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Autism Increasing: दुनिया में ऑटिज़्म क्यों बढ़ रहा है? जानिए असली वजह
Why is Autism Increasing: दुनिया में ऑटिज़्म के मामले क्यों बढ़ रहे हैं? जानिए CDC और WHO के आंकड़े, बेहतर पहचान, आनुवंशिकी, पर्यावरण और टीकों से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों की पूरी कहानी।
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Why is Autism Increasing: अमेरिका में वर्ष 2000 में लगभग 150 बच्चों में से एक की पहचान ऑटिज़्म के साथ होती थी। अब यह आँकड़ा 31 में से एक तक पहुँच गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में लगभग 6 करोड़ 18 लाख लोग ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम पर हैं। लेकिन क्या केवल दो दशकों में बच्चों के मस्तिष्क के विकास में इतना बड़ा परिवर्तन आ गया है? या जिन बच्चों को पहले अलग-अलग नामों से पहचाना जाता था, उन्हें अब चिकित्सा विज्ञान एक नई समझ के साथ देख रहा है? स्वीडन और डेनमार्क के शोध इस प्रश्न के चौंकाने वाले उत्तर देते हैं। वहीं आनुवंशिकी, गर्भावस्था, पर्यावरण और बढ़ती मातृ-पितृ आयु से जुड़े अध्ययन कहानी का दूसरा पक्ष सामने रखते हैं। ऑटिज़्म के बढ़ते आँकड़ों के पीछे छिपी वास्तविकता जितनी वैज्ञानिक है, उतनी ही सामाजिक भी।
दुनिया भर में पिछले कुछ दशकों के दौरान बच्चों के मानसिक और मस्तिष्कीय विकास से जुड़ी जिस स्थिति ने वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, शिक्षकों और अभिभावकों का सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया है, वह 'ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर' है। अमेरिका से लेकर यूरोप और एशिया तक, ऑटिज़्म के साथ पहचाने जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। विशेष रूप से अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र, यानी 'सीडीसी', के आँकड़ों ने इस विषय को अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। वर्ष 2000 में उसके निगरानी नेटवर्क द्वारा अध्ययन किए गए आठ वर्ष के बच्चों में लगभग प्रत्येक 150 में से एक की पहचान ऑटिज़्म के साथ हुई थी। वर्ष 2010 तक यह अनुपात लगभग 68 में एक, वर्ष 2018 में 44 में एक, वर्ष 2020 में 36 में एक और वर्ष 2022 में 31 में एक तक पहुँच गया। अप्रैल 2025 में प्रकाशित सीडीसी की रिपोर्ट में वर्ष 2022 के इन्हीं आँकड़ों का विश्लेषण किया गया था। पहली नजर में यह एक असाधारण वृद्धि दिखाई देती है। महज 22 वर्षों में पहचाने गए ऑटिज़्म की व्यापकता लगभग पाँच गुनी हो गई। लेकिन इस संख्या को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि इसी अनुपात में नए बच्चों में ऑटिज़्म पैदा होने लगा है, एक गंभीर वैज्ञानिक भूल होगी। कारण यह है कि किसी स्थिति का वास्तव में अधिक होना और पहले से मौजूद स्थिति की अधिक पहचान होना, दोनों अलग-अलग घटनाएँ हैं। आज ऑटिज़्म पर होने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक विमर्श इन्हीं दोनों संभावनाओं के बीच चल रहा है।
यहाँ एक तथ्य शुरुआत में ही स्पष्ट करना आवश्यक है। ऑटिज़्म कोई संक्रामक बीमारी नहीं है, न ही यह ऐसी स्थिति है जो किसी बच्चे को दूसरे बच्चे के संपर्क में आने से हो सकती है। यह मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक 'न्यूरोडेवलपमेंटल' स्थिति है, जिसका प्रभाव व्यक्ति के सामाजिक संवाद, संचार के तरीकों, संवेदनाओं, रुचियों और व्यवहार में दिखाई दे सकता है। कुछ ऑटिस्टिक बच्चों को भाषा सीखने में उल्लेखनीय कठिनाई होती है, जबकि कुछ बच्चे बहुत अच्छी भाषा क्षमता रखते हैं। कुछ को नियमित दिनचर्या में परिवर्तन से परेशानी होती है, कुछ विशेष विषयों में असाधारण रुचि दिखाते हैं और कुछ तेज आवाज, प्रकाश या स्पर्श के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। ऐसे व्यक्तियों की क्षमताएँ और सहायता संबंधी आवश्यकताएँ बहुत भिन्न हो सकती हैं। कोई ऑटिस्टिक व्यक्ति स्वतंत्र जीवन जी सकता है, जबकि किसी दूसरे को दैनिक गतिविधियों के लिए आजीवन व्यापक सहायता की आवश्यकता हो सकती है। इसी विविधता के कारण इसे 'स्पेक्ट्रम' कहा जाता है। इसका अर्थ केवल कम से अधिक गंभीरता की कोई सीधी रेखा नहीं, बल्कि अनेक प्रकार की विकासात्मक विशेषताओं और सहायता संबंधी आवश्यकताओं का समूह है। इसलिए जब हम ऑटिज़्म की बढ़ती व्यापकता की चर्चा करते हैं, तब हमें यह समझना चाहिए कि हम किसी एक समान स्थिति वाले बच्चों की संख्या नहीं गिन रहे, बल्कि ऐसे व्यक्तियों की पहचान कर रहे हैं जिनकी विकासात्मक विशेषताएँ अलग-अलग रूपों में सामने आती हैं।
