RSS Ka Itihas: संघ की प्राणवायु

RSS History in Hindi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इतिहास, विचारधारा, संगठनात्मक ढांचे और भाजपा से रिश्ते पर आधारित विस्तृत लेख। जानिए डॉ. हेडगेवार से लेकर मोहन भागवत तक संघ की यात्रा और भारतीय राजनीति में उसकी भूमिका।

Yogesh Mishra
Published on: 11 Jun 2026 3:10 PM IST
RSS Ka Itihas Role in Indian Politics
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RSS Ka Itihas Role in Indian Politics 

RSS Ka Itihas: ‘संघं शरणं गच्छामि।’ यह सूत्र भले गौतम बुद्ध ने दिया था, पर इन दिनों ‘संघ’ और ‘शरण’—दोनों के मायने बदल गए हैं, नए अर्थ ग्रहण कर चुके हैं। आज की देश-काल-परिस्थिति में ‘संघ’ का अर्थ है-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। विपक्ष ‘शरणं गच्छामि’ को केंद्र सरकार का आरएसएस के आगे समर्पण बताकर शोर कर रहा है। हाल में संघ प्रमुख मोहन भागवत सहित 15 महत्त्वपूर्ण स्वयंसेवकों के सामने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में, कई मंत्रियों द्वारा अपने कामकाज का ‘प्रजेंटेशन’ देने पर विरोध के स्वर और मुखर हुए हैं।

यह हाय-तौबा मचाने वाली कांग्रेस हो या अन्य संगठन/व्यक्ति—वे भूल जाते हैं कि आरएसएस और भाजपा के बीच नाभि-नाल का संबंध है; दोनों सहगामी हैं। संघ का भाजपा से सहजीवी रिश्ता है। संघ के लिए राजनीति साधन है, साध्य नहीं—उसके केंद्र में राजनीति नहीं, संस्कृति और देश का गौरव है। आज़ादी के बाद हमारा सार्वजनिक जीवन राज्य सत्ता और सत्ता-मुखी राजनीति के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया। संभवतः यही कारण है कि संघ की आलोचना में लोग यह आधारहीन बात कहने से नहीं चूकते कि संघ की कर्म-साधना, भाजपा के माध्यम से सत्ता पर काबिज होने का षड्यंत्र है। ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद संघ ने समय की आवश्यकता समझकर कांग्रेस के लिए ज़मीन तैयार की थी।


वैचारिक उद्गम और सांगठनिक संकल्प

संघ की इस विशाल चेतना को समझने के लिए हमें इसके उद्गम और इसके आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन-संकल्प की तह में जाना होगा। मूल रूप से आज के तेलंगाना के रहने वाले और नागपुर में आकर बसे एक पुरोहित परिवार के केशव बाल्यावस्था से ही प्रखर राष्ट्रभक्त थे। उनका जन्म नागपुर के इसी परिवार में 1 अप्रैल,1889 को हुआ था। 1902 की प्लेग-महामारी में वे बाल्यावस्था में ही माता-पिता से वंचित हो गए। बाद में परिवार के परिचितों और संबंधियों ने उनकी शिक्षा-दीक्षा में सहयोग किया। उन्होंने नागपुर, यवतमाल और पुणे में शिक्षा पाई। हेडगेवार जी के दो बड़े भाई थे—एक महादेव शास्त्री और दूसरे सीताराम शास्त्री। केशव का जुड़ाव कलकत्ता की ‘अनुशीलन समिति’ से भी था, जो अपने समय के क्रांतिकारियों की प्रसिद्ध संस्था थी। कोलकाता जाकर उन्होंने नेशनल मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की, पर उनका मन केवल चिकित्सा में नहीं। बल्कि राष्ट्रीय संगठन और अनुशासित समाज-निर्माण में अधिक रमा रहा।

जो लोग यह दुष्प्रचार करते हैं कि संघ का रिश्ता स्वतंत्रता आंदोलन से नहीं था, उन्हें इतिहास के पन्ने पलटने चाहिए। 1897 में जब इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक के साठ साल पूरे होने पर भारत में हीरक महोत्सव मनाया जा रहा था, तब स्कूलों में बच्चों को मिठाई बाँटी गई। पर आठ साल के बालक हेडगेवार ने मिठाई फेंक दी, खाई नहीं। जब वह बारह साल के थे तब एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण समारोह के निमित्त ‘एम्प्रेस मिल’ ने अपना कारख़ाना सजाया और आतिशबाज़ी की। उसे देखने केशव नहीं गए। उनका तर्क था कि “विदेशी राजा का समारोह मनाना लज्जाजनक है। मैं देखने नहीं जाऊँगा।” अंग्रेज़ी अध्ययन के लिए केशव को नील सिटी हाईस्कूल में प्रवेश दिलाया गया। 1908 में जब सरकारी अधिकारी इस स्कूल का निरीक्षण करने आए, तब केशव ने अपने कक्षा के साथियों के साथ बंगाल विभाजन के तीव्र विरोध का हथियार बने ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष करके उनका स्वागत किया। लिहाज़ा विद्यालय से केशव को निष्कासन का दंड झेलना पड़ा, क्योंकि जाँच में सब बच्चों ने अपनी गलती मान ली थी, पर केशव ने नहीं मानी।


युवा अवस्था में डॉ. हेडगेवार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, हिंदू समाज-सुधार और राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलनों से गहरे प्रभावित रहे। विनायक दामोदर सावरकर और अन्य समकालीन राष्ट्रीय विचारकों के विचारों का प्रभाव उन पर माना जाता है। डॉ. बी. एस. मुंजे जैसे वरिष्ठ नेताओं ने भी उन्हें मार्गदर्शन दिया। लोकमान्य तिलक 1914 में छह साल की सज़ा काट कर वापस आए तो उनका गरम दल काफ़ी शिथिल पड़ चुका था। पर उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई का अपना काम आगे बढ़ाना था। उस समय उन्हें नागपुर में काम करने के लिए जो युवक मिला, वह डॉक्टर हेडगेवार ही थे। इस तरह हेडगेवार कांग्रेस के नेता बने। 1920 दिसंबर में नागपुर में काँग्रेस अधिवेशन होना था। अधिवेशन की व्यवस्था का ज़िम्मा हेडगेवार का था। तिलक को इस अधिवेशन की अध्यक्षता करनी थी, पर इसी साल पहली अगस्त को तिलक का निधन हो गया, लिहाज़ा काँग्रेस के नेतृत्व के सूत्र महात्मा गाँधी के हाथ आ गए। गांधी जी ने अंग्रेज़ सरकार से असहयोग व स्वदेशी के उपयोग का नारा दिया। डॉ. हेडगेवार भी इसमें शामिल हुए। वह गांधी जी के इन दोनों कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए प्रचार-प्रसार करने लगे। उनके भाषणों से नाराज़ अंग्रेज़ सरकार ने उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुक़दमा चलाया, जिसमें उन्हें एक साल की सज़ा हुई।

