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आखिर युवा होने की सजा क्यों? स्वतंत्रता, सामाजिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य का सवाल
Youth Freedom in India: युवाओं की स्वतंत्रता, परिवार और समाज का दबाव, मोरल पुलिसिंग और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल। जानिए क्यों युवाओं को नियमों के साथ भरोसा, सम्मान और अपनी बात कहने की आजादी भी जरूरी है।
Youth Freedom in India Explained in Hindi
Youth Freedom in India: आसमान में उड़ान भरते पक्षियों को देखकर क्या आपके मन में भी कभी यह विचार नहीं आता है कि मनुष्य के बनाए नियम अगर इन पक्षियों पर भी लागू हो जाए, उन्हें भी मोरल पुलिसिंग या अपने समाज और माता-पिता या शिक्षकों के दबाव का सामना करना पड़े तो ये अपनी स्वाभाविक उड़ान, प्रकृति प्रदत्त जीवन ही भूल जाएंगे और जब पक्षी आसमान में ही नहीं उड़ेंगे तो यह आसमान तो सूना हो जाएगा, सिर्फ बादलों के निर्विघ्न आने-जाने का रास्ता। पर बादलों ने तो कभी भी इन पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाया और न ही उसने कभी इनकी उड़ान पर रोक-टोक की। अगर यह आसमान, यह बादल भी ऐसा ही करने लग जाए तो इस आसमान की ख़ूबसूरती ही समाप्त हो जाए। यह आसमान और यह बादल तो सहयोगी बनते हैं इनको उन्मुक्त उड़ान भरने देने के। तभी तो ये पक्षी मीठी-मीठी आवाज में सुबह-सुबह मन को मीठा एहसास दे जाते हैं, अपनी चिर-पिर से। अरे शर्म करो समाज वालों इस झूठी नैतिकता, झूठे भविष्य के दबाव में आज की युवा पीढ़ी को इस तरह प्रताड़ित करना, उनके पीछे लग जाना बंद करो कि वे दबाव में अपना स्वाभाविक जीवन की समाप्त कर लें। संस्कार, संस्कृति, सभ्यता एक तरफ हैं लेकिन उसके लिए बेमानी सजा एक तरफ़।
हमारे समाज में युवाओं की स्वतंत्रता को अभी भी अक्सर परिवार, समाज और सार्वजनिक नैतिकता की कसौटी पर कसा और परखा जाता है। लड़कियों के मामले में तो यह और भी कठोर हो जाती है। उसने कपड़े कैसे पहनें हैं, दोस्त, प्रेम प्रसंग, आने-जाने का समय, घूमने की जगह, सब पर किसी न किसी की नजर गडी ही रहती है। विडंबना देखिए कि एक ओर तो हम अपनी युवा होती पीढ़ी से कहते हैं कि आत्मनिर्भर बनों दूसरी ओर उनके ही निर्णयों पर, फैसलों पर अविश्वास भी करते हैं। बेटों से कहते हैं कि जिम्मेदार नागरिक बनो, लेकिन उन्हें भावनाओं और असफलताओं से जूझने की , खुद को व्यक्त करने की भाषा ही नहीं देते, स्वतंत्रता ही नहीं देते। क्या युवाओं को केवल शैक्षणिक और आर्थिक सफलता की मशीन बना देना ही आधुनिक हो जाना होता है।
आज की युवा पीढ़ी दोहरी निगरानी में जीती है। घर वाले उसे देख रहे हैं, संस्थान जहां वह पढ़ रहा है, वह भी उसे देख रहा है, समाज की चौकन्नी निगाहें उसे देख रही हैं और ये फिजूल का चौकस सोशल मीडिया तो हर समय उसका मूल्यांकन करने के लिए तैयार ही बैठा है। सबसे ज्यादा मजेदार बात यह है कि यह निगरानी कहीं से भी सकारात्मक नहीं है बल्कि परेशान कर देने वाली है। किसी परीक्षा में कम अंक, कोई गलत निर्णय, कहीं से भी वायरल वीडियो, प्रेम प्रसंग और सबसे बढ़कर एक असफलता....बस सब कुछ सार्वजनिक शर्मिंदगी में बदल सकता है, सार्वजनिक चर्चा का विषय बन सकता है। और हमारी ढिठाई तो देखो कि उसके बाद भी हम पूछते हैं कि आज का युवा इतना दबाव क्यों महसूस करता है? और लग जाते हैं अपने समय और आज के समय की तुलना करने में।
