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संघ की प्राणवायु
RSS History Explained in Hindi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास, विचारधारा और सौ वर्षों की यात्रा जानिए। हेडगेवार से मोहन भागवत तक, संघ की कार्यकर्ता परंपरा, भाजपा से संबंध और सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव की पूरी कहानी।
RSS Ka Itihas Kya Hai: ‘संघं शरणं गच्छामि।’ भारतीय चिंतन की परंपरा में इस उद्घोष का संबंध गौतम बुद्ध और उनके द्वारा स्थापित भिक्षु संघ से है। लेकिन आधुनिक भारत के राजनीतिक विमर्श में ‘संघ’ और ‘शरण’ जैसे शब्दों ने नए अर्थ भी ग्रहण किए हैं। आज सार्वजनिक जीवन में जब ‘संघ’ की चर्चा होती है, तो प्रायः उसका संकेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर होता है। देश में जब भी संघ और केंद्र सरकार के संबंधों को लेकर कोई बड़ा प्रसंग सामने आता है, राजनीतिक बहस तेज हो जाती है। संघ के पदाधिकारियों के समक्ष सरकार के मंत्रियों द्वारा अपने कामकाज का विवरण प्रस्तुत करने से लेकर भाजपा की नीतियों और नेतृत्व में संघ की भूमिका तक, अनेक प्रश्न बार-बार उठते रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में सरसंघचालक मोहन भागवत और अन्य प्रमुख स्वयंसेवकों के समक्ष मंत्रियों द्वारा कामकाज की प्रस्तुतियाँ दिए जाने के प्रसंग को भी विपक्ष ने सरकार पर संघ के प्रभाव के प्रमाण के रूप में देखा था। आलोचकों के लिए यह संवैधानिक सरकार पर एक वैचारिक संगठन का प्रभाव है, जबकि संघ और भाजपा से जुड़े लोग इसे समान वैचारिक पृष्ठभूमि वाले संगठनों के बीच स्वाभाविक संवाद बताते हैं। प्रश्न केवल इतना नहीं है कि संघ सरकार को प्रभावित करता है या सरकार संघ की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरती है। बड़ा प्रश्न यह है कि एक शताब्दी पहले नागपुर में कुछ युवाओं के साथ आरंभ हुआ संगठन भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और सार्वजनिक चेतना में इतना प्रभावशाली कैसे हो गया कि उसके समर्थन और विरोध के बिना समकालीन भारत की राजनीतिक कथा अधूरी दिखाई देती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच नाभि-नाल का संबंध है। दोनों का रिश्ता वैचारिक भी है और संगठनात्मक इतिहास से उपजा हुआ भी। किंतु दोनों को एक ही संस्था मान लेना संघ के स्वरूप को समझने में भूल होगी। संघ की अपनी मान्यता है कि राजनीति राष्ट्रजीवन का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र अवश्य है। लेकिन वही राष्ट्रजीवन का संपूर्ण स्वरूप नहीं है। उसके चिंतन में संस्कृति, सामाजिक संगठन, चरित्र-निर्माण, राष्ट्रीय अस्मिता और सेवा को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। इसीलिए संघ अपने राजनीतिक संबंधों की व्याख्या करते हुए प्रायः इस धारणा पर बल देता है कि राजनीति साधन है, साध्य नहीं। इसके विपरीत आलोचक मानते हैं कि संघ ने स्वयं को प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति से अलग रखते हुए भी राजनीतिक निर्णयों, सत्ता-संरचना और सार्वजनिक नीतियों पर प्रभाव डालने की असाधारण क्षमता विकसित की है। भारतीय लोकतंत्र में संघ की वास्तविक भूमिका को समझने के लिए इन दोनों दृष्टियों को देखना आवश्यक है। स्वतंत्रता के बाद देश का अधिकांश सार्वजनिक विमर्श राज्यसत्ता, राजनीतिक दलों और सरकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। संघ का संगठनात्मक विस्तार इस सत्ता-केंद्रित दृष्टिकोण से