स्टीयरिंग पर महिलाएँ, पुरुष मानसिकता और बढ़ता रोड रेज

Female Drivers Safety in India: महिलाओं के बढ़ते ड्राइविंग के बीच रोड रेज, हॉर्न, पीछा करने और अभद्र व्यवहार की घटनाएं क्या बताती हैं? जानिए महिला चालकों की सुरक्षा, पुरुष मानसिकता और सड़क पर लैंगिक असमानता का पूरा सवाल।

Anshu Sarda Anvi
Published on: 19 Sept 2026 5:27 PM IST
Women Driving in India Female Drivers Safety Explained
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Women Driving in India Female Drivers Safety Explained

Female Drivers Safety in India: गुरुग्राम में महिला बाइक सवार को कार से कथित रूप से टक्कर मारने की घटना ने महिला चालकों की सुरक्षा और रोड रेज का सवाल फिर खड़ा किया है। पुलिस ने इस मामले में हत्या के प्रयास का केस दर्ज किया है। यह सिर्फ रोड रेज एक घटना नहीं है बल्कि उस अपराध के बाद पैदा हो रहे सवालों पर भी बात करने की जिम्मेदारी है। महिलाओं की बढ़ती ड्राइविंग, पुरुष मानसिकता, सड़क पर महिलाओं को 'कमतर चालक' समझना, हॉर्न बजाकर परेशान करना, उनका पीछा करना, किसी भी तरह की टिप्पणी करना जैसे प्रश्नों पर बात करना आवश्यक हो जाता है कि

'स्टीयरिंग पर हाथ आते ही महिला से परेशानी क्यों?'

एक महिला जब घर से निकलती है तो उसकी सुरक्षा की चिंता की जाती है, लेकिन जब वही महिला अपने दोपहिया वाहन या कार लेकर सड़क पर निकलती है तो उसकी स्वतंत्रता पुरुष अहंकार को क्यों चुनौती लगने लगती है?

क्या सड़क पर महिला की आजादी खतरनाक हो जाती है?

सड़क पर एक महिला या लड़की आज जब दोपहिया चला रही होती है तो कुछ लोगों की निगाहें अचानक सड़क से हटकर उस पर टिक जाती हैं। वह किन कपड़ों में है, कितनी तेज चला रही है, किस बाइक को चला रही है, अकेली है या दोस्तों के साथ है, जैसे सड़क पर वाहन चलाने के उसके अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके बारे में टिप्पणी करना हो। समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब यह नजरिया गालियां देने, पीछा करने, टिप्पणी करने, रास्ता रोकने, छेड़छाड़ या रोड रेज में बदल जाता है।

गुरुग्राम की हाल ही में घटित हुई घटना इसी मानसिकता पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। महिला बाइकर का एक कार ने पीछा किया, चालक ने अभद्र इशारे किए और बाइक को टक्कर मार दी। घटना बाइक में लगे कैमरे में कैद हुई। पुलिस ने मामला दर्ज किया और हत्या के प्रयास सहित गंभीर धाराएं जोड़ीं और पांच सदस्यीय विशेष जांच दल गठित किया। आरोपी पक्ष ने इसे जानबूझकर किया गया हमला मानने से इनकार करते हुए दुर्घटना बताया है।

लेकिन इस पूरे मामले में एक सवाल जांच से भी बड़ा है—एक महिला का सड़क पर अपने वाहन से निकलना कुछ पुरुषों के लिए इतना असहनीय क्यों हो जाता है?

यह सवाल इसलिए भी अब जरूरी हो जाता है क्योंकि भारत में महिलाएं अब सिर्फ कार की पिछली सीट पर बैठने वाली नहीं रह गई हैं। वे स्कूटर चला रही हैं, बाइक चला रही हैं, ऑफिस जा रही हैं, कॉलेज जा रही है, अपने कार्यक्षेत्र के लिए जा रहीं हैं, बच्चों को स्कूल छोड़ रही हैं, उन्हें ट्यूशन और हॉबी क्लासेस ले जा रहीं हैं , घरों में जाकर मेहंदी, योग शिक्षा, ट्यूशन और पार्लर की सेवाएं देने वाली भी उन्हें चला रहीं हैं, डिलीवरी और गिग अर्थव्यवस्था में प्रवेश कर रही हैं और शौकिया लंबी दूरी की सोलो ‌बाइक यात्राएं भी कर रही हैं। हालांकि ये सब बदलाव बहुत धीमी गति से चल रहे हैं, पर दिखाई देने लगे हैं।

