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क्यों अब सावन आकर्षित नहीं करता
Sawan Ki Barish: कभी सावन की बारिश कागज की नाव, तीज, झूले, कजरी और मिट्टी की सौंधी खुशबू लेकर आती थी। आज जलभराव, ट्रैफिक, बाढ़ और भागती जिंदगी के बीच सावन का आकर्षण क्यों कम होता जा रहा है?
Sawan Ki Barish
Sawan Ki Barish: रिमझिम-झिरमिर बरसाती पानी की बूंदे जब आती हैं तब मन अचानक आल्हाद कर उठता है--- अहा, बारिश आई है। चौक-चौबारे तो अब धीरे-धीरे करके खत्म हो चले हैं। पहले मायके में जब तेज बारिश आती थी तो कमरों से रसोई तक जाने में भीग जाते थे, खुला चौक जो था। ज्यादा तेज बारिश होती, तो आंगन में पानी भर जाता तो कागज की नाव बना लिया करते थे। तब उस बारिश में पैदल या रिक्शा में स्कूल जाते, अपनी कोचिंग जाते थे। रास्ते में रिक्शे वाले एक- दूसरे रिक्शा वालों को हिदायत देते हुए निकलते- आगे उस मोड़ पर पानी भरा है, संभल कर जाना।
साइकिल, स्कूटर भी चलाते थे बारिश रुकने के बाद या धीमी-धीमी बारिश में पर कभी डर नहीं लगता था, चिंता नहीं होती थी। पर अब बारिश आती है तो डर होता है कि सड़क जाम का, जगह-जगह पानी भर जाने का, कृत्रिम बाढ़ का। चाहे टियर-1 शहर हो या टियर-2 शहर हो या कोई भी और हो इस कृत्रिम बाढ़ के प्रभाव से अछूते हैं हीं नहीं। सावन की बारिश में नदियां ओवरफ्लो होकर बहने लगती हैं, पहाड़ों से बहती मिट्टी सरक-सरककर सड़कों पर आ जाती है, जगह-जगह सड़कें स्वत: ही फट जाती हैं और उन पर पर बड़े-बड़े गड्ढे पड़ जाते हैं, कहीं सड़कें बैठ जाती हैं।
अब मिट्टी में पड़ती बारिश की बूंदे सौंधी- सौंधी खुशबू नहीं देंती, तन को ठंडक भी नहीं देंती, मन को ताजगी भी नहीं देंती, क्योंकि अब हमारे पास समय ही कहां रहा है, इन सबको महसूस करने के लिए। दूसरा अब बारिश से जगह-जगह कचरा जाम हो जाता है, फिसलन हो जाती है और उस कचरे के भीगने से जो बदबू उठती है, वह हमें सावन की बारिश में भीगी हुई मिट्टी की खुशबू आने ही नहीं देती। अब गांव भी शहरों में बदलते जा रहे हैं और शहर फ्लैटनुमा बंद घरों की इमारतों में।
एक संवेदनशील मन आज भी देखता है, महसूस करता है कि सारे पेड़-पौधे जब बारिश के पानी से भीगते हैं तो बारिश रुकने के बाद उन्हें देखना आंखों को कितना अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि नहा-धोकर नए-नए पत्तों के कपड़े पहन कर ये पेड़-पौधे और कितने सुंदर लगने लगे हैं। बारिश के बाद की हवा के ठंडे-ठंडे झोंके दिल को छू लेते हैं। बारिश जमीन की सारी गर्मी सोख लेती है और साफ हवा हमें मिलने लगती है । जिंदगी में मन कितनी बार छला जाता, कितनी बार टूट जाता है पर ये बारिश की बूंदे हर बार उस टूटे मन को तृप्त कर, जीने का एक नया कारण दे जातीं हैं। तभी तो सावन से त्योहारों की एक लंबी कतार चालू हो जाती है।
घर के पास का पीपल जब बारिश के बाद हवा में डोलता था, तो ऐसा लगता मानो सहज, सरल, सुंदर अभिव्यक्ति का स्वर कानों में उतर आया हो और उससे निकलने वाली ठंडी हवा से खुशियां आस-पास बिखर गई हों। तीज के गीत गुनगुनाने लगे जाते थे, घरों में झूले पड़ जाते थे और मेहंदी लगाने की तैयारियां होने लगतीं। हरे- भरे सावन में लहरिया खरीदना और उसको पहनना जरूरी हो जाता क्योंकि जहां मन हरा -भरा हो तो युवतियों के, महिलाओं के भावों में अपने आप सागर की लहरों जैसे उतार- चढ़ाव आने लगते। मन- मयूर अपने आप नाच उठता।
पर अब सावन कब आता है, कब जाता है यह हमारी पीढ़ी तक के लोगों को तो पता होता है क्योंकि त्योहार चालू होने वाले होते हैं लेकिन हमारी अगली पीढ़ी यानी जेन जी, जो इस समय बहुत सुर्खियां बटोर रही है क्योंकि हर छोटे-बड़े नेता को अब इनके बारे में बात करनी पड़ती है, इनके बारे में बोलना, सोचना और इन्हें लूप में लेना ही पड़ता है, को इन सब सावन-भादो से क्या लेना-देना ? उन्हें उनके आने-जाने का मालूम ही नहीं होता। लिखा होगा कालिदास ने 'मेघदूतम', 'ऋतु संहार' जिसमें यक्ष ने मेघों को दूत बनाकर अपनी पत्नी को अपना संदेश भेजा और 'ऋतु संहार' में भारत की 6 ऋतुओं में प्रकृति के सुंदर रूप का वर्णन किया गया है। पर अब जीवन इतनी तीव्र गति से भाग रहा है कि इस बढ़ते कोलाहल में हम भले ही बारिश देख रहे हैं, भीग रहे हैं पर मन अंदर से रसहीन होता जा रहा है।
आज भी जब शास्त्रीय संगीत सुनते हैं तो राग मल्हार, राग मेघ, सूरदासी मल्हार, राग गौड़ मल्हार या अमृत वर्षिणी जैसे मनोहर राग और उनके भाव, उनका आरोह -अवरोह कानों में इतना सुखद प्रतीत होता है। आंखें बंद कर इसे सुनने से इसका बहुत ही सकारात्मक और मानसिक शांति वाला प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। पर हम इस समय इतने बिखरे-बिखरे से हैं कि हमारे अंदर कुछ तो खालीपन है, जो अब हमें सावन अपनी ओर खींचता नहीं है। शिव भक्त कांवड़ लेकर बम भोले को रिझाने चले हैं तो व्हाट्सएप ग्रुप में तीज की पार्टी कैसे करनी है, कब करनी है की चर्चाएं चल रही हैं।
पहले सब पारंपरिक तीज- त्योहार घरों के त्योहार होते थे, घर के मंगल के, शगुन के त्योहार होते थे पर अब लीक-पीट चलाने जैसे बनते जा रहे हैं। घर की देहरी से निकलकर ये त्योहार अब होटल- रेस्टोरेंट में मनाएं जा रहे हैं, रील्स बनाए जा रहीं हैं और इन सब के बीच इसके अपने निहितार्थ खत्म होते जा रहे हैं। रील्स बनाना कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि जेन जी की प्रसिद्धि भी तो इसी को लेकर हुई है । लेकिन जब त्योहारों के अर्थ खत्म हो जाएं तो उन त्योहारों को मनाने का कोई औचित्य भी नहीं रह जाता है।
अब न तो लोकगीत बच रहे, जो लोकजीवन का रस हुआ करते थे, श्रावणी कजरी अब मंचों पर रह गई है। हम उपभोक्तावादी दुनिया का वह हिस्सा बनते जा रहे हैं जहां अब समय नहीं है , संवेदना नहीं है। अगर सब होता तो हम मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के एक गांव का 28 जुलाई का वायरल वीडियो देख कर सिहर उठते कि कैसे एक डैम के खंबो पर कूद-कूद कर अपनी जान को जोखिम में डालकर,
उफनती बेतवा नदी को पार कर स्कूल जाते स्कूली बच्चे
दिख रहे थे। वीडियो वायरल होने के बाद की प्रशासनिक कार्रवाई अपनी जगह है पर पहले सवाल यह है कि बच्चों को अपनी शिक्षा के लिए क्यों इस तरह से जान जोखिम में डालकर जाना पड़ रहा है।
सावन की यह बारिश किसी को दुलारती है तो किसी को सताती है। हाल ही में संपन्न हुए ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों में भारत को चौथा स्थान प्राप्त हुआ। इस जीत में योगदान देने वाली मीराबाई चानू, अस्मिता दे, साक्षी चौधरी, शर्मिला धनकर, लवलीना बरगोहाई, ज्ञानेश्वरी यादव जैसे महिला खिलाड़ियों के नाम के ऊपर हम गर्व करते हैं , हमें उन पर खुशियां मनानी चाहिए और उनके प्रदर्शन के लिए उनकी प्रशंसा भी अवश्य करनी चाहिए। पर अचानक कान चौंक जाते हैं , आंखें भर्रा उठती हैं, जब असम के हैलाकंदी में एक अगस्त की रात 16 वर्षीय एक नाबालिग लड़की, जो कि कक्षा 10 की छात्रा थी, के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और फिर निर्दयता के साथ, बर्बरता के साथ उसकी हत्या कर दी गई। पांच आरोपियों में से एक नाबालिग लड़का भी है, यह बात महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि उसका कृत्य क्षम्य नहीं बनता। उसमें से एक लड़के से लड़की की पहले से जान- पहचान बताई जाती है। उस लड़की को सबक सिखाने के लिए किया गया यह घिनौना कृत्य सावन की बारिशों से न तो धुल पाएगा और न ही बेटियों की सुरक्षा के प्रति हमारे चिंता को कम करेगा।
एक वीडियो शायद उत्तर प्रदेश का वायरल हो रहा है, जहां सड़क पर पानी भरा था और नाला दिखाई नहीं दे रहा था, स्कूल जाते हुए तीन बच्चे उसमें गिर गए। इसमें किसकी गलती है? आईआईटी जैसे बड़े संस्थानों की कैंटीनों ,आने जाने वाले रास्तों पर जल भराव हो रहा है, इसमें किसकी गलती है? देश की राजधानी दिल्ली समेत सभी बड़े शहर सावन की तेज बारिश में घंटों के जाम के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं, क्योंकि पानी निकासी की सुविधा बिल्कुल भी सही नहीं है , यह किसकी गलती है? असम, हिमाचल प्रदेश जैसे प्रदेश बाढ़ से बुरी तरह से त्रस्त हो रखे हैं। हर साल आने वाली बाढ़ से इस बार की बाढ़ कुछ अलग थी। पर बाढ़ तो हमेशा ही आती है, उसमें वहां के स्थानीय निवासियों की तो गलती नहीं।
दरअसल अब सावन आता है, सावन चला जाता है पर उससे मिलने वाली खुशियां अब कम जगह बना पाती हैं क्योंकि बारिश आने का अर्थ है दैनिक कार्यों पर लगाम लग जाना, बारिश आने का अर्थ है तेज बारिश के बाद और अधिक उमस हो जाना, क्योंकि बारिश आने का अर्थ है कहीं-कहीं बिजली- पानी की सप्लाई बंद हो जाना, क्योंकि बारिश आने का अर्थ है रास्ते में पानी भर जाना और फिर घंटे के जाम में फंस जाना, क्योंकि बारिश आने का अर्थ है जगह-जगह फिसलने का डर होना और उन सबसे बढ़कर टूटे हुए तारों से करंट फैलने का डर हो जाना।
पर फिर भी सावन तो सावन ही है जो जेठ -आषाढ़ की तपती धूप से हमें राहत देने चला आता है हर साल, हम चाहे उसका इंतजार कर रहे होते हैं या नहीं। किसानों को तो उसका इंतजार होता है, इस धरती को तो उसका इंतजार होता है, इस कोलतार से लिपी हुई सड़कों को उसका इंतजार होता है, इन कंक्रीट के जंगलों को भी इसका इंतजार होता है , जो कि प्रकृति प्रदत्त जंगल खत्म करके बनाए गए हैं। तो सावन का इंतजार तो कवियों, साहित्यकारों, फिल्मकारों सभी को होता है। इससे पहले की कहीं सावन बीत न जाए, सावन को जी लेना चाहिए....
'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है......'


