Mahatma Gandhi on Vibhishan: क्या रावण का विरोध करना देशद्रोह था? विभीषण पर गांधीजी की यह सोच चौंका देगी

Mahatma Gandhi on Vibhishan: जानें क्यों गांधीजी ने रावण का विरोध करने वाले विभीषण के चरित्र में सत्याग्रह का संदेश देखा। रामायण के इस प्रसंग से देशभक्ति और नैतिक साहस की सीख समझें।

Jyotsana Singh
Published on: 15 Oct 2026 12:32 PM IST (Updated on: 15 Oct 2026 12:32 PM IST)
Mahatma Gandhi on Vibhishan: Why Opposing Ravana Was Not Betrayal
X

Mahatma Gandhi on Vibhishan: Why Opposing Ravana Was Not Betrayal


Mahatma Gandhi on Vibhishan: किसी अपने की गलती पर सवाल उठाना आसान नहीं होता। जब गलत करने वाला व्यक्ति अपना भाई, परिवार का सदस्य या सत्ता में बैठा शासक हो, तब सच बोलने की कीमत और बढ़ जाती है। रामायण में विभीषण का चरित्र इसी नैतिक संघर्ष का बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। रावण के भाई होने के बावजूद उन्होंने उसके अधर्म का समर्थन नहीं किया और जब उनकी सलाह नहीं मानी गई, तो उसका साथ छोड़ दिया। महात्मा गांधी ने विभीषण के इसी आचरण में सत्याग्रह और सच्ची देशभक्ति का संदेश देखा। उनकी दृष्टि में देश या शासन की गलतियों को छिपाना देशभक्ति नहीं, बल्कि उन गलतियों का विरोध करना सच्ची निष्ठा का परिचायक है।

साल 1929 का दौर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था। महात्मा गांधी देश की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक और नैतिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव डाल रहे थे। उनकी खासियत यह थी कि वे धर्मग्रंथों को केवल पूजा-पाठ या धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रखते थे। वे उनमें छिपे नैतिक संदेशों को अपने समय की समस्याओं से जोड़कर देखते थे।

तुलसीदास की रामचरितमानस गांधीजी के प्रिय ग्रंथों में शामिल थी। गांधीजी ने इसके प्रसंगों और चौपाइयों पर विचार करते हुए कई बार ऐसी व्याख्याएं कीं, जो प्रचलित धारणाओं से अलग थीं। गांधी साहित्य को भी इसी दृष्टि से पढ़ते थे। मैथिलीशरण गुप्त की रचना साकेत में उर्मिला के विरह-वर्णन को लेकर उनकी साहित्यिक टिप्पणी इसका एक उदाहरण है। बाद में गुप्त के तर्कों पर गांधीजी ने अपने विचारों पर दोबारा विचार करने की इच्छा भी जताई।

जब गांधीजी ने विभीषण के चरित्र की अलग व्याख्या की

वर्ष 1929 के एक प्रसंग के अनुसार, महात्मा गांधी से साबरमती आश्रम में मिलने आए कुछ लोगों के बीच रामचरितमानस को लेकर चर्चा हो रही थी। इसी दौरान एक व्यक्ति ने विभीषण को देशद्रोही और कुलद्रोही बताते हुए सवाल उठाया कि उन्होंने अपने भाई रावण का साथ छोड़कर भगवान राम का पक्ष क्यों लिया।

गांधीजी ने इस धारणा से अलग विचार रखा। उनके विचार का मूल भाव था कि विभीषण ने अपने भाई की गलत नीतियों के खिलाफ सत्याग्रह किया था। उन्होंने पारिवारिक संबंधों के नाम पर अधर्म का समर्थन नहीं किया। गांधीजी की इस व्याख्या का उल्लेख *नवजीवन* में मौजूद है। असल में महात्मा गांधी और 'नवजीवन' का गहरा संबंध है। गांधी जी ने अपने विचारों और साहित्य को लोगों तक पहुँचाने के लिए 7 सितंबर 1919 को 'नवजीवन' नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था।

रावण के खिलाफ क्यों खड़े हुए विभीषण?