12 जुलाई, 1922 के दिन वह कारागार से छूटे। इसके बाद उन्होंने गहराई से मंथन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राजनीतिक दासता से मुक्ति के साथ-साथ समाज का सांस्कृतिक और अनुशासित संगठन भी अनिवार्य है। इसी विचार-मंथन से 1925 में विजयादशमी के दिन (27 सितंबर 1925) नागपुर में मोहिते के टूटे-फूटे बाड़े में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने पाँच-छह युवाओं के साथ जो खेल-कूद और शाखा की परंपरा शुरू की, वही आज के विशाल संघ-प्रवाह की गंगोत्री है। हेडगेवार का लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था। वे मानते थे कि यदि समाज भीतर से संगठित, अनुशासित और जाग्रत नहीं होगा तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी टिकाऊ नहीं हो पाएगी। संघ को उन्होंने किसी धार्मिक-राजनीतिक संस्था की तरह नहीं। बल्कि सांस्कृतिक-सामाजिक स्वयंसेवक संगठन के रूप में रखा।

डॉ. हेडगेवार ने वादोनावलम्ब्या: (वाद विवाद में न पड़ते हुए) सर्वेषाम् अविरोधेन (किसी से विरोध न रखते हुए) सम्पूर्ण समाज को संगठित करने का संकल्प लिया। संघ के इस सांगठनिक ढांचे में अनुशासन के अपने सूत्र गढ़े गए, जहाँ ‘एकश: संपद’ भी संघ का मंत्र है, जिसका मतलब है—एक ही पंक्ति में खड़े रहो; और ‘एक सामान्य मुख्य शिक्षक दक्ष आज्ञा देता है’ की व्यवस्था सर्वोपरि मानी गई। संघ भारत को मातृभूमि मानता है, भोगभूमि नहीं। संघ पश्चिम की राज्य आधारित राष्ट्र की संकल्पना और भारतीय जीवन दृष्टि पर आधारित राष्ट्र की संकल्पना भिन्न भिन्न मानता है।

नामकरण, मूल प्रार्थना और सांगठनिक प्रतीक


शुरुआत में इस कार्य को कोई निश्चित नाम नहीं दिया गया था। संघ की स्थापना के बाद संगठन के नाम को लेकर गंभीर विचार हुआ। डॉ. हेडगेवार ने 17 अप्रैल, 1926 को अपने घर पर एक बैठक बुलाई। इसमें छब्बीस स्वयंसेवक शामिल हुए। सभी से पूछा गया कि संगठन का कोई निश्चित नाम होना चाहिए। विचार-विमर्श के बाद तीन नाम प्रमुख रूप से सामने आए—पहला, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। दूसरा, ज़री पटका मंडल। और तीसरा, भारतोद्धार मंडल। राय लेने पर बीस लोगों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम का समर्थन किया। ज़री पटका मंडल केवल पाँच लोगों की पसंद था, जबकि भारतोद्धार मंडल को लेकर कोई विशेष राय नहीं बनी। ज़री पटका मंडल का संबंध पेशवाई परंपरा से जोड़ा गया था और यह नाम प्रथम वर्ष के एक छात्र ने दिया था। इसके अतिरिक्त शिवाजी संघ, महाराष्ट्र सेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ जैसे नामों पर भी चर्चा हुई थी। अंततः जिस नाम में राष्ट्र, स्वयंसेवा और संगठन—तीनों का सार समाहित था, वही नाम स्थायी हुआ—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

संघ की नियमित शाखाओं में प्रारंभ से ही मातृभूमि को नमन करने वाली प्रार्थना का विशेष स्थान रहा। यह प्रार्थना डॉ. हेडगेवार ने अपने साथियों के साथ मिलकर तैयार की थी। उस समय नागपुर में मराठी के साथ हिंदी का भी बोलचाल में मिश्रण था, इसलिए प्रारंभिक प्रार्थना मूल रूप से मराठी में थी, पर उसमें हिंदी के कुछ शब्द भी शामिल थे। 1939 तक यह प्रार्थना संघ के कार्यक्रमों में गाई जाती रही। संघ की मूल प्रार्थना में मातृभूमि, आर्यभूमि और धर्मभूमि के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव था—“नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी, नमो आर्यभूमि जिथे वाढलो मी, नमो धर्मभूमि जियेच्याच कामी, पडो देह माझा सदा ती नमी मी।” इसका हिंदी पद भी संघ की प्रारंभिक साधना-परंपरा का हिस्सा था—“हे गुरु श्री रामदूता, शील हमको दीजिए। शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए। लीजिए हमको शरण में, रामपंथी हम बनें।ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, वीर व्रतधारी बनें।” प्रार्थना के अंत में छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ रामदास का जयघोष लगाया जाता था—“राष्ट्रगुरु श्री समर्थ रामदास स्वामी जी की जय।” इससे स्पष्ट होता है कि संघ की प्रारंभिक सांस्कृतिक चेतना में मातृभूमि, अनुशासन, धर्मरक्षा, चरित्र-निर्माण और शिवाजी-समर्थ रामदास की परंपरा का गहरा प्रभाव था।

छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मोहर संस्कृत में थी। इसी सांस्कृतिक संकेत को ध्यान में रखते हुए 1939 में यह विचार सामने आया कि संघ की प्रार्थना संस्कृत में होनी चाहिए। मराठी प्रार्थना को संस्कृत में रूपांतरित करने का निर्णय फ़रवरी 1939 में नागपुर से लगभग पचास किलोमीटर दूर सिंदी में नाना साहेब तलातुले के आवास पर हुई बैठक में लिया गया। इस बैठक में सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार उपस्थित थे। भविष्य के सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर और बालासाहेब देवरस भी वहाँ थे। अप्पाजी जोशी, विट्ठल राव पटकी, तात्या राव तैलंग, बाबूराव सोलडक और कृष्ण राव मोहरिले भी इस विचार-विमर्श में शामिल थे। मराठी प्रार्थना को संस्कृत में ढालने का कार्य मोहिते का बाड़ा शाखा के कार्यवाह और संस्कृत विद्वान नरहरि नारायण राव भिंडे को सौंपा गया। उनके प्रयास से नई प्रार्थना गढ़ी गई—“नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे…।” इस प्रार्थना को सबसे पहले पुणे शिविर में डॉ. हेडगेवार और गुरु गोलवलकर जी के सामने संघ प्रचारक अनंत राव काले ने गाया। उल्लेखनीय है कि संघ के इसी शिविर में डॉ. भीमराव अंबेडकर भी आए थे।

‘सर सेनापति’ का पद और प्रशासनिक ढाँचा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारंभिक ढाँचे में एक समय ‘सर सेनापति’ का पद भी था। यह पद लगभग चौदह वर्ष तक संघ में रहा। नवंबर 1929 में जब सरसंघचालक का पद बना, उसी समय सरकार्यवाह और सर सेनापति जैसे पद भी बने। सर सेनापति के पद पर मार्तंड राव जोग चुने गए। वे संघ के पहले और अंतिम सर सेनापति रहे। यह पद मूल रूप से छत्रपति शिवाजी द्वारा अपनी मराठा सेना के सर्वोच्च अधिकारी के लिए सृजित किया गया था। संघ में पथ-संचलन की शुरुआत भी मार्तंड राव जोग ने ही की थी। जोग 1920 में सेना से सेवानिवृत्त हुए थे और 1926 में कांग्रेस सेवा दल से जुड़े। बाद में संघ की संरचना में सैन्य प्रशिक्षण के स्थान पर सांस्कृतिक, अनुशासनात्मक और सामाजिक प्रशिक्षण पर अधिक बल दिया गया। 28 अप्रैल,1943 को दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने सभी शाखाओं से सैन्य प्रशिक्षण समाप्त करा दिया। सर सेनापति का पद हटने के साथ संघ के गणवेश में भी परिवर्तन हुआ। पहले खाकी नेकर और खाकी कमीज़ गणवेश का हिस्सा थे। बाद में कमीज़ का रंग सफेद कर दिया गया।

