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Bashir Badr: कुछ अधूरी महफ़िलें कुछ अनकहे जज़्बात
Bashir Badr: हरेंद्र कृष्ण त्रिपाठी ने बशीर बद्र और राजशेखर जी के साथ बिताए पलों को याद करते हुए एक भावुक संस्मरण लिखा, जिसमें शायरी, मुलाकातों और बिछड़ने के दर्द की झलक मिलती है।
Bashir Badr (Image Credit-Social Media)
Bashir Badr: अभी अतिप्रिय राजशेखर जी के रुख़्सत होने के ग़म से मन उबर भी नहीं पाया था कि आज मशहूर शायर बशीर बद्र साहब के इंतिक़ाल की ख़बर ने रूह तक को झिंझोड़ दिया.. दोनों शख्सियतें उम्र और मिज़ाज के अलग-अलग सोपानों पर थीं.. दोनों से मेरा रिश्ता भी अलग-अलग तरह का था… मगर दोनों से जुड़ाव 90 के दशक से रहा..
राजशेखर जी से संबंध पारिवारिक और आत्मिक था.. किसी भी विषय पर उनसे तफ़्सील से हुई गुफ़्तगू कई उलझी हुई गिरहें खोल देती थी.. उनसे बात कर तमाम विषयों पर एक नई समझ और नई रोशनी मिलती थी.. वहीं बशीर बद्र साहब से पहली मुलाक़ात गाज़ियाबाद में श्री काशीनाथ मिश्र जी के यहाँ हुई थी.. तब साहित्य से बस परिचय ही हुआ था.. दुष्यंत कुमार जी को पढ़ना-समझना शुरू ही किया था कि बशीर साहब से रूबरू होने का अवसर मिला.. क्या ग़ज़ब की शख्सियत थी… बेहद सादा.. बेहद अपनापन लिए हुए… बिल्कुल अपनी शायरी की तरह..
उन्होंने शायरी को अरबी-फ़ारसी के भारी-भरकम लफ़्ज़ों की कैद से निकालकर नए एहसासों..आसान जुबान और दिल में उतर जाने वाले अंदाज से सजाया.. यही वजह रही कि उनकी ग़ज़लें आम आदमी की जुबान पर चढ़ गईं.. 1992-93 के छात्रसंघ चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों तक अपने भाषणों में मैंने दुष्यंत जी और बशीर बद्र साहब को खूब पढ़ा, खूब जिया.. एक वाक़या आज भी हूबहू याद है...
राष्ट्रीय दिवस पर लाल क़िले में उनका एक मुशायरा था.. कार्यक्रम के बाद उन्हें अपनी गाड़ी से वापस लेकर लौटना था.. वहीं उन्होंने अपना मशहूर शेर पढ़ा..
“कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो…”
जब हम लोग गाड़ी में बैठे तो अपनी अल्हड़ समझ से मैंने कहा..
ये तो केवल परमपिता परमेश्वर ही हो सकता है… जो आँखों में भी आए और नज़र को ख़बर भी न हो…
वो मुस्कुराए… फिर बेहद नरमी से बोले—
आपने तो इस शेर को रूहानी कर दिया…
बस.. उसी दिन से बातों का सिलसिला चल पड़ा..
वो दौर बेसिक फ़ोन का था… फिर मोबाइल और बदलते नंबरों की भीड़ में बहुत कुछ छूटता चला गया..
सच है..ज़िंदगी की जद्दोजहद अक्सर दिल की सबसे नर्म जगहों से ही क़ुर्बानियाँ माँगती है..
सबसे तकलीफ़देह बात यह रही कि अंतिम दिनों में बशीर बद्र साहब डिमेंशिया जैसी बीमारी की गिरफ़्त में आ गए थे..
न अपने कहे हुए अशआर याद रहे न उन्हें चाहने वाले चेहरे..
हाँ… जब उनके अपने लोग उनके ही शेर गुनगुनाते थे तब उनके चेहरे पर अचानक एक रौनक उतर आती थी… जैसे बुझती हुई शमा में कोई आखिरी लौ काँपी हो..
मैं अक्सर सोचता रहा—
जिन लोगों की साँसें ही अल्फ़ाज़, एहसास और मोहब्बत से चलती हों… उनसे अगर यादें भी छिन जाएँ तो उनके भीतर कैसी वीरानियाँ उतरती होंगी… कैसी बेआवाज चीख़ें गूँजती होंगी…
एक-एक कर जहीन और रूहदार लोगों का यूँ चला जाना जिंदगी के आसमान में ऐसा सन्नाटा छोड़ रहा है जिसे शायद कभी भरा नहीं जा सकेगा..
अब महसूस होता है कि लोग सिर्फ दुनिया से रुख़्सत नहीं होते… अपने साथ एक दौर.. कुछ अधूरी महफ़िलें कुछ अनकहे जज़्बात और दिलों को रौशन रखने वाली पूरी एक दुनिया भी ले जाते हैं..
फिर पीछे रह जाते हैं कुछ शेर.. कुछ आवाज़ें, कुछ मुस्कुराहटें… और उम्र भर चुभता हुआ एक खामोश खालीपन।
-हरेंद्र कृष्ण त्रिपाठी