एक अध्ययन के अनुसार 2019-20 में भारत में जारी ड्राइविंग लाइसेंसों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 12 प्रतिशत थी जो कि 2013 से 2020 के बीच में वार्षिक चक्रवृद्धि दर 9.3 प्रतिशत रही, जबकि पुरुषों के लिए यह 4.3 प्रतिशत थी। यानी आधार छोटा होने के बावजूद महिलाओं के ड्राइविंग की ओर बढ़ने की रफ़्तार पुरुषों की तुलना में तेज रही। अगर इसे सिर्फ वाहन चलाने की बढ़ती संख्या के रूप में देखते हैं तो यह भूल होगी। एक महिला के पर्स या जेब में रखा ड्राइविंग लाइसेंस न केवल उस महिला की गतिशीलता का प्रमाणिक दस्तावेज है बल्कि इसका मतलब है कि वह नौकरी तक खुद पहुंच सकती है, बच्चों को खुद लेकर जा सकती है, परिवहन की अनुपलब्धता में स्वयं जा सकती है, इमरजेंसी में में किसी और पर निर्भर रहने की जरूरत को न्यून कर सकती है, बुलाकर यह कहा जा सकता है कि सड़क पर महिला की उपस्थिति महज ट्रैफिक का विषय नहीं है। बल्कि यह सामाजिक स्वतंत्रता का विषय है, उसके आत्मविश्वास और आत्म निर्भरता का विषय है।

अब रोड रेज जैसी जो समस्याएं हो रहीं हैं तो क्या वह समस्या महिला के ड्राइविंग कौशल की कमी के कारण हो रहीं हैं? नहीं, यह कमी नजरिये में है। हमारे देश में महिलाओं के साथ सड़क पर होने वाली परेशानी हमेशा दुर्घटना नहीं होती। लगातार हॉर्न बजाना, पीछे-पीछे चलना, ओवरटेक करना, कभी गाड़ी बराबर लाकर फिजूल टिप्पणी करना और कभी सिर्फ इसलिए आक्रामक व्यवहार करना कि सामने वाली महिला है, तो ये सब सड़क पर मौजूद लैंगिक असमानता के ही रूप हैं। देश में अधिकतर इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के लाइसेंस के पास हैं और उन्होंने अपने परिवार के सदस्य से ही यह वाहन चलाना सीखा है, कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया है।

इसका अर्थ है कि महिलाओं को वाहन चलाने का अधिकार मिल जाने भर से समस्या समाप्त नहीं होती। आवश्यकता है कि उन्हें सुरक्षित प्रशिक्षण दिया चाहिए। असम में 2018 में उपलब्ध राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार 15.19 लाख ड्राइविंग लाइसेंस धारकों में सिर्फ 66,889 महिलाएं थीं। यानी उस समय महिला लाइसेंसधारकों की हिस्सेदारी बेहद कम थी। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। पर सवाल यह है कि क्या सड़क की मानसिकता भी उतनी ही तेजी से बदल रही है? नहीं अधिकांश पुरुष आज भी महिला चालकों के प्रति एक अपेक्षा वाला भाव रखते हैं।

पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी महिलाओं के दोपहिया वाहन चलाने को केवल परिवहन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्थानों पर अधिकार के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में 29 अगस्त को लाहौर ट्रैफिक पुलिस ने महिलाओं की स्कूटर रैली आयोजित की। रिपोर्ट के अनुसार लाहौर के ट्रैफिक पुलिस प्रशिक्षण केंद्रों से अब तक 15 हजार से अधिक महिलाओं को कार, मोटरसाइकिल और स्कूटर चलाने का प्रशिक्षण दिया जा चुका है; इनमें 7,178 महिलाओं ने मोटरसाइकिल या स्कूटर का प्रशिक्षण लिया।

वहां का वुमैन ऑन व्हील्स कार्यक्रम भी महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी भागीदारी को बढ़ाने के उद्देश्य से चलाया गया है। पंजाब सरकार की पहल में महिलाओं को मोटरसाइकिल प्रशिक्षण के साथ सड़क सुरक्षा और उत्पीड़न से निपटने की जानकारी भी दी गई। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में महिलाओं का अकेले सड़क पर होना अभी भी कई जगह सामान्य दृश्य नहीं माना जाता है