संघ की प्रशासनिक संरचना का एक निर्णायक प्रसंग अक्टूबर,1929 से जुड़ा है। डॉ. हेडगेवार की जीवनी लिखने वाले नाना पालकर के अनुसार, उस महीने नागपुर में संघ की एक बड़ी सभा हुई। डॉ. हेडगेवार ने 19 अक्टूबर,1929 को सभी प्रांतीय संघचालकों को पत्र भेजकर 9-10 नवंबर को बैठक के लिए नागपुर आने को कहा। जब स्वयंसेवक एकत्र हुए तो यह अनुभव हुआ कि अब संगठन को एक प्रशासनिक व्यवस्था और उसके नेतृत्व के लिए एक स्पष्ट मुखिया चाहिए। अप्पाजी जोशी इस बात से चिंतित थे कि डॉ. हेडगेवार स्वयं कोई पद लेने को तैयार नहीं हैं। विश्वनाथ राव केलकर, बालाजी दुद्दार, अप्पाजी जोशी, कृष्ण राव मोहरिर, तात्याजी कालेकर, बाबूराव मुथाल, बाबासाहेब कोल्टे और मार्तंड राव जोग जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में इस विषय पर चर्चा हुई। हेडगेवार जी को इस चर्चा से दूर रखा गया। बाद में नागपुर के स्वयंसेवकों का संयुक्त कार्यक्रम मोहिते के बाड़ा में हुआ। डॉ. हेडगेवार भगवा ध्वज के पास खड़े थे और स्वयंसेवक प्रवेश द्वार के पास थे। अचानक वर्धा के संघचालक अप्पाजी जोशी ने तेज आवाज़ में कहा—“सरसंघचालक प्रणाम। एक, दो, तीन।” डॉ. हेडगेवार अवाक रह गए। इसके बाद अप्पाजी जोशी ने एक दिन पहले हुई बैठक के निर्णयों की जानकारी दी। इस तरह संगठन ने अपने संस्थापक को औपचारिक रूप से सरसंघचालक के रूप में स्वीकार किया।

अप्पाजी जोशी और हेडगेवार के क्रांतिकारी प्रसंग


हेडगेवार और संघ की चर्चा अप्पाजी जोशी के उल्लेख के बिना अधूरी रहती है। अप्पाजी से हेडगेवार की निकटता उस समय बनी जब स्त्री-वेश धारण करने वाले लड़कों के प्रशिक्षण की बात चली। हेडगेवार महिला-वेशधारी कलाकारों के माध्यम से क्रांतिकारियों तक सामग्री पहुँचाने के काम में लगे थे। इसी काल में दोनों के बीच गहरा संबंध बना। 1917 में प्रशिक्षित युवकों के साथ 1919 में हेडगेवार ने अप्पाजी को भी भेजा। लौटने पर उन्हें क्रांतिकारी अर्जुन सेठी की सेवा में लगाया गया। अर्जुन सेठी वर्धा जेल में कठोर यातना के कारण विक्षिप्त हो गए थे। अप्पाजी ने उन्हें तीन-चार वर्ष तक अपने घर पर रखा और स्वस्थ होने के बाद ही छोड़ा। अप्पाजी इस बात से चिंतित थे कि हेडगेवार कोई पद नहीं ले रहे हैं, जबकि संघ का कोई प्रमुख भी नहीं था। उन्होंने संघ के अन्य बड़े कार्यकर्ताओं से चर्चा की और फिर हेडगेवार जी को बताया कि हम सबने मिलकर आपको सरसंघचालक चुन लिया है। पहले हेडगेवार जी नाराज़ हुए, पर धीरे-धीरे उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया।

अप्पाजी जोशी को इसके लिए अपना पूरा जीवन संघकार्य की ओर मोड़ना पड़ा। वे 56 संस्थाओं के सदस्य थे। डॉ. हेडगेवार के कहने पर उन्होंने उन सभी संस्थाओं से त्यागपत्र भेजे और उनकी प्रतियाँ हेडगेवार जी के चरणों में रख दीं। एक प्रसंग वर्धा का है, जहाँ बाबा के वेश में रह रहे क्रांतिकारी गंगा प्रसाद पांडेय के घर रखी पिस्तौल हटाने डॉ. हेडगेवार पहुँचे। अप्पाजी भी उनके साथ थे। उन्हें यह पता नहीं था कि एक जासूस उनके पीछे लग चुका है। जैसे ही गंगा प्रसाद पांडेय ने पिस्तौल हेडगेवार जी को सौंपी, पुलिस का जासूस बीच में कूद पड़ा। हेडगेवार जी ने तत्काल पिस्तौल अप्पाजी को देकर उन्हें वहाँ से भगा दिया। उस पिस्तौल के एक लूटकांड में इस्तेमाल का संदेह था। बाद में इस प्रसंग को समाप्त करवाने की भूमिका भी अप्पाजी ने निभाई। जब डॉ. हेडगेवार ने जंगल सत्याग्रह के लिए सरसंघचालक का दायित्व डॉ. परांजपे को देने का विचार किया, तब अप्पाजी जोशी ने तय किया कि वे भी डॉक्टर साहब के साथ जेल जाएँगे—और वे जेल गए भी। हेडगेवार मन ही मन गुरु गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी पसंद कर चुके थे, पर वे किसी को आहत नहीं करना चाहते थे। उन्होंने अप्पाजी से पूछा कि यदि गुरुजी को सरसंघचालक बना दिया जाए तो कैसा रहेगा। अप्पाजी ने उत्तर दिया—“आपने तो मेरे मन की बात कह दी, डॉक्टर जी।” 1940 में जब हेडगेवार उपचार के लिए बिहार के राजगीर जा रहे थे, वे अप्पाजी को भी साथ ले गए, पर उन्हें सरसंघचालक नहीं बनाया। इससे अप्पाजी के समर्थक नाराज़ हुए। तब अप्पाजी ने उन्हें समझाया—“मैं डॉक्टर जी का दाहिना हाथ था, यह सत्य है, पर गुरुजी तो डॉक्टर जी का हृदय हैं।” आगे चलकर अप्पाजी गुरुजी के भी दाहिने हाथ बने रहे।

