखक एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे। इन परस्पर विरोधी दावों के बीच सावधानी आवश्यक थी। विभिन्न लेखकों के राजनीतिक विचारों में समानता होना किसी केंद्रीय संगठन के निर्देश पर आंदोलन चलने का स्वतः प्रमाण नहीं है। दूसरी ओर अनेक व्यक्तियों का लगभग एक ही समय पर समान प्रकार का विरोध करना राजनीतिक रूप से प्रभावशाली सार्वजनिक अभियान का रूप अवश्य ले सकता है। इसलिए 'सुनियोजित' या 'स्वतःस्फूर्त' जैसे शब्दों का उपयोग ठोस प्रमाणों और घटनाओं के आधार पर होना चाहिए। केवल राजनीतिक आरोपों से किसी आंदोलन की वास्तविक उत्पत्ति निर्धारित नहीं की जा सकती।
पुरस्कार-वापसी के समय एक और महत्त्वपूर्ण परिस्थिति थी। अक्टूबर-नवंबर 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव चल रहे थे। राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन और जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल तथा कांग्रेस के महागठबंधन के बीच तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा थी। असहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव का प्रश्न इस चुनावी वातावरण में भी चर्चा का विषय बना। पुरस्कार-वापसी आंदोलन के आलोचकों ने उसके समय को बिहार चुनाव से जोड़कर देखा। यह कहना उचित है कि आंदोलन ने उस समय के सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया और विभिन्न दलों ने उससे अपने-अपने तर्कों के समर्थन में सामग्री प्राप्त की। लेकिन केवल चुनाव के समय आंदोलन होने से यह सिद्ध नहीं होता कि वह चुनावी परिणाम प्रभावित करने के उद्देश्य से ही शुरू किया गया था। राजनीतिक समय का महत्त्व और किसी आंदोलन के आयोजकों की वास्तविक मंशा दो अलग प्रश्न हैं। दोनों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण आवश्यक हैं। इस मामले में सार्वजनिक विमर्श अक्सर आरोप और प्रत्यारोप के स्तर पर अधिक केंद्रित रहा, जबकि हत्याओं की जाँच, लेखकों की सुरक्षा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूल विषय अपेक्षाकृत पीछे छूटते दिखाई दिए।
यही पुरस्कार-वापसी आंदोलन की एक बड़ी विडंबना थी। लेखक जिन घटनाओं के विरोध में सामने आए थे, उनकी वास्तविक परिस्थितियाँ कई बार आंदोलन की राजनीतिक व्याख्याओं के नीचे दबने लगीं। नरेंद्र दाभोलकर ने अंधविश्वास और अवैज्ञानिक प्रथाओं के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया था। गोविंद पानसरे सामाजिक समानता, वामपंथी राजनीति और इतिहास संबंधी विचारों के लिए जाने जाते थे। एम. एम. कलबुर्गी कन्नड़ भाषा और साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान थे। मोहम्मद अखलाक एक सामान्य नागरिक थे, जिनकी हत्या अफवाह और भीड़ की हिंसा के बीच हुई। इन व्यक्तियों के जीवन, विचार और परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं थीं। लेकिन सभी घटनाएँ भारतीय समाज के सामने यह प्रश्न रखती थीं कि क्या वैचारिक असहमति, धार्मिक पहचान या सामाजिक आरोप किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का आधार बन सकते हैं? पुरस्कार-वापसी आंदोलन का नैतिक औचित्य इसी प्रश्न से जुड़ा था। यदि चर्चा केवल इस बात तक सीमित रह जाए कि कौन लेखक किस पार्टी के निकट है, तो हिंसा के वास्तविक पीड़ित सार्वजनिक विमर्श से गायब हो सकते हैं। उसी प्रकार यदि लेखकों के विरोध को आलोचना से परे मान लिया जाए, तो साहित्यिक प्रतिरोध की लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर पड़ सकती है।