ऑटिज़्म के इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक वर्ष 1943 में हुई थी। उस समय अमेरिका में कार्यरत बाल मनोचिकित्सक लियो कैनर ने 11 बच्चों के व्यवहार का विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया। इन बच्चों में सामाजिक संपर्क के विशिष्ट तरीके, संवाद संबंधी कठिनाइयाँ और नियमित व्यवहार के प्रति तीव्र आग्रह जैसी विशेषताएँ दिखाई देती थीं। कैनर ने इन लक्षणों को एक अलग विकासात्मक स्थिति के रूप में समझने का प्रयास किया। लगभग इसी समय ऑस्ट्रिया में हांस एस्पर्गर भी ऐसे बच्चों का अध्ययन कर रहे थे जिनके सामाजिक व्यवहार और रुचियों में विशिष्ट अंतर थे। हालांकि ऑटिज़्म जैसा व्यवहार मानव समाज में इससे बहुत पहले से मौजूद रहा होगा, लेकिन चिकित्सा विज्ञान ने इसे व्यवस्थित रूप से समझना बीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू किया। शुरुआती दशकों में ऑटिज़्म को अत्यंत दुर्लभ स्थिति माना जाता था। इसके अतिरिक्त कई बच्चे, जिन्हें आज ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम पर पहचाना जा सकता है, उस समय बौद्धिक अक्षमता, भाषा विकास में विलंब अथवा अन्य मानसिक और विकासात्मक श्रेणियों में दर्ज कर दिए जाते थे। कुछ बच्चों को किसी स्पष्ट निदान के बिना ही जीवन बिताना पड़ता था। इसका अर्थ यह है कि पुराने समय के चिकित्सा अभिलेखों में ऑटिज़्म का कम दिखाई देना आवश्यक नहीं कि समाज में उसके वास्तव में बहुत कम होने का प्रमाण हो। यह उस दौर के चिकित्सा विज्ञान की सीमित समझ का परिणाम भी हो सकता है।
ऑटिज़्म की बढ़ती व्यापकता के पीछे सबसे महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक इसकी परिभाषा और निदान की प्रक्रिया में हुआ परिवर्तन है। वर्ष 1980 में अमेरिकी मनोचिकित्सा संगठन की निदान संबंधी नियमावली 'डीएसएम-3' में ऑटिज़्म को अलग नैदानिक पहचान मिली। वर्ष 1994 में प्रकाशित 'डीएसएम-4' में ऑटिज़्म से जुड़ी विभिन्न स्थितियों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया। इनमें 'ऑटिस्टिक डिसऑर्डर', 'एस्पर्गर सिंड्रोम' और अन्य व्यापक विकासात्मक विकार शामिल थे। वर्ष 2013 में प्रकाशित 'डीएसएम-5' ने इन विभिन्न श्रेणियों को समेटकर 'ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर' की एक व्यापक अवधारणा के अंतर्गत रखने का निर्णय लिया। इस परिवर्तन का अर्थ यह नहीं था कि अचानक किसी नई मस्तिष्कीय स्थिति का जन्म हो गया। चिकित्सा विज्ञान ने उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर पहले अलग-अलग पहचानी जाने वाली विकासात्मक विशेषताओं को एक साझा ढाँचे में समझने का प्रयास किया। यद्यपि अलग-अलग संस्करणों के मानदंड कभी व्यापक और कभी कुछ विशेष मामलों में अधिक सीमित भी हुए, लेकिन लंबी अवधि में ऑटिज़्म की अवधारणा पहले की तुलना में अधिक विविध स्थितियों को पहचानने लगी। इससे उन बच्चों और वयस्कों को भी निदान मिलने का अवसर बढ़ा जिनकी कठिनाइयाँ पहले की संकीर्ण परिभाषाओं में ठीक से समा नहीं पाती थीं।
लेकिन क्या केवल परिभाषा बदल जाने से दुनिया भर में दिखाई देने वाली इतनी बड़ी वृद्धि को समझाया जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए डेनमार्क में किया गया एक अध्ययन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वर्ष 2015 में 'जामा पीडियाट्रिक्स' में प्रकाशित इस शोध में उन बच्चों का अध्ययन किया गया जो वर्ष 1980 से 1991 के बीच पैदा हुए थे। शोधकर्ताओं ने जाँचा कि ऑटिज़्म के मामलों में दर्ज वृद्धि का कितना हिस्सा चिकित्सा निदान के मानदंडों और स्वास्थ्य अभिलेखों की व्यवस्था में हुए परिवर्तनों से संबंधित था। डेनमार्क में वर्ष 1994 में निदान संबंधी वर्गीकरण बदला गया था और वर्ष 1995 में बाह्य रोगी सेवाओं से प्राप्त निदानों को भी राष्ट्रीय अभिलेखों में शामिल किया जाने लगा। अध्ययन का निष्कर्ष चौंकाने वाला था। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि उनके अध्ययन में दिखाई देने वाली ऑटिज़्म की वृद्धि का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इन दो प्रशासनिक और नैदानिक परिवर्तनों से समझाया जा सकता था। इसका अर्थ यह हुआ कि जिन बच्चों को पहले रिकॉर्ड में ऑटिज़्म के रूप में नहीं गिना जा रहा था, वे नियम और रिकॉर्डिंग व्यवस्था बदलने के बाद आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने लगे। यह निष्कर्ष पूरी दुनिया के लिए 60 प्रतिशत का कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है, लेकिन इसने एक महत्त्वपूर्ण तथ्य स्थापित किया कि अधिक दर्ज किए गए मामलों का अर्थ हमेशा उतनी ही बड़ी जैविक वृद्धि नहीं होता।
डेनमार्क के बाद स्वीडन का एक अध्ययन इस बहस में और भी महत्त्वपूर्ण प्रमाण लेकर आया। वर्ष 2015 में प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका 'बीएमजे' में प्रकाशित शोध में वैज्ञानिकों ने ऑटिज़्म के आधिकारिक निदान और बच्चों में वास्तविक ऑटिस्टिक व्यवहार-संबंधी विशेषताओं की प्रवृत्ति को अलग-अलग मापा। अध्ययन में स्वीडन में वर्ष 1993 से 2002 के बीच जन्मे बच्चों के आँकड़ों का उपयोग किया गया। इसमें लगभग 20 हजार जुड़वाँ बच्चों से संबंधित एक जनसंख्या-अध्ययन और दस लाख से अधिक बच्चों के राष्ट्रीय अभिलेख शामिल थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि अध्ययन अवधि में ऑटिज़्म के पंजीकृत निदान लगातार बढ़े, लेकिन समान मापन-पद्धति से देखी गई ऑटिस्टिक व्यवहार-संबंधी विशेषताओं की व्यापकता में वैसी वृद्धि नहीं दिखाई दी। दूसरे शब्दों में, चिकित्सा व्यवस्था जिन बच्चों को ऑटिस्टिक के रूप में दर्ज कर रही थी, उनकी संख्या बढ़ रही थी, लेकिन उस अवधि में जनसंख्या के भीतर संबंधित व्यवहारों का स्तर अपेक्षाकृत स्थिर था। इस शोध ने बेहतर पहचान और अभिलेखीकरण के पक्ष में मजबूत प्रमाण दिया। हालाँकि यह एक निश्चित अवधि और विशिष्ट जनसंख्या का अध्ययन था, इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि किसी भी देश या किसी भी समय वास्तविक व्यापकता कभी नहीं बढ़ सकती। फिर भी इसने उस धारणा को गंभीर चुनौती दी कि बढ़ते निदान अनिवार्य रूप से बदलती जैविक परिस्थितियों का परिणाम हैं।