डॉ. हेडगेवार का व्यक्तित्व प्रेरक प्रसंगों से भरा था। एक बार एक अंग्रेज अफसर ने उनसे पूछा—“तुम्हारा धर्म क्या है?” हेडगेवार ने उत्तर दिया—“मेरा धर्म भारत माता की सेवा है।” उनकी सादगी ऐसी थी कि अपने घर में स्वयं झाड़ू लगाना या स्वयंसेवकों के साथ बैठकर साधारण भोजन करना उनके लिए सामान्य बात थी। डॉ. हेडगेवार स्वयं असहयोग आंदोलन 1920 और नागपुर ध्वज सत्याग्रह 1923 में जेल गए। उनकी सोच थी कि पहले राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण आवश्यक है, तभी राजनीतिक स्वतंत्रता स्थायी होगी। प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने नागपुर क्षेत्र में छोटे-छोटे शिविर आयोजित किए। स्वयंसेवकों को कठोर अनुशासन, शारीरिक अभ्यास और मानसिक प्रशिक्षण दिया गया। वे स्वयं भी अभ्यासों में अगली पंक्ति में रहते थे, जिससे स्वयंसेवकों में नेतृत्व और अनुशासन का भाव पैदा होता था। उन्होंने संगठन को धार्मिक प्रदर्शन की बजाय सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान का माध्यम बताया और समाज के विभिन्न तबकों में समरसता लाने की आकांक्षा रखी। 1940 में स्वास्थ्य बिगड़ने पर भी वे संगठन को व्यवस्थित और विस्तृत होते देखना चाहते थे। उन्होंने एम. एस. गोलवलकर को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया। उनके अंतिम संदेशों में संगठन के विस्तार और समाज की एकता का भाव प्रमुख था। डॉ. हेडगेवार ने स्वयं बहुत व्यापक साहित्य नहीं छोड़ा। उनका वास्तविक साहित्य उनका संगठनात्मक प्रयोग, अनुशासन और कार्यपद्धति ही था। 21 जून,1940 को नागपुर में उनका निधन हुआ। उनके बाद संघ ने राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र विस्तार लिया। उनकी स्मृति आज संघ के संस्थागत स्मृतिचिह्नों, स्मृति मंदिर, जन्मतिथि आयोजनों और जीवनी-प्रकाशनों में संरक्षित है। डॉ. हेडगेवार की समाधि-स्मृति मंदिर की डिजाइन मुंबई के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट गोविंद वासुदेव दीक्षित ने तैयार की थी। वर्धा के रहने वाले पांडुरंग नागपुर कार्यालय के प्रभारी थे। उनकी जान नागपुर कार्यालय में ही बसती थी। रेशमी बाग में पांडुरंग की स्मृति में पांडुरंग भवन बनाया गया।

राजनीति और संघ: विभाजन रेखा


प्रत्यक्ष रूप से संघ राजनीति से अलग रहा। जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कांग्रेस से अलग हुए तो उन्होंने संघ-प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) से मिलकर राजनीतिक स्तर पर सहायता का अनुरोध किया। उस समय संघ के भीतर यह बहस चली कि संघ को सार्वजनिक सेवा के लिए रखा जाए या राजनीतिक कार्य के लिए साधन बनाया जाए। वसंतराव ओक आदि इसे राजनीतिक दल में बदलना चाहते थे, जबकि बालासाहब देवरस, भाऊराव देवरस ने गुरुजी से आग्रह किया कि “संघ, संघ ही रहे; जिसे राजनीतिक मोर्चा बनाना हो, वह अलग बनाए।” नतीजतन जनसंघ और संघ अलग-अलग रहे। दोनों के कार्य स्पष्ट रूप से विभक्त किए गए। हाँ, डॉ. मुखर्जी को राजनीतिक दल खड़ा करने हेतु कुछ प्रचारक दिए गए और उन्हें हिन्दुत्व की विचारधारा पर आगे बढ़ने की नसीहत दी गई।इन प्रचारकों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदर सिंह भंडारी, नानाजी देशमुख, भाई महावीर, बलराज मधोक, जगन्नाथराव जोशी, हरिपद भारती, उद्धवराव कोरेगांवकर तथा रामभाऊ म्हाळगी के नाम थे।

वर्ष 1952 के लोकसभा चुनाव में जनसंघ बहुत उत्साह से मैदान में उतरा, पर उसे भारी धक्का लगा—उसके केवल 3 प्रत्याशी जीते। स्वामी करपात्री की रामराज्य परिषद के 4 और हिंदू महासभा के 3 उम्मीदवार विजयी हुए। बाद में इन दलों ने मिलकर एक मोर्चा बना लिया। आपातकाल के दौरान सबसे अधिक उत्पीड़न संघ के लोगों ने झेला; फिर भी जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तब जनसंघ को समाहित कर सबसे बड़ा उत्सर्ग संघ ने ही किया—क्योंकि जनसंघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ही राजनीतिक प्लेटफ़ॉर्म था।

संघ ने कभी चंदा बटोरने या सदस्यता फार्म भरवाने की होड़ नहीं लगाई, फिर भी वह विश्व का सबसे बड़ा कर्म-आंदोलन है—क्योंकि इसमें पक्ष और विपक्ष दोनों का चिंतन है; करने वाले भी यही, और जरूरत पड़े तो टोकने-बिदकने वाले भी यही। संघ में राष्ट्रीयता और संस्कृति का निरंतर प्रवाह है। किसी संगठन का वातावरण यदि उत्तम हो, तो वह किसी भी आंदोलन को उभार देता है। और यदि वातावरण प्रतिकूल हो, तब उसके स्वयंसेवक डटकर सामना करते हैं। यही कारण है कि लोकपाल की मांग उठाने वाले अन्ना आंदोलन को विस्तार देने में स्वयंसेवक प्राणपण से जुटे, पर जब भाजपा के कुछ नेता गर्वोक्ति में बहकने लगे तो दिल्ली चुनाव में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया—लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की विजय के लिए संघ ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी। यही नहीं, भारतीय मजदूर संघ, स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ—नीतिगत प्रश्नों पर उसी मोदी सरकार के विरुद्ध भी, आवश्यकता पड़ने पर, खड़े हुए।

संघ के आलोचक अक्सर कहते नहीं थकते कि स्वतंत्रता आंदोलन में संघ हाथ पर हाथ धरे बैठा था। पर ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि 1920 के खिलाफत आंदोलन में डॉ. हेडगेवार सक्रिय रहे। हाँ, उसी आंदोलन के अनुभव ने उन्हें अलग संगठन खड़ा करने की प्रेरणा दी। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में स्वयंसेवकों के साथ डॉ. हेडगेवार जेल भी गए। आपातकाल में इंदिरा गांधी के क्रोध की सबसे अधिक गाज इन्हीं स्वयंसेवकों पर गिरी। महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगा प्रतिबंध अप्रत्याशित था, जो कांची के महास्वामी चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती, जस्टिस बैंकेटराम शास्त्री और ताताचार्य एडवोकेट के हस्तक्षेप से हटाया गया। सरदार वल्लभभाई पटेल चाहते थे कि संघ कांग्रेस में शामिल हो जाए, किंतु संघ इसके लिए तैयार नहीं हुआ।

गाँधी जी, संघ और गोडसे विवाद का सत्य


संघ की नीति को लेकर महात्मा गाँधी के विचार और गोडसे विवाद पर संसद का ऐतिहासिक सत्य आज के आलोचकों के मुँह पर करारा तमाचा है। गाँधी जी स्वयं संघ की कार्यपद्धति के साक्षी रहे थे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि:

“बरसों पहले मैं वर्धा में संघ के एक शिविर में गया था। उस समय इसके संस्थापक डॉ हेडगेवार जी थे। गांधी जी को जमना लाल बजाज संघ शिविर में ले गये थे। गांधी जी स्वयं सेवकों के कड़े अनुशासन, सादगी व छूआछूत की पूर्ण समाप्ति से बहुत प्रभावित हुए। संघ की नीति हिंदू व हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है। वह भी किसी दूसरे को नुक़सान पहुँचा कर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास नहीं रखता। वह आत्म रक्षा का कौशल सीखाता है।प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया। संघ एक सुसंगठित व अनुशासित संस्था है। उसकी शक्ति भारत के हित में या खिलाफ प्रयोग की जा सकती है। संघ के खिलाफत जे आरोप लगाये जाते हैं, उनमें सच्चाई है या नहीं।यह मैं नहीं जानता । यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दें।” ( साभार - संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड 89 ,पेज संख्या 215-217)

