Khan Abdul Ghaffar Khan: गफ्फार खान ने गांधी से क्यों कहा- ‘हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया’?

Khan Abdul Ghaffar Khan: 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के दौरान खान अब्दुल गफ्फार खान ने भारत विभाजन का विरोध किया था। जानें गांधी से उनकी शिकायत और पश्तूनों के भविष्य की कहानी।

Jyotsana Singh
Published on: 14 Aug 2026 10:20 AM IST
Khan Abdul Ghaffar Khan: Why Did Ghaffar Khan Feel Betrayed by Gandhi Over Partition?
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Khan Abdul Ghaffar Khan: Why Did Ghaffar Khan Feel Betrayed by Gandhi Over Partition?

Khan Abdul Ghaffar Khan: 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान अस्तित्व में आया, लेकिन इसी आजादी की दहलीज पर एक ऐसा नेता भी खड़ा था, जिसके लिए यह दिन खुशी से ज्यादा पीड़ा लेकर आया। यह थे खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें ‘सरहदी गांधी’ या ‘सीमांत गांधी’ के नाम से जाना जाता है। कांग्रेस के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाले गफ्फार खान ने मजहब के आधार पर बंटवारे का विरोध किया था। जब भारत का विभाजन हुआ तो उन्हें लगा कि जिस कांग्रेस पर उन्होंने भरोसा किया, उसने मुश्किल वक्त में उन्हें और उनके पश्तून साथियों को अकेला छोड़ दिया। आज पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर गफ्फार खान की कहानी इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि इसमें आजादी, विभाजन और पश्तूनों के राजनीतिक भविष्य का वह सवाल छिपा है, जिसकी गूंज आज भी पाकिस्तान में सुनाई देती है। गफ्फार खान की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ लॉर्ड माउंटबेटन से नहीं थी। उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि महात्मा गांधी और कांग्रेस, जिनसे उन्हें सबसे अधिक उम्मीद थी, आखिरकार विभाजन को रोक नहीं सके।

पश्तून समाज से निकला वह नेता जिसने अहिंसा को बनाया हथियार

खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म 1890 में तत्कालीन उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत यानी NWFP के उत्मानजई में हुआ था। उन्होंने शुरुआत में अपने समाज में शिक्षा और सामाजिक सुधार का काम किया। आगे चलकर उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ आंदोलन खड़ा किया, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अहिंसक संघर्ष को अपनाया। इसके कार्यकर्ता लाल रंग की वर्दी के कारण ‘रेड शर्ट्स’ के नाम से भी पहचाने गए।बगफ्फार खान का राजनीतिक रास्ता मुस्लिम लीग से अलग था। वह धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग के बजाय ऐसे भारत के पक्ष में थे, जिसमें अलग-अलग धर्म और समुदाय साथ रह सकें। महात्मा गांधी के अहिंसा के विचार का उन पर गहरा असर पड़ा और उन्होंने पश्तून समाज के लोगों को भी इसी रास्ते पर संगठित किया।

यही वजह थी कि जब भारत के विभाजन की बात निर्णायक दौर में पहुंची तो गफ्फार खान को लगा कि उनके वर्षों के संघर्ष और कुर्बानियों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

माउंटबेटन को क्यों लगा बेहद चतुर राजनीतिक खिलाड़ी?

1947 में लॉर्ड लुई माउंटबेटन भारत के आखिरी वायसराय बनकर आए। ब्रिटिश सरकार ने पहले जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण का लक्ष्य रखा था, लेकिन माउंटबेटन ने प्रक्रिया को काफी तेजी से आगे बढ़ाया। 3 जून 1947 को भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की योजना सार्वजनिक की गई।

गफ्फार खान की आत्मकथा में माउंटबेटन को लेकर बेहद दिलचस्प टिप्पणी मिलती है। उनके मुताबिक माउंटबेटन राजनीतिक नेताओं की मानसिकता को समझने में माहिर थे। वह जानते थे कि किस नेता को किस तरीके से समझाया जा सकता है। इसी राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल उन्होंने विभाजन की योजना को आगे बढ़ाने में किया।