इस बहस का एक दूसरा पक्ष ब्रिटेन के शोध से भी सामने आया। वर्ष 2016 में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग समय के बच्चों की तुलना की। एक समूह का मूल्यांकन वर्ष 1998-99 में और दूसरे का वर्ष 2007-08 में किया गया था। अध्ययन में ऑटिज़्म के निदान की व्यापकता बढ़ी हुई मिली, लेकिन संबंधित व्यवहार-संबंधी विशेषताओं की व्यापकता में भी वृद्धि दिखाई दी। इससे यह संभावना सामने आई कि कुछ जनसंख्याओं में परिवर्तन को केवल बेहतर पहचान से समझाना पर्याप्त नहीं हो सकता। हालांकि व्यवहार मापने वाले अध्ययन भी पद्धतिगत सीमाओं से मुक्त नहीं होते। अभिभावकों की जागरूकता, प्रश्नों के उत्तर देने के तरीके और सामाजिक अपेक्षाओं में परिवर्तन उनके निष्कर्षों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए स्वीडन और ब्रिटेन के परिणामों को एक-दूसरे का पूर्ण विरोधी मानने के बजाय यह समझना अधिक उचित है कि अलग-अलग समाजों में ऑटिज़्म की दर्ज व्यापकता के पीछे अनेक कारण एक साथ काम कर सकते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक समुदाय आज भी इस प्रश्न का कोई एक सार्वभौमिक प्रतिशत नहीं बता सकता कि बढ़े हुए निदानों में कितना हिस्सा बेहतर पहचान से संबंधित है और कितना वास्तविक जैविक या पर्यावरणीय परिवर्तन से।
विश्वव्यापी आँकड़ों की चर्चा करते समय एक और कम चर्चित तथ्य समझना आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सितंबर 2025 में प्रकाशित जानकारी के अनुसार वर्ष 2021 में दुनिया में लगभग प्रत्येक 127 व्यक्तियों में से एक ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम पर था। यह लगभग 6 करोड़ 18 लाख लोगों के बराबर है। यह अनुमान 'ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ 2021' के अध्ययन से आया, जिसमें उपलब्ध जनसंख्या-अनुसंधान और सांख्यिकीय मॉडल का उपयोग किया गया था। इस अध्ययन ने पुराने वैश्विक अनुमानों की तुलना में काफी अधिक व्यापकता दर्ज की। वर्ष 2019 के पुराने मॉडल में लगभग 271 व्यक्तियों में से एक का अनुमान था, जबकि संशोधित मॉडल में 127 में एक का। इतनी बड़ी अंतर-संख्या को देखकर यह समझना गलत होगा कि केवल दो वर्षों में दुनिया में ऑटिज़्म दोगुने से अधिक हो गया। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि इस अंतर का प्रमुख कारण आँकड़ों के चयन और अनुमान लगाने की पद्धति में परिवर्तन था। नए विश्लेषण में ऐसे अध्ययनों को अधिक महत्त्व दिया गया जो जनसंख्या में सक्रिय रूप से ऑटिज़्म की पहचान करते थे, बजाय केवल पुराने चिकित्सा अभिलेखों पर निर्भर रहने के। यह उदाहरण बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि कभी-कभी वैज्ञानिक जानकारी बेहतर होने से किसी स्थिति की अनुमानित व्यापकता अचानक बढ़ जाती है, जबकि वास्तविक जनसंख्या में वैसी अचानक वृद्धि नहीं हुई होती।
अमेरिका के आँकड़ों को समझने में भी यही सावधानी आवश्यक है। वर्ष 2025 में जारी सीडीसी की रिपोर्ट ने वर्ष 2022 के दौरान 16 निगरानी क्षेत्रों में रहने वाले आठ वर्ष के बच्चों के अभिलेखों का अध्ययन किया था। इन क्षेत्रों में औसतन 31 बच्चों में से एक ऑटिज़्म के साथ पहचाना गया। लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में यह अनुपात बहुत भिन्न था। टेक्सास के लारेडो क्षेत्र में लगभग 103 बच्चों में एक की पहचान हुई, जबकि कैलिफोर्निया के निगरानी क्षेत्र में लगभग 19 में से एक की। क्या इसका अर्थ यह है कि कैलिफोर्निया में बच्चों के मस्तिष्क का विकास टेक्सास की तुलना में पाँच गुना अधिक प्रभावित हो रहा है? ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध आँकड़ों से नहीं निकाला जा सकता। निदान की सुविधाएँ, चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता, स्कूलों की पहचान प्रणाली, अभिभावकों की जागरूकता और स्वास्थ्य अभिलेखों तक शोधकर्ताओं की पहुँच, सभी इस अंतर को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही ये 16 क्षेत्र पूरे अमेरिका की जनसंख्या का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसलिए 31 में एक का आँकड़ा एक महत्त्वपूर्ण निगरानी परिणाम है, लेकिन उसे अमेरिका के प्रत्येक शहर, प्रत्येक आयुवर्ग या पूरी दुनिया पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
