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Childhood: आँगन का सिमटता लोकतंत्र
Childhood: आँगन केवल घर का हिस्सा नहीं, बल्कि परिवार और बचपन का लोकतंत्र है।
Shrinking Courtyards Childhood, Culture, and the Lost Heart of Indian Homes
Childhood: दुनिया में कितने भी परिवर्तन हुए हों, एक इच्छा ऐसी है जो उसी भावनात्मक तीव्रता के साथ आज भी हमारे मन में उपस्थित रहती है। इस इच्छा का नाम है—घर। दुनिया का कोई भी कोना हो, घर और उससे जुड़े सपने न कम हुए हैं और न होंगे। मुंशी प्रेमचंद के युग में ‘गोदान’ की जो स्थिति थी, 21वीं शताब्दी में कमोबेश वही मकान की है। दोनों के सुख लगभग समान हैं, दोनों की चाहत लगभग आम है और दोनों को पाने का संत्रास हर शख्स जीने को तैयार है। हमारी संस्कृति में घर को मात्र आवास के रूप में नहीं स्वीकारा गया, जो सिर्फ़ ईंट–गारे से बना होता है, बल्कि एक समग्र संस्कृति के रूप में। घर एक साम्राज्य है, जिसकी आत्मीय संरचना का केन्द्र होता है—आँगन।
प्रसिद्ध कथाकारों, कवियों और कलाकारों ने घर पर कितना कुछ लिखा और सोचा है, और हर बार आँगन पर विशेष चर्चा की है। पिछले दिनों बातचीत के दौरान एक मित्र ने अवधी में लिखा यह मुक्तक सुनाया—
वास दूब अंखुवन के तन का बचपन कहाँ गया,
परी नखत तितुरी मठरी वाला मनु कहाँ गया।
कोठिरिन कमरन मा वटिगा है खूनु क्यार नाता,
जीमा वाया हँसति रहें ऊ आँगनु कहाँ गया।।
अंतिम पंक्ति का सवाल और दर्द झकझोर देता है—सचमुच आँगन कहाँ गया? बहुत दिन नहीं हुए जब घर के इस महत्त्वपूर्ण हिस्से में परिवार का लोकतंत्र हँसता–खिलखिलाता दिखता था। आँगन में सबसे बड़ा अधिकार बच्चों और औरतों का होता था। बच्चे घुटनों के बल सरक–सरक कर घरवालों का मन मोह लेते थे, चलना सीखते थे, लकड़ी के खड़खड़े के सहारे खड़े होकर डग भरते थे, फिर उँगली पकड़कर आगे बढ़ते थे। उस समय ज़्यादातर आँगन कच्ची मिट्टी के होते थे और गोबर से लिपे–पुते रहते थे। कहा जाता था कि मिट्टी से सने बच्चों पर देवता भी रीझते हैं।
ईश्वर भी जब जन्म लेता था तो इसी आँगन में भागा–भागा फिरता था। तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकाण्ड में इसका मनोहारी शब्दचित्र खींचा है—
आँगन फिरत घुटुरुवनि चाए,
नील जलद तनु स्याम राम सिसु,
जननि निरखि मुख निकट बोलाए।।
तुलसी के राम की तरह सूरदास के श्याम भी आँगन में न जाने कितनी लीलाएँ करते हैं। आँगन ही वह स्थान है जहाँ आसमान ताकती मध्यकालीन नायिकाएँ प्रिय की प्रतीक्षा करती थीं, जहाँ चाँद देखने और उतरने के किस्से, मुहावरे और शेर–ओ–शायरी पनपते रहे। करवा चौथ की रस्म हो या ईद का चाँद, आँगन ही उनका साक्षी होता। लड़की की शादी में आँगन मड़वा गाड़ने का मुकाम होता और लड़के की तिलक की शोभा भी आँगन में उतरती। देवर–भाभी की होली का मैदान भी यही होता। घनानंद ने अपनी प्रेयसी सुजान को मनाने के लिए बादलों से मनुहार की थी—
“कबहु व विसासी सुजान के आँगन मो असुवानि को ले बरसो।”
कुछ भी हो, आँगन की सबसे बड़ी ज़रूरत बच्चों को थी, है और रहेगी। मगर आज आँगन है कहाँ? घर बनवाते समय आँगन सबसे उपेक्षित जगह मानी जाने लगी है। कॉलोनियों और बहुमंज़िला फ़्लैटों की संस्कृति में तो आँगन की कोई गुंजाइश ही नहीं बची। अब बच्चे कमरों में क़ैद हैं या किसी की निगरानी में पार्कों और ट्रैक पर टहल रहे हैं। आँगन में बच्चों को कुछ भी लुढ़काने–पुढ़काने की स्वतंत्रता थी, जो आज खो गई है। कहीं यह बच्चों के प्रति हमारे बदलते दृष्टिकोण का प्रतीक तो नहीं?