अलग एक सामाजिक प्रयोग के रूप में आरंभ हुआ था। लेकिन समय के साथ उसका राजनीतिक प्रभाव भी लगातार बढ़ता गया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिले व्यापक जनसमर्थन के संदर्भ में भी संघ के कुछ स्वयंसेवकों की भूमिका को लेकर चर्चाएँ होती रही हैं। इसे संघ द्वारा कांग्रेस के पक्ष में किसी औपचारिक निर्णय का निर्विवाद प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यह प्रसंग संघ और भाजपा के संबंधों को यांत्रिक रूप से देखने की सीमा अवश्य सामने लाता है।
किसी संगठन की शक्ति केवल उसकी सदस्य-संख्या, कार्यालयों, संसाधनों अथवा राजनीतिक पहुँच में नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति उस विचार में निहित होती है जिसे उसके कार्यकर्ता अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक शताब्दी लंबी यात्रा को इसी कसौटी पर समझना अधिक सार्थक है। उसकी शाखाएँ, गणवेश, प्रार्थना, अनुशासन, पदाधिकारी, प्रचारक और संबद्ध संस्थाएँ संगठन के दिखाई देने वाले अंग हैं; किंतु इनके पीछे ऐसी कार्यकर्ता-परंपरा विकसित हुई जिसने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर सामूहिक उद्देश्य को प्रतिष्ठित करने का दावा किया। इस दावे की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ और सीमाएँ दोनों हैं। इसलिए संघ की प्राणवायु की खोज केवल उसके संस्थापक अथवा सरसंघचालकों की जीवनियों में नहीं बल्कि उन सामान्य स्वयंसेवकों के जीवन में भी करनी होगी जिन्होंने संगठन को अपने समय, श्रम, पारिवारिक सहयोग और व्यक्तिगत त्याग से सींचा।
इस यात्रा की शुरुआत डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से होती है। उनका जन्म 1 अप्रैल, 1889 को नागपुर के एक मराठीभाषी पुरोहित परिवार में हुआ। उनके परिवार की पैतृक जड़ें वर्तमान तेलंगाना के क्षेत्र से जुड़ी थीं, जहाँ से उनके पूर्वज नागपुर आकर बसे थे। उनके पिता बलिराम पंत हेडगेवार धार्मिक अध्ययन और पुरोहिताई से जुड़े थे। परिवार में उनके दो बड़े भाई महादेव शास्त्री और सीताराम शास्त्री भी थे। बालक केशव का जीवन आरंभ से ही आर्थिक कठिनाइयों और पारिवारिक संकटों के बीच बीता। 1902 में फैली प्लेग महामारी ने उनके माता-पिता को छीन लिया। इसके बाद परिवार के परिचितों, संबंधियों और शुभचिंतकों के सहयोग से उनकी शिक्षा आगे बढ़ी। उन्होंने नागपुर, यवतमाल और पुणे में अध्ययन किया। बचपन से ही उनमें अंग्रेजी शासन के प्रति असहमति और स्वदेशी चेतना दिखाई देती थी। उनके व्यक्तित्व को समझने वाले जीवनीकारों ने अनेक ऐसे प्रसंग दर्ज किए हैं जो उनकी बाल्यावस्था में विकसित राष्ट्रीय भावना का परिचय देते हैं।
एक प्रसंग 1897 का है। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के शासन के साठ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भारत के अनेक विद्यालयों में समारोह आयोजित हुए और बच्चों को मिठाइयाँ बाँटी गईं। संघ की जीवनी-परंपरा के अनुसार आठ वर्षीय केशव ने अंग्रेजी सत्ता के इस उत्सव में मिली मिठाई खाने से इनकार कर दिया और उसे फेंक दिया। एक अन्य प्रसंग एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण समारोह का है। नागपुर की एम्प्रेस मिल को सजाया गया, आतिशबाजी की व्यवस्था हुई और लोगों में उत्सव देखने का आकर्षण था। लेकिन केशव वहाँ नहीं गए। उनका तर्क था कि जिस विदेशी सत्ता ने देश को अधीन बना रखा है, उसके राजा का उत्सव मनाने में गौरव की कोई बात नहीं हो सकती।