ऑटिज़्म की बढ़ती पहचान के पीछे महिलाओं और लड़कियों से संबंधित एक ऐसी कहानी भी छिपी है, जिस पर वैज्ञानिकों ने अपेक्षाकृत देर से ध्यान दिया। लंबे समय तक माना जाता रहा कि ऑटिज़्म मुख्यतः लड़कों में पाया जाता है। अनेक पुराने अध्ययनों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों में इसकी पहचान बहुत कम हुई। लेकिन अब शोधकर्ताओं को पता चल रहा है कि इसका कुछ हिस्सा निदान की पद्धति और व्यवहार-संबंधी सामाजिक अपेक्षाओं से भी जुड़ा हो सकता है। अनेक ऑटिस्टिक लड़कियाँ सामाजिक परिस्थितियों में दूसरों के व्यवहार की नकल करके अपनी कठिनाइयों को छिपाने का प्रयास करती हैं। इसे 'कैमोफ्लाजिंग' या 'मास्किंग' कहा जाता है। उदाहरण के लिए कोई बच्ची सामाजिक संवाद के नियमों को सहज रूप से न समझने के बावजूद सीखे हुए वाक्यों और हावभाव का उपयोग कर सकती है। बाहर से देखने पर उसका व्यवहार सामान्य सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप लग सकता है, लेकिन इसके लिए उसे अधिक मानसिक प्रयास करना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त ऑटिज़्म की पहचान के शुरुआती मानदंडों का विकास अधिकतर लड़कों के अध्ययन के आधार पर हुआ था। परिणामस्वरूप कुछ लड़कियों और महिलाओं की पहचान बचपन में नहीं हो सकी और उन्हें किशोरावस्था या वयस्क होने के बाद निदान मिला। इससे ऑटिज़्म के मामलों में दिखाई देने वाली नई वृद्धि का एक हिस्सा वास्तव में पहले छूट गए व्यक्तियों की पहचान भी हो सकता है।
जुलाई 2026 में प्रकाशित एक नए अमेरिकी अध्ययन ने इस संभावना को और मजबूत किया। 'जामा नेटवर्क ओपन' में प्रकाशित इस शोध ने वर्ष 2016 से 2024 के बीच एक बड़ी स्वास्थ्य प्रणाली से जुड़े 1 लाख 71 हजार से अधिक व्यक्तियों के अभिलेखों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2020 के बाद ऑटिज़्म के नए दर्ज निदानों में वृद्धि विशेष रूप से लड़कियों और महिलाओं से जुड़ी थी, जबकि कई पुरुष समूहों में निदान की दर अपेक्षाकृत स्थिर रही या घटी। अध्ययन की महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन 3.4 वर्ष बाद निदान मिला था। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि उनके अध्ययन में दिखाई देने वाली वृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा उन महिलाओं की बेहतर पहचान से संबंधित हो सकता है जो पहले निदान की प्रक्रिया से बाहर रह जाती थीं। यह शोध पूरी अमेरिकी जनसंख्या का प्रतिनिधि अध्ययन नहीं था, लेकिन उसने एक महत्त्वपूर्ण संकेत दिया कि केवल नए जन्म लेने वाले बच्चों के आँकड़ों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। ऑटिज़्म की पहचान का इतिहास लड़कियों, महिलाओं और वयस्कों में छूटे हुए निदानों का इतिहास भी है।
स्वीडन में प्रकाशित एक अन्य बड़े अध्ययन ने भी इसी प्रश्न को नया आयाम दिया। लगभग 27 लाख 57 हजार व्यक्तियों से जुड़े इस जन्म-समूह अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि बचपन में लड़कों के निदान अधिक होने के बावजूद उम्र बढ़ने के साथ लड़कियों की पहचान तेजी से बढ़ती है। अध्ययन के अनुसार बीस वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते निदान की संचयी दर में लड़के और लड़कियों का अंतर बहुत कम रह गया था। यह परिणाम लंबे समय से प्रचलित उस धारणा की समीक्षा करने का आधार देता है कि ऑटिज़्म लड़कों में हमेशा लड़कियों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जैविक स्तर पर स्त्री और पुरुष के बीच कोई अंतर नहीं है। आनुवंशिक और विकासात्मक अंतर संभव हैं। लेकिन यह स्पष्ट हो रहा है कि निदान में दिखाई देने वाले अंतर को केवल जैविक अंतर मान लेना उचित नहीं है। यदि किसी समूह की पहचान व्यवस्थित रूप से देर से होती रही है, तो नए निदानों में उसकी बढ़ती संख्या वास्तविक स्थिति की वृद्धि के बजाय स्वास्थ्य व्यवस्था की बेहतर पहुँच और बदलते ज्ञान का परिणाम भी हो सकती है।
इन सभी अध्ययनों के बाद भी एक प्रश्न बचा रहता है। यदि बेहतर पहचान, विस्तृत नैदानिक परिभाषाएँ और जागरूकता ही बढ़ते आँकड़ों का बड़ा कारण हैं, तो क्या वास्तविक जैविक या पर्यावरणीय परिवर्तन की संभावना को पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए? इसका उत्तर है, नहीं। विज्ञान के पास अभी ऐसे पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं जिनसे दुनिया भर में ऑटिज़्म की वास्तविक व्यापकता बढ़ने की किसी एक निश्चित दर की पुष्टि की जा सके। लेकिन ऐसे अनेक कारकों की पहचान की गई है जो किसी बच्चे के ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम पर होने की संभावना से जुड़े पाए गए हैं। इनमें आनुवंशिक विशेषताएँ, माता-पिता की आयु, गर्भावस्था के दौरान कुछ स्वास्थ्य स्थितियाँ, समय से पहले जन्म और पर्यावरणीय परिस्थितियाँ शामिल हैं। इन कारकों की चर्चा करते समय सबसे महत्त्वपूर्ण सावधानी यह है कि किसी परिस्थिति का ऑटिज़्म के साथ सांख्यिकीय संबंध होना और उसके सीधे ऑटिज़्म पैदा करने का प्रमाण मिलना, दोनों अलग बातें हैं। यदि किसी अध्ययन में एक विशेष परिस्थिति वाले परिवारों में ऑटिज़्म अधिक पाया गया, तो इससे अपने आप यह सिद्ध नहीं होता कि उस परिस्थिति ने ऑटिज़्म पैदा किया। इसके पीछे आनुवंशिकी, सामाजिक परिस्थितियाँ, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अथवा अन्य अज्ञात कारण भी काम कर सकते हैं।