गांधी जी ने यह भी लिखा है कि “यदि मेरे पास क़ानून बनाने का अधिकार होता तो निश्चित रुप से मैं मतांतरण पर रोक लगा देता।”

गांधी जी की हत्या को लेकर भी संघ को कटघरे में खड़ा किया जाता है। पर सच्चाई की तह तक जाया जाये तो संसद में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के इस वक्तव्य से गुजरना ज़रूरी हो जाता है—

“और मुझे आपत्ति है गोडसे का नाम लेने के बारे में। श्री अय्यर विद्वान आदमी हैं, श्री अय्यर को सारे इतिहास का पता होना चाहिए, गोडसे की पृष्ठभूमि का भी पता होना चाहिए। गोडसे आरएसएस का विरोधी था। गोडसे आरएसएस की अखबार में आलोचना करता था। और गांधी जी की हत्या की दो-दो बार जांच हुई। और सब जांच में निकला कि उनकी हत्या से आरएसएस का कोई संबंध नहीं था। क्या दुनिया को यह कहना चाहते हैं कि गांधी जी के हत्यारे भारत में सत्ता में आ रहे हैं? ... आपस की लड़ाई में हम गांधी को न घसीटें, उनको इस तरह से घसीटिए मत।"

वाजपेयी जी ने अपने इस संबोधन में जस्टिस कपूर कमीशन (कपूर आयोग) की रिपोर्ट का भी हवाला दिया था और साफ किया था कि राजनीतिक लांछन लगाने के लिए गांधी जी की हत्या के मामले में संघ का नाम जोड़ना पूरी तरह गलत और निराधार है।

गुरुजी का नेतृत्व, वैचारिक विस्तार और प्रतिबंध का काल


21 जून, 1940 को डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर सरसंघचालक बने। वे 1973 तक इस पद पर रहे। उनका जन्म 19 फरवरी, 1906 को नागपुर के निकट रामटेक में हुआ। उनके अनुयायी उन्हें ‘गुरुजी’ या ‘श्रीगुरुजी’ कहते हैं। वे संघ की वैचारिक नींव को मजबूत करने वाले प्रमुख व्यक्तित्व माने जाते हैं। वे मराठी करहाड़े ब्राह्मण परिवार से थे। उनकी माता लक्ष्मीबाई गोलवलकर धार्मिक और सादगीपूर्ण महिला थीं। परिवार में कुल छह भाई-बहन थे। माधवजी बचपन से अध्ययनशील, मृदुभाषी और गंभीर स्वभाव के माने जाते थे। उनके पिता सदाशिवराव शिक्षक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि से जुड़े थे। उन्होंने फर्ग्युसन कॉलेज, पुणे में पढ़ाई की और बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी.एससी. और एम.एससी. की शिक्षा प्राप्त की। कुछ स्रोतों में उनके कानून अध्ययन का भी उल्लेख मिलता है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वे महामना मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आए, जिनका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। अध्ययन काल में उनका झुकाव विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म तीनों की ओर था। वे अपने अध्यापकों के प्रिय विद्यार्थी थे और गहरे विश्लेषण की क्षमता के लिए जाने जाते थे। कुछ समय तक उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया और फिर नागपुर लौट आए। उनकी शिक्षा ने उन्हें वैचारिक लेखन, संवाद और शास्त्रार्थ की शक्ति दी।

गोलवलकर जी 1930 के दशक में डॉ. हेडगेवार के निकट आए। संघ के भीतर उन्हें मुख्यतः शिक्षा और प्रशिक्षण से जुड़े दायित्व दिए गए। 1937 से 1939 के बीच उन्होंने अखिल भारतीय अधिकारी प्रशिक्षण शिविर का आयोजन सफलतापूर्वक संभाला। इससे हेडगेवार ने उन्हें आगे के नेतृत्व के लिए तैयार किया। 1937 में उन्हें अखंड प्रचारक के रूप में नियुक्त किया गया, अर्थात उनका जीवन पूर्ण रूप से संघकार्य के लिए समर्पित हो गया। डॉ. हेडगेवार ने पहले उन्हें नागपुर की जिम्मेदारी दी, फिर संघ शिक्षा वर्ग का सर्वाधिकारी बनाया, फिर एक महीने के लिए बंगाल भेजा। हेडगेवार को लगता था कि ऐसे व्यक्ति को दूसरे सरसंघचालक के रूप में तैयार किया जाना चाहिए। इसलिए उन्हें सरकार्यवाह बनाकर नागपुर केंद्र में रखा गया।

उनके नेतृत्वकाल ने संघ की विचारधारा, संगठन-विस्तार और बाहरी प्रभाव—तीनों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। जब 1940 में हेडगेवार का देहांत हुआ, तब संघ का भविष्य अनेक लोगों को अनिश्चित दिखाई देता था। पर उसी समय एक शांत, मनीषी और गहरे वैचारिक व्यक्तित्व ने संगठन को संभाला। गुरुजी ने विचार को संगठन और दर्शन को व्यवहार में बदलने का प्रयास किया। उनके नेतृत्व में संघ ने स्वयं को केवल शाखा-आधारित संगठन नहीं। बल्कि एक जीवंत राष्ट्रीय चेतना के रूप में परिभाषित किया। उनके शब्दों में—“हमारा कार्य व्यक्ति-निर्माण है। व्यक्ति बनेगा तो राष्ट्र स्वयं उठ खड़ा होगा।” गुरुजी ने संघ की शाखाओं को पूरे देश में फैलाने का काम तेज किया। 1940 में जहाँ लगभग 500 शाखाएँ बताई जाती हैं, वहीं 1947 तक यह संख्या 5000 से अधिक पहुँचने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने संघ को केवल सांस्कृतिक संगठन नहीं। बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का साधन बताया। उनके भाषणों में “एक देश, एक समाज, एक संस्कृति” की भावना बार-बार प्रकट होती थी। शाखाओं की संख्या, प्रांतीय समन्वय और प्रचारक-प्रणाली में उनके नेतृत्व में बड़ी वृद्धि हुई। संघ के कई सामाजिक-शैक्षिक कदम इसी दौर में व्यवस्थित हुए। गुरुजी ने संघ को विचार-केंद्रित संगठन बनाया। उनका लेखन और भाषण संघ के वैचारिक आधार को परिभाषित करते रहे। वे संगठन के अनुशासन, आचार-नीति और भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि पर बल देते थे।