केशव को अंग्रेजी शिक्षा के लिए नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में प्रवेश दिलाया गया। इसी दौरान बंगाल विभाजन के विरोध में देशभर में स्वदेशी आंदोलन और ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष राष्ट्रीय प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके थे। 1905 के बंग-भंग के बाद उठी राजनीतिक चेतना की लहर नागपुर तक पहुँची। 1908 में विद्यालय के निरीक्षण के लिए सरकारी अधिकारी आए तो केशव और उनके साथियों ने ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष किया। इस विरोध के कारण उन्हें विद्यालय से निष्कासन का सामना करना पड़ा। संघ की जीवनियों में वर्णित है कि अन्य विद्यार्थियों ने अनुशासनात्मक कार्रवाई से बचने के लिए क्षमा माँग ली, किंतु केशव अपनी बात पर अड़े रहे। इसी घटना ने उनके जीवन को सामान्य शिक्षा की दिशा से हटाकर राजनीतिक सक्रियता की ओर और अधिक प्रेरित किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के स्वराज्य संबंधी विचारों का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। स्वदेशी, आत्मसम्मान और संगठन की भावना उनके चिंतन के स्थायी तत्व बन गए।
आगे चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे कलकत्ता गए, जहाँ उन्होंने नेशनल मेडिकल कॉलेज में अध्ययन किया। कलकत्ता उस समय क्रांतिकारी गतिविधियों, राष्ट्रवादी छात्र आंदोलनों और गुप्त संगठनों का महत्वपूर्ण केंद्र था। हेडगेवार का संपर्क अनुशीलन समिति से जुड़े क्रांतिकारी परिवेश से भी हुआ। अनुशीलन समिति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध से जुड़ी प्रमुख संस्थाओं में थी। हेडगेवार ने चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। लेकिन चिकित्सकीय पेशे को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाने के बजाय राष्ट्रीय आंदोलन और संगठनात्मक कार्य में सक्रिय रहने का निर्णय किया। डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे जैसे वरिष्ठ राष्ट्रवादी नेताओं से उन्हें मार्गदर्शन मिला। विनायक दामोदर सावरकर और उस दौर के हिंदू राष्ट्रवादी चिंतन का प्रभाव भी उनके वैचारिक विकास के संदर्भ में उल्लेखनीय माना जाता है। यद्यपि इन सभी व्यक्तियों और विचारधाराओं से उनके संबंधों की प्रकृति अलग-अलग थी, उनकी वैचारिक यात्रा में राजनीतिक स्वाधीनता के साथ सांस्कृतिक संगठन की आवश्यकता लगातार प्रमुख होती गई।
1914 में छह वर्ष का कारावास पूरा करके लोकमान्य तिलक भारत की राजनीतिक गतिविधियों में लौटे तो उनके नेतृत्व वाला राष्ट्रवादी धड़ा अनेक कठिनाइयों का सामना कर रहा था। नागपुर में राष्ट्रवादी गतिविधियों के संचालन में हेडगेवार की भूमिका बढ़ी। वे कांग्रेस के कार्यक्रमों से जुड़े और स्थानीय स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। दिसंबर, 1920 में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में हुआ। इसकी व्यवस्थाओं में हेडगेवार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। तिलक का निधन उसी वर्ष 1 अगस्त को हो चुका था। इसके बाद कांग्रेस की राजनीति में महात्मा गांधी के असहयोग, स्वदेशी और जनांदोलन की कार्यपद्धति का प्रभाव बढ़ा। हेडगेवार ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया। विदेशी शासन के विरुद्ध भाषण दिए और राष्ट्रवादी गतिविधियाँ संचालित कीं। ब्रिटिश सरकार ने उनके भाषणों को राजद्रोहपूर्ण मानकर मुकदमा चलाया। उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और 12 जुलाई, 1922 को वे जेल से रिहा हुए। खिलाफत और असहयोग आंदोलनों के दौरान हिंदू-मुस्लिम संबंधों तथा कांग्रेस की राजनीतिक नीति को लेकर उनके मन में उत्पन्न प्रश्न भी आगे उनके संगठनात्मक चिंतन का हिस्सा बने।