रामचरितमानस के अनुसार, जब रावण माता सीता का हरण करके लंका ले आया, तब विभीषण ने उसे समझाने का प्रयास किया। उन्होंने सीता को सम्मानपूर्वक भगवान राम के पास लौटाने की सलाह दी। विभीषण जानते थे कि रावण का यह निर्णय अनुचित है और इसके कारण लंका को विनाशकारी युद्ध का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन रावण अपने अहंकार में किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। उसने विभीषण की सलाह मानने के बजाय उनका अपमान किया। इसके बाद विभीषण ने लंका छोड़कर भगवान राम की शरण में जाने का निर्णय लिया। यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था। एक ओर उनका परिवार और जन्मभूमि थी, तो दूसरी ओर वह नैतिक रास्ता था जिसे वे सही मानते थे। उन्होंने रावण को सुधारने की कोशिश की, लेकिन जब वह अधर्म छोड़ने को तैयार नहीं हुआ, तब विभीषण ने उसका साथ देने से इनकार कर दिया। गांधीजी की दृष्टि से इस प्रसंग में अपने संबंधों से ऊपर उठकर सत्य का साथ देने का संदेश दिखाई देता है।

विभीषण के चरित्र में गांधीजी को क्यों दिखा सत्याग्रह?

महात्मा गांधी के लिए सत्याग्रह केवल विरोध का तरीका नहीं, बल्कि सत्य और नैतिकता के प्रति दृढ़ रहने का सिद्धांत था। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए भी सत्य और अहिंसा को महत्वपूर्ण माना। उनके विचार में अन्याय का विरोध करना जरूरी है, लेकिन उसके लिए अपनाया गया रास्ता भी नैतिक होना चाहिए।

विभीषण के आचरण में भी उन्हें यही भावना दिखाई दी। विभीषण सबसे पहले अपने भाई को समझाने का प्रयास किया। जब उनकी बात ठुकरा दी गई, तब उन्होंने गलत का समर्थन करने के बजाय उससे अलग होने का रास्ता चुना। गांधी जी की दृष्टि में यह प्रसंग बताता है कि किसी व्यक्ति के प्रति प्रेम या निष्ठा का अर्थ उसके हर निर्णय को सही मान लेना नहीं है। कई बार सच बोलने के लिए बाहरी शत्रु से लड़ने की तुलना में अधिक साहस चाहिए होता है, क्योंकि इसमें अपने लोगों की नाराजगी और संबंध टूटने का डर भी शामिल होता है। विभीषण का चरित्र इसी नैतिक साहस को सामने लाता है।

देश की गलतियों पर सवाल उठाना देशद्रोह नहीं

गांधीजी की विभीषण के आचरण से जुड़ी इस व्याख्या का सबसे महत्वपूर्ण संदेश देशभक्ति से जुड़ा माना जाता है। देश से प्रेम करने का अर्थ उसकी हर गलती को सही ठहराना नहीं हो सकता। यदि किसी शासन की नीति गलत है या किसी व्यवस्था में अन्याय हो रहा है, तो उसे सुधारने के लिए आवाज उठाना भी जिम्मेदारी का हिस्सा है। विभीषण ने रावण का विरोध व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण नहीं, बल्कि उसके अनुचित आचरण के कारण किया। इसी तरह, किसी देश की सत्ता और देश के हित को हमेशा एक मान लेना भी सही नहीं है। साथ ही आलोचना तथ्यों और तर्कों पर आधारित होनी चाहिए। केवल विरोध करना अपने आप में सत्य का प्रमाण नहीं है।

आज भी प्रासंगिक है विभीषण और गांधीजी की सीख

महात्मा गांधी की दृष्टि में कई बार सच्चा प्रेम ही अन्याय के सामने खड़े होने की ताकत देता है।विभीषण की कहानी का सार भी यही है कि सच्ची निष्ठा गलतियों को छिपाने में नहीं, उन्हें सुधारने का साहस जुटाने में है। परिवार, समाज या देश के प्रति प्रेम और उसकी गलतियों का विरोध एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। गांधीजी का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि, देशभक्ति केवल प्रशंसा करने में नहीं, बल्कि देश और समाज को बेहतर बनाने के लिए गलत के खिलाफ आवाज उठाने में भी दिखाई देती है।

Jyotsana Singh
ABOUT THE AUTHOR

Jyotsana Singh