गफ्फार खान के अनुसार माउंटबेटन ने पहले सरदार वल्लभभाई पटेल को अपने नजरिए के करीब लाया और फिर जवाहरलाल नेहरू को समझाने पर ध्यान दिया। उनका मानना था कि शुरुआत में नेहरू विभाजन की बात के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन लगातार बातचीत और बदलती परिस्थितियों के बीच उनका विरोध कमजोर पड़ता गया। इसी वजह से गफ्फार खान ने माउंटबेटन को बेहद चतुर और प्रभावशाली राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में देखा। उनकी नजर में माउंटबेटन केवल सत्ता हस्तांतरण कराने वाले ब्रिटिश अधिकारी नहीं थे, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने में माहिर व्यक्ति थे।

माउंटबेटन से शिकायत थी, लेकिन दिल में सबसे बड़ी चोट गांधी से थी

गफ्फार खान की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा यहीं से शुरू होता है। माउंटबेटन और कांग्रेस के दूसरे नेताओं से उनकी शिकायत जरूर थी, लेकिन सबसे गहरी चोट उन्हें महात्मा गांधी से लगी। गांधी और गफ्फार खान के बीच राजनीतिक रिश्ते से कहीं ज्यादा गहरा जुड़ाव था। दोनों अहिंसा, हिंदू-मुस्लिम एकता और साझा भारत की सोच के समर्थक थे। गफ्फार खान को भरोसा था कि जिस गांधी ने लंबे समय तक भारत के विभाजन का विरोध किया। वह आखिरी समय में भी उनके और सीमांत प्रांत के लोगों के लिए मजबूती से खड़े होंगे। लेकिन जब कांग्रेस ने विभाजन की योजना को स्वीकार कर लिया तो गफ्फार खान खुद को अकेला महसूस करने लगे। उनकी शिकायत थी कि खुदाई खिदमतगारों ने कांग्रेस का साथ दिया, अंग्रेजों का दमन झेला और आजादी की लड़ाई में कुर्बानियां दीं, लेकिन जब उनके अपने इलाके के भविष्य का फैसला करने का समय आया तो उनकी आवाज कमजोर पड़ गई।

उनकी पीड़ा को एक चर्चित कथन 'आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया' उस समय कांग्रेस के फैसले से उनके गहरे मोहभंग का प्रतीक बन गया।

असली लड़ाई सिर्फ बंटवारे की नहीं, पश्तूनों के भविष्य की थी

गफ्फार खान की परेशानी केवल यह नहीं थी कि भारत दो हिस्सों में बंट रहा था। उनकी सबसे बड़ी चिंता उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के भविष्य को लेकर थी। 3 जून की योजना के तहत इस प्रांत में जनमत संग्रह होना था। लोगों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प था। लेकिन गफ्फार खान और उनके समर्थकों को यह विकल्प अधूरा लगता था। उनका तर्क था कि पश्तूनों को अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में अधिक विकल्प मिलना चाहिए।

जून 1947 में बान्नू प्रस्ताव के जरिए स्वतंत्र पश्तून राज्य यानी ‘पख्तूनिस्तान’ की मांग सामने रखी गई। ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद जुलाई 1947 में हुए जनमत संग्रह का गफ्फार खान और उनके समर्थकों ने बहिष्कार किया।

इस तरह विभाजन का फैसला केवल भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा तय करने का मामला नहीं रह गया था। गफ्फार खान के लिए यह पश्तूनों की राजनीतिक पहचान और भविष्य का सवाल भी था।

गांधी के साथ माउंटबेटन और जिन्ना से मिलने पहुंचे गफ्फार खान

कांग्रेस की कार्यसमिति से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के बाद गांधी गफ्फार खान के साथ खड़े हुए। गांधी ने माउंटबेटन से बात करने का भरोसा दिया और दोनों उनसे मिले। लेकिन मामला आगे बढ़ाने के लिए जिन्ना से बातचीत की जरूरत बताई गई।