सुबह से रात तक स्कूल, होमवर्क और फिर टीवी–चैनलों में उलझे बच्चों को हमने इतनी फुरसत ही नहीं दी कि वे आँगन में झाँक भी सकें। आँगन लिप्साओं और विवशताओं के तीरों से घायल हो गया है। घर का नक्शा बनाते समय दुकानों और किराए के कमरों का ध्यान पहले रखा जाता है। दुकानें निकल आएँगी तो किराए पर उठाई जा सकती हैं, सेवानिवृत्ति के बाद जनरल मर्चेंट की दुकान खोली जा सकती है या महिलाएँ बुटीक चला सकती हैं। आँगन में यह सब कहाँ सम्भव है? लिहाज़ा वह उपेक्षित हो गया।
यह उपेक्षा एक मीठा विष है। मनुष्य समाज में रहेगा तो उसे पहली सामाजिकता के संस्कार के लिए आँगन से गुज़रना ही होगा। लेकिन लगता है मनुष्य इस संकट से बाख़बर नहीं है। हमने स्वयं समस्याओं की गुत्थियाँ तैयार की हैं और अब उनमें फँसकर घुट रहे हैं। आधुनिक जीवनदृष्टि और उत्तर–आधुनिकता के नाम पर हमने अपने ‘स्व’ की उपेक्षा की है। गिरवी रखे स्वाभिमान से जातीय चिंतन के स्फुलिंग नहीं फूट सकते। अगर वे सफल होकर रोशनी बनें तो हमें अपने अतीत में संस्कृति के बीते उजास में आँगन की आत्मीयता दिखेगी।
मनुष्य जानता था कि आँगन और बचपन का गहरा रिश्ता है। बचपन तभी समृद्ध होगा जब उसे आँगन में कूदने–उछलने, शैतानी करने, रीझने–खीझने का बराबर मौक़ा मिलेगा। कभी यह मौक़ा मिलता भी था। आँगन में महिलाएँ पंचायत करती थीं, जाँता–चक्की चलती थी, ओखल रखा जाता था, सिल–बट्टे होते थे। दादी–नानी भूखे बच्चे को निवाला देने के लिए खड़ी होकर चंदामामा गाती थीं—
“चंदा मामा आरे आवा, पारे आवा, नदिया किनारे आवा,
सोना के कटोरिया में दूध भात है से आया।
बबुआ के मुँहवा में घुटुँक से,
आवाहू उत्तरी आवा हमारी मुंडेर।
कब से पुकारिले, भइल बड़ी देर।
भइल बड़ी देर, हां बाबू को लागल भूख।।
ऐ चंदा मामा।
मनवा हमार लागे कहीं ना, रहिलै देख घड़ी बाबू को बिना
एक घड़ी हमारा को लागै सौ जून।
औद्योगीकरण और महानगरीय सभ्यता ने सबसे पहले आँगन की संस्कृति पर ही प्रहार किया। आज अधिकांश घरों से आँगन नदारद है। यह गैर–मौजूदगी बचपन को ढेर सारे सुखों से वंचित कर रही है। यदि हम भविष्य के मनुष्य को अधिक मानवीय देखना चाहते हैं तो हमें बचपन को आँगन का लोकतंत्र देना होगा। बंद कमरों में अंधेरे की तानाशाही ही पनप सकती है।
आँगन व्यक्तिवाद के विरुद्ध सामूहिकता का संस्कार है। इसलिए आइए, आँगन के बारे में फिर से सोचें। गौर करें—बच्चे बुट जाएंगे इन कमरों में। खेलने के लिए आँगन रखिए। यदि नहीं रखेंगे तो इस शायर की तरह पछताना पड़ेगा—
“इस शहर में उतरे तो चंदा कहाँ उतरे,
हमने किसी भी घर में आँगन नहीं देखा।”


