धर्म, पहचान और चुनाव: क्या मुद्दे बदल रहे हैं या सिर्फ भाषा?

Religion Politics India: क्या चुनावी राजनीति में मुद्दे बदल रहे हैं या सिर्फ उनकी भाषा? यह लेख धर्म, पहचान और विकास की बदलती राजनीति और उसकी रणनीति की गहरी पड़ताल करता है।

Yogesh Mishra
Published on: 28 April 2026 9:07 PM IST
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Religion Politics India: भारतीय राजनीति में धर्म और पहचान कोई नए तत्व नहीं हैं। ये हमेशा से मौजूद रहे हैं। कभी सीधे रूप में। कभी संकेतों में। कभी नारों में। कभी नीतियों में। लेकिन आज जो बदलाव दिख रहा है, वह सतह पर नहीं है। वह गहराई में है। सवाल यह नहीं है कि पहचान की राजनीति खत्म हो रही है या नहीं। सवाल यह है कि वह किस रूप में सामने आ रही है। क्या वह कम हो रही है, या और अधिक परिष्कृत—और अधिक refined—हो गई है?

पहले पहचान की राजनीति खुलकर होती थी। भाषणों में स्पष्ट संकेत होते थे। बयान सीधे होते थे। समर्थन और विरोध साफ दिखाई देता था। लेकिन अब भाषा बदल गई है। शब्द बदल गए हैं। प्रस्तुति बदल गई है। आज वही बातें परतों में कही जाती हैं। संकेतों में कही जाती हैं। विकास, सुरक्षा, संस्कृति जैसे व्यापक शब्दों के भीतर पहचान की राजनीति छिपी रहती है। यानी मुद्दा वही है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति बदल गई है।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है मतदाता की बदलती अपेक्षा। आज का मतदाता सिर्फ एक पहचान के आधार पर निर्णय नहीं लेता। वह विकास भी चाहता है। अवसर भी चाहता है। सुरक्षा भी चाहता है। इसलिए राजनीतिक दल भी अपनी भाषा में बदलाव कर रहे हैं। वे सीधे पहचान की बात करने के बजाय उसे व्यापक एजेंडा के भीतर समाहित करते हैं।


दूसरा कारण है कानूनी और संस्थागत ढांचा। चुनाव आयोग के नियम हैं। आचार संहिता है। सीधे तौर पर धर्म या जाति के आधार पर अपील करना प्रतिबंधित है। ऐसे में राजनीतिक दलों को अपनी बात कहने के लिए नए तरीके खोजने पड़ते हैं। यही कारण है कि भाषा अधिक प्रतीकात्मक और परोक्ष होती जा रही है।

तीसरा कारण है मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार। आज हर बयान रिकॉर्ड होता है। हर शब्द का विश्लेषण होता है। सोशल मीडिया पर तुरंत प्रतिक्रिया आती है। ऐसे में खुलकर बयान देने का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए भाषा को सावधानी से चुना जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मुद्दा गायब हो गया है। वह सिर्फ रूप बदल चुका है।

आज पहचान की राजनीति कई परतों में चलती है। पहली परत है सांस्कृतिक पहचान की। त्योहारों, परंपराओं, प्रतीकों के माध्यम से एक भावनात्मक जुड़ाव बनाया जाता है। दूसरी परत है सामाजिक पहचान की। इसमें जाति, समुदाय, वर्ग के आधार पर समीकरण बनाए जाते हैं। तीसरी परत है विकास की। इसमें यह दिखाया जाता है कि किस वर्ग को क्या मिला, किसे क्या मिलना चाहिए। इन तीनों परतों का मिश्रण आज की राजनीति को आकार देता है।

यह भी ध्यान देने की बात है कि पहचान की राजनीति सिर्फ एक दिशा में नहीं चलती। हर राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से इसका उपयोग करता है। कोई इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत करता है। कोई सामाजिक न्याय के रूप में। कोई क्षेत्रीय अस्मिता के रूप में। यानी भाषा अलग है, लेकिन मूल तत्व समान है—पहचान।


इस पूरे परिदृश्य में मतदाता की भूमिका भी बदल रही है। वह अब सिर्फ एक पहचान से बंधा नहीं है। वह बहुस्तरीय है। वह एक ही समय में कई पहचान रखता है—धार्मिक, जातीय, पेशेवर, क्षेत्रीय। और वह इन सबके बीच संतुलन बनाकर निर्णय लेता है। यही कारण है कि राजनीति भी बहुस्तरीय हो गई है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बदलाव सकारात्मक है? क्या refined भाषा से राजनीति बेहतर हो रही है? या यह सिर्फ एक परदा है, जिसके पीछे वही पुरानी रणनीति चल रही है? इसका जवाब सरल नहीं है। एक तरफ यह कहा जा सकता है कि खुली टकराव वाली भाषा कम हुई है, जो समाज के लिए अच्छा है। दूसरी तरफ यह भी सच है कि जब बातें परतों में होती हैं, तो उन्हें समझना कठिन हो जाता है। और पारदर्शिता कम हो जाती है।

इसका एक असर यह भी है कि राजनीतिक बहस जटिल हो गई है। पहले मुद्दे स्पष्ट होते थे। अब संकेतों को समझना पड़ता है। बयान के पीछे का अर्थ निकालना पड़ता है। यह प्रक्रिया आम मतदाता के लिए आसान नहीं है। और जब समझ कठिन होती है, तो भ्रम की संभावना बढ़ती है।

यह भी देखना जरूरी है कि क्या विकास वास्तव में पहचान की राजनीति को पीछे छोड़ रहा है, या वह सिर्फ उसका नया चेहरा बन गया है। कई बार विकास की भाषा में भी पहचान की राजनीति छिपी होती है। यह बताया जाता है कि किस वर्ग को क्या मिला। किस क्षेत्र को कितना लाभ हुआ। यानी विकास भी एक तरह से पहचान के साथ जुड़ जाता है।


आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और मजबूत हो सकती है। क्योंकि समाज जटिल हो रहा है। अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। और राजनीति को हर वर्ग तक पहुंचना है। ऐसे में सीधे संदेश के बजाय लक्षित और परतदार संदेश ज्यादा प्रभावी होते हैं। यही कारण है कि राजनीतिक संचार भी बदल रहा है।

अंत में सवाल वही है। क्या मुद्दे बदल रहे हैं या सिर्फ भाषा? संकेत यही बताते हैं कि मुद्दे पूरी तरह नहीं बदले हैं। वे रूप बदल रहे हैं। प्रस्तुति बदल रही है। और शायद रणनीति भी अधिक सूक्ष्म हो गई है।

लोकतंत्र के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए कि पारदर्शिता कम हो सकती है। अवसर इसलिए कि टकराव कम हो सकता है। लेकिन अंतिम निर्णय मतदाता के हाथ में है। अगर वह सतह के पार देखेगा, परतों को समझेगा, तो राजनीति भी अधिक जवाबदेह होगी।

क्योंकि अंततः लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है। यह समझ का भी खेल है। और जितनी गहरी समझ होगी, उतनी ही स्पष्ट राजनीति होगी।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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