Food Loss and Waste: किसानों की मेहनत से उगा अनाज, फिर कूड़ेदान में क्यों पहुंच रहा खाना? वजह जानकर चौंकेंगे

Food Loss and Waste पर 29 सितंबर को International Day of Awareness मनाया जाता है। जानें भारत और दुनिया में खाद्य बर्बादी के आंकड़े, कारण और समाधान।

Jyotsana Singh
Published on: 29 Sept 2026 8:34 AM IST (Updated on: 29 Sept 2026 8:35 AM IST)
Food Loss and Waste: Why Is So Much Food Ending Up in the Trash?
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Food Loss and Waste: Why Is So Much Food Ending Up in the Trash?

International Day of Awareness of Food Loss and Waste : एक तरफ दुनिया में करोड़ों लोग पर्याप्त भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हरसाल बड़ी मात्रा में खाना बिना खाए ही कूड़े में पहुंच जाता है। घरों की रसोई से लेकर होटल, रेस्तरां, बाजार और सप्लाई चेन तक भोजन की बर्बादी एक बड़ी वैश्विक चुनौती बन चुकी है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। बल्कि भारत में खाद्य व्यवस्था की तस्वीर तो कई मायनों में विरोधाभासी नजर आती है। एक ओर सरकार गरीब और जरूरतमंद परिवारों तक मुफ्त खाद्यान्न पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर योजनाएं चला रही है, ताकि कोई व्यक्ति भूखा न रहे। दूसरी ओर यही कृषि प्रधान देश उन देशों की सूची में शामिल है जहां बड़े पैमाने पर भोजन बर्बाद होने की समस्या सामने आती है। यानी एक तरफ थाली तक अनाज पहुंचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ तैयार भोजन का कूड़ेदान तक पहुंच जाना भी बड़ी चिंता है। खाने की यह बर्बादी सिर्फ अन्न का नुकसान नहीं है, बल्कि किसान की मेहनत, पानी, जमीन, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों की भी बर्बादी है। 29 सितंबर को मनाया जाने वाला ‘खाद्य हानि और अपव्यय के प्रति जागरूकता का अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ इसी गंभीर समस्या पर सवाल खड़े करता है। इस दिन का मकसद लोगों को यह समझाना है कि खाने की बर्बादी केवल भोजन फेंकने तक सीमित समस्या नहीं है। इसके साथ पानी, जमीन, ऊर्जा, किसान की मेहनत और पर्यावरण से जुड़े संसाधनों की भी बर्बादी होती है।

29 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है यह दिवस?

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 दिसंबर 2019 को प्रस्ताव 74/209 पारित करके 29 सितंबर को खाद्य हानि और अपव्यय के प्रति जागरूकता का अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया था। इसका उद्देश्य दुनिया भर में खाद्य हानि और अपव्यय को कम करने के लिए जागरूकता बढ़ाना और सरकारों, कंपनियों तथा आम लोगों को मिलकर कार्रवाई के लिए प्रेरित करना है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भोजन की बर्बादी कम करना सतत विकास और खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। इसी सोच के तहत इस दिन लोगों को खेत से लेकर थाली तक भोजन के हर चरण में होने वाली बर्बादी को कम करने का संदेश दिया जाता है।

चीन के बाद भारत में सबसे ज्यादा घरेलू खाद्य बर्बादी

भारत में खाद्य बर्बादी का आंकड़ा काफी बड़ा है। UNEP की Food Waste Index Report 2021 में भारत के घरों में करीब 50 किलो प्रति व्यक्ति सालाना खाद्य अपव्यय का अनुमान लगाया गया था। उस रिपोर्ट में भारत में कुल घरेलू खाद्य अपव्यय करीब 68.76 मिलियन टन आंका गया था, जबकि चीन के लिए यह आंकड़ा करीब 91.65 मिलियन टन था। इसी आधार पर भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर था।

UNEP की 2024 Food Waste Index Report में भारत के घरों में खाद्य अपव्यय का अनुमान बढ़कर करीब 55 किलो प्रति व्यक्ति सालाना बताया गया है। भारत की बड़ी आबादी को देखते हुए घरों से निकलने वाले खाद्य कचरे की कुल मात्रा भी बहुत अधिक है।

