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युवाओं से संवाद करना आज की आवश्यकता है
छात्र आंदोलन, पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के बढ़ते आक्रोश पर विस्तृत विश्लेषण। जानिए क्यों आज युवा संवाद और शिक्षा सुधार सबसे बड़ी जरूरत बन चुके हैं।
Paper Leak Crisis NEET Protest
क्या यह छात्र आंदोलन सिर्फ सीबीएसई या मेडिकल नीट पेपर लीक के खिलाफ है, नहीं यह उस आक्रोश का ज्वार है, जो कहता है बस, अब बहुत हो गया। यह उस उच्च शिक्षा में हो रही धांधलियों और झूठे वायदों के खिलाफ है, जो कि उन्हें परेशान कर रहें है। यहां बात नीट पेपर लीक या सीबीएसई की खामियों या अन्य पेपर लीक और एग्जाम की खामियों से कहीं दूर निकल चुकी है। यह बिल्कुल सच है कि जो इतनी युवा भीड़ जंतर-मंतर पर एकत्र हुई है वे सिर्फ नीट के परीक्षार्थी तो नहीं हैं और न ही अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के परिक्षार्थी रहे। बल्कि ये वह युवा भीड़ थी जो अपने जीवनयापन, अपने भविष्य, अपने रोजगार, कैरियर से आहत और जीवन की अन्य परेशानियों में उलझी हुई है। जिसका पेट न तो बातों की लफ्फाजी से भरता है और न ही यत्र-तत्र खड़े हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर से भरता है। वह चाहता है 2 जून की सुकून वाली रोटी और सम्मानजनक जीवन। यह न तो लोहिया के समय का युवा है और न ही वी पी सिंह के समय वाला मंडल आयोग या राम मंदिर आंदोलन में भाग लेता हमारे साथ का विद्यार्थी । अब उसके हाथ में मोबाइल है और इस दुनिया की युवा होती पीढ़ी को पता है कि भोजन, मकान की आवश्यकता के साथ-साथ एक अच्छे करियर की जरूरत सबसे ज्यादा होती है जो कि कभी आरक्षण का बढ़ता प्रतिशत, कभी उच्च शिक्षा की बढ़ती फीस तो कभी इस तरह के पेपर लीक, सीटों की कम संख्या या शिक्षा प्रणाली व परीक्षा तंत्र की टूटी-फूटी व्यवस्था के द्वारा उनके करियर की हर संभावना को हर दिन तोड़ रही है।
हम और आप आंदोलनकारियों की विचारधारा का समर्थन करें या न करें पर इस बात से जरूर सहमत होंगे कि जो कुछ भी इस समय देश की राजधानी में घटित हो रहा है वह आज के समय के समाज का दर्पण है, जो हांफ रहा है, अपने बच्चों के, अपने भविष्य को लेकर आशंकित है कि आगे क्या होगा? न तो यह कोई पहला आंदोलन है, न ही आखिरी। एक स्वस्थ लोकतंत्र के निशानी होते हैं आंदोलन, असहमति और विरोध को जगह मिलना, उनको सुना जाना।
संवाद के दरवाजे बंद कर देना या उनको इस कदर टालते रहना कि वह बढ़ते-बढ़ते इतना बड़ा आक्रोश बन जाए कि स्वयं प्रधानमंत्री को आधी रात को इंस्टाग्राम पर विद्यार्थियों के लिए एक संबोधन करना पड़े। लोकतांत्रिक देश है, सबको सुना जाना चाहिए, सबको कहने का अधिकार है।
लेकिन देश के भविष्य पर यूं लाठियां चलाना, उन्हें निराश करना सीधे-सीधे उन्हें गलत रास्ते पर मोड़ देना है, गलत हाथों में जाने देना है। इन युवाओं को नए नारों की जरूरत नहीं, मीठे वायदों की भी जरूरत नहीं बल्कि ठोस विचारधारा की जरूरत है, ठोस काम की जरूरत है जो कि दिखाई दे। विद्यार्थी हों, पत्रकार हों, चाहे वे मेन स्ट्रीम मीडिया के हों या सोशल मीडिया के या अपनी ड्यूटी करते पुलिस वालें हों, 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान इनमें से जिनको भी शारीरिक, मानसिक क्षति हुई , वह वाकई किसी भी तरह से क्षम्य में नहीं हो सकती।