गुरुजी से जुड़ा “We, or Our Nationhood Defined” 1939-40 के आसपास का सबसे चर्चित ग्रंथ माना जाता है। ग्रंथ में राष्ट्र-परिभाषा, संस्कृति-केंद्रित दृष्टि और आंतरिक खतरे पर टिप्पणियाँ मिलती हैं। इसी कारण गुरुजी को समझने के लिए उनके अपने ग्रंथों, संघ-अभिलेखों और आलोचनात्मक अध्ययनों—तीनों का संतुलित अध्ययन आवश्यक माना जाता है। देश के विभाजन और सांप्रदायिक दंगों के समय गुरुजी ने स्वयंसेवकों को राहत, पुनर्वास और शरणार्थी सहायता कार्यों में लगाया। उन्होंने स्वयं दिल्ली, पंजाब और बंगाल के राहत शिविरों का दौरा किया। कराची में बमकांड में फँसे स्वयंसेवकों की सुरक्षित रिहाई हो या विभाजन के समय पीड़ितों से मिलने के लिए जान जोखिम में डालकर जाना—इन अनेक प्रसंगों में उनके निकट सहयोगी वासुदेव केशव थत्ते, जिन्हें आबाजी थत्ते कहा जाता था, उनके साथ उपस्थित रहे। आबाजी थत्ते को गुरुजी की परछाईं कहा जाता था। उन्होंने गुरुजी के साथ देश भर में प्रवास किया। उन्हें गुरुजी से जुड़े अनेक प्रसंग और घटनाएँ ज्ञात थीं, पर उन्होंने न तो उन्हें सार्वजनिक रूप से बताया, न लिखा, जबकि वे डायरी लिखा करते थे। एक बार किसी ने उनसे कहा कि आपके पास गुरुजी के साथ रहने का सबसे अधिक अनुभव है, आप पुस्तकें क्यों नहीं लिखते। उन्होंने उत्तर दिया—“श्रीराम के साथ हनुमान लंबे समय तक रहे। लेकिन श्रीरामचरित वाल्मीकि जी ने लिखा, हनुमान जी ने नहीं।” पूछने वाला निरुत्तर हो गया।

गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा, जो सर्वथा अप्रत्याशित था। प्रतिबंध के दौरान बाबूराव चौथाई वाले, जो जीवन भर प्रचारक न होते हुए भी सीधे सरसंघचालक से जुड़े रहे और जिन्हें सरसंघचालकों का पत्रलेखक कहा जाता था, उन्होंने गुरु गोलवलकर के निजी सामान—पत्र, कमंडल आदि—को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की। बाबूराव ने गुरु गोलवलकर के लगभग 11,000 पत्रों की प्रतिलिपि से ‘पत्ररूप श्री गुरुजी’ ग्रंथ बनाया। गुरु गोलवलकर पत्रों का उत्तर स्वयं लिखते थे, जबकि तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस पत्र का उत्तर बाबूराव को बता देते और बाबूराव उसे लिखते थे। गोलवलकर जी बालासाहेब का कितना सम्मान करते थे, इसका उल्लेख उनके निजी सचिव बाबूराव चौथाई वाले ने एक घटना में किया है। गोलवलकर जी अस्वस्थ थे। उनके देहावसान से पंद्रह दिन पहले बालासाहेब फूड प्वाइजनिंग के कारण बेहोश होकर गिर पड़े। जब गुरु गोलवलकर के देहावसान के बाद बालासाहेब को पता चला कि अंतिम पत्र में गुरुजी ने सरसंघचालक के लिए उनका नाम लिखा है, तो उनका पहला सवाल था—“हमारे स्वास्थ्य के बारे में गुरुजी को जानकारी थी?” यह पत्र बालासाहेब भिड़े ने पढ़ा था। इस तरह की कहानियाँ बाबूराव जैसे निकटस्थ कार्यकर्ताओं के कारण ही सामने आईं। डॉ. आबाजी थत्ते की बीमारी के दौरान बाबूराव चौथाई वाले ने कुछ समय गुरु गोलवलकर जी के साथ प्रवास किया। बाद में उन्होंने ‘मेरे देखे हुए श्री बालासाहेब देवरस’ नामक पुस्तक लिखी।


गांधी जी की हत्या के बाद डॉ गोलवलकर ने जो तार संदेश भेजे, जो श्रद्धांजलि के रुप में अपना लेख भेजा, इन सब दस्तावेज़ों की पंक्तियाँ गांधी जी से संघ के रिश्तों की तासीर बताने व इस घटना से संघ को महसूस हुई वेदना की कहानी कहते हैं। सरदार पटेल, पंडित नेहरु और देवदास गांधी को जो पत्र भेजे उसमें लिखा था—

“कल चेन्नै में वह भयंकर वार्ता सुनी कि किसी अविचार भ्रष्ट हृदय व्यक्ति ने पूज्य महात्मा जी पर गोली चलाकर उस महापुरुष के आकस्मिक असामयिक निधन का निर्घुण (घृणास्पद) कृत्य किया है। यह निंद्य कृत संसार के सामने अपने समाज पर कलंक लगाने वाला हुआ है। महात्मा जी का जीवन किसी समुदाय विशेष की सीमा से उठकर मानव समाज के हितार्थ समर्पित था। … जब से मैंने यह समाचार पाया। अंत: करण शून्य सा हो रहा है। निकट भविष्य कि भीषणता देख इस श्रेष्ठ संयोजक को तिरोधान से हृदय चिंता से भर गया है। विविध प्रवृत्तियों को एक सूत्र में पिरोकर उन्हें संन्मार्गगामी बनाने वाले कुशल कर्णधार पर यह आघात एक व्यक्ति से नहीं, किंतु संपूर्ण देश से देशद्रोह प्रतीत होता है। इस व्यक्ति के विषय में उचित व्यवहार आप के राज्य के सूत्र चालक करेंगे ही। यह व्यवहार कितना भी कठोर हो, तो भी घटित हानि की तुलना में यह सौम्य ही दिखेगा।देश की अपरिमित हानि हुई। .. अतुलनीय संगठक के तिरोधान से जो रिक्तता पैदा हुई है…।”

इसी प्रकार सरदार पटेल को लिखे पत्रों के शब्द व भाव थे—

“अखिल मानव समाज को हिलाने वाली दुर्घटना सुनी। इतनी दुष्ट ,निदंनीय घटना संभवत: कभी नहीं हुई होगी। हृदय अतीव पीड़ा से व्यथित हो उठा है। …पूर्ण जगत को दुःख से नि: शब्द करने वाल को क्या कहे? .. हम सभी उस महान कर्णधार के असामयिक स्वर्गवास से उत्पन्न ज़िम्मेदारी को सँभालें और इस भीषण संकटकालीन में सुचारु भावना,संयमित वाणी, स्नेहपूर्ण व्यवहार, से शक्ति संपन्न हो उठें और राष्ट्र जीवन स्थाई एकता से भर दें।उस महापुरुष का यही सच्चा पुण्य स्मरण होगा।”

एक फ़रवरी, 1948 को प्रेस को श्रद्धांजलि भेजी थी उसमें लिखा था—

”वर्तमान युग के परम आदरणीय तथा लोकप्रिय विभूति की हत्या पराकोटि का पाश्विक कृत्य है। .. यह समाचार सुनते ही मेरे मन में जो घृणातिरेक तथा दुख का उद्रेक हुआ , उसे प्रकट करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। यह एक अतुलनीय भीषण त्रासदी है, क्योंकि इसका खलनायक इस देश का नागरिक तो है ही, वह हिंदू भी है।..आज अपने देश की परिस्थिति अत्यंत विकट है। इस समय उस एकता निर्माता तथा शांति प्रस्थापक महात्मा की नितांत आवश्यकता थी।”