हर साल घरों में ही बर्बाद हो जाता है लाखों टन खाना

खाद्य बर्बादी का सबसे बड़ा हिस्सा घरों से जुड़ा है। जरूरत से ज्यादा खाना बना लेना, जरूरत से ज्यादा सामान खरीद लेना, फ्रिज में रखे भोजन का समय पर इस्तेमाल नहीं करना और प्लेट में खाना छोड़ देना इसके आम कारण हैं। कई बार शादी, पार्टी या बड़े आयोजनों में भी जरूरत से कहीं ज्यादा भोजन तैयार किया जाता है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद बड़ी मात्रा में खाना कूड़े में चला जाता है। अगर खाने को सही तरीके से सुरक्षित रखा जाए और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था हो तो इस बर्बादी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

दुनिया में हर साल एक अरब टन से ज्यादा खाना हो रहा बर्बाद

खाद्य बर्बादी केवल भारत की समस्या नहीं है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी UNEP की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 में दुनिया भर में करीब 1.05 अरब टन भोजन बर्बाद हुआ। इसमें घरों के अलावा खाद्य सेवा क्षेत्र और खुदरा क्षेत्र से होने वाला खाद्य अपव्यय भी शामिल था।

इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी घरों की रही। वैश्विक स्तर पर खाद्य बर्बादी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा घरेलू स्तर से आने का अनुमान है। इसका मतलब साफ है कि समस्या का समाधान केवल सरकारों या बड़े कारोबारों की जिम्मेदारी नहीं है। आम उपभोक्ता की आदतों में बदलाव भी उतना ही जरूरी है।

खाद्य हानि और खाद्य अपव्यय दोनों एक नहीं हैं

खाद्य हानि और खाद्य अपव्यय को अक्सर एक ही अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दोनों में अंतर है। खेत में फसल तैयार होने के बाद कटाई, भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण या आपूर्ति के दौरान भोजन की मात्रा या गुणवत्ता कम हो जाए तो इसे खाद्य हानि कहा जाता है।

वहीं जब भोजन बाजार, होटल, रेस्तरां या घर तक पहुंचने के बाद इस्तेमाल होने के बजाय फेंक दिया जाता है तो इसे खाद्य अपव्यय कहा जाता है। यानी खेत से बाजार तक भोजन का खराब होना और घर में बना खाना प्लेट में छोड़ देना समस्या के दो अलग-अलग हिस्से हैं।

दोनों को कम करने के लिए अलग-अलग स्तर पर काम करने की जरूरत है। किसानों के लिए बेहतर भंडारण और परिवहन व्यवस्था जरूरी है, जबकि उपभोक्ताओं के स्तर पर खरीदारी और भोजन इस्तेमाल करने की आदतों में बदलाव जरूरी है।

खाना फेंकने से सिर्फ भोजन नहीं, पानी और ऊर्जा भी होती है बर्बाद

एक्सपर्ट्स के मुताबिक खाने की बर्बादी को अक्सर सिर्फ कचरे की समस्या माना जाता है, लेकिन इसका असर इससे कहीं बड़ा है। एक खाद्य पदार्थ को खेत से हमारी थाली तक पहुंचाने में पानी, जमीन, बिजली, ईंधन और मानव श्रम का इस्तेमाल होता है। जब वही खाना बिना खाए फेंक दिया जाता है तो उसके उत्पादन में इस्तेमाल हुए सभी संसाधनों का भी नुकसान होता है। यही कारण है कि खाद्य बर्बादी को कम करना प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इसके अलावा जब बड़ी मात्रा में भोजन कचरे के रूप में लैंडफिल तक पहुंचता है तो उसके सड़ने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो सकता है। ऐसे में भोजन की बर्बादी कम करने से पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को भी कम किया जा सकता है।

बढ़ती आबादी के बीच खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार दुनिया की आबादी 2050 तक करीब 9.7 अरब तक पहुंच सकती है। आबादी बढ़ने के साथ भोजन की मांग भी बढ़ेगी। ऐसे में सिर्फ ज्यादा भोजन पैदा करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जितना भोजन पैदा हो रहा है उसका बेहतर इस्तेमाल करना भी जरूरी होगा। अगर उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ भोजन की बर्बादी भी बढ़ती रही तो खाद्य सुरक्षा की चुनौती और गंभीर हो सकती है। इसलिए खाद्य हानि और अपव्यय कम करना भविष्य के लिए टिकाऊ खाद्य व्यवस्था बनाने का अहम हिस्सा है।