आंकड़ों को देखना होगा कि 2002-2025 के बीच 45 प्रमुख परीक्षा लीक हुई मतलब हर साल दो से अधिक।
नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि भारत में पिछले 10 वर्षों में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जिसका मतलब है कि हर दिन औसतन 25 स्कूल बंद हुए या पास के स्कूलों में मिलाए गए हैं, जिससे छात्रों के नामांकन में 2.26 करोड़ की कमी आई है। इसके विपरीत, निजी स्कूलों की संख्या में बढ़ी है। भारत में एमबीबीएस में सरकारी और निजी कॉलेजों में मिलाकर लगभग 1.37 लाख सीटें हैं और इस बार परीक्षा देने वाले 23 लाख परिक्षार्थी थे। वहीं प्रीमियम इंजीनियरिंग सीटों की संख्या करीब 67,000 है और जेईई मेंस परीक्षा में 15 लाख से अधिक तथा 1.80 लाख छात्र जेईई एडवांस्ड की परीक्षा देते हैं। देश में प्रीमियम सरकारी संस्थानों में 67,000 और निजी एवं राज्य इंजीनियरिंग कॉलेजों में 12,00,000 के लगभग सीट हैं। दस लाख यूपीएससी आवेदक केवल 1,000 सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। अब आप सोच सकते हैं कि उन पर कितना दवाब होगा, परीक्षा निकालने का। नीट पेपर लीक के बाद लगभग 21 परीक्षार्थियों ने आत्महत्या कर ली। कोचिंग नगरी कोटा में औसतन 20 छात्र हर वर्ष आत्महत्या कर लेते हैं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया' रिपोर्ट के अनुसार, 2004 में शिक्षित बेरोजगार युवाओं का आंकड़ा लगभग 30 लाख था, जो 2023 तक बढ़कर लगभग 1.1 करोड़ हो गया है। आर्थिक सर्वेक्षण बताते हैं कि केवल 8.25% स्नातक ही अपनी योग्यता और शिक्षा से मेल खाने वाले काम में हैं, जबकि आधे से अधिक ऐसे कार्य कर रहे हैं जिनके लिए डिग्री की आवश्यकता नहीं होती है। देश में प्रतिवर्ष 50 लाख युवा स्नातक डिग्री हासिल करता है जबकि केवल 28 लाख नौकरियां ही सृजित हो पाती हैं।
हमारी केंद्रीय सरकार द्वारा बजट 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय के लिए लगभग ₹1.39 लाख करोड़ का आवंटन किया गया, जो कि कुल केंद्रीय बजट का लगभग 2.4% से 2.6% हिस्सा है। नाममात्र रूप से राशि लगातार बढ़ रही है, लेकिन विश्लेषकों का यह कहना है कि कुल बजट के मुकाबले शिक्षा का हिस्सा अभी भी जीडीपी या कुल व्यय के लक्षित मानकों से कम है। यानी शिक्षा व्यवस्था हमारे यहां इतना महत्व ही नहीं रख रही है। पेपर लीक मामलों और व्यवस्था की कमियों के कारण भारत की शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं, जिससे योग्यता और निष्पक्षता कहीं पीछे छूट जाती है। बार-बार परीक्षाएं रद्द होने और टलने से 2-3 वर्षों से लगातार सब कुछ छोड़कर मेहनत कर रहें छात्रों और उनके परिवारों पर भारी मानसिक व आर्थिक दबाव पड़ता है। संगठित पेपर माफिया, भारी बेरोजगारी के कारण सरकारी नौकरियों की अत्यधिक मांग और परीक्षा तंत्र के अंदर मिलीभगत, परीक्षा केंद्रों और प्रश्नपत्रों को सुरक्षित रखने वाले 'स्ट्रांग रूम' में लचर सुरक्षा या डिजिटल बुनियादी ढांचे में कमियों का फायदा उठाकर प्रश्नपत्रों तक अनधिकृत पहुंच और लंबे समय तक मजबूत केंद्रीय कानूनों की कमी के कारण दोषियों को सख्त सजा न मिलना पेपर लीक मामलों के कारण होतें हैं।