समय के साथ इन घटनाओं से संबंधित कानूनी प्रक्रियाएँ भी आगे बढ़ीं। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में 10 मई 2024 को पुणे की विशेष अदालत ने सचिन अंदुरे और शरद कलस्कर को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। तीन अन्य आरोपियों को पर्याप्त प्रमाण के अभाव में बरी किया गया। इस मामले की जाँच और मुकदमे की लंबी प्रक्रिया ने यह भी स्पष्ट किया कि वैचारिक हिंसा के गंभीर मामलों में न्याय प्राप्त करने में कितना समय लग सकता है। किसी हत्या के विरोध में केवल सार्वजनिक बयान देना पर्याप्त नहीं होता। निष्पक्ष जाँच, विश्वसनीय साक्ष्य, प्रभावी अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दोषियों को दंडित करना भी आवश्यक है। इसी प्रकार पानसरे और कलबुर्गी से जुड़े मामलों में जाँच तथा न्यायिक प्रक्रियाओं की लंबी अवधि भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था की जटिलताओं को सामने लाती रही। इन घटनाओं की गंभीरता किसी राजनीतिक सरकार की आलोचना से आगे जाकर नागरिक सुरक्षा और कानून के शासन के प्रश्न से जुड़ी थी।
पुरस्कार-वापसी आंदोलन की समीक्षा करते समय न्याय और राजनीतिक नैतिकता के इस अंतर को समझना आवश्यक है। किसी हत्या के मामले में संबंधित सरकार की प्रशासनिक जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन आपराधिक दोष तय करने का अधिकार अदालत को है। सार्वजनिक बहस में अक्सर सरकार की नीतिगत आलोचना, राजनीतिक जिम्मेदारी और अपराध के कानूनी आरोप एक-दूसरे में मिला दिए जाते हैं। इससे चर्चा उत्तेजक तो हो सकती है, लेकिन स्पष्ट नहीं रहती। उदाहरण के लिए किसी राज्य में हुई हत्या के बाद यह पूछना उचित है कि पुलिस ने क्या कार्रवाई की, आरोपियों को कब गिरफ्तार किया गया, जाँच निष्पक्ष थी या नहीं और पीड़ित परिवार को सुरक्षा मिली या नहीं। उसी तरह केंद्र सरकार से सामाजिक सद्भाव तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में स्पष्ट राजनीतिक संदेश की अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन किसी विशेष अपराध को सीधे किसी राजनीतिक नेता के आदेश या मंशा का परिणाम बताने के लिए अलग प्रकार के प्रमाण चाहिए। साहित्यकारों और राजनीतिक नेताओं, दोनों के सार्वजनिक वक्तव्यों में इस अंतर का पालन होना चाहिए।
इस आंदोलन के संदर्भ में 'असहिष्णुता' शब्द भी व्यापक राजनीतिक विवाद का विषय बना। असहिष्णुता का अर्थ केवल किसी दूसरे के विचार से असहमति नहीं है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक और आवश्यक है। कोई व्यक्ति किसी पुस्तक की आलोचना कर सकता है, किसी लेखक के विचारों का विरोध कर सकता है और किसी राजनीतिक विचारधारा को अस्वीकार कर सकता है। लेकिन असहमति तब असहिष्णुता का रूप लेने लगती है जब व्यक्ति दूसरे की अभिव्यक्ति रोकने, उसे धमकाने, हिंसा करने अथवा उसके संवैधानिक अधिकारों को सीमित करने का प्रयास करता है। इस दृष्टि से किसी लेखक की हत्या अथवा किसी नागरिक को उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा का शिकार बनाना गंभीर अपराध और सामाजिक असहिष्णुता का संकेत हो सकता है। दूसरी ओर किसी लेखक की राजनीतिक राय की कठोर आलोचना करना अपने आप असहिष्णुता नहीं है। इसी प्रकार पुरस्कार-वापसी का विरोध करना भी लोकतांत्रिक अधिकार है, जब तक वह धमकी, हिंसा या उत्पीड़न का रूप न ले। समस्या तब उत्पन्न होती है जब समाज के अलग-अलग समूह अपने लिए असहमति की स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन दूसरों को वही अधिकार देने को तैयार नहीं होते।
वर्ष 2015 के आंदोलन की एक विशेषता यह भी थी कि उसने साहित्यिक पुरस्कारों को सामाजिक प्रतिरोध के प्रतीक में बदल दिया। भारत में साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने अथवा सम्मान अस्वीकार करने की परंपरा इससे पहले भी रही थी। साहित्यकार सार्वजनिक जीवन में असहमति व्यक्त करने के लिए पत्र, वक्तव्य, पदत्याग, बहिष्कार और विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक प्रतिरोध का उपयोग करते रहे हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर ने अप्रैल 1919 के जलियाँवाला बाग नरसंहार के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई नाइटहुड की उपाधि त्याग दी थी। यह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध एक ऐतिहासिक नैतिक प्रतिरोध था। हालांकि ब्रिटिश शासन की उपाधि लौटाना और स्वतंत्र भारत की स्वायत्त साहित्यिक संस्था का पुरस्कार लौटाना समान परिस्थितियाँ नहीं हैं, फिर भी दोनों में सम्मान को सार्वजनिक असहमति के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने का तत्व मौजूद है। इसलिए पुरस्कार लौटाने की पूरी अवधारणा को केवल वर्ष 2015 की राजनीति का आविष्कार कहना सही नहीं होगा। प्रश्न हर बार यही होगा कि विरोध किस कारण किया गया, किस संस्था को संबोधित था और उसका वास्तविक उद्देश्य क्या था।
यह भी समझना आवश्यक है कि साहित्यकार की नैतिक विश्वसनीयता केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि उसने कोई पुरस्कार लौटाया या नहीं। किसी लेखक ने पुरस्कार लौटाया, इसलिए वह स्वतः अधिक संवेदनशील या साहसी नहीं हो जाता। इसी प्रकार किसी लेखक ने पुरस्कार नहीं लौटाया, इसलिए उसे असहिष्णुता का समर्थक भी नहीं माना जा सकता। विरोध के अनेक रूप हो सकते हैं। कोई लेखक अपनी रचना के माध्यम से प्रतिरोध करता है, कोई सार्वजनिक वक्तव्य देता है, कोई अदालत का दरवाजा खटखटाता है और कोई सामाजिक आंदोलन में भाग लेता है। कुछ लोग पुरस्कार लौटाने के बजाय संबंधित संस्था के भीतर रहकर सुधार का प्रयास करना अधिक उपयोगी मान सकते हैं। इन सभी विकल्पों का मूल्यांकन उनके उद्देश्य और परिणामों के आधार पर होना चाहिए। यदि पुरस्कार-वापसी को ही नैतिकता की एकमात्र कसौटी बना दिया जाए, तो साहित्यकारों की स्वतंत्रता एक नए प्रकार के सामूहिक दबाव में बदल सकती है।