SDG 12.3 में खाद्य बर्बादी आधी करने का लक्ष्य

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों यानी SDGs में भी खाद्य बर्बादी को कम करने पर जोर दिया गया है। SDG 12 का उद्देश्य टिकाऊ उपभोग और उत्पादन को बढ़ावा देना है। इसके लक्ष्य 12.3 में 2030 तक खुदरा और उपभोक्ता स्तर पर प्रति व्यक्ति वैश्विक खाद्य अपव्यय को आधा करने और उत्पादन तथा आपूर्ति श्रृंखला में होने वाली खाद्य हानि को कम करने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार, किसान, खाद्य कंपनियां, होटल-रेस्तरां, खुदरा कारोबारी और आम उपभोक्ता सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। अकेले किसी एक क्षेत्र के प्रयास से खाद्य बर्बादी की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

घर की रसोई से शुरू हो सकती है खाद्य बर्बादी रोकने की कोशिश

एक्सपर्ट्स के मुताबिक खाद्य बर्बादी रोकने के लिए हर व्यक्ति छोटे-छोटे बदलाव कर सकता है। जरूरत के हिसाब से ही राशन और सब्जियां खरीदना, भोजन को सही तरीके से स्टोर करना और बचा हुआ खाना समय रहते इस्तेमाल करना इसकी शुरुआत हो सकती है। खाना बनाते समय परिवार की जरूरत के अनुसार मात्रा तय करना भी जरूरी है। प्लेट में उतना ही खाना लेना चाहिए जितना खाया जा सके। अगर खाना बच जाता है तो उसे सुरक्षित तरीके से रखकर बाद में इस्तेमाल किया जा सकता है। बड़े आयोजनों में भी भोजन की मात्रा का बेहतर अनुमान लगाना और बचे हुए खाने को जरूरतमंदों तक पहुंचाने की व्यवस्था करना खाद्य बर्बादी कम करने में मदद कर सकता है।

खेत से थाली तक हर स्तर पर बदलाव जरूरी

FAO और UNEP का जोर भी इसी व्यापक दृष्टिकोण पर है कि खाद्य हानि और अपव्यय को रोकने, कम करने, दोबारा उपयोग करने और संसाधनों में बदलने के लिए नवाचार तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए। इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होने के साथ रोजगार और आर्थिक अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

FAO (Food and Agriculture Organization) यानी खाद्य और कृषि संगठन। यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी है, जो भूख और कुपोषण कम करने, खाद्य सुरक्षा, कृषि, मत्स्य पालन, वानिकी और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों से जुड़े मुद्दों पर काम करती है। वहीं UNEP (United Nations Environment Programme) यानी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम। यह पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े वैश्विक मुद्दों पर काम करता है। खाद्य बर्बादी के मामले में दोनों की भूमिका अलग-अलग लेकिन जुड़ी हुई है। FAO खाद्य उत्पादन और खाद्य प्रणालियों से जुड़े पहलुओं पर काम करता है, जबकि UNEP खास तौर पर Food Waste Index जैसी रिपोर्टों के जरिए घरों, खुदरा और खाद्य सेवा क्षेत्र में होने वाली खाद्य बर्बादी का आकलन करता है। जिनका मानना है कि, भारत जैसे बड़े देश में खाद्य बर्बादी रोकने के लिए खेत से लेकर उपभोक्ता तक पूरी व्यवस्था को मजबूत करना होगा। फसल कटने के बाद बेहतर भंडारण, कोल्ड चेन, परिवहन और प्रसंस्करण सुविधाओं की जरूरत है ताकि भोजन बाजार तक पहुंचने से पहले खराब न हो। इसके साथ ही खाद्य कारोबारों और उपभोक्ताओं को भी भोजन की वास्तविक जरूरत और उपयोग के हिसाब से योजना बनानी होगी। संयुक्त राष्ट्र खाद्य हानि और अपव्यय को कम करने के लिए नवाचार और चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए दुनिया को प्रेरित करता है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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