दरअसल यह आंदोलन केवल परीक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा, अपने मूल मुद्दों से भटक गया और उनके द्वारा प्रयोग की जा रही भाषा सिर्फ व्हाट्सएप, रील्स, इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया की भाषा बनकर रह गई, उसमें कहीं भी कोई वैचारिक गहराई नहीं थी। हमें युवा होती पीढ़ी को संवाद का मंच देना चाहिए पर हमने स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों से लेकर परिवार के भीतर तक यह मंच उनसे छीन लिया है क्योंकि हम उनके सवालों के उत्तर देने में असमर्थ हो गएं हैं। जेन जी और जेन अल्फा के सोचने का तरीका मिलेनियल्स और बेबी बूमर जनरेशन से एकदम अलग है। इसे आप इस तरह से समझ सकते हैं जैसे कि एक संयुक्त परिवार की पहली पीढ़ी और तीसरी पीढ़ी के सोचने का तरीका एकदम अलग होता है। पहली पीढ़ी घर में हो रही समस्याओं को शांति से बैठकर देखती है और उसे हमेशा दरकिनार कर देती है कि समय के साथ ये सब अपने आप खत्म हो जाएंगी, या फिर इन्हें अंत में हमारी ही बात माननी पड़ेगी। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब दूसरी पीढ़ी ने तो उसे स्वीकार कर लिया होता है अपनी पहली पीढ़ी पर विश्वास रखकर लेकिन जब तीसरी पीढ़ी आती है वह देखती है कि इस विश्वास का कोई फायदा नहीं हो रहा तो वह आक्रोशित होती है उन्हें न समझे जाने पर और वह उसके विरुद्ध चली जाती है। यह आंदोलन अब समाज, नेताओं और तंत्र तीनों को स्वयं को ही बड़ा समझने की आदत को और अपनी सोच बदलने पर मजबूर करेगा। डिजिटल दुनिया का युवा अपने घर में ही लंबी बात सुनने का इच्छुक नहीं होता तो वह नेताओं के लंबे भाषणों और औपचारिक, मीठे- झूठे वायदों से कैसे प्रभावित होगा? अब वे सब कुछ तुरंत चाहते हैं। किसी भी समस्या की सच्चाई, उससे तुरंत जुड़ाव और कंटेंट क्रिएटर्स के छोटे-छोटे वीडियो अब उनकी बात कहने का नया जरिया हैं। आज की पीढ़ी के तेवर और सोच एकदम अलग है। उन्होंने अपने आंदोलन के लिए किसी भी स्थापित पार्टी पर विश्वास नहीं किया बल्कि सोशल मीडिया पर बनी एक आभासी पार्टी के ऊपर विश्वास करके चले भी आए। सत्ता और विपक्ष दोनों ये जितनी जल्दी समझ ले उतना अच्छा है कि इन युवाओं को खारिज करना अब आसान नहीं है क्योंकि उन्होंने आप पर विश्वास न करके, आपको पहले ही खारिज कर दिया है।
मेन स्ट्रीम मीडिया के न्यूज़ एंकरों को भी यह सोचना होगा कि उनका पुराना विश्लेषण का ढर्रा अब काम नहीं आएगा।
अब सब कुछ स्क्रीन की स्पीड तय कर रही है कि कितनी जल्दी आप लोगों तक पहुंच सकते हैं, जुड़ सकते हैं, उनकी अपनी भाषा में , उनके अपने विचारों के माध्यम से।
अब भले ही धीरे-धीरे करके यह आंदोलन खत्म हो जाए लेकिन एक बात ध्यान रखना चाहिए कि अराजकता जब भी किसी भी आंदोलन का चेहरा बन जाती है तो वह चाहे किसी भी तरफ से हो, समाज को अंधकार में धकेल देती है।
इस छात्र आंदोलन में भी बहुत सारी कमियां रही होंगी, गलतियां हुई होंगी लेकिन बिल्कुल नकारे जा सकने वाला इसमें कुछ भी नहीं है। हमें सोचना होगा कि आगे कभी हमारे युवा पीढ़ी को इस तरह की पुलिसिया बर्बरता का सामना न करना पड़े और न ही हमारे पत्रकारों और पुलिस को ऐसी आक्रामक भीड़ का सामना करना पड़े। इसलिए छात्रों को अपने लक्ष्य से अगर नहीं भटकना है तो इन अराजक तत्वों को अपने अंदर शामिल नहीं करना होगा और सरकार को भी चाहिए कि यह युवा पीढ़ी कहीं भटके उसके पहले इनसे संवाद कर लिया जाए।