उसी तरह पुरस्कार लौटाने वालों की आलोचना केवल उनके व्यक्तिगत राजनीतिक संबंधों के आधार पर करना भी पर्याप्त नहीं है। कोई लेखक कांग्रेस का समर्थक हो सकता है, कोई भाजपा का, कोई वामपंथी विचारधारा से जुड़ा हो सकता है और कोई किसी राजनीतिक दल से संबंध न रखना चाहता हो। भारतीय संविधान के अंतर्गत उन सभी को राजनीतिक विचार रखने का अधिकार है। लेकिन साहित्यकार जब समाज की ओर से नैतिक हस्तक्षेप करने का दावा करता है, तब उससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने घोषित सिद्धांतों के प्रति ईमानदार रहे। यदि वह किसी सरकार के समय अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध का विरोध करता है, तो दूसरी सरकार के समय उसी प्रकार की घटना होने पर उसका दृष्टिकोण क्यों बदल जाता है? यदि वह धार्मिक हिंसा का विरोध करता है, तो क्या उसका विरोध सभी पीड़ित समुदायों के लिए समान है? यदि वह साहित्यिक संस्थाओं की स्वायत्तता की माँग करता है, तो क्या वह अपने पसंदीदा राजनीतिक नेतृत्व द्वारा उन्हीं संस्थाओं में हस्तक्षेप का भी विरोध करेगा? ये प्रश्न किसी लेखक को चुप कराने के लिए नहीं, बल्कि उसकी नैतिक स्थिति को अधिक स्पष्ट बनाने के लिए उठाए जाने चाहिए।
यहाँ साहित्य अकादमी की स्वायत्तता का प्रश्न फिर सामने आता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक संसाधनों से संचालित सांस्कृतिक संस्थाएँ सरकार की वैचारिक शाखाएँ नहीं होनी चाहिए। सरकार उन्हें वित्तीय सहायता दे सकती है, लेकिन उनके साहित्यिक निर्णय स्वतंत्र विशेषज्ञता के आधार पर होने चाहिए। उसी प्रकार लेखक और कलाकार भी सरकारी अनुदान या पुरस्कार प्राप्त करने के बाद सत्ता की प्रशंसा करने के लिए बाध्य नहीं होते। सार्वजनिक धन किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। वह नागरिकों के करों और राष्ट्रीय संसाधनों से आता है। इसलिए सरकारी सहायता प्राप्त किसी संस्था से सम्मान प्राप्त करना सरकार के प्रति राजनीतिक निष्ठा की शर्त नहीं बन सकता। यह सिद्धांत पुरस्कार-वापसी आंदोलन के समर्थकों और विरोधियों दोनों पर समान रूप से लागू होता है। जो लोग पुरस्कार लौटाने वालों को सरकारी सम्मान का अपमान करने वाला मानते थे, उन्हें भी यह स्वीकार करना चाहिए कि साहित्यिक सम्मान सरकार के प्रति आजीवन सहमति का अनुबंध नहीं है। और जो लेखक पुरस्कार लौटा रहे थे, उन्हें भी समझना चाहिए कि स्वायत्त संस्था का सम्मान लौटाने से उस संस्था के साहित्यिक कार्य और उसके निर्णायकों की स्वतंत्र भूमिका के बारे में अलग प्रश्न पैदा हो सकते हैं।
वर्ष 2015 के बाद भी भारत में लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की भूमिका को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पुस्तकों और फिल्मों पर आपत्तियाँ, इंटरनेट पर विचारों का नियंत्रण, धार्मिक तथा राजनीतिक भावनाओं के आधार पर कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक विरोध के अधिकार जैसे प्रश्न बार-बार सामने आते रहे। दूसरी ओर सामाजिक माध्यमों के विस्तार ने बौद्धिक विवादों को नई तीव्रता प्रदान की। अब किसी लेखक का एक वाक्य कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। प्रशंसा और आलोचना के साथ व्यक्तिगत हमले, धमकियाँ और संगठित ऑनलाइन अभियानों की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। ऐसे वातावरण में साहित्यकार की स्वतंत्रता का प्रश्न और अधिक जटिल हो गया है। केवल सरकार और लेखक के बीच संबंध ही महत्त्वपूर्ण नहीं रह गए हैं। सामाजिक संगठन, डिजिटल मंच, आर्थिक दबाव, प्रकाशक और विभिन्न वैचारिक समूह भी अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए साहित्यिक स्वतंत्रता की रक्षा किसी एक राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करने से कहीं व्यापक लोकतांत्रिक दायित्व है।