इसी के साथ महात्मा गांधी की स्मृति में संघ की सभी शाखाओं के दैनिक कार्यक्रम बंद कर तेरह दिन शोक मनाने का आदेश दिया। 1949 में प्रतिबंध हटने के बाद संघ ने संविधान और सार्वजनिक गतिविधियों का औपचारिक स्वरूप अपनाया। प्रतिबंध हटवाने के लिए वार्ता हुई और अंततः प्रतिबंध हटाया गया। इसके बाद 1949-50 में संघ ने अपने तंत्र को अधिक सार्वजनिक और संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप व्यवस्थित किया।

1950 से 1970 के बीच गुरुजी ने लगभग हर राज्य में जाकर हजारों सभाएँ कीं। उनके उद्बोधनों में आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और भारतीय संस्कृति के गौरव का विशेष उल्लेख रहता था। ‘विचार दर्शन’ जैसे हिंदी संकलनों में उनके 1940 से 1970 के बीच दिए गए प्रमुख उद्बोधनों का संग्रह मिलता है। उनका व्यक्तिगत जीवन अत्यंत सादा था। वे देशभर की यात्राओं में सामान्य स्वयंसेवकों के घर ठहरते, साधारण भोजन करते और मिलने वालों के नाम याद रखते। एक प्रसंग में शाखा में किसी युवा ने उन्हें पहचाना नहीं और कहा—“आप जमीन पर क्यों बैठे हैं, ऊपर बैठिए।” गुरुजी मुस्कराए और बोले—“संघ में ऊपर या नीचे कोई नहीं होता, सब स्वयंसेवक हैं।” गांधीजी के निधन के बाद जब देश में उथल-पुथल थी, उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि गांधीजी ने जिस एकता और अहिंसा का संदेश दिया, वही समाज-निर्माण की दिशा में प्रेरक होना चाहिए।

गोलवलकर जी के काल में संघ के लिए शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक क्षेत्रों में अनेक संबद्ध संस्थाएँ सक्रिय हुईं। संघ का प्रभाव गाँव-कस्बों से लेकर शहरों तक फैलने लगा। गोलवलकर जी के विचारों ने सांगठनिक आधार दिया। आधुनिक समय में उनके योगदान की व्याख्या अलग-अलग दृष्टियों से की जाती है। गुरुजी का निधन 5 जून, 1973 को नागपुर में हुआ।

सांगठनिक विस्तार, स्मृतियाँ और परंपराएँ

संघ का विस्तार शब्दों से नहीं, कर्म और जीवित संपर्क से हुआ। इसीलिए बाढ़, भूकंप, अकाल—जहाँ-जहाँ भी प्राकृतिक आपदा आई—वहाँ संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे दिखे। 1967 का अकाल, लातूर का भूकंप, बिहार की विनाशकारी बाढ़, उत्तराखंड का प्रकृतिक प्रकोप, चरखी दादरी में विमान दुर्घटना, सुनामी और सबसे हालिया जम्मू-कश्मीर की बाढ़—हर जगह स्वयंसेवकों की भूमिका भुलायी नहीं जा सकती। हर आपदा में उनकी उपस्थिति सामाजिक संवेदनशीलता का ठोस प्रमाण है। भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन युद्धों के समय भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। निःसंदेह इसी कारण जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री जैसे प्रधानमंत्रियों ने गणतंत्र दिवस परेड में आरएसएस की टुकड़ी को शामिल होने का गौरव दिया। ‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म देखिए—निर्माता-निर्देशक फरहान अख्तर की यह फिल्म हैं। वह प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर के सुपुत्र हैं। फिल्म के एक दृश्य में, जब पाकिस्तान से आए शरणार्थी लालकिले के आसपास डेरा डाले हैं, उन्हें भोजन कराने वाला जो व्यक्ति दिखता है, वह गणवेशधारी स्वयंसेवक है। दृश्य पल भर का है, पर यह बताता है कि निर्माता-निर्देशक, चाहकर भी एक बड़े सत्य से आँख नहीं चुरा पाए।

भूदान आंदोलन, गो-रक्षा आंदोलन या डॉ. राममनोहर लोहिया-जयप्रकाश नारायण आदि के नेतृत्व में हिंदी की प्रतिष्ठा और व्यवस्था-परिवर्तन के लिए हुए हर आंदोलन में संघ के लोगों ने जाति, धर्म, पंथ, क्षेत्र, सम्प्रदाय, भाषा और आपसी राग-द्वेष से ऊपर उठकर शिरकत की। हैदराबाद विलय, कश्मीर विलय, गोवा मुक्ति, ‘असम बचाओ’ जैसे राष्ट्रीय एकता अभियानों में स्वयंसेवकों की उपस्थिति निर्णायक सिद्ध हुई। हर जगह बिना बुलावे उपस्थित रहना, आरएसएस को ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के साथ-साथ ‘Ready for Selfless Service’ की संज्ञा वाला संगठन भी बना देता है।

संघ की परंपरा में कुछ पर्वों का विशेष महत्व है। संघ छह प्रमुख पर्व मनाता है—चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विजयादशमी, हिंदू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा, मकर संक्रांति और रक्षा बंधन। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार का जन्मदिन माना जाता है। विजयादशमी से डॉ. हेडगेवार के जीवन का एक बड़ा विरोध-प्रदर्शन भी जुड़ा था। और 27 सितंबर, 1925 को संघ की स्थापना भी दशहरे के दिन ही हुई। हिंदू साम्राज्य दिवस का संबंध विक्रम संवत 1731 की ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से है, जब छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। गुरु पूर्णिमा संघ की गुरु-दक्षिणा परंपरा से जुड़ी है। नाना पालकर ने गुप्त धन लेने की परंपरा का श्रेय डॉक्टर जी को दिया है। पहले गुरु-दक्षिणा उत्सव में 84 रुपये आए थे। संघ गुरु-दक्षिणा के धन से चलता रहा। एक अन्य पर्व उस दिन से जुड़ा है जब डॉक्टर जी को आद्य सरसंघचालक घोषित किया गया था। इस दिन आद्य सरसंघचालक प्रणाम कहा जाता है।

संघ के विस्तार में प्रांतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। 1949 में प्रतिबंध हटने के बाद गुरु गोलवलकर ने उड़ीसा पर भी विशेष ध्यान दिया और बाबूराव पालधिकर को उड़ीसा का पहला प्रांत प्रचारक बनाकर भेजा। 1936 में उड़ीसा अलग राज्य बना था। अनंत लाल श्रीवास्तव ने पश्चिम उड़ीसा के संबलपुर में, पूर्णानंद स्वामी ने दक्षिण उड़ीसा के गंजाम में, और डॉ. बी. एस. मुंजे के भतीजे मुकुंद राव मुंजे मध्य प्रदेश के बिलासपुर से कटक में शाखा शुरू करने आए। 1942/1949 के आसपास प्रतिबंध हटने के बाद संघ ने उड़ीसा को एक राज्य के रूप में प्रांत घोषित किया। प्रतिबंध हटने के बाद कांग्रेस नेता नीलकंठ दास ने संघ की मदद की। नीलकंठ दास को अक्टूबर 1950 में नागपुर में आयोजित प्रतिष्ठित विजयादशमी उत्सव की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया। जब नीलकंठ जी नागपुर आए तो गुरु गोलवलकर स्वयं स्टेशन पर अपने अतिथि को लेने पहुँचे।