ऑटिज़्म के वैज्ञानिक अध्ययन में आनुवंशिकी की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। परिवारों और जुड़वाँ बच्चों पर किए गए शोध लंबे समय से संकेत देते रहे हैं कि ऑटिज़्म के विकास में आनुवंशिक विशेषताओं का बड़ा योगदान है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ऑटिज़्म के लिए कोई एक 'ऑटिज़्म जीन' जिम्मेदार है। आधुनिक आनुवंशिक अनुसंधान ने अनेक ऐसे जीन और आनुवंशिक परिवर्तन पहचाने हैं जो मस्तिष्क के प्रारंभिक विकास, तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क और विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं से जुड़े हैं। कुछ मामलों में ऐसे दुर्लभ आनुवंशिक परिवर्तन मिलते हैं जिनका प्रभाव अपेक्षाकृत बड़ा हो सकता है, जबकि अनेक दूसरे मामलों में बहुत से छोटे-छोटे आनुवंशिक प्रभाव मिलकर संभावना को प्रभावित करते हैं। कुछ परिवर्तन माता-पिता से विरासत में मिलते हैं और कुछ बच्चे में नए रूप से उत्पन्न हो सकते हैं। इसी कारण एक ही परिवार में दो बच्चों की विकासात्मक विशेषताएँ काफी अलग हो सकती हैं। आनुवंशिकी हमें यह समझने में सहायता करती है कि ऑटिज़्म की जैविक पृष्ठभूमि जटिल क्यों है। लेकिन आनुवंशिकी अकेले पिछले दो दशकों में दर्ज निदानों की तेज वृद्धि की पूरी व्याख्या नहीं करती। इतनी छोटी ऐतिहासिक अवधि में सामान्य जनसंख्या की आनुवंशिक संरचना का इतनी तेजी से बदल जाना अपेक्षित नहीं है कि उससे पाँच गुने निदानों का सीधा निष्कर्ष निकाला जा सके। इसलिए शोधकर्ताओं को आनुवंशिक संभावनाओं के साथ उनके विकासात्मक और पर्यावरणीय संदर्भों को भी समझना पड़ता है।
माता-पिता की बढ़ती आयु एक दूसरा महत्त्वपूर्ण शोध-विषय है। दुनिया के अनेक देशों में उच्च शिक्षा, रोजगार, विवाह के बदलते स्वरूप और सामाजिक परिस्थितियों के कारण लोग पहले की तुलना में अधिक उम्र में माता-पिता बन रहे हैं। कुछ जनसंख्या-अध्ययनों में अधिक आयु के पिता और माता के बच्चों में ऑटिज़्म की पहचान की संभावना औसतन अधिक मिली है। अधिक आयु के पिता में शुक्राणुओं के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान नए आनुवंशिक परिवर्तनों की संभावना बढ़ सकती है। दूसरी ओर माता की अधिक आयु के साथ गर्भावस्था संबंधी कुछ स्वास्थ्य जोखिम भी बढ़ सकते हैं। लेकिन यह संबंध सरल या अनिवार्य नहीं है। अधिक उम्र के अधिकांश माता-पिता के बच्चे ऑटिस्टिक नहीं होते और कम उम्र के माता-पिता के बच्चे भी ऑटिस्टिक हो सकते हैं। इसके अलावा अधिक आयु में माता-पिता बनने वाले परिवारों में शिक्षा, आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच जैसी परिस्थितियाँ भी निदान की संभावना को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए माता-पिता की बढ़ती आयु को ऑटिज़्म की वैश्विक वृद्धि का निश्चित कारण घोषित करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। यह एक ऐसा कारक है जिसका योगदान विभिन्न आबादियों में अलग हो सकता है और जिसे अन्य जैविक तथा सामाजिक कारकों के साथ समझना आवश्यक है।
गर्भावस्था के दौरान माँ के स्वास्थ्य से जुड़े कुछ प्रश्न भी वैज्ञानिक अनुसंधान के केंद्र में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार गर्भावस्था के दौरान मधुमेह, समय से पहले जन्म, जन्म के समय कम वजन और प्रसव संबंधी कुछ गंभीर जटिलताएँ ऑटिज़्म की बढ़ी हुई संभावना से संबंधित पाई गई हैं। लेकिन इनमें से किसी एक परिस्थिति का होना यह निर्धारित नहीं करता कि बच्चा ऑटिस्टिक होगा। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक कठिनाई सामने आती है। उदाहरण के लिए समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में विकासात्मक अंतर अधिक पहचाने जा सकते हैं, लेकिन इस संबंध में गर्भावस्था की मूल समस्या, आनुवंशिक पृष्ठभूमि और जन्म के बाद स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयाँ, सभी की भूमिका हो सकती है। इसी तरह जिन बच्चों को जन्म के बाद अधिक चिकित्सकीय निगरानी मिलती है, उनमें विकासात्मक स्थितियों की पहचान भी जल्दी हो सकती है। इसलिए शोधकर्ताओं को यह अलग करना पड़ता है कि कौन-सा कारक वास्तव में विकास को प्रभावित कर रहा है और कौन-सा केवल बेहतर चिकित्सकीय निगरानी के कारण आँकड़ों में अधिक दिखाई दे रहा है।
पर्यावरण प्रदूषण से जुड़े अध्ययन भी ऑटिज़्म की बहस में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कुछ शोधों में गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण और कुछ भारी धातुओं के संपर्क तथा ऑटिज़्म के बीच सांख्यिकीय संबंध देखे गए हैं। यह विषय विशेष रूप से उन देशों के लिए महत्त्वपूर्ण है जहाँ बड़े शहरों में वायु प्रदूषण लंबे समय से गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। लेकिन इस क्षेत्र में एक बड़ी वैज्ञानिक समस्या यह है कि प्रदूषण का वास्तविक संपर्क मापना कठिन होता है। किसी व्यक्ति का घर प्रदूषित क्षेत्र में होना यह नहीं बताता कि गर्भावस्था के किस चरण में उसे कौन-से प्रदूषक की कितनी मात्रा मिली। प्रदूषण से जुड़े अध्ययन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, यातायात, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य पर्यावरणीय संपर्कों से भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए वायु प्रदूषण को ऑटिज़्म का सिद्ध या सार्वभौमिक कारण बताना उपलब्ध प्रमाणों से आगे बढ़ जाना होगा। फिर भी प्रदूषण कम करने के सार्वजनिक स्वास्थ्य लाभ स्वतंत्र रूप से स्थापित हैं, इसलिए इस दिशा में शोध और रोकथाम की आवश्यकता ऑटिज़्म से जुड़े अनिश्चित प्रश्नों के बावजूद बनी रहती है।
