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शब्द यात्रा
गोपाल चतुर्वेदी द्वारा योगेश मिश्र की किताब ‘शब्द पथ’ की समीक्षा—समसामयिक घटनाओं, संवेदनाओं और वैचारिक पत्रकारिता की सशक्त झलक।
Shabd Yatra (Image Credit-Social Media)
Shabd Yatra: योगेश मिश्र एक वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार हैं। शब्द पथ में संकलित उनके 2016 से 2017 तक की घटनाओं पर लिखे लेख हैं। इन्हें उनकी वैचारिक प्रतिक्रिया कहना अधिक उचित होगा। इनको पढ़ने से, उन पर लोहिया के चिंतन का प्रभाव झलकता है, वहीं उस घटना के संदर्भ-बिंदु से उनका व्यापक अध्ययन भी। वे अपने समय के सार्थक प्रहरी हैं और एक सजग पत्रकार की भूमिका से भली-भांति परिचित ही नहीं, उसे निभाने को कृतसंकल्प भी हैं। तभी उन्होंने अपने युग की ध्वनि-प्रतिध्वनि को पकड़ने का जीवंत प्रयास किया है। इसीलिए वे कहते हैं कि —
“मैं आज भी समय और समाज के विभिन्न पहलुओं की बेचैन प्रवृत्तियों की शिनाख्त करने के लिए प्रयासरत हूं।”
संग्रह के पहले लेख का शीर्षक ‘धर्म’ है। इसका प्रारम्भ हरियाणा के चन्द्रमोहन और अनुराधा वाली की प्रेम-कथा, विवाह और तलाक से होकर धर्म को आस्था के स्थान पर लाभ-हानि और सुविधा-सुभीते से जोड़ता है, क्योंकि इस युगल ने वैवाहिक रिश्ते के लिए इस्लाम में धर्म परिवर्तन किया था। चलते-चलते इस अवधारणा को सिद्ध करने योगेश राजस्थान के एक अधिकारी सालोरिया की शिकायत को भी निवटाने चलते हैं कि वे रेवेन्यू बोर्ड के चेयरमैन होकर सेवानिवृत्त हुए, जबकि वरिष्ठता के बावजूद उन्हें दलित होने के कारण मुख्य सचिव नहीं बनाया गया। सालोरिया भूलते हैं कि उनके विरुद्ध जमीन घोटाले का गंभीर आरोप भी दर्ज था। योगेश की टिप्पणी कि—देश की सर्वोच्च सेवा में 37 साल बिताने के बाद सालोरिया दलित कैसे रह जाते हैं?—बात सर्वथा उचित है। लेखक कई उदाहरण देकर सिद्ध करते हैं कि राजनेता खुद पर लगे आरोपों को नकारने हेतु दलित की ढाल लिए प्रस्तुत रहते हैं। मायावती हों या जीतनराम मांझी, दलित अफसर भी कब मौका चूकते हैं, जैसे मुलायम और लालू की पार्टी के शासन काल में पिछड़े अधिकारी?
कई उदाहरणों के पश्चात योगेश के दो निष्कर्ष सामने आते हैं—
मलाईदार पोस्टिंग के जमाने में बाजार ने यहां भी जगह बना ली है और राजनेता नौकरशाह की ताकत चाहता है, जबकि नौकरशाह राजनेता की सत्ता। सब शॉर्टकट के पक्षधर हैं। ‘समय’ उमराव सालोरिया के बहाने नौकरशाही के आईने के सामने खड़े होने का है।
इस लेख की कुछ विस्तार से चर्चा मैंने इसलिए की कि हर घटना की तह में जाना तथा वैसी ही दूसरी घटनाओं के उदाहरण देकर तार्किक निष्कर्ष निकालना योगेश की शैली है। चाहे उनके लेख ‘शर्मिंदा होने की सही वजह’ हों या फिर ‘सियासत का कद मुल्क से ऊंचा’, अथवा ‘डूबी अगस्ताझील के उतराते सवाल’ हों या फिर ‘इस लोकतंत्र की वलिहारी’—योगेश जी के समसामयिक लेखों का एक अन्य तथ्य महत्वपूर्ण है कि उनके पास विषयों की विविधता है। वे खेल से लेकर ‘हर मन पानी राखिए’ तक अपने अध्ययन की गहराई के कारण लिखने में समर्थ हैं। उनके पास न आंकड़ों का अभाव है, न उदाहरण का।
डॉ. लोहिया को 1967 के चुनाव में दीनदयाल उपाध्याय के प्रचार के लिए जौनपुर जाना था। कई समाजवादी इसका विरोध कर रहे थे, पर लोहियाजी अड़ गए यह कहते हुए कि —
“जाऊंगा, क्योंकि दीनदयाल बहुत बड़ा दार्शनिक है, उसकी जीत जरूरी है।”
कभी राजनेता कुर्सी से उसूल को बड़ा मानते थे। वहीं वर्तमान राजनीति का झुकाव अब जनसेवा से हटकर कुर्सी-सेवा तक सीमित हो गया है। इसीलिए लेख ‘घायल महिलाएं’ में कॉमन सिविल कोड के अभाव को विषय के इतिहास से आंककर योगेश का निष्कर्ष है कि—
“मुस्लिम महिलाओं का दुर्भाग्य है कि इस अधार्मिकता की अतार्किक परिशान्ति में अब कठमुल्लाओं के अलावा हमारे राजनेता भी शामिल हो गए हैं।” एक अन्य रोचक और पठनीय लेख ‘अब आनंद मंत्रालय’ है। इसके प्रारम्भ की पंक्तियां हैं कि—“राजनीति सपने बेचने का नाम है।” लेख का अंत विभिन्न अर्थसंगत आंकड़ों का हवाला देकर इस नतीजे पर पहुंचता है कि—
“संसाधन नहीं है, पेट भूखा रहेगा, हाथ खाली रहेगा, दिमाग में फितूर होगा, पढ़ाई, दवाई और सिंचाई नहीं होगी। बिजली, सड़क और पानी नहीं होगा तो आनंद का ध्यान कभी नहीं आ सकता है। किसी को भी नहीं आ सकता है।” यह एक ऐसा सच है, जिसे कोई भी अभाव में जीता हुआ व्यक्ति साबित कर सकता है, बता सकता है, जता सकता है, पर हमारे राजनेता इसे समझने को तैयार नहीं हैं। उन्हें तो लगता है कि हर चीज पर उनका अधिकार है, हमारे सपनों पर भी।
‘अब आनंद मंत्रालय’ भले ही आनंद देने में असफल रहा हो, पर ‘शब्द पथ’ के सारे लेख पाठकों को बौद्धिक आनंद देने में सक्षम हैं। सारे लेख योगेश की मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत हैं। उन्हें पढ़कर यह सिद्ध होता है कि योगेश केवल पत्रकार ही नहीं, कवि-पत्रकार हैं। उनकी सरल, सहज भाषा, पुष्ट तर्क, संजोए गए आंकड़े इन लेखों को रोचक बनाते हैं। वहीं वैचारिक समावेश इन्हें सामयिक घटनाओं पर सिर्फ पत्रकारिक टिप्पणी होने से कहीं ऊपर उठा देता है। कुछ छूटने का बोध ही निरंतर लिखते रहने की प्रेरणा है। मुझे विश्वास है कि भविष्य में भी योगेश शब्द पथ पर इसी प्रकार अग्रसर होते रहेंगे। मुझे उनकी बौद्धिक पत्रकारिता पर गर्व है।
( यह अंश लेखक ने योगेश मिश्र की किताब ‘शब्द पथ’ के लिए लिखा था। साभार ।)


