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युवा की नई बेचैनी: डिग्री है, दिशा नहीं
Youth Career Confusion India: डिग्री होने के बावजूद युवा क्यों दिशाहीन महसूस कर रहा है? यह लेख करियर, शिक्षा, रोजगार और मानसिक दबाव के बीच आज के युवाओं की नई बेचैनी को समझाता है।
Youth Career Confusion India
Youth Career Confusion India: आज का युवा पहले से ज्यादा पढ़ा-लिखा है। उसके पास डिग्रियां हैं। सर्टिफिकेट हैं। ऑनलाइन कोर्स हैं। स्किल की लंबी सूची है। लेकिन इसके बावजूद एक खालीपन है। एक बेचैनी है। एक सवाल है—आखिर जाना कहाँ है? क्या करना है? किस दिशा में बढ़ना है? यही आज के युवा की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
पहले रास्ते सीमित थे। विकल्प कम थे। इसलिए निर्णय आसान था। डॉक्टर बनना है। इंजीनियर बनना है। सरकारी नौकरी करनी है। यही मुख्य रास्ते थे। आज विकल्प अनगिनत हैं। डेटा साइंस है। डिजिटल मार्केटिंग है। कंटेंट क्रिएशन है। स्टार्टअप है। फ्रीलांसिंग है। हर क्षेत्र में अवसर है। लेकिन यही अवसर कई बार भ्रम पैदा करता है। क्योंकि हर रास्ता सही लगता है। और कोई भी स्पष्ट नहीं होता।
इस नई स्थिति में युवा एक अजीब द्वंद्व में फँस गया है। एक तरफ उसे बताया जाता है कि दुनिया बदल रही है। नए अवसर आ रहे हैं। जोखिम लो। नया करो। दूसरी तरफ उससे स्थिरता की अपेक्षा की जाती है। परिवार चाहता है कि वह सुरक्षित नौकरी करे। समाज चाहता है कि वह जल्दी स्थापित हो। इस खींचतान में युवा कई बार न इधर का रहता है, न उधर का।
रोज़गार का संकट इस बेचैनी को और बढ़ाता है। नौकरी हैं। लेकिन पर्याप्त नहीं। जो हैं, वे हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं। स्किल की बात होती है। लेकिन स्किल और नौकरी के बीच सीधा संबंध नहीं दिखता। कई बार उच्च शिक्षा के बाद भी युवा उसी जगह खड़ा होता है, जहां वह शुरुआत में था। इससे आत्मविश्वास पर असर पड़ता है। और दिशा और धुंधली हो जाती है।
स्टार्टअप का सपना भी इसी कहानी का हिस्सा है। हर जगह कहा जा रहा है—अपना कुछ शुरू करो। उद्यमी बनो। लेकिन हर युवा उद्यमी नहीं हो सकता। हर विचार सफल नहीं होता। और असफलता के लिए समाज तैयार नहीं है। ऐसे में युवा जोखिम लेने से डरता भी है। और न लेने पर पछताता भी है। यह दोहरी स्थिति उसे और अस्थिर करती है।
डिजिटल दुनिया ने इस बेचैनी को और जटिल बना दिया है। सोशल मीडिया पर हर दिन सफलता की कहानियां दिखती हैं। कोई 25 की उम्र में करोड़पति है। कोई स्टार्टअप बेच चुका है। कोई विदेश में बस गया है। यह सब देखकर तुलना बढ़ती है। और तुलना से असंतोष जन्म लेता है। युवा सोचता है—मैं पीछे क्यों हूँ? जबकि वास्तविकता यह है कि हर कहानी की अपनी परिस्थितियां होती हैं।
शिक्षा व्यवस्था भी इस समस्या का हिस्सा है। डिग्री मिलती है। लेकिन दिशा नहीं मिलती। जानकारी मिलती है। लेकिन मार्गदर्शन नहीं मिलता। कॉलेज खत्म होता है। लेकिन करियर की स्पष्टता नहीं आती। इससे युवा खुद ही रास्ता खोजने की कोशिश करता है। और इस प्रक्रिया में कई बार भटक जाता है।
परिवार की भूमिका भी बदल रही है। पहले परिवार निर्णय में मार्गदर्शन करता था। अब वह भी भ्रमित है। नई अर्थव्यवस्था को समझना आसान नहीं है। इसलिए कई बार वह पुराने अनुभव के आधार पर सलाह देता है, जो आज के संदर्भ में पूरी तरह उपयुक्त नहीं होती। इससे पीढ़ियों के बीच अंतर बढ़ता है। और युवा खुद को अकेला महसूस करता है।
इस पूरी स्थिति का मनोवैज्ञानिक असर भी गहरा है। चिंता बढ़ रही है। असुरक्षा बढ़ रही है। भविष्य को लेकर अनिश्चितता है। और यह सब मिलकर एक ऐसी बेचैनी पैदा करता है, जो दिखती नहीं। लेकिन महसूस होती है। यही कारण है कि आज का युवा पहले से ज्यादा संवेदनशील भी है, और कई बार ज्यादा अस्थिर भी।
लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी है। यही युवा सबसे ज्यादा सक्षम भी है। उसके पास जानकारी है। संसाधन हैं। तकनीक है। वह तेजी से सीख सकता है। बदल सकता है। नई राह बना सकता है। यानी संभावना भी उतनी ही बड़ी है, जितना भ्रम है।
सवाल यह है कि इस संभावना को दिशा कैसे मिले? इसके लिए तीन स्तर पर काम जरूरी है। पहला, शिक्षा। शिक्षा को सिर्फ डिग्री देने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि दिशा देने वाली व्यवस्था बनना होगा। दूसरा, नीति। रोजगार और स्किल के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा। तीसरा, समाज। असफलता को स्वीकार करने की संस्कृति बनानी होगी।
युवा को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। उसे यह स्वीकार करना होगा कि हर रास्ता तुरंत स्पष्ट नहीं होता। कई बार रास्ता चलते-चलते बनता है। तुलना से बचना होगा। अपनी गति को समझना होगा। और सबसे जरूरी, धैर्य रखना होगा।
अंत में सवाल वही है। क्या भारत का युवा ‘संभावना’ और ‘भटकाव’ के बीच फँसा हुआ है? जवाब है—हाँ। लेकिन यह स्थायी स्थिति नहीं है। यह एक संक्रमण है। एक बदलाव का दौर है। और हर बदलाव के दौर में भ्रम होता है।
अगर सही दिशा मिली, तो यही बेचैनी ऊर्जा में बदल सकती है। और अगर नहीं मिली। तो यही बेचैनी निराशा में भी बदल सकती है। इसलिए यह सिर्फ युवा का सवाल नहीं है। यह पूरे समाज का सवाल है। क्योंकि जिस दिशा में युवा जाएगा, उसी दिशा में देश जाएगा।


