राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका

युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है। आज़ादी के आंदोलन से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक युवाओं की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। जानें कैसे युवा राष्ट्र निर्माण, सामाजिक परिवर्तन और नए भारत की नींव रखते हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Sept 2025 5:27 PM IST
Role of Youth in Nation Building
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Role of Youth in Nation Building

देश के नेता रहे राजीव गांधी ने जब 21वीं सदी के भारत का सपना देखा था, तब शायद उन्हें उम्मीद भी नहीं रही होगी कि इस सदी की शुरुआत 60 फ़ीसदी युवा आबादी से होगी। ऐसे में युवाओं की राष्ट्र-निर्माण में भूमिका को लेकर चिन्तन, विचार, चर्चा और विमर्श मोज़ूं है। आयोजकों को साधुवाद—क्योंकि यह जुमला आम है, “उस ओर ज़माना चलता है, जिस ओर जवानी चलती है।”

‘राष्ट्र-निर्माण में युवाओं की भूमिका’ पर चर्चा लखनऊ की पृष्ठभूमि में सर्वाधिक माकूल है, क्योंकि लखनऊ के युवा और लखनऊ विश्वविद्यालय के तरुण छात्र पिछले आठ-दस दशकों—यानी वर्ष 1922 से—भारत के हरावल दस्ते में रहे हैं। यहीं सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी आज़ाद हिन्द फ़ौज की ‘यूथ ब्रिगेड’ बनाई थी, जिसका ज़िम्मा मरहूम पत्रकार और वर्ष 1942 में लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र-संघ के अध्यक्ष रहे सैयद मोहम्मद जाफ़र को सौंपा था। राम, कृष्ण और गांधी की तरह ही सारी दुनिया में सिकन्दर, ऑगस्टस, फ़्रेडरिक महान से लेकर बर्ट्रैंड रसेल, रस्किन, थोरो, चर्चिल और मार्टिन लूथर किंग जैसे महापुरुषों ने युवावस्था से वरदान प्राप्त करके ही समय को शिला पर ऐसे हस्ताक्षर दर्ज किए, जिनके चलते महानता ने उनका वरण किया।

किसी महान कार्य को करने के लिए या किसी राष्ट्र की उन्नति में युवाओं की भूमिका सबसे अहम होती है। इतिहास को पलटें और वर्तमान पर नज़र गड़ाएँ तो यह तथ्य हाथ लगता है कि जिन भी लोगों ने युगांतरकारी परिवर्तन किए, वे युवा ही थे। ईसा मसीह, महावीर, बुद्ध और सिकन्दर ही नहीं, भारत जिस सूचना-प्रौद्योगिकी के बलबूते पर ‘सुपर-पावर’ बनने की दहलीज़ पर खड़ा है, उसकी कमान भी—देश में ही नहीं, बाहर भी—युवाओं के हाथ में ही है। देश में वैसे तो कई प्रधानमंत्री हुए हैं, लेकिन राजीव गांधी एकमात्र युवा प्रधानमंत्री थे। वही वजह है कि उन्होंने तमाम विरोधों के बीच 21वीं सदी का सपना देखा। जब वे कंप्यूटर लेकर आए थे, तमाम दकियानूसी लोगों और नेताओं ने उन पर हाथों से रोज़गार छीनने की तोहमत मढ़ी थी, पर हक़ीक़त यह है कि आज कंप्यूटर रोज़गार का सबसे बड़ा साधन है।

युवा माने क्या?—युवा सपने देखता है, गढ़ता है, उसे साकार करने के लिए जूझता है, ख़तरे उठाता है। इसी नाते राजीव गांधी ने भारत के भविष्य का सपना देखा। बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी के ‘महात्मा गांधी’ बनने के लिए जो घटना ज़िम्मेदार थी, वह दक्षिण अफ़्रीका में ट्रेन के डिब्बे से उन्हें नीचे फेंक देने की थी। वे युवा थे, इसलिए उन्होंने प्रतिकार किया। बूढ़ा आदमी इसे ‘नियति’ मानकर स्वीकार कर लेता। युवा—बन्धन, नियति, धर्म, जाति, क्षेत्र और समझौते की बंदिशों से मुक्त होता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ आदमी ‘समझौते’ के नये-नये तर्क तलाश लेता है—नये-नये शास्त्र और शस्त्र गढ़ता है।