अक्टूबर 2026 में पीछे मुड़कर वर्ष 2015 के पुरस्कार-वापसी आंदोलन को देखें तो उसकी कुछ उपलब्धियाँ और कुछ सीमाएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। इसने लेखकों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सद्भाव पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा उत्पन्न की। साहित्य अकादमी को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और हिंसा की निंदा करने वाला औपचारिक प्रस्ताव पारित करने के लिए एक विशेष बैठक करनी पड़ी। संसद में भी पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों के बारे में जानकारी माँगी गई। दूसरी ओर आंदोलन की राजनीतिक व्याख्या इतनी तीखी हो गई कि उसके मूल नैतिक प्रश्न कई बार आरोप-प्रत्यारोप के नीचे दब गए। कुछ लेखकों की राजनीतिक निकटता और पूर्व वक्तव्यों को लेकर विवाद हुए। विरोध के तरीकों पर प्रश्न उठे। साहित्यिक संस्थाओं की स्वायत्तता और पुरस्कार-वापसी की औपचारिक प्रक्रिया को लेकर भी भ्रम सामने आया। इन घटनाओं ने यह दिखाया कि साहित्यकार का सार्वजनिक विरोध प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता के लिए स्पष्ट तर्क, तथ्यात्मक सावधानी और नैतिक निरंतरता भी आवश्यक है।
इस आंदोलन की आलोचना का सबसे ठोस आधार यही होना चाहिए कि नैतिक प्रतिरोध की कसौटी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलनी नहीं चाहिए। यदि दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और अखलाक की हत्या के विरोध में आवाज उठाना उचित था, तो अन्य कालखंडों में हुई वैचारिक, धार्मिक और सामुदायिक हिंसा के विरोध में भी उतनी ही स्पष्ट नैतिक दृष्टि आवश्यक है। लेकिन इसके साथ यह भी समझना चाहिए कि अतीत में किसी अन्याय पर पर्याप्त विरोध न होने का अर्थ यह नहीं कि भविष्य में भी कोई विरोध नहीं होना चाहिए। नैतिकता की माँग यह नहीं हो सकती कि पहले हुई चुप्पियों के कारण आगे भी चुप्पी बनी रहे। अधिक उचित अपेक्षा यह होगी कि साहित्यकार अपने अतीत की सीमाओं को स्वीकार करें और भविष्य में अधिक सुसंगत तथा व्यापक दृष्टिकोण अपनाएँ। यही बात राजनीतिक दलों और सरकारों पर भी लागू होती है। जो दल विपक्ष में रहकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की बात करता है, उसे सत्ता में आने पर भी उसी सिद्धांत का सम्मान करना चाहिए।
पुरस्कार-वापसी के आलोचकों के सामने भी एक नैतिक प्रश्न है। यदि किसी लेखक के विरोध को केवल इसलिए राजनीतिक षड्यंत्र बताया जाए कि वह सरकार के विरुद्ध बोल रहा है, तो यह भी लोकतांत्रिक असहमति के प्रति असहिष्णु दृष्टिकोण का संकेत हो सकता है। सरकारों की आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है। आलोचना में अतिशयोक्ति, पक्षपात या तथ्यात्मक त्रुटियाँ हो सकती हैं। उनका उत्तर प्रमाण और तर्क से दिया जाना चाहिए। किसी लेखक के वैचारिक संबंधों का उल्लेख करना उपयोगी संदर्भ हो सकता है, लेकिन वह उसके तर्कों का स्वतः खंडन नहीं है। इसी प्रकार साहित्यकार को भी अपनी प्रतिष्ठा के कारण यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि उसके सार्वजनिक राजनीतिक वक्तव्यों पर कोई प्रश्न न उठाए। लोकतंत्र में न सरकार आलोचना से ऊपर है और न लेखक। कोई पुरस्कार किसी व्यक्ति को सार्वजनिक जवाबदेही से मुक्त नहीं कर सकता।