विश्वविद्यालयों, संस्थानों, कॉलेजों में शैक्षणिक ईमानदारी जरूरी है, सार्वजनिक स्थानों पर कानून का पालन करना जरूरी है, यह समय सब जानते हैं। यह क्यों नहीं जानते कि नाबालिगों की सुरक्षा तो और भी ज्यादा जरूरी है। नियम लागू करने और अपमान में फर्क होता है, अनुशासन और डर में भी फर्क होता है, सलाह और नियंत्रण में फर्क होता है और सुरक्षा तथा निगरानी में भी फर्क होता है। लेकिन यह फर्क हमारी संस्थाएं और समाज समझ ही नहीं पा रहे हैं, यहां तक कि हमारे अपने परिवार भी नहीं समझ पा रहे हैं। हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि हमने उसके चारों ओर कितनी दीवारें खड़ी कर दी हैं और क्यों कर दी है। लेकिन रुकिए, इसका अर्थ यह नहीं है कि युवाओं को बिल्कुल ही नियमों से मुक्त कर दिया जाए या कानून से ऊपर कर दिया जाए।
आई आई टी मुंबई में घटित हुई उस दिल को विचलित कर देने वाली आत्महत्या की घटना की तह में जाने या किसकी गलती है और किसने क्या आरोप लगाएं ,उन पर न जाकर क्योंकि वह अब जांच समिति की जांच का मामला है, उस विषय पर बात करनी चाहिए जिससे आगे इस तरह की घटनाएं न हों। संस्थान के छात्रों की ओर से मानसिक स्वास्थ्य, शिकायत-निवारण, छात्र प्रतिनिधित्व और संस्थागत प्रक्रियाओं में सुधार की मांगें सामने आईं। संस्थान ने इनमें से कई मुद्दों पर बदलाव की प्रक्रिया भी शुरू की है। पर ये बदलाव आई आई टी जैसे बड़े संस्थानों से निकलकर देश के हर विश्वविद्यालय, कॉलेज और स्कूल के लिए होने चाहिए कि अगर कोई विद्यार्थी किसी भी तरह के मानसिक उथल-पुथल में है तो उसे सबसे पहले किस से बात करनी चाहिए। क्या हम हर संस्थान में कोई ऐसा भरोसेमंद मेंटर या साइकोलॉजिस्ट नियुक्त कर पाएंगे जिससे शिकायत करने से विद्यार्थी को मन में कोई डर न लगे। क्या हम विद्यार्थियों को मानसिक स्वास्थ्य की सहायता वास्तव में प्रदान कर पाएंगे? जब विद्यार्थी किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्यवाही की जद में आ जाते हैं तो संस्थाओं, विद्यालयों, कॉलेजों को चाहिए कि विद्यार्थी को अपनी बात कहने का अवसर अवश्य दें और इसके साथ ही समाज को भी यही आईना अपने सामने रखना होगा विशेषकर परिवार जनों को। आई आई टी से लेकर सामान्य कॉलेज तक मानसिक स्वास्थ्य और मैटर सहयोगी की जरूरत है। पूर्वोत्तर समेत देश के विभिन्न प्रदेशों के हजारों युवा जब अपने घर से दूर मेट्रो शहरों में सिर्फ पढ़ने के लिए रहते हैं तो क्या इन विश्वविद्यालयों के कैंपस सिर्फ हॉस्टल या कक्षाएं है या वे उनके भावनात्मक सहारा भी हैं।
यदि दो युवा-नव युवा सड़क पर साथ दिखते हैं तो मानसिक रूप से विक्षिप्त या असामाजिक लोगों की पहली प्रतिक्रिया क्या होती है, उन्हें घूरना, उनका वीडियो बनाना, उन्हें रोकना, भद्दे कमेंट करना, उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना। जबकि हमारी जवाबदेही यह होनी चाहिए कि हम सुनिश्चित करें कि वे सुरक्षित हैं और किसी भी तरह की असामाजिक गतिविधि में तो नहीं है? हाल ही में बिहार के जमुई के अलावा बांका और समस्तीपुर से भी लगातार ऐसी घटनाओं के वीडियो सामने निकल कर आएं, जिनमें आपराधिक मानसिकता वाले कुछ लोगों ने रास्ते में लड़कियों के साथ में यौन हिंसा की और उनके साथी को मारा-पीटा। वहीं दिल्ली के प्रसिद्ध लेडी श्रीराम कॉलेज के पास कालकाजी में घटित हुई एक घटना में आरोप है कि आरोपियों ने खुद के पुलिस होने का दावा करते हुए नाबालिग जोड़े को डराया-धमकाया और फिर लड़की के साथ यौन हिंसा की। जबकि एक दूसरे वायरल वीडियो में हिंदू कॉलेज की दो लड़कियों के ऊपर लड़कों ने चलती कार से अभद्र टिप्पणी की, फिर उनका पीछा किया और जब वे लड़कियां थाने में इसकी रिपोर्ट करने गई तो उन्हें एक से दूसरे थाने तक रात के समय रिपोर्ट लिखाने के लिए भेजा जाता रहा। आखिर में जाकर चौथे थाने में रिपोर्ट लिखी गई।
