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Indian Railway Crisis: संघर्ष एक अदद बर्थ का
Indian Railway Crisis: भारतीय रेलवे कई अग्नि परीक्षा लेती है। सब्र की। सहन की। किस्मत की। शुरुआत, वैसे किस्मत से होती है। ट्रेन में सीट और वो भी रिज़र्व सीट पाना किस्मत की परीक्षा है।
Indian Railway Reservation Crisis
Indian Railway Reservation Crisis: यूं तो हमारी जिंदगी में रोजमर्रा के संघर्ष अनंत हैं। चैन की जिंदगी हमें नसीब कहाँ? यहां 'हम' से मतलब हम जैसे आम, साधारण नागरिक जो गैस सिलेंडर, पेट्रोल, बैंक, पोस्ट ऑफिस, बिजलीघर, पानी, नगर निगम, रेलवे, जनता दरबार, अस्पताल ... हर जगह लाइन में खड़े नजर आते हैं। यानी क्यू वाली जमात। बाकी जो हमारे जैसे नहीं हैं, वो लाइनों से परे हैं। वो लाइन लगवाते हैं, उनमें खड़े नहीं होते।
संघर्ष एक अदद जिंस पाने की है। चाहे वो बिजली हो या उसका बिल। स्पीड पोस्ट करने की हो या हाउस टैक्स जमा करने की। जद्दोजहद हर दिन की है, हर चीज की है। सभी जद्दोजहदों की बात बढ़ाने लगे तो बात बहुत लंबी निकल जायेगी सो बात करते हैं फिलहाल ट्रेनों की। ट्रेन इसलिए कि हम जैसे आज भी ट्रेनों पर आश्रित हैं।हवाई यात्रा और कार का तेल खर्चा हमारे लिए बे-औकाती है। सो, सौ दुत्कार सहने के बाद भी बिना चाहे भारतीय रेल की शरण में जाना पड़ता है।
भारतीय रेलवे कई अग्नि परीक्षा लेती है। सब्र की। सहन की। किस्मत की। शुरुआत, वैसे किस्मत से होती है। ट्रेन में सीट और वो भी रिज़र्व सीट पाना किस्मत की परीक्षा है। कहने को बुकिंग सब ऑनलाइन है। पारदर्शी है। लेकिन असलियत में ऐसा कुछ है नहीं। अव्वल तो जिस ट्रेन से आप जाना चाहते हैं, उसमें रिजर्वेशन मिलना ही लॉटरी लगने जैसा हो जाता है। लगता है कि समूची आबादी उसी ट्रेन के पीछे पड़ी है, सब एक ही गन्तव्य पर जा रहे हैं। दूसरी दूसरी ट्रेनों में ढूँढिये तो हर जगह वही आलम नज़र आता है।
जद्दोजहद की यह पहली सीढ़ी है।अब रेलवे का कहना है कि वो तो रोजाना औसतन 13,198 पैसेंजर ट्रेनें चलाती है। ये ट्रेनें हर दिन लगभग 2.3 करोड़ यात्रियों को ढोती हैं। यानी हर ट्रेन में 1,828 यात्री! जगह मिले तो कैसे? तभी तो हमारे जैसे 3 करोड़ 39 लाख लोग बीते एक साल में कन्फर्म या वेटलिस्टेड टिकट तक नहीं पा सके हैं। ये आंकड़ा भी रेल मंत्रालय का ही है।कोई करे भी क्या करे? बिना रिज़र्वेशन ही किसी भी डिब्बे में घुस जाए और टीटी वाला जुगाड़ ढूंढे। हरे नोट का पत्ता पकड़ाए और यात्रा करे? या फिर दलालों से तत्काल रिज़र्वेशन करवाये? अपने आप तो वो भी नहीं मिलता।
रेलवे का क्या? उसकी तो मौज है। वेटिंग टिकट हो या आरएसी, पैसा पूरा ले लेना है, वो भी एडवांस में। ये भी गजब बेइज्जती है। टिकट का पैसा दो, बर्थ भी न मिले और घूस देकर जगह पाओ।यह असलियत है। हर दिन, हर ट्रेन की। त्योहारी और समर स्पेशल चलने के बावजूद की।
जो 3 करोड़ 39 लाख लोग साल 2025-26 में रिजर्वेशन न पा सके, वैसे लोगों की तादाद पांच साल पहले 1 करोड़ 65 लाख थी। साफ है कि रेलवे की तमाम महान उपलब्धियों के बावजूद मर्ज ठीक होना तो दूर, बढ़ता गया है, क्रोनिक हो गया है। इसी मर्ज का नतीजा है ट्रेनों के स्लीपर और एसी डिब्बों में मचा भेड़िया धसान। जिसकी फोटो-वीडियो अब न्यू नॉर्मल लगती हैं। जिज्ञासा अब सिर्फ एक है कि तथाकथित प्रीमियम वंदे भारत ट्रेनें इस भेड़िया धसान से कब तक अपनी अस्मत बचा पाएंगी। बीते तक़रीबन पंद्रह सालों से रिजर्वेशन के कंफर्म न हो पाने के डर से रेल की यात्रा मैंने छोड़ दी थी। बीते दिनों कुछ ख़ास दोस्तों के दबाव में शुरु की। पहले तेजस में फिर वंदे भारत में पर बहुत निराशा हाथ लगी। कहावत याद आने लगी- नाम बड़े, दर्शन थोड़े।