मुंशी प्रेमचंद की विरासत इस पूरे विवाद को समझने की अधिक व्यापक दृष्टि प्रदान करती है। उन्होंने किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, गरीबों और समाज के उपेक्षित वर्गों के जीवन को साहित्य के केंद्र में रखा। उनकी रचनाएँ सत्ता, धन, जाति, पाखंड और सामाजिक अन्याय के विभिन्न रूपों पर प्रश्न उठाती हैं। लेकिन उनका साहित्य किसी एक राजनीतिक दल के प्रचार तक सीमित नहीं है। उसमें मनुष्य की कमजोरियाँ भी हैं, समाज की जटिलताएँ भी और परिवर्तन की आकांक्षा भी। प्रेमचंद का साहित्य इसलिए स्थायी महत्त्व रखता है कि वह राजनीतिक नारों से आगे जाकर जीवन के सत्य को पकड़ने का प्रयास करता है। यदि साहित्यकार स्वयं को प्रेमचंद की परंपरा का उत्तराधिकारी मानते हैं, तो उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे अपने समय की सत्ता से प्रश्न करें। लेकिन उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि सत्ता केवल सरकार में नहीं होती। सत्ता राजनीतिक दलों में होती है, सामाजिक पदानुक्रम में होती है, आर्थिक संस्थाओं में होती है और कभी-कभी साहित्यिक प्रतिष्ठानों तथा वैचारिक समूहों में भी होती है। साहित्य का काम इन सभी शक्तियों के सामने स्वतंत्र विवेक बनाए रखना है।
पुरस्कार की राजनीति और राजनीति के पुरस्कारों का विवाद इसलिए समाप्त नहीं होता कि किसी सरकार ने अपनी आलोचना को खारिज कर दिया या किसी लेखक ने सम्मान लौटाकर विरोध दर्ज करा दिया। वास्तविक प्रश्न पुरस्कारों की नैतिक प्रतिष्ठा का है। यदि किसी सम्मान का मूल्य केवल उससे मिलने वाली राशि, स्मृति-चिह्न या सार्वजनिक प्रसिद्धि में है, तो उसे लौटाना भी सीमित अर्थ रखेगा। लेकिन यदि सम्मान किसी लेखक के स्वतंत्र साहित्यिक योगदान की सामाजिक मान्यता है, तो उसकी प्रतिष्ठा को राजनीति की तत्कालीन प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखने की आवश्यकता होगी। उसी तरह यदि कोई लेखक किसी गंभीर नैतिक कारण से पुरस्कार लौटाता है, तो उसके विरोध की गंभीरता को केवल राजनीतिक असहमति के आधार पर नकारा नहीं जाना चाहिए। प्रत्येक मामले में लेखक के तर्क, उसके आचरण और विरोध की परिस्थितियों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए।
वर्ष 2015 के पुरस्कार-वापसी आंदोलन ने भारतीय समाज के सामने एक असुविधाजनक लेकिन आवश्यक प्रश्न रखा था। क्या साहित्यकार को अपने समय की राजनीतिक घटनाओं पर मौन रहना चाहिए, ताकि उसकी साहित्यिक स्वतंत्रता पर कोई सवाल न उठे? या उसे बोलना चाहिए, भले ही उसके वक्तव्य राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन जाएँ? इसका उत्तर मौन के पक्ष में नहीं हो सकता। साहित्यकार को बोलने का अधिकार है और गंभीर अन्याय के समय उसके बोलने का महत्त्व भी है। लेकिन यह अधिकार जितना मूल्यवान है, उसके साथ उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी जुड़ी है। उसे तथ्यों के प्रति ईमानदार रहना चाहिए, अपने राजनीतिक झुकाव को छिपाकर निष्पक्षता का भ्रम पैदा नहीं करना चाहिए और जिन नैतिक सिद्धांतों की माँग वह दूसरों से करता है, उन्हें स्वयं पर भी लागू करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यही स्वतंत्र साहित्यिक विवेक की कसौटी है।
पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों से पूछा जाना चाहिए कि क्या उनके विरोध के मानदंड सभी सरकारों और सभी प्रकार की हिंसा पर समान रूप से लागू होते हैं? लेकिन पुरस्कार-वापसी की आलोचना करने वाले राजनीतिक नेतृत्व से भी पूछा जाना चाहिए कि क्या वह अपने विरोधियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वैसा ही सम्मान करता है जैसा अपने समर्थकों की स्वतंत्रता का? यदि कोई साहित्यकार अपने विरोध में चयनात्मक है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। यदि कोई सरकार अपने आलोचकों के प्रति असहिष्णु है, तो उसकी भी आलोचना होनी चाहिए। और यदि कोई साहित्यिक संस्था अपनी स्वायत्तता की रक्षा में कमजोर पड़ती है, तो उस पर भी प्रश्न उठाए जाने चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती किसी एक पक्ष की नैतिक विजय में नहीं, बल्कि सभी पक्षों पर समान सिद्धांत लागू होने में है।
आखिर पुरस्कार लौटाकर साहित्यकार क्या लौटाता है? सम्मान-चिह्न, प्रमाणपत्र और पुरस्कार राशि वह लौटा सकता है। लेकिन अपनी रचना, उसके पाठकों पर पड़े प्रभाव और उससे अर्जित साहित्यिक प्रतिष्ठा को वह वापस नहीं कर सकता। उसी प्रकार कोई सरकार किसी लेखक को सम्मान दे सकती है, लेकिन उसकी रचनात्मक स्वतंत्रता को अपना राजनीतिक अधिकार नहीं बना सकती। साहित्य और सत्ता के संबंध की वास्तविक मर्यादा इसी अंतर में निहित है। पुरस्कार राज्य अथवा संस्था द्वारा साहित्यिक योगदान की स्वीकृति है, साहित्यकार के विवेक पर स्वामित्व का प्रमाणपत्र नहीं। लेकिन साहित्यकार भी अपने सम्मान को ऐसी नैतिक ढाल नहीं बना सकता जिसके पीछे उसके हर राजनीतिक आचरण को आलोचना से सुरक्षा मिल जाए।
प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने वाली सच्चाई के रूप में देखा था। मशाल का अर्थ है प्रकाश, और प्रकाश का स्वभाव है कि वह अपने तथा पराए के बीच भेद नहीं करता। यदि साहित्य की मशाल केवल विरोधी राजनीतिक दल की कमजोरियाँ उजागर करे और अपने पसंदीदा दल के अंधेरों पर मौन रहे, तो वह साहित्यिक विवेक के बजाय राजनीतिक पक्षधरता का उपकरण बनने लगेगी। लेकिन यदि सत्ता उस मशाल को इसलिए बुझाना चाहे कि उसका प्रकाश असुविधाजनक है, तो वह भी लोकतंत्र की आत्मा पर आघात होगा। वर्ष 2015 की पुरस्कार-वापसी की राजनीति का वास्तविक सबक यही है कि साहित्यकार को सत्ता से स्वतंत्र रहना चाहिए और सत्ता को साहित्यकार की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। सम्मान लौटाने अथवा सम्मान बनाए रखने से अधिक महत्त्वपूर्ण है अपने नैतिक विवेक को सुरक्षित रखना। क्योंकि पुरस्कार लौटाने से प्रतिष्ठा का इतिहास नहीं मिटता और पुरस्कार प्राप्त करने से स्वतंत्र चिंतन का दायित्व समाप्त नहीं होता। साहित्य की सच्ची प्रतिष्ठा उस दिन स्थापित होगी जब उसका विरोध किसी सरकार या दल की सुविधा से नहीं, बल्कि न्याय, सत्य, स्वतंत्रता और मनुष्यता के प्रति उसकी स्थायी प्रतिबद्धता से निर्धारित होगा। तभी साहित्य राजनीति के पीछे चलने के बजाय उसके आगे मशाल लेकर चलने का नैतिक अधिकार अर्जित कर सकेगा।