स्वतंत्रता आंदोलन में हेडगेवार की भागीदारी और स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्थागत भूमिका के बीच अंतर करना आवश्यक है। हेडगेवार संघ की स्थापना से पहले कांग्रेस और क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे थे। संघ की स्थापना के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलनों से अपना व्यक्तिगत संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं किया। 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेने के कारण वे कारावास गए। इस दौरान संघ का दायित्व डॉ. लक्ष्मण वामन परांजपे को सौंपा गया। नागपुर के ध्वज सत्याग्रह सहित तत्कालीन राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़े अनेक स्वयंसेवकों के व्यक्तिगत योगदान का भी उल्लेख किया जाता है। किंतु संघ ने स्वयं को कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन की एक संगठनात्मक शाखा के रूप में विकसित नहीं किया। उसने प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष के बजाय हिंदू समाज के दीर्घकालिक संगठन को प्राथमिकता दी। इसलिए यह कहना कि हेडगेवार का स्वतंत्रता संघर्ष से कोई संबंध नहीं था, इतिहास की अनदेखी होगी।
1922 में जेल से लौटने के बाद हेडगेवार ने भारतीय समाज और स्वतंत्रता आंदोलन की दशा पर गंभीर चिंतन किया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना आवश्यक है। लेकिन यदि समाज भीतर से विभाजित, अनुशासनहीन और आत्मविश्वास से वंचित रहा तो स्वतंत्रता की रक्षा कठिन होगी। वे हिंदू समाज के भीतर जातिगत विभाजन, सामाजिक दूरी, आपसी अविश्वास और सामूहिक संगठन के अभाव को राष्ट्रीय दुर्बलता का कारण मानते थे। उनका समाधान किसी नए राजनीतिक दल की स्थापना में नहीं बल्कि ऐसे नियमित संगठनात्मक अभ्यास में था जो सामान्य व्यक्तियों में नेतृत्व, आत्मसंयम, साहस, सामूहिकता और राष्ट्रभाव विकसित कर सके। इसी चिंतन का परिणाम 27 सितंबर, 1925, विजयादशमी के दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के रूप में सामने आया। उस दिन कुछ सहयोगियों के साथ हेडगेवार ने अपने घर पर इस नए संगठनात्मक प्रयोग की शुरुआत की। बाद में 28 मई, 1926 को नागपुर के मोहिते बाड़ा में नियमित दैनिक शाखा आरंभ हुई। मोहिते बाड़ा का वह परिसर, जहाँ खेलकूद, व्यायाम, दंड-अभ्यास और सामूहिक प्रशिक्षण शुरू हुआ, संघ की स्मृति में उसके प्रारंभिक विस्तार का प्रतीक बन गया।
हेडगेवार ने संघ को प्रत्यक्ष धार्मिक अनुष्ठानों अथवा चुनावी राजनीति पर केंद्रित संस्था के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक स्वयंसेवक संगठन के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। संघ का घोषित उद्देश्य हिंदू समाज में संगठन, अनुशासन, राष्ट्रीय चेतना, आत्मबल और सामाजिक एकता विकसित करना था। शाखा इसका आधार बनी। यहाँ नियमित उपस्थिति, खेल, व्यायाम, दंड-अभ्यास, पथ-संचलन, प्रार्थना, बौद्धिक चर्चा और सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण का प्रयास किया गया। ‘एकशः संपत्’ जैसी आज्ञाएँ पंक्तिबद्ध अनुशासन का अभ्यास कराती थीं। शाखा में मुख्य शिक्षक की आज्ञा का पालन सामूहिक व्यवस्था का अंग माना गया। पद, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षा नियमितता तथा कार्यनिष्ठा पर बल देने की परंपरा विकसित हुई। हेडगेवार के दृष्टिकोण को संस्कृत के ‘वादानवलम्ब्य’ और ‘सर्वेषाम् अविरोधेन’ जैसे सूत्रों से भी व्यक्त किया गया—अर्थात अनावश्यक वाद-विवाद से बचकर तथा यथासंभव किसी के प्रति विरोध का भाव रखे बिना सामाजिक संगठन का कार्य करना।
