Robin Reames Book: आज के भाषणबाज यूनानी भाषणशास्त्रियों से कुछ सीख सकते हैं?

Robin Reames Book: क्या आज के भाषणबाज प्राचीन यूनानी और रोमन भाषणशास्त्रियों से कुछ सीख सकते हैं? जानिए रॉबिन रीम्स की किताब ‘द एंशिएंट आर्ट ऑफ थिंकिंग फॉर योरसेल्फ’ संवाद, तर्क और ध्रुवीकृत राजनीति पर क्या कहती है।

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Published on: 15 Jun 2026 8:05 PM IST
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Robin Reames Book: शिकागो के इलिनॉय विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की प्रोफेसर रॉबिन रीम्स की जब भी अपने पिता से राजनीतिक बहस होती, तो वे निराश हो जाती थीं, क्योंकि उन्होंने कॉलेज में उदारवादी विचार अपनाए थे। वह अब भी कई लोगों की तरह वामपंथी और दक्षिणपंथी आदशों की विशाल, अंधी खाई से निराश हैं और इसलिए उनकी पुस्तक 'द एशिएंट आर्ट ऑफ थिंकिंग फॉर योरसेल्फ' मौजूदा दौर में संवाद करने में मदद करना चाहती है।

रीम्स मानती हैं कि हमारी राय अकाट्य सत्य से उत्पन्न होने के बजाय हमारे पहले के विश्वासों से निर्धारित होती है। उन्हें उम्मीद है कि हम प्राचीन यूनानियों और रोमनों की परिष्कृत अलंकारिक तकनीकों से सीख सकते हैं, जिनके राजनीतिक विमर्श में तर्क-वितर्क की कला को उस हद तक उन्नत किया गया, जो आज लगभग अकल्पनीय है। यूनानियों और रोमनों को उम्मीद थी कि राजनीतिक भाषण तर्क के आधार पर तैयार किए जाएंगे। रीम्स लिखती हैं, 'अगर प्राचीन भाषणशास्त्री इन दिनों हमारे कुछ सार्वजनिक विवादों को सुनते, तो उन्हें लगता कि हमने अपना दिमाग खो दिया है।' उन्होंने लिखा कि उस वक्त एक वक्ता से साधारण भाषण के जरिये सदन को एकजुट करने की अपेक्षा नहीं की जाती थी, बल्कि उम्मीद की जाती थी कि वह हर बार सभा को संबोधित करते समय एक नया, अपना स्थायी तर्क गढ़े। जबकि आज के युग में ऐसे लोग प्रशंसा के पात्र हैं, जो नारेबाजी के बजाय . विचारों पर गंभीरता से बहस करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। फिर भी रीम्स यह दिखाने में सफल नहीं हुई कि यूनान की प्राचीन तकनीकें आज कितनी मददगार होंगी।

अब जो चीज अक्सर हमारे तकों को नष्ट कर देती है, वह यह है कि हम चिंताओं को साझा नहीं करते हैं, बल्कि हम उन्हें अलग-अलग तरीके से देखते हैं। रोम्स फ्रांस की इस बहस का हवाला देती हैं कि क्या मुस्लिम महिलाओं को स्कूलों में हिजाब पहनने की अनुमति दी जानी चाहिए। इस मामले में किसी की राय इस बात पर निर्भर करती है कि कोई धर्मनिरपेक्षता को धार्मिक प्रतिबद्धता से ऊपर या नीचे रखता है या नहीं।

किताब के अनुसार, समस्या यह नहीं है कि हम अपनी धारणाओं से 'चिपके' रहते हैं, बल्कि यह है कि हम उन्हें प्राकृतिक नियम मान लेते हैं। आज के वामपंथी श्वेतवाद और सामाजिक वर्चस्व से लड़ने को मानवीयता के लिए जरूरी मानते हैं। भले ही वे जानते हों कि अन्य लोग इस लड़ाई को उतना ऊंचा दर्जा नहीं देते, जितना वे देते हैं। रीम्स बताती हैं कि यूनानियों ने परस्पर विरोधी विचारों को सह-अस्तित्व की अनुमति दी थी।

रीम्स की यह पुस्तक शानदार है और अच्छे इरादे से लिखी गई है, लेकिन ध्रुवीकृत विमर्श के दौर में व्यह अपनी उपयुक्तता साबित कर पाएगी, यह देखने वाली बात होगी।

( साभार ‘अमर उजाला’ एवं लेखक की किताब ‘ द एशिएंट आर्ट ऑफ थिंकिंग फ़ॉर योरसेल्फ’।)

-रॉबिन रीम्स

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