TRENDING TAGS :
Workers Rights in India: समाजवाद में श्रमिकों का स्थान पूंजीपति से ऊपर है
Workers Rights in India: कांग्रेस नेता सी.एम. स्टीफन ने 1972 के लोकसभा भाषण में कहा कि समाजवाद में श्रमिक का स्थान पूंजीपति से ऊपर होता है।
Workers Rights in India Shramik Adhikar 1972
Workers Rights in India: इस समय राष्ट्र संकट में है और हमें इस संकट का सामना करना है। देश में प्रत्येक कार्मिक संघों ने एक होकर इस संकट का मुकाबला किया है। राष्ट्र को भारी शरणार्थी समस्या का सामना करना पड़ा है। सभा में प्रत्येक सदस्य को इस मंत्रालय के महान कार्य की प्रशंसा करनी चाहिए कि उन्होंने किस प्रकार जटिल स्थिति को सुलझाया है।
हमारे प्रधानमंत्री और श्रममंत्री ने कार्मिक संघों में एक प्रकार की सर्वसम्मति लाने का प्रयास किया है, जिससे औद्योगिक संबंधों में सुधार हो तथा उन्हें मान्यता प्राप्त हो सके, श्रममंत्री ने यह धमकी भी दी थी कि यदि ऐसा फॉर्मूला नहीं निकाला गया, तो वे कार्मिक संघों पर दबाव डालने के लिए कानून बनाएंगे। यह प्रसन्नता का विषय है कि तीनों राष्ट्रीय कार्मिक संघों ने आपस में मिलकर एक फॉर्मूला निकाला है, यह निश्चय ही एक सुधार है।
संसदीय तथा राज्य विधानसभा के चुनावों के निर्णयों से पता चलता है कि जनता ने वामपंथी उग्रवाद को अस्वीकार कर दिया है, श्रमजीवी वर्ग के अधिकारों का आदर किया जाना चाहिए। कार्मिक संघों को मान्यता देने की कसौटी बनाते समय इस राष्ट्रीय निर्णय को ध्यान में रखा जाना चाहिए। कार्मिक संघों को श्रमजीवी वर्ग की आशाओं के अनुसार कार्य करने को बचनबद्ध होना चाहिए। जो कार्मिक संघ श्रमजीवी वर्ग की आशाओं के अनुरूप कार्य नहीं करता है, उसे मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।
आज हमें श्रमिकों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए, श्रम मंत्रालय का, जो ब्रिटिश प्रशासन के समय से चलते आ रहे हैं, कार्य केवल औद्योगिक क्षेत्र में कानून तथा व्यवस्था लागू करना है, उसका कार्य श्रमिकों से अपना कार्य कराना है, परंतु अब राज्य समाजवाद लाने के लिए कटिबद्ध है, समाजवाद में श्रमिक का स्थान पूंजीपति की अपेक्षा सर्वोपरि रहता है। हमने एकाधिकार, विदेशों द्वारा पूंजी नियोजन आदि के बारे में अपने दृष्टिकोण को बदला है, तो क्या हम श्रमिक के प्रति अपना दृष्टिकोण नहीं बदले सकते हैं? सरकारी मशीनरी जिस प्रकार कार्य कर रही है, उससे पता चलता है कि श्रमिक के प्रति हमारे दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं आया है। श्रम मंत्रालय के पास अधिकार सीमित हैं। वह रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं करा सकता है। वह श्रम संबंधी नीतियों को लागू नहीं कर सकता है। उसका कार्य केवल मौन दर्शक बने रहना है।
आज का श्रमिक केवल मजदूरी और बोनस से ही संतुष्ट नहीं है, वह अपना पद, गरिमा और स्थिति के प्रति जागरूक है। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिसके प्रति मंत्रालय को आंख नहीं मूंदनी चाहिए। यदि श्रम मंत्रालय के मन में श्रमिकों के लिए चिंता है, तो उसे उनके प्रति अपने विचार बदलने चाहिए। मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा, यहां सभा में ग्रेच्युटी विधेयक लाया गया था। किसी सदस्य ने यह मांग प्रस्तुत की थी कि ग्रेच्युटी का भुगतान न करने की स्थिति में मालिकों पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता न हो। इसके लिए सरकार ने तर्क दिया कि इस मांग को मानने का तात्पर्य यह है कि 'मालिकों को परेशान किया जाएगा, यह एक गलत दृष्टिकोण है और इसको बदला जाना चाहिए।
अंत में मेरा यह कहना है कि हमें अपना दृष्टिकोण बदल देना चाहिए और यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए कि उत्पादन करने वाले श्रमिक का स्थान सर्वोपरि होता है।
( साभार ‘ अमर उजाला’। कांग्रेस नेता व सांसद के तीन मई 1972 के भाषण के अंश।)
-सी.एम. स्टीफन