तेजस का एक्जीक्यूटिव क्लास तो बस पुरानी प्राइवेट बस की सीट समझें।स्वादहीन नाश्ता व भोजन। पर गलती मेरी है स्वाद तलाशना भी क्यों चाहिए।फिर वंदे भारत से दिल्ली की छह घंटे से अधिक लंबी व थकान भरी यात्रा। टाइम इतना कि लढिया की यात्रा की याद सताने लगी। पर दिल्ली से झाँसी के बीच चल रही गतिमान ने भरोसा दिला दिया कि रेलवे नई पीढ़ी में आ गई है।
पर समस्या तो जगह की है। क्या करें लोग अब भयमुक्त हैं। उन्हें रिज़र्व्ड कोच में कब्जा करने में कोई डर नहीं। जानते हैं कि भीड़ तंत्र में कोई कुछ कर नहीं सकता।भारतीय रेलवे की हालत यह है कि जितनी सवारियां वो ढोती है, उसकी करीब दोगुनी सवारियां यात्रा नहीं कर पातीं। इलाज मिल नहीं रहा। जो कुछ किया जा रहा है वो सब कॉस्मेटिक है। देश को विकसित करने का एक कॉस्मेटिक तरीका ढूंढा गया कि एसी डिब्बे बढ़ा दो। लोग आराम से यात्रा करें। सो, 2018 में नॉन एसी की बजाए फोकस हो गया एसी डिब्बी बनाने पर। नॉन एसी माने जनरल और स्लीपर। आम सवारियों की सवारी। जो नॉन एसी डिब्बी चल रहे थे, उनको भी कहीं यार्ड में पटक दिया गया। कुछ सालों बाद जब सोशल मीडिया पर है तौबा मची, आंकड़े सामने आए तो सरकार ने अपना फैसला बदल दिया और फिर फोकस हो गया ज्यादा नॉन एसी डिब्बे बनाने पर।
डिब्बे तो नए बन रहे हैं। अपने रेल मंत्री के आंकड़ों में ही बताया जाता है कि ट्रेनों में 70 फीसदी नॉन एसी डिब्बे लग रहे हैं, जो कुल सवारियों का 65 फीसदी हिस्सा ढोते हैं।
आंकड़े हमेशा सुंदर होते हैं। खरे खरे नम्बर। लेकिन खेल भी नम्बर ही करते हैं। आंकड़े ये नहीं बताते कि जब नॉन एसी डिब्बों की भरमार है, तब एसी डिब्बे जनरल क्यों बनते जा रहे हैं? क्यों 4 करोड़ के करीब लोग एक अदद बर्थ से महरूम रह गए हैं। और क्या प्लानिंग है सबको ऑन डिमांड जगह मुहैया कराने की?
साइबर क्राइम कंट्रोल की बातें बड़ी बड़ी हैं। लेकिन आईआरटीसी की टिकट बुकिंग वेबसाइट आज तक दलाल मुक्त न हो सकी। कितने ही अपडेट्स किये गए। दलाल पकड़े गये। टाइमिंग बदलीं गईं। लेकिन नतीजा? नई ट्रेनों की बात भी क्या ही करें। हम कोरोना के पहले वाली पोजीशन तक में न लौट सके। जो ट्रेनें रद्द हुईं, उनमें कितनी ही आज तक पटरी पर नहीं लौटीं। क्यों नहीं लौटीं, काश इस रहस्य से पर्दा उठता।
अखबारों में स्पेशल ट्रेनों की लिस्टें देखिये। मानों मौसमी और त्योहारी ट्रेनों की सौगातें बरसा दी गईं हों। स्पेशल ट्रेनों के स्पेशल मोटे किराए। मगर जिम्मेदारी सिफर। ट्रेन चलेगी मगर कब पहुंचेगी, सब भगवान जाने या रेल महकमा। कभी कभी तो लगता है, दोनों ही नहीं जानते।
विकसित होना किसे नहीं सुहाता? कौन नहीं चाहता कि जिंदगी की ढेरों जद्दोजहदों में से कुछ तो कम हों? हम तो पूरा पैसा देकर आरएसी की आधी सीट पर चौबीसों घण्टों का सफर कर लेते हैं, मगर चूं नहीं करते। हम एसी टिकट लेकर जनरल कोच के हालातों में सफर कर लेते हैं। शायद यही हमारी गलती है। लेकिन करें भी क्या, हमें तो खगड़िया से मुंबई जाना ही है। लात खा कर भी जाएंगे, डंडे खा कर भी जाएंगे। घूस देकर भी जाएंगे। पैंट्री कार वालों की लूट सहते हुए जाएंगे। किन्नरों की वसूली झेलते हुए जाएंगे। टॉयलट में बैठ कर भी जाएंगे।
कहते हैं कि सब उम्मीद पर चल रहा है। लेकिन असलियत कहीं ये तो नहीं कि सब कुछ नाउम्मीदी की हताशा पर चल रहा है?
(लेखक पत्रकार हैं ।)