आखिर कब तक समाज की निगरानी व नैतिकता के नाम पर नियंत्रण और हिंसा की जाती रहेगी। इस तरह की घटनाओं में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वह लड़का -लड़की वहां क्यों थे बल्कि यह होना चाहिए कि किसी नागरिक को यह अधिकार किसने दिया कि वह दूसरे नागरिक की नैतिकता का ठेकेदार बन जाए।
अगर कोई विद्यार्थी परीक्षा में गलती करता है तो क्या हम उसके पूरे भविष्य पर अपराधी की मोहर लगा देंगे या उसे यह समझने का अवसर देंगे कि एक गलती कभी भी जीवन का अंत नहीं है? अगर एक युवा को जिम्मेदार बनाना है तो उसे जिम्मेदारी का अभ्यास भी देना होगा। हर निर्णय अगर उसके लिए कोई और लेगा तो वह स्वतंत्र और जिम्मेदार नागरिक कैसे बनेगा? उसे हर समय यह बताकर-जताकर कि हम तुमसे ज्यादा जानते हैं या तुम्हें हमारे लिए निर्णय के हिसाब से ही चलना होगा। ऐसा कहकर हम शायद आज्ञाकारी बच्चे तो बना सकते हैं, जिसे देखकर एक पिता गर्व से कह उठे कि मेरा बेटा राम है या मेरी बेटी मेरे कहे के बाहर नहीं निकलती है लेकिन इस तरह से देश का एक स्वतंत्र नागरिक नहीं बन सकता। इसलिए बजाय यह प्रश्न करने की कि किसने नियम तोड़ा, किसने कानून हाथ में लिया, किसकी गलती है, हमारे पास सवाल और भी हैं कि क्या हमने अपने युवाओं को, अपने बच्चों को इतनी स्वतंत्रता या इतना स्थान दिया है कि वे गैर आपराधिक गलती के बाद भी, बगैर किसी हिचक के वापस लौट सकें।
क्या हमने उन्हें इतना भरोसा दिया है कि वे अपनी परेशानी कह सकें, क्या हम उनके विश्वासपात्र बन पाए हैं, जिन पर वे आंख मूंदकर विश्वास कर सकें और अपने मन की बात खुलकर कह सकें। क्या हमने उन्हें इतना सम्मान दिया है कि उनकी निजता को भी अधिकार मानें और उनकी निजता का सम्मान करें? कितनी अजीब सी बात है कि हमारे वरिष्ठ लोग अपने लिए तो सम्मान चाहते हैं पर वे अपने से छोटो को न तो सम्मान देते हैं और न ही उनके प्रति विश्वास की भावना रखते हैं।
और अंत में सबसे जरूरी बात कि क्या हम वाकई उन्हें जीने दे रहे हैं उनकी जिंदगी या हम हर कदम पर उन्हें जबरदस्ती ही गाइड कर रहे हैं कि उन्हें कैसे जीना चाहिए तथा भविष्य में क्या करना चाहिए। सभी समाज वालों और परिवारजनों को भी एक बात ध्यान में रखना चाहिए कि युवाओं को रास्ता दिखाइए, लेकिन उसकी हर चाल पर पहरा मत लगाइए। नियम समझाइए लेकिन अपमान मत कीजिए। गलती पर रोकिए लेकिन व्यक्ति को उसकी गलती में बांध मत दीजिए। किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसने कितने नियम बनाए हैं। असली पहचान तो इस बात से होती है कि वह अपनी अगली पीढ़ी को कितनी गरिमा, स्वतंत्रता और भरोसे के साथ बड़ा होने दे रहा है। भारत का भविष्य न तो केवल आई आई टी जैसे बड़े संस्थानों की प्रयोगशाला से और न ही आई आई एम जैसे बड़े संस्थानों के स्टार्टअप्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था से बनेगा। वह हमारे घर, कॉलेजों, सड़कों के माध्यम से भी बनेगा जो यह बताते हैं कि हम अपने युवा पीढ़ी के साथ में किस तरह का व्यवहार कर रहे हैं। ये सारी घटनाएं - कभी आई आई टी, कभी प्रेम-विवाह, कभी सोशल मीडिया, कभी महिला की स्वतंत्रता, कभी कॉलेज-हॉस्टल, कभी नौकरी का दबाव, कभी परिवार की अपेक्षाएं......आखिर कब तक। सिर्फ एक सवाल निकाल कर आता है कि हम युवाओं को भविष्य तो सौंपना चाहते हैं लेकिन क्या उन्हें वर्तमान में अपने फैसले लेने का अधिकार भी देना चाहते हैं? क्या हमने अपने युवाओं को स्वतंत्र देश का स्वतंत्र नागरिक मानना बंद कर दिया है?
( लेखिका प्रख्यात स्तंभकार हैं।)