युवा-शक्ति ही राष्ट्र-शक्ति है, क्योंकि युवावस्था ही जीवन का मध्याह्न है—जीवन की ऊँचाई है। युवावस्था जीवनरूपी वृक्ष का सबसे मज़बूत और शक्तिशाली छतनार काल है, जिसकी छाया में किसी भी राष्ट्र के उन्नत सपने देखे जा सकते हैं। सभी महापुरुषों ने अपने जीवन के मध्याह्न—यानी युवावस्था—में ही महानता के शिखर छुए हैं। कोई भी जीवन तब महान बनता है, जब वह अपने समय के सापेक्ष उठे हुए सवालों का जवाब देने के क़ाबिल हो जाता है—‘उत्तर’ बन जाता है। राम के समय सबसे बड़ा प्रश्न—रावण था—राम उसके ‘उत्तर’ बनकर खड़े हुए। कृष्ण के समय का सबसे बड़ा प्रश्न—कंस, दुर्योधन और सामाजिक अराजकता थी—जिसका ‘जवाब’ कृष्ण ने दिया। महात्मा गांधी के समय का सबसे बड़ा प्रश्न केवल भारत की आज़ादी ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के मज़लूम और मुफ़लिस भारतीयों की अस्मिता का भी था—इस प्रश्न का जवाब मोहनदास करमचंद गांधी की युवावस्था ने दिया था।

हिन्दुस्तान के सन्दर्भ में आचार्य रजनीश कहते हैं—यहाँ ‘युवावस्था’ वर्ष 1920 या उसके बाद पैदा हुई। इस कालखंड के पहले इस देश में या तो ‘बच्चे’ थे या फिर ‘बूढ़े’। 12-14 साल के बीच ही बच्चों की शादी हो जाती थी—तरुणाई की उम्र आते-आते वे ‘पिता’ बन जाते थे। उन पर बच्चों को पालने-पोसने, परिवार की ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करने के ऐसे अहम और पेचीदे काम लद जाते थे कि वे भविष्य के सपने देखने की जगह ‘वर्तमान’ में जीना ज़्यादा पसंद करने लगे थे। जवानी के पहले ही भारत का नौजवान ‘बूढ़ा’ हो जाता था। 20वीं सदी के मध्य में पहली बार परम्पराओं के ख़िलाफ़ ‘अस्वीकृति’ के हाथ उठे—यही वह समय था जब देश में जवानी का प्रस्फुटन हुआ। बचपन से निकलकर बूढ़े होने की यात्रा के बीच—जवानी की दहलीज़ पर खड़े तरुण दिखने लगे। स्वामी विवेकानन्द, चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, खुदीराम बोस, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और सुभाष चन्द्र बोस—इसी का नतीजा थे।

कोई भी देश, कोई भी पीढ़ी—और कोई भी व्यक्ति—जो ‘इन्कार’ करना नहीं जानता—वह ‘भविष्य’ नहीं संजो सकता, ‘भविष्य’ नहीं बना सकता। क्योंकि ‘इन्कार’ से निकला हुआ ‘स्वीकार’—तथ्यपूर्ण और प्रामाणिक होता है। इन्कार—आत्मबल का प्रतीक है। 20वीं सदी के मध्याह्न में ‘इन्कार से स्वीकार’ की यात्रा प्रारम्भ करने वाले जवानों ने आँखें खोलीं—और अपनी नयी आँखों से भारत के भविष्य की ओर दृष्टिपात किया। इस तरह भारत के इन नये बच्चों ने—अपनी जवान नज़रों से दुनिया को देखना शुरू किया—अपना अतीत ‘समृद्ध’ नहीं बल्कि ‘यूटोपिया’-सा लगा। लगा—हम अपने ‘अतीत’ की राख में महानता की ‘चिंगारी’ तलाशने के बजाय—‘भविष्य’ के गर्भ से—एक उन्नतिशील, समृद्ध और महान भारत पैदा करने की कोशिश करें—तो यह ज़्यादा बेहतर होगा। नतीजतन, उन्होंने ‘नये भारत’ के निर्माण का संकल्प लिया। जीवन और समाज के हर क्षेत्र में युवा ‘नये प्रयोग’ की ओर निकल पड़ा। ‘सनातन’ शब्द की व्याख्या उसने—‘प्राचीन’ या ‘अनादि-काल’ से नहीं, बल्कि ‘सतत नूतनता’ के अर्थ में की। इस नवयुवक ने—अतीत के किसी ‘मौर्य-काल’, ‘गुप्त-काल’ या ‘अकबर महान’ के काल को ‘स्वर्ण-युग’ मानने से इन्कार कर दिया—उसने यह संकल्प लिया—हमें अपने ‘भविष्य’ में—पुख़्ता और मज़बूत ‘स्वर्ण-युग’ का निर्माण करना है—जहाँ—राजाओं-महाराजाओं के ‘महलों’ से निकलकर—जीवन का ‘स्वर्ण’—एक ‘आम’ आदमी के दरवाज़े तक दस्तक दे सके।