ऑटिज़्म की बढ़ती व्यापकता के संबंध में एक अत्यंत संवेदनशील विवाद बचपन में लगाए जाने वाले टीकों से जुड़ा रहा है। वर्ष 1998 में एक प्रकाशित अध्ययन ने खसरा, कण्ठमाला और रूबेला से बचाव वाले 'एमएमआर' टीके तथा ऑटिज़्म के बीच संबंध होने का संदेह पैदा किया था। बाद में उस अध्ययन में गंभीर वैज्ञानिक और नैतिक समस्याएँ सामने आईं और उसे वापस ले लिया गया। इसके बावजूद टीकों को लेकर अविश्वास अनेक देशों में फैलता रहा। बाद के वर्षों में बड़े जनसंख्या-अध्ययनों और व्यवस्थित वैज्ञानिक समीक्षाओं ने टीकों तथा ऑटिज़्म के बीच कारणात्मक संबंध का समर्थन नहीं किया। दिसंबर 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीका सुरक्षा सलाहकार समिति ने उपलब्ध शोधों की नई समीक्षा के बाद इस निष्कर्ष की पुनः पुष्टि की। सितंबर 2026 में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक विस्तृत समीक्षा ने भी पाया कि अधिक विश्वसनीय और बेहतर पद्धति वाले अध्ययनों में बचपन के टीकों, जिनमें थायोमर्सल वाले टीके भी शामिल हैं, और ऑटिज़्म के बीच कारणात्मक संबंध का प्रमाण नहीं मिलता। इसलिए ऑटिज़्म की बढ़ती पहचान को टीकाकरण का परिणाम बताना वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुरूप नहीं है। ऐसे दावे विशेष रूप से नुकसानदेह हो सकते हैं क्योंकि वे अभिभावकों को उन टीकों से दूर कर सकते हैं जो बच्चों को गंभीर संक्रामक रोगों से बचाते हैं।
इसी संदर्भ में मोबाइल फोन, स्क्रीन टाइम और डिजिटल जीवनशैली को लेकर भी अनेक आशंकाएँ व्यक्त की जाती हैं। आज के बच्चे पहले की तुलना में अधिक समय मोबाइल फोन, टेलीविजन और डिजिटल उपकरणों के संपर्क में बिताते हैं। कुछ अध्ययनों में अधिक स्क्रीन समय और छोटे बच्चों के भाषा विकास, नींद, ध्यान तथा सामाजिक संवाद से संबंधित कठिनाइयों के बीच संबंध पाया गया है। लेकिन इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि स्क्रीन देखने से ऑटिज़्म उत्पन्न होता है। ऑटिज़्म एक जटिल न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है और वर्तमान वैज्ञानिक प्रमाण स्क्रीन टाइम को उसका स्थापित कारण नहीं मानते। यहाँ कारण और परिणाम की दिशा समझना भी महत्त्वपूर्ण है। संभव है कि विकासात्मक अथवा संवेदनात्मक विशेषताओं वाले कुछ बच्चे डिजिटल उपकरणों की ओर अधिक आकर्षित हों। ऐसे में केवल स्क्रीन के उपयोग और व्यवहार में अंतर साथ-साथ दिखाई देने से यह सिद्ध नहीं होता कि स्क्रीन ने ही उस अंतर को पैदा किया। अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से संबंधित स्वतंत्र चिंताएँ अवश्य हैं, लेकिन उन्हें ऑटिज़्म के कारणों के साथ मिलाना अभिभावकों के बीच अनावश्यक भय पैदा कर सकता है।
ऑटिज़्म के बारे में वैज्ञानिक जानकारी बढ़ने के साथ एक दूसरी सामाजिक प्रवृत्ति भी विकसित हुई है, जिसे 'न्यूरोडाइवर्सिटी' कहा जाता है। इसका मूल विचार यह है कि मानव मस्तिष्क के विकास, सूचना को समझने, सामाजिक संवाद और संवेदनात्मक अनुभवों में विविधता पाई जाती है। इस दृष्टिकोण के समर्थक इस बात पर जोर देते हैं कि प्रत्येक विकासात्मक अंतर को केवल कमी या बीमारी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। ऑटिस्टिक व्यक्तियों की क्षमताओं, जरूरतों, अनुभवों और अधिकारों को भी महत्त्व दिया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण चिकित्सा विज्ञान की आवश्यकता समाप्त नहीं करता। ऐसे अनेक ऑटिस्टिक बच्चे और वयस्क हैं जिन्हें संवाद, शिक्षा, दैनिक जीवन, मानसिक स्वास्थ्य या अन्य सहवर्ती स्थितियों के लिए व्यापक सहायता की आवश्यकता होती है। लेकिन यह विचार अवश्य सामने लाता है कि निदान का उद्देश्य किसी व्यक्ति को केवल सामान्य व्यवहार के पूर्वनिर्धारित ढाँचे में फिट करना नहीं होना चाहिए। उसकी कठिनाइयों को समझना, उसकी क्षमताओं को विकसित करना और समाज को अधिक समावेशी बनाना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इस सामाजिक परिवर्तन ने ऑटिज़्म के बारे में जागरूकता बढ़ाई है और ऐसे अनेक वयस्कों को अपनी स्थिति समझने तथा औपचारिक पहचान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया है, जो बचपन में निदान से वंचित रह गए थे।
ऑटिज़्म की वैश्विक बहस का भारतीय संदर्भ कुछ अलग चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। भारत में ऑटिज़्म की वास्तविक व्यापकता के बारे में अमेरिका जैसी निरंतर और व्यापक राष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। भारत में किए गए कुछ अध्ययनों ने अपेक्षाकृत कम व्यापकता दर्ज की है, लेकिन उन्हें देश की वास्तविक स्थिति का पूर्ण प्रतिनिधि मानना कठिन है। वर्ष 2017 में प्रकाशित एक भारतीय जनसंख्या-अध्ययन में ग्रामीण, शहरी और जनजातीय क्षेत्रों के एक से दस वर्ष की आयु के 28,070 बच्चों का मूल्यांकन किया गया था। इसमें 43 बच्चों की पहचान ऑटिज़्म के साथ हुई और अध्ययन की व्यापकता लगभग 0.15 प्रतिशत दर्ज की गई। इसी प्रकार वर्ष 2019 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण ने पाया कि भारत में उपलब्ध जनसंख्या-आधारित अध्ययनों की संख्या बहुत सीमित थी। समीक्षा में शामिल शहरी अध्ययनों की संयुक्त व्यापकता लगभग 0.09 प्रतिशत और ग्रामीण अध्ययन की लगभग 0.11 प्रतिशत थी। लेकिन इन संख्याओं की तुलना सीधे अमेरिका के 3.2 प्रतिशत वाले आँकड़े से नहीं की जा सकती, क्योंकि आयुवर्ग, पहचान की प्रक्रिया, अध्ययन के स्थान और परीक्षण-पद्धति में अंतर था। यह संभव है कि भारत में बड़ी संख्या में ऑटिस्टिक बच्चों की पहचान ही नहीं हो पा रही हो। साथ ही उपलब्ध शोधों के आधार पर देश की वास्तविक राष्ट्रीय व्यापकता का विश्वसनीय अनुमान देना अभी कठिन है।
भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल ऑटिज़्म के संभावित बढ़ते मामलों की नहीं, बल्कि समय रहते उसकी पहचान और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की भी है। महानगरों में बच्चों के विकास से जुड़े विशेषज्ञ, बाल मनोचिकित्सक, क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक, स्पीच थेरेपिस्ट और अन्य संबंधित सेवाएँ अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध हैं, जबकि छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी सुविधाओं तक पहुँच सीमित हो सकती है। अनेक परिवारों में बच्चे के बोलने में विलंब, सामाजिक संवाद में कठिनाई या कुछ व्यवहार-संबंधी विशेषताओं को सामान्य विकास का हिस्सा मानकर लंबे समय तक प्रतीक्षा की जाती है। दूसरी ओर कभी-कभी किसी एक व्यवहार, जैसे आँखों में कम देखना या देर से बोलना, को ऑटिज़्म का निश्चित प्रमाण मान लेने की भी गलती होती है। वास्तव में किसी एक लक्षण के आधार पर ऑटिज़्म का निदान नहीं किया जा सकता। इसके लिए विकासात्मक इतिहास, संवाद, सामाजिक संपर्क, व्यवहार और अन्य संभावित विकासात्मक स्थितियों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक होता है। बच्चे का विकास समझना किसी एक परीक्षा में पास या फेल होने जैसा नहीं है। इसलिए बेहतर व्यवस्था वह होगी जिसमें अभिभावकों की चिंताओं को गंभीरता से लिया जाए, लेकिन बच्चों पर जल्दबाजी में कोई गलत पहचान भी न थोपी जाए।
समय पर पहचान होने का महत्त्व इस बात में है कि बच्चे और परिवार की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार सहायता शुरू की जा सके। संवाद और भाषा विकास में कठिनाई होने पर स्पीच एवं लैंग्वेज सहायता उपयोगी हो सकती है। दैनिक गतिविधियों, संवेदनात्मक आवश्यकताओं या अन्य विकासात्मक कठिनाइयों के लिए व्यक्तिगत मूल्यांकन के आधार पर अलग प्रकार की सहायता आवश्यक हो सकती है। विद्यालयों में अनुकूल वातावरण, शिक्षकों का प्रशिक्षण, परिवार का सहयोग और बच्चे के व्यवहार को समझने वाला सामाजिक परिवेश महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रमाण-आधारित मनोसामाजिक हस्तक्षेप संवाद और सामाजिक कौशल विकसित करने में मदद कर सकते हैं तथा ऑटिस्टिक व्यक्तियों और उनके परिवारों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बना सकते हैं। लेकिन यहाँ भी एक भ्रम से बचना चाहिए। ऑटिज़्म की पहचान होना यह नहीं बताता कि बच्चे का भविष्य कैसा होगा। हर बच्चे की विकासात्मक यात्रा अलग होती है। न ही सभी बच्चों के लिए कोई एक उपचार या हस्तक्षेप समान रूप से उपयोगी होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है कि व्यक्ति की सहायता संबंधी आवश्यकताओं को समझकर उसके अनुरूप सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ, न कि केवल निदान के नाम को देखकर एक जैसी अपेक्षाएँ तय कर ली जाएँ।
इस पूरी चर्चा में एक ऐसी बात भी है, जिस पर सार्वजनिक नीति बनाने वालों को विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि किसी देश में ऑटिज़्म की पहचान बढ़ती है, तो उसे केवल स्वास्थ्य समस्या बढ़ने का संकेत मानकर भयभीत होने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि उसकी स्वास्थ्य व्यवस्था पहले कितने बच्चों को पहचानने में असफल रही थी। अधिक निदान का अर्थ कई बार अधिक बच्चों का आवश्यक सेवाओं तक पहुँचना भी हो सकता है। लेकिन इसके विपरीत यदि किसी देश में ऑटिज़्म के मामले बहुत कम दर्ज हो रहे हैं, तो यह अपने आप बेहतर स्वास्थ्य का प्रमाण नहीं है। संभव है वहाँ परीक्षण, विशेषज्ञों और जागरूकता की कमी हो। इसलिए देशों के बीच ऑटिज़्म की तुलना करते समय केवल प्रतिशत देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी जानना आवश्यक है कि कितने बच्चों का मूल्यांकन किया गया, किन मानदंडों का उपयोग हुआ, कितनी आयु में पहचान हुई और कितने परिवारों तक स्वास्थ्य तथा शिक्षा संबंधी सहायता पहुँची। किसी स्थिति के बारे में कम जानकारी होना और उस स्थिति का कम होना, दोनों अलग बातें हैं।