यह गफ्फार खान के लिए बेहद कठिन स्थिति थी। जिस मुस्लिम लीग के खिलाफ उन्होंने वर्षों तक राजनीति की थी, अब उन्हें उसी के नेता मोहम्मद अली जिन्ना से अपने इलाके के भविष्य को लेकर बात करनी पड़ रही थी। जिन्ना की ओर से प्रांतीय स्वायत्तता जैसे आश्वासन दिए गए। लेकिन गफ्फार खान को बाद में महसूस हुआ कि जब उनसे बातचीत की जा रही थी, तब तक बड़े राजनीतिक फैसले लगभग हो चुके थे। उनकी नजर में उनसे राय उस समय मांगी जा रही थी, जब निर्णायक सौदा पहले ही तय हो चुका था।

14 अगस्त आया, पाकिस्तान बना और गफ्फार खान का सपना अधूरा रह गया

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान अस्तित्व में आया और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत भी पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। जनमत संग्रह में पाकिस्तान के पक्ष में परिणाम आया, हालांकि गफ्फार खान और उनके समर्थकों ने इसका बहिष्कार किया था।

गफ्फार खान ने पाकिस्तान बनने के बाद भी सशस्त्र संघर्ष का रास्ता नहीं चुना। वह अहिंसा, लोकतांत्रिक अधिकारों और पश्तूनों की राजनीतिक आवाज की बात करते रहे। लेकिन नए पाकिस्तान में भी उनका राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और उनकी राजनीति लंबे समय तक सत्ता प्रतिष्ठान के लिए चुनौती बनी रही।

जिस नेता ने संयुक्त भारत के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उसे आजादी के बाद पाकिस्तान में रहना पड़ा। भारत ने हालांकि उनके योगदान को सम्मान दिया और 1987 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

गफ्फार खान का पश्तून सवाल आज भी पाकिस्तान में क्यों सुलग रहा है?

गफ्फार खान जिस पश्तून समाज के राजनीतिक अधिकार और सम्मान की बात करते थे, उसका सवाल पाकिस्तान बनने के करीब आठ दशक बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। फर्क यह है कि 1947 में बहस मुख्य रूप से पश्तूनों के राजनीतिक भविष्य और पहचान को लेकर थी, जबकि आज इसके साथ आतंकवाद, सैन्य अभियान, लापता लोगों, मानवाधिकार और राजनीतिक स्वायत्तता जैसे मुद्दे भी जुड़ गए हैं।

पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान से लगा पश्तून बहुल इलाका लंबे समय से आतंकवादी हिंसा से प्रभावित रहा है। आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सुरक्षा अभियानों के बीच स्थानीय आबादी की मुश्किलें भी बढ़ी हैं। पश्तून अधिकार कार्यकर्ता आरोप लगाते रहे हैं कि आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के दौरान आम नागरिकों को हिरासत, कथित जबरन गुमशुदगी और दूसरी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी असंतोष से पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट यानी PTM जैसे आंदोलनों को बल मिला। यह आंदोलन लापता लोगों को अदालतों के सामने पेश करने, कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच, बारूदी सुरंगों को हटाने और पश्तून इलाकों में नागरिक अधिकारों की रक्षा की मांग करता रहा है। वहीं पाकिस्तान सरकार ने अक्टूबर 2024 में PTM पर प्रतिबंध लगा दिया और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया। यहां 1947 का इतिहास आज से जुड़ता दिखाई देता है। गफ्फार खान चाहते थे कि पश्तूनों को अपने राजनीतिक भविष्य को तय करने में ज्यादा अधिकार और विकल्प मिलें। आज भी पश्तून राजनीति में पहचान, सुरक्षा, नागरिक अधिकार और स्वायत्तता के सवाल उठते हैं। PTM लंबे समय से अपने आंदोलन को पाकिस्तान के संविधान के भीतर अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश करता रहा है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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