इस देश ने अपने अतीत में महानता और स्वर्ण-युग को ‘देखा’—उसी को ‘महिमामंडित’ किया। इसी वजह से समृद्ध प्राकृतिक धरोहर/संपदा के बावजूद—आर्यावर्त/भारतवर्ष—दुनिया की प्रगति की दौड़ में ‘पीछे’ छूट गया—क्योंकि देश के आम से ख़ास लोगों तक—अपने मन में यह ‘धारणा’ बैठा ली कि—हम ‘अतीत’ में बहुत महान थे—हम ‘देवताओं’ की संतान थे—हम ‘विश्व-गुरु’ थे। नतीजतन—हम ‘अतीत’ की ओर उन्मुख हो गए—और ‘भविष्य’ की ओर पीठ कर ली। समस्याएँ जब आईं—तो वे ‘आगे’ से आईं—‘भविष्य’ से आईं—हमने समाधान ‘अतीत’ से खोजे। हम—वैज्ञानिक और औद्योगिक ‘क्रांति’ के दौर में—देवताओं, भूत-पिशाचों, जादूगरों और बाजीगरों से अपनी समस्या के ‘समाधान’ की उम्मीद करते रहे। आज भी तमाम लोग—बच्चों के फोड़े-फुंसियों के इलाज के लिए—भालू से फूंक मरवाने पर विश्वास करते हैं। हम यह भूल गए कि समस्याओं के ‘गर्भ’ में ही समाधान छिपा होता है।

जब हम अपने अतीत के अंधे मोह और अंधभक्ति में निमग्न थे—उसकी महानता ‘सिद्ध’ करने में जुटे थे—उसी समय यूरोप/पश्चिम ने—जिन्हें जीवन जीने के लिए—शताब्दियों से—प्रतिपल ‘प्रकृति’ से संघर्ष करना पड़ा—अपने अतीत को ‘महान’ नहीं बताया—‘भविष्य’ को महान बनाने का बीड़ा उठाया—अतीत को एक सिरे से ‘उतार फेंका’। नतीजतन—यूरोप में प्रगति की सम्भावनाओं के नये-नये द्वार खुले—वास्को-द-गामा और कोलम्बस—मात्र एक नाव के सहारे—अनन्त समुद्र का सीना चीर सके—अमुनसेन और रॉबर्ट पियरी—दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव पर पहुँचे—नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने—चाँद के माथे पर—अपने चरण-चिह्न अंकित किए—इन्होंने जब नया इतिहास लिखा—इनकी उम्र ‘युवा’ थी। लेकिन भारत के यौवन में ‘ऊर्ध्वपतन’ हो रहा है—बचपन के बाद—जवानी की ऊर्जा ‘फूटती’ ही नहीं—सीधे ‘बूढ़ापा’ आ जाता है—भारत का ‘बचपन’—‘यौवन’ की स्वाभाविक गतिविधि से गुजरकर—वृद्धावस्था नहीं प्राप्त करता। बच्चे—‘बिना जवान हुए’ ही—बूढ़े होते जा रहे हैं। ‘जवानी’—एक ‘ख़ास’ मानसिक स्थिति है—‘बचपन’ भी—एक ‘ख़ास’ चित्त-दशा का नाम है—मनोविज्ञान की निष्पत्तियाँ—खतरनाक संकेत दे रही हैं।