ऑटिज़्म की बढ़ती व्यापकता के संबंध में भविष्य के अनुसंधान के सामने सबसे बड़ी चुनौती वास्तविक जैविक परिवर्तन और बेहतर पहचान के प्रभाव को अलग करना है। इसके लिए ऐसे दीर्घकालिक जनसंख्या-अध्ययन आवश्यक हैं जिनमें अलग-अलग समय पर जन्मे बच्चों का मूल्यांकन समान वैज्ञानिक मानदंडों से किया जाए। केवल अस्पतालों में दर्ज मरीजों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं होगा। शोधकर्ताओं को ऐसे बच्चों तक भी पहुँचना होगा जो कभी चिकित्सा व्यवस्था में दर्ज ही नहीं हुए। इसी तरह गर्भावस्था, आनुवंशिकी, पर्यावरण, जन्म से संबंधित परिस्थितियों और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के आँकड़ों को सावधानीपूर्वक जोड़ना होगा। किसी एक कारक से जुड़े सांख्यिकीय संबंध को कारणात्मक संबंध समझने की जल्दबाजी से बचना होगा। विकासात्मक विज्ञान की वास्तविक चुनौती यही है कि वह अनेक संभावित कारणों के बीच संबंधों को पहचाने और फिर ऐसे प्रमाण जुटाए जिनसे उनका वास्तविक योगदान समझा जा सके। इस क्षेत्र में नए आनुवंशिक परीक्षण, बड़े जनसंख्या-अध्ययन और मस्तिष्क के प्रारंभिक विकास पर अनुसंधान महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इनके निष्कर्षों को वैज्ञानिक अनिश्चितताओं सहित समझना आवश्यक है।
यह प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है कि क्या बढ़ती पहचान के साथ ऑटिज़्म को लेकर समाज का दृष्टिकोण भी बदल रहा है। पहले जिन बच्चों को असामान्य, अनुशासनहीन, सामाजिक रूप से कमजोर या पढ़ाई में अयोग्य मान लिया जाता था, उनके व्यवहार को अब विकासात्मक विज्ञान की सहायता से अधिक संवेदनशीलता के साथ समझने की संभावना बढ़ी है। यह परिवर्तन केवल चिकित्सा की उपलब्धि नहीं, सामाजिक दृष्टि के विस्तार का भी परिणाम है। लेकिन निदान का बढ़ना तभी सार्थक होगा जब उसके साथ सम्मान, शिक्षा, सामाजिक स्वीकृति और आवश्यक सहायता भी बढ़े। यदि किसी बच्चे की ऑटिज़्म के साथ पहचान हो जाए, लेकिन उसे विद्यालय में प्रवेश, उचित शिक्षण व्यवस्था या परिवार को आवश्यक मार्गदर्शन न मिले, तो केवल आँकड़ों में उसका नाम दर्ज हो जाना पर्याप्त नहीं होगा। इसी तरह वयस्क ऑटिस्टिक व्यक्तियों की रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, स्वतंत्र जीवन और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित आवश्यकताओं को भी सार्वजनिक विमर्श में स्थान मिलना चाहिए। ऑटिज़्म को केवल बचपन की स्थिति समझना भी एक गंभीर भूल है। ऑटिस्टिक बच्चे बड़े होकर ऑटिस्टिक वयस्क बनते हैं, और समाज की जिम्मेदारी उनके जीवन के हर चरण तक फैली होती है।
अंततः मूल प्रश्न पर लौटना आवश्यक है कि क्या दुनिया में ऑटिज़्म वास्तव में बढ़ रहा है या विज्ञान अब उसे पहले से बेहतर पहचान रहा है। उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों का सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है कि ऑटिज़्म के दर्ज मामलों और निदानों की व्यापकता निश्चित रूप से बढ़ी है। इस वृद्धि का एक बड़ा और अच्छी तरह प्रमाणित हिस्सा निदान की बदलती परिभाषाओं, अधिक जागरूकता, बेहतर परीक्षण, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच तथा पहले छूटे हुए बच्चों और वयस्कों की पहचान से संबंधित है। स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों के अध्ययन इस निष्कर्ष को मजबूत आधार देते हैं। दूसरी ओर आनुवंशिक, प्रजनन संबंधी और पर्यावरणीय कारकों पर जारी अनुसंधान यह संभावना खुली रखता है कि कुछ आबादियों में वास्तविक व्यापकता को प्रभावित करने वाले परिवर्तन भी हो सकते हैं। लेकिन अभी ऐसा कोई सार्वभौमिक प्रमाण नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि पूरी दुनिया में ऑटिज़्म के बढ़ते आँकड़ों के पीछे केवल एक ही जैविक या पर्यावरणीय कारण काम कर रहा है। न ही ऐसा विश्वसनीय प्रतिशत उपलब्ध है जो हर देश में वास्तविक वृद्धि और बेहतर पहचान के योगदान को अलग-अलग निर्धारित कर सके।
ऑटिज़्म की इस कहानी में विज्ञान की प्रगति और उसकी सीमाएँ दोनों दिखाई देती हैं। सौ वर्ष पहले मनुष्य के विकासात्मक व्यवहारों के बारे में हमारी समझ बहुत सीमित थी। अनेक बच्चों को उनकी कठिनाइयों के साथ अकेला छोड़ दिया जाता था। आज हम उन विशेषताओं को अधिक व्यवस्थित ढंग से पहचान सकते हैं, जिनके लिए पहले समाज के पास उचित भाषा तक नहीं थी। यह संभव है कि ऑटिज़्म के साथ पहचाने जाने वाले कुछ व्यक्ति हमेशा से हमारे समाज में मौजूद रहे हों, लेकिन उन्हें समझने की दृष्टि अब विकसित हुई हो। इसके साथ यह भी संभव है कि बदलती जैविक और पर्यावरणीय परिस्थितियों का कुछ प्रभाव हो, जिसे पूरी तरह जानना अभी बाकी है। विज्ञान की ईमानदारी इसी में है कि जहाँ प्रमाण मजबूत हैं, वहाँ स्पष्ट निष्कर्ष दिया जाए और जहाँ प्रमाण अधूरे हैं, वहाँ अनिश्चितता स्वीकार की जाए।
इसलिए ऑटिज़्म के बढ़ते आँकड़ों का सबसे बड़ा संदेश केवल यह नहीं है कि दुनिया में कितने बच्चे ऑटिस्टिक हैं। उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि इतने लंबे समय तक हम कितने बच्चों और वयस्कों को सही ढंग से समझ ही नहीं पाए। संभव है भविष्य का विज्ञान हमें बताए कि ऑटिज़्म की वास्तविक व्यापकता में भी कुछ परिवर्तन हुआ है। लेकिन वर्तमान अनुसंधान हमें एक महत्त्वपूर्ण सत्य के करीब अवश्य ले जाता है। कई बार समाज में किसी स्थिति की संख्या इसलिए नहीं बढ़ती कि वह अचानक अधिक पैदा होने लगी है, बल्कि इसलिए भी बढ़ती है कि हमारी आँखें उसे पहचानने में पहले से अधिक सक्षम हो गई हैं। ऑटिज़्म की कहानी इसी बदलती वैज्ञानिक दृष्टि, अधूरे ज्ञान और मानवीय समझ के विस्तार की कहानी है।