संघ के पूर्वोत्तर विस्तार में भी अनेक कार्यकर्ताओं की भूमिका रही। हॉकी खिलाड़ी ठाकुर राम सिंह ने कामाख्या राव बरुआ के साथ असम में संघ को खड़ा किया। वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य असम में 1977-78 में शुरू हुआ और इसकी जिम्मेदारी वसंतराव भट्ट को मिली। कृष्ण राव सप्रे को पूर्वोत्तर का भगीरथ कहा जाता था। श्यामल सेन गुप्ता, दिनेंद्र नाथ डे, सुधामय दत्ता, शुभंकर चतुर्वेदी, मधु लिमये, सतीश और सुनील त्रिवेदी, अतुल जोग, गजानन बापट और डॉ. रामगोपाल गुप्त जैसे नाम भी संघ के विभिन्न क्षेत्रों के प्रसार और कार्य-विस्तार में उल्लेखनीय रहे।

चमन लाल का उल्लेख भी संघ की कथा में महत्वपूर्ण है। अगस्त 2021 में वेंकैया नायडू ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया। अजय वैष्णव के अनुसार मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने अपने बेटे के विवाह में चमन लाल को पोर्ट लुई बुलवाया था। कश्मीर आंदोलन के समय गुरु गोलवलकर ने चमन लाल के हाथ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक पत्र भेजकर सावधान किया था। यह प्रसंग संघ और तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीति के बीच संवाद की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। इसी संदर्भ में सावरकर के छोटे भाई की मॉब लिंचिंग में मृत्यु का उल्लेख भी आता है।

वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत का संघ-संसार भी पुराने कार्यकर्ताओं की परंपरा से जुड़ा है। वह 1994 से 1999 तक बिहार के क्षेत्र प्रचारक रहे। इस दौरान उन्होंने बिहार और झारखंड के सुदूर क्षेत्रों की यात्रा सरकारी बसों और स्वयंसेवकों की मोटरसाइकिलों पर बैठकर की। उनके दादा श्री नारायण पांडुरंग, जिन्हें नाना साहेब कहा जाता था, डॉ. हेडगेवार के साथ थे। नाना साहेब कांग्रेस से भी जुड़े रहे और उन्होंने इलाहाबाद से एलएलबी किया। चंद्रपुर में वे संघ कार्य के खेवनहार बने। मोहन भागवत के पिता मधुकर राव भागवत ने लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी को प्रशिक्षित किया। गुजरात में संघ को खड़ा करने का श्रेय मधुकर राव जी को दिया जाता है। नरेंद्र मोदी ने अपनी पुस्तक ‘ज्योति पुंज’ में मधुकर राव के बारे में विस्तार से लिखा है।


बालासाहेब देवरस का पूरा नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस था। बालासाहेब और उनके भाई भाऊराव देवरस एक समय निष्क्रिय हो गए थे, पर गुरुजी के आग्रह पर वे वापस आए। बालासाहेब देवरस ने पहले और दूसरे सरसंघचालक के चित्रों को भारत माता के चित्र के साथ लगाने का निर्देश दिया था। आगे चलकर बालासाहेब देवरस ने संघ को सामाजिक संवाद, सेवा और विस्तार की दिशा में नए चरण में पहुँचाया।

1949 में सबसे पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना हुई। इसके बाद 1990 में सेवा विभाग। 1994 में संपर्क विभाग का काम आरंभ हुआ। अभी जीवन व समाज के अलग अलग क्षेत्रों में काम करने वाले बत्तीस आनुषंगिक संगठन हैं। जो इन दिनों सात तरह के कार्यक्रम को परिणाम तक पहुँचाने में लगे हैं। इन दिनों संघ के पास पुराने कामों में जो काम बचा हुआ है, वह मतातंरण व समान नागरिक संहिता हैं। बाक़ी धारा 370 की समाप्ति, संघ शाखाओं का देश भऱ में विस्तार, राम मंदिर निर्माण, तीन तलाक़ जैसे महत्व के मुद्दे वह पूरे कर अंजाम तक पहुँचा चुका हैं। आज उसने पंच परिवर्तन—सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, स्व आधारित जीवन, नागरिक कर्तव्य व शिष्टाचार इन सब को अपने एजेंडे में लिया है।

आज पूरे भारत में कुल 924 जिलों में से 98.3 प्रतिशत जिलों में संघ की शाखाएं चल रही हैं। कुल 6618 खंडों में से 92.3 प्रतिशत खंडों (तालुका), कुल 58,939 मंडलों में से (मंडल यानी दस बारह गाँवों का समूह) 52.2 प्रतिशत मंडलों में, 51,710 स्थानों पर 83,129 दैनिक शाखाएं तथा अन्य 26,460 स्थानों पर 32,146 साप्ताहिक मिलन केंद्रों के माध्यम से संघ कार्य का देश व्यापी विस्तार हुआ हैं। 83,129 दैनिक शाखाओं में से 59 प्रतिशत प्रतिशत शाखाएं छात्रों की 41 प्रतिशत व्यवसायी स्वयंसेवकों की है। चालीस साल से ऊपर के प्रौढ़ स्वयं सेवकों की केवल 11 प्रतिशत शाखाएं हैं।

नैतिक अधिष्ठान

‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ और ‘वंदेमातरम्’ के भाव के बाद, भारत को भूगोल भर नहीं। बल्कि संस्कृति-अध्यात्म और ‘भारत माता’ के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय भी संघ को जाता है। राजनीति के क्षेत्र में भावनात्मक राष्ट्रवाद की अवधारणा संघ की ही देन है। वैश्वीकरण के दौर में आर्थिक राष्ट्रवाद का कोई ठोस खाका ‘स्वदेशी’ के अतिरिक्त बन ही नहीं पाया। भारतीय गौरव की प्रतिष्ठा में संघ की सक्रियता नजरअंदाज नहीं की जा सकती। इन सब सच्चाइयों को अनदेखा कर, यदि केवल ‘विरोध के लिए विरोध’ की तर्ज़ पर संघ की मुखालफत की जाए, तो वह विवेकपूर्ण रुख नहीं होगा—क्योंकि अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के सिवा संघ को किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति से कुछ चाहिए ही नहीं। जो स्वयंसेवक भाजपा में आते भी हैं, उनकी राजनीति नहीं—‘संस्कृति’ ही संघ की प्राणवायु है। उनका दैनिक अनुशासन, दिनचर्या और रहन-सहन प्रमाण है कि वे राजनीति करने वाले अन्य लोगों से कितने भिन्न हैं।

संघ-विचार के आलोचकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश-गौरव की स्थापना हेतु प्रतिबद्ध कोई भी व्यक्ति या संगठन, यदि सरकार के निर्माण में अपना तप-बल लगाए, तो वह स्वाभाविक ही जानना चाहेगा कि देश सचमुच किस दिशा में जा रहा है—और यह जानना तो लोकतंत्र में हर मतदाता का अधिकार है। संघ तो उन मतदाताओं का सशक्त समूह है जो लोकतंत्र को निरंतर खाद-पानी देता है—वह पक्ष भी है, विपक्ष भी; वह टोकता भी है और खड़ा भी करता है; वह समर्थक भी है, आलोचक भी। उसकी इन द्विविध भूमिकाओं और देश के लिए किए गए तप के आगे सरकारों का कद बौना पड़ता है। ऐसे में यदि सरकार संघ की शरण में जाती है, तो उसे राजनीतिक नहीं—नैतिक दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए।

( मूलरूप से 13 सितंबर,2015 को प्रकाशित ।)

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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