संघ का एक महत्वपूर्ण वैचारिक आग्रह राष्ट्र और राज्य के बीच अंतर को लेकर रहा। पश्चिम के आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा में राजनीतिक सीमाओं, राजसत्ता और नागरिकता को केंद्रीय स्थान प्राप्त है, जबकि संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में भारत की प्राचीन सभ्यता, साझा सांस्कृतिक स्मृति, परंपराएँ और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक संबंध महत्वपूर्ण माने जाते हैं। संघ भारत को केवल भूगोल या उपभोग की भूमि नहीं, बल्कि मातृभूमि और सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखता है। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ और ‘वंदे मातरम्’ के भाव इसी दृष्टि के आधार हैं। संघ के समर्थक इसे भारतीय राष्ट्रचेतना की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति मानते हैं, जबकि आलोचकों का प्रश्न है कि धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं वाले आधुनिक भारत में इस अवधारणा के भीतर सभी समुदायों की समान भागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी।
संघ की स्थापना के बाद आरंभिक महीनों में संगठन का कोई औपचारिक नाम निर्धारित नहीं था। डॉ. हेडगेवार ने 17 अप्रैल, 1926 को अपने निवास पर एक बैठक बुलाई, जिसमें छब्बीस स्वयंसेवकों के उपस्थित होने का उल्लेख मिलता है। बैठक में संगठन के नाम पर विचार किया गया। ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’, ‘ज़री पटका मंडल’ और ‘भारतोद्धार मंडल’ प्रमुख प्रस्ताव थे। ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’, ‘शिवाजी संघ’ और ‘महाराष्ट्र सेवक संघ’ जैसे नाम भी चर्चा में आए। संघ की परंपरा में वर्णित विवरण के अनुसार बीस स्वयंसेवकों ने ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम का समर्थन किया और पाँच ने ‘ज़री पटका मंडल’ को पसंद किया। ‘ज़री पटका’ नाम का संबंध मराठा और पेशवाई परंपरा से था तथा इसे प्रथम वर्ष के एक छात्र द्वारा सुझाया गया बताया जाता है। अंततः ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम स्वीकार किया गया। इस नाम में राष्ट्र को उद्देश्य, स्वयंसेवा को कार्यपद्धति और संघ को संगठनात्मक स्वरूप के रूप में समाहित माना गया।
संघ की शाखा-पद्धति की विशेषता यह थी कि उसने संगठन निर्माण को किसी असाधारण अवसर, आंदोलन अथवा बड़े सम्मेलन पर निर्भर नहीं रहने दिया। दैनिक शाखा ने संगठन को निरंतरता प्रदान की। सामान्य व्यक्ति रोज कुछ समय एक निश्चित स्थान पर पहुँचकर सामूहिक अभ्यास करे, अपने से भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से मिले और धीरे-धीरे सार्वजनिक कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त करे—यह देखने में साधारण लेकिन संगठनशास्त्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रयोग था। ऐसे प्रयोग की शक्ति उसकी पुनरावृत्ति में छिपी होती है। वही कार्य जो एक दिन में मामूली दिखाई देता है, दशकों के अभ्यास से स्थायी सामाजिक नेटवर्क का रूप ले सकता है।
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