पुरुष समाज के सामने भी आत्ममंथन का समय है। सड़क पर किसी महिला को देखकर उससे चुनौती के रूप में ओवरटेकिंग करना, कोई प्रदर्शन या आकर्षण की चीज समझना बंद करना होगा। कई लोग यूं तो महिलाओं के प्रति बहुत सामान्य होते हैं पर महिला चालकों को देखकर इस तरह से मुंह बनाते हैं जैसे इनके कारण ही अभी कोई दुर्घटना होने वाली है और उन्हें इनसे एक सुरक्षित दूरी पर खुद को रखना चाहिए। सड़क पर उसकी मौजूदगी उतनी ही सामान्य होनी चाहिए जितनी किसी पुरुष की। बल्कि यह महिला और पुरुष दोनों की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सड़क पर स्वयं के साथ- साथ सा चालकों को भी कैसे सुरक्षित रखा जाए।

एक महिला जब वाहन‌ चलाती है तो वह केवल एक वाहन ही नहीं चलाती है। वह अपने समय पर अपना अधिकार जताती है, अपने समय के लिए सहजता सुनिश्चित करती है। वह अपने काम, शिक्षा, नौकरी, परिवार और शहर के बीच अपने लिए खुद रास्ता चुनती है। वह यह तय करती है कि उसे किस समय घर से निकलना है और कहां जाना है, इसके लिए वह दूसरों पर निर्भर नहीं होती है। इसलिए दो पहियों पर संतुलित होती महिला वास्तव में अपनी स्वतंत्रता और अपने समय को भी संतुलित कर रही होती है। शायद इसी कारण सड़क पर महिला की स्वतंत्रता कुछ पुरुषों को असहज करती है। 2026 की एक महिला राइडर सुरक्षा रिपोर्ट में भी 542 महिला दोपहिया चालकों में 57.7 प्रतिशत ने उत्पीड़न का अनुभव बताया और 72.7 प्रतिशत ने कहा कि बड़े वाहन उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं देते। हालांकि यह एक स्वतंत्र सर्वेक्षण है और इसे पूरे भारत की आबादी का प्रतिनिधि आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी यह महिला चालकों के अनुभवों की गंभीरता का बताता है।

तो सवाल यह है कि इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, रोड रेज को सामान्य दुर्घटना मानने की प्रवृत्ति खत्म करनी होगी। वाहन को हथियार की तरह इस्तेमाल करना केवल यातायात उल्लंघन नहीं, गंभीर आपराधिक व्यवहार हो सकता है। हर बड़े शहर में रोड सेफ्टी हेल्पलाइन और त्वरित शिकायत व्यवस्था होनी चाहिए। ड्राइविंग लाइसेंस देने के साथ जेंडर-सेंसिटिव रोड सेफ्टी के विषय में बताया जाना चाहिए। पुरुष चालकों को भी यह समझाना होगा कि हॉर्न, पीछा करना, रास्ता रोकना या अभद्र टिप्पणी करना उनके लिए मनोरंजन हो सकता है लेकिन महिला चालकों के लिए वह किसी मानसिक उत्पीड़न से कम नहीं। लड़कियों और महिलाओं को भी सुरक्षित तरीके से वाहन चलाना सीखना ज्यादा जरूरी है। यह सड़क जिस महिला को घर से बाहर स्वयं को आत्मविश्वासी बनाती है, वहीं उसकी जिम्मेदारी यह भी होनी चाहिए कि वह सुरक्षित लौट कर आए।

गुरुग्राम की घटना इसलिए सिर्फ एक महिला बाइकर की कहानी नहीं है। बल्कि यह उस बदलते भारत की तस्वीर है जहां महिलाएं तो आगे बढ़ रही हैं, लेकिन सड़क पर उनके साथ चल रही मानसिकता अभी भी कहीं पीछे छूटी हुई है या खुद को बदलाव के अनुरूप ढाल नहीं पा रही है। महिला के हाथ में स्टीयरिंग आते ही उसकी आजादी शुरू होती है, और विश्वास मानिए कि उसे यह सुनना ही पड़ता है कि तुम्हारे तो पर लग गए हैं और इसी बदलाव को स्वीकार करने में समाज की परीक्षा शुरू होती है। सड़क पर

उसे रास्ता देना एहसान नहीं है, उसकी सुरक्षा करना कोई उपकार नहीं है। यह सड़क सबकी है। इसलिए स्टीयरिंग पर महिला का हाथ भी उतना ही स्वाभाविक होना चाहिए जितना पुरुष का। अपनी स्वयं की मानसिकता से मुकाबला करें न कि महिलाओं की सड़क पर उपस्थित से।

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