युवा महोत्सवों में मुझे प्रायः नयी उम्र की ‘नयी फसल’ नदारद दिखती है—‘आसमान में सुराख़’ करने की ‘चिर-युवा’ अभिलाषा का कहीं नामोनिशान नहीं—न सपने—न संकल्प—युवा-चेतना ‘अनुपस्थित’—नौजवानों के ‘स्वप्न-विहीन’ चेहरे—उदास, हताश—और थके मन की ‘संदर्भ-सूची’ जैसी इबारत से युक्त मिलते हैं—अगर ‘कल’ का भारत ‘इन्हें’ ही सँवारना है—तो बेशक भारत का भविष्य ‘अच्छा’ नहीं है। आज़ादी के आन्दोलन के बाद—बसन्त-ऋतु के उत्सव फिर नहीं आए—‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ जैसे गीत—फिर नहीं फूटे—बसन्ती रंगों के प्रति जो स्वाभाविक ‘उमंग’ चाहिए—वह ‘जवानी’ में आती है—आज के नौजवानों को देखें—तो तपाक से कह सकते हैं—भारत में ‘जवानी’ की ऋतु का ‘आना’ प्रायः ‘बंद’ है। ब्रिटिश दासता के विरुद्ध—जेलों में सड़ने, हाथ-पाँव तुड़वाने—और फाँसी के फंदे को ‘चूम’ लेने वाले—लोग ‘युवा’ ही थे—अपने प्राणों को ‘बलिवेदी’ पर चढ़ाने वालों की निगाह में—संसद-सदस्यता या विधान-मंडलों की मेम्बरी—दूर-दूर तक ‘नहीं’ थी—आँखों में ‘महान भारत’ के इन्द्रधनुषी स्वप्न थे—स्वप्नों को ‘यथार्थ’ तक लाने वाले—‘चिर-युवा’ संकल्प भी थे—ब्रिटिश साम्राज्यवाद को धूल में मिलाने के जज़्बात—नई पीढ़ी में ही समुद्री ज्वार की तरह ‘उफान’ पर थे—भारत का ‘यौवन’—उस कालखंड में अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा में ‘खिल’ रहा था। यही वजह है कि—लेखन, कविता, कला, रंगकर्म और पत्रकारिता—सबमें—इसी ‘जवानी’ का ‘उत्ताप’ महसूस किया गया। नवम्बर 1967 के ‘अंग्रेज़ी हटाओ आन्दोलन’ में—उत्तर प्रदेश के युवाओं ने सड़कों को—नयी चेतना के रंग से रंग डाला था। दुष्यंत कुमार की विद्रोही कविताएँ—आज के युवाओं की मनःस्थिति/परिदृश्य पर बड़ा सटीक वार करती हैं—“ज़िन्दगी का कोई मकसद नहीं है, एक भी क़द आज ‘आदमक़द’ नहीं है।”

सारी दुनिया के सामाजिक/राजनीतिक परिवर्तनों के केन्द्र—‘नवयुवक’ ही रहे हैं—भारत को एक ‘सोद्देश्य’ सामाजिक परिवर्तन की दरकार है। बेशक—आज की पीढ़ी ने भारत की अनेक मान्यताओं को ‘पलीता’ दिखाया है—मगर जाति, भाषा, मजहब—और धन की सीमाओं को ‘ढहाने’ के बजाय—उन्हें ‘मज़बूत’ करने में ही—युवा-शक्ति का ‘दुरुपयोग’ हुआ है। भारत के राजनीतिक-सामाजिक नेतृत्व में—नवयुवकों को प्रेरित करने वाली क्षमताओं का ‘अभाव’ है—राजनीति—मूल्यों और विचारों की दृष्टि से ‘ऊसर’ हो चुकी है—राजनेताओं के पास—‘बड़े सपने’ देखने वाला ‘चित्त’ ही नहीं है—नौजवान को ‘सपने’ चाहिए—जितना बड़ा ‘सपना’, उतनी बड़ी ‘जवानी’। युवक—आगे की ज़िन्दगी में—रसवन्त अनुभूतियाँ पाते हैं। कभी—महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, सुखदेव, राजगुरु, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, भगत सिंह—और स्वामी विवेकानन्द—भारत की तरुणाई के ‘महबूब’ थे—फ़िलवक्त—भारत की नयी पीढ़ी—अनेक गाड़ियों के ‘काफ़िले’ के बीच—कई ‘सेलुलर’ फ़ोन रखकर चलने वाले—‘असलहों’ से घिरे राजनेताओं से प्रभावित है—उसके ‘रोल-मॉडल’—ऐश्वर्या राय, बिल गेट्स, अनिल अंबानी, शाहरुख़ ख़ान, माइकल जैक्सन और कटरीना कैफ़—जो ‘दौलतमन्द’ भी हैं—और अपने व्यवसाय में ‘सफल’ भी। छात्रावासों में—अक्सर कमरों पर—क्रिकेट-खिलाड़ियों/अभिनेताओं-अभिनेत्रियों के बड़े पोस्टर चस्पाँ—और गांधी-आजाद-भगत-विवेकानन्द जैसी तस्वीरें—या तो ‘नदारद’—या कहीं ‘नीचे’ छोटी-सी—वह भी बहुत ‘कम’ कमरों में।

बीस से तीस वर्ष की उम्र के ‘जवानों’ का ठिकाना—जिम/मसाज-पार्लर/हेयर-सैलून—ड्रेसिंग-टेबल पर—एंटी-रिंकल, फ़ेयरनेस क्रीम, मनचाहा डियो—शेव—महंगे आफ़्टरशेव से महकती—बालों पर शाइनिंग-जेल—ट्रेडमिल पर दौड़—बदन पसीने में तर—‘वेस्ट’ से झांकती मांसपेशियाँ फड़कती—लेकिन रुकने का नाम नहीं—कसी हुई ‘फ़िटनेस’ उनके रूटीन का अहम कार्य—‘बाइसेप्स-टोन’—अपव्यय करने को ‘डम्बल-लिफ्टिंग’—पेट की चर्बी पर काबू—‘सिट-अप्स’—लचक बनाए रखने को ‘स्ट्रेचिंग’—रोजनामचे का हिस्सा—‘चरित्र, धैर्य, सुविचार और अच्छे सिद्धान्त’—ये शब्द अब युवाओं को रास नहीं आते—कहते हैं—यदि हम ‘पारम्परिक नीतियों’ और ‘सामाजिक उलझनों’ में पड़े रहे—तो कुछ हासिल नहीं कर पाएँगे—हम भी अपने बुज़ुर्गों की तरह ‘हर एक’ चीज़ को तरसेंगे।

यही वजह है—हमने राम-कृष्ण पैदा किए—बुद्ध-महावीर पैदा किए—दिग्नाग-नागार्जुन पैदा किए—विवेकानन्द-गांधी पैदा किए—पर ‘एक भी’ आइन्स्टाइन, फेरो, हेसिन (हेज़न?), रदरफोर्ड और नील्स बोहर—नहीं पैदा कर सके। वजह—हमारे युवाओं का—केवल ‘अतीत’ और ‘वर्तमानजीवी’ होना है—जबकि ‘बच्चे’ ‘भविष्य’ का प्रतीक हैं—अतीत कितना भी महान हो—वह ‘चुक’ गया—भारत ने ‘भविष्य’ का स्वागत ‘वर्तमान’ में नहीं किया। भारत की 65 फ़ीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है—इस लिहाज़ से देश तो ‘दिन-प्रतिदिन’ जवान हो रहा है—लेकिन राजनीतिज्ञ इसके ठीक उलट—दिन-प्रतिदिन ‘बुज़ुर्ग’ होते जा रहे हैं—वे चाहते हैं—युवा कन्धों पर ‘बूढ़ा सिर’ रखा रहे—तभी तो ‘विचार-शून्यता’ की जो स्थिति आज दिख रही है—वैसी इस देश के राजनीतिक इतिहास में पहले कभी नहीं दिखी। पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों और दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले नेता—अन्ततः ‘उन्हीं’ सामन्ती-मनुवादी प्रवृत्तियों के शिकार हो जाते हैं—जिनके ख़िलाफ़ उन्होंने संघर्ष शुरू किया था।

महात्मा गांधी ने राजनीति को नयी परिभाषा दी—उन्होंने राजनीति के तौर-तरीके बदल डाले—‘हिन्द-स्वराज’ के रूप में—उन्होंने भविष्य के भारतीय समाज की ‘आदर्श’ कल्पना सामने रखी। आचार्य विनोबा भावे ने—तेरह वर्षों की पदयात्रा के अथक प्रयास से—यह दिखाया कि—एक पेचीदा समस्या का ‘लोकतांत्रिक’ व ‘मानवीय’ समाधान क्या/कैसे हो सकता है—विनोबा के प्रयासों से—भारत में ‘भूमिहीनों’ को जितनी ज़मीनें मिलीं—उतनी ‘किसी और’ के प्रयास से नहीं मिलीं। जयप्रकाश नारायण ने—युवाओं के बलबूते पर—भारत को ‘दूसरी’ आज़ादी दिलाई—यह बात दीगर है—जिन चेहरों और कन्धों के सहारे जयप्रकाश ने यह लड़ाई लड़ी—वे आगे चलकर—उसी व्यवस्था के ‘अविभाज्य अंग’ हो गए—जिसके ख़िलाफ़ जंग शुरू हुई थी। दुनिया में तीन बड़े/क्रांतिकारी परिवर्तन हुए—पहला—फ्रांस में युवाओं ने—जनरल चार्ल्स द गॉल की सरकार पलटी—दूसरा—1917 में लेनिन की अगुवाई में ‘बोल्शेविक क्रांति’—युवाओं ने सफल बनाई—तीसरा—जयप्रकाश का आन्दोलन—जिसमें कहा गया—“सम्पूर्ण क्रांति—नारा है, भावी इतिहास—हमारा है।”

लेकिन अब ‘युवा’—‘भावी इतिहास’ लिखते नहीं दिख रहे—देखकर/पढ़कर—यह चिन्ता सताती है—हमारी युवा-पीढ़ी को क्या होता जा रहा है?—वह भटक रही है—दिखावे में लिप्त है—इंटरनेट-कैफ़े जाकर ‘आपत्तिजनक साइट्स’ देखती है—‘नाइट-क्लबों’ में भीड़—एक हाथ में ‘सिगरेट’ या ‘बीयर’—दूसरे हाथ में ‘गर्ल/बॉय-फ़्रेंड’ का हाथ—इसे ही ‘ज़िन्दगी’ मान लिया—लेकिन क्या सचमुच ‘पश्चिम’ ऐसा जीवन जी रहा है?—क्या वहाँ इस तरह की ‘स्वतंत्रता’ है?—पश्चिम के लोगों के बीच रहकर—जब उनकी ज़िन्दगी को समझने की कोशिश करें—तो साफ़ होता है—हमारी पीढ़ी/समाज—‘भ्रांतियों’ में जी रहा है—हमने सिर्फ़ ‘इनकी ज़िन्दगी’ का ‘एक’ पहलू देखा—वास्तविकता ‘बिल्कुल अलग’ है। भारत की तरुणाई ही—भारत को ‘यौवन’ दे सकती है—यह तभी सम्भव है—जब भारत की तरुणाई—‘स्वस्थ चित्त’ और ‘स्वतंत्र चिंतन’ के ज़रिए—देश-समाज-मानवता के प्रति ‘कर्तव्य-बोध’ जाग्रत करके—‘भौतिकता’ व ‘आध्यात्मिकता’ की ‘समन्वित’ जीवन-पद्धति अपनाए—‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ के गीत-संगीत को ‘आदर्श’ समझे—न कि—‘चोली के नीचे क्या है’, ‘चुनरी के पीछे क्या है’, ‘मुन्नी बदनाम हुई’ या ‘शीला की जवानी’ जैसे—बाज़ारवाद के सस्ते ‘सड़क-छाप’ गीतों को।

21वीं सदी का यह ‘यंग इंडिया’—सागर की लहरों-सा लरजता—तमाम वर्जनाएँ तोड़ता—आगे बढ़ रहा है—हौसलों से लबरेज़—हर चुनौती से टकराने का आत्मविश्वास—और ‘जो चाहा’ उसे पाने का ‘हठ’ लिए—अपनी पुरानी पीढ़ियों की तुलना में ‘कम भावुक’—‘ज़्यादा चालाक’—अपार सम्भावनाओं से भरा—नया देश तेज़ी से उभर रहा है। आज का भारत-नवयुवक—दुनिया के नवयुवकों के साथ मिलकर—कदम से कदम मिलाकर—भविष्य में—नित-नयी सम्भावनाओं की तलाश में लगा है—वह लालायित/उत्सुक है—कि—कैसे इस भारत को—दुनिया के माथे का ‘तिलक’ बना दिया जाए। ऐसे में—पता नहीं क्यों—ये पंक्तियाँ बहुत अखरती हैं—हालाँकि हम इन्हें ‘गर्व’ से कहते हैं—

“यूनान-मिस्र-रोमा—सब मिट गए जहाँ से,

बाक़ी मगर है अब तक—नामोनिशाँ हमारा;

कुछ बात है कि हस्ती—मिटती नहीं हमारी,

सदियों रहा है दुश्मन—‘दौर-ए-जहाँ’ हमारा।”

कारण—इन पंक्तियों के मार्फ़त—हम प्रकारान्तर से यह भी कह बैठते हैं—कि ‘हम प्राचीन देश’ के वासी हैं—हमारा ‘देश बूढ़ा’ हो चुका है। दुनिया के देशों ने ‘विध्वंस’ भी देखे हैं—‘निर्माण’ भी—विध्वंस ही—निर्माण की ‘जननी’ है। कृष्ण ने गीता में कहा—आत्मा ‘अजर-अमर’ है—कलेवर बदलती है—एक शरीर छोड़कर—दूसरे जन्म में—दूसरा शरीर धारण करती है—रजनीश इसे यूँ स्पष्ट करते हैं—चूँकि हम ‘अजर-अमर’ हैं—हमें इस पृथ्वी पर—बार-बार ‘आना-जाना’ है—इसलिए ‘प्रगति’ करने की कोई ‘जल्दी’ नहीं—जबकि पश्चिम के पास ‘एक’ ही जन्म है—इसी जन्म में—उन्हें ‘सब कुछ’ कर लेना है—इसीलिए—उन्होंने अपने समय का ‘सदुपयोग’ किया—इसी जीवन में—इसी जन्म में—पश्चिम के लोग—धरती को ‘स्वर्ग’ बनाने में जुट गए।

मतलब—यह ‘बिल्कुल’ नहीं कि हम ‘अतीत-विरोधी’ हैं—हम ‘बुज़ुर्ग-विरोधी’ हैं—या कि—हमें ‘अतीत’ की अच्छी बातों को ‘ग्रहण’ नहीं करना चाहिए—लेकिन हमें ‘अतीत’ पर—समालोचनात्मक नज़र डालनी होगी। ‘स्वर्णिम भारत’, ‘नया भारत’—बनाने के लिए—‘पुरातनता’ का कलेवर उतार—‘युवावस्था’ का वरण करना होगा। युवाओं को ‘जगह’ और ‘ज़मीन’ देनी होगी—क्योंकि वे—नये दिमाग़ से—नयी समस्याओं का ‘नया रास्ता’ निकाल सकते हैं—वे ‘वर्तमान’ से ‘भविष्य-पथ’ तैयार कर सकते हैं—वे ‘अतीतजीवी’ नहीं—‘भविष्योन्मुखी’ हैं—‘भविष्य’ की नज़रों में—नज़रें गड़ाकर—नवीन सम्भावनाओं के द्वार खोलने के लिए—उनकी ‘पीठ’ थपथपानी होगी—क्योंकि ‘वर्तमान’ के ही गर्भ से—‘भविष्य’ जन्म लेगा। जब तक—हम—युवाओं/तरुणाई/जवानी को ‘जगह’ नहीं देंगे—‘मौका’ नहीं देंगे—तब तक—राष्ट्र-निर्माण में—उनकी ‘सही’ हिस्सेदारी और ‘भूमिका’ नहीं होगी। तीन क्रान्तियों की नज़ीर—कुछ महापुरुषों की उपलब्धियों का ज़िक्र—यह सब ‘युवावस्था’ में हुए/किए गए—ऐसे में—राष्ट्र-निर्माण के लिए—युवाओं को—अपनी भूमिका का न केवल ‘निर्वाह’ करना होगा—बल्कि ‘उन्हें’ भूमिका ‘देनी’ भी होगी। आज का युवा—इस भूमिका के मार्फ़त—अनन्त सम्भावनाओं के द्वार खोलेगा—क्योंकि भारत के युवकों के पास—केवल समृद्ध/स्वर्णिम ‘अतीत’ नहीं—बल्कि ‘वैश्वीकरण’ और ‘ग्लोबल-विलेज’ की मार्फ़त—पूरी दुनिया से ‘सीधा’ सम्पर्क भी है।

(यह लेख 10 मार्च, 2007 को लखनऊ, सरस्वती शिशु मन्दिर में आयोजित ‘युवा संगोष्ठी’ में प्रस्तुत। सितंबर, 2025 को संशोधित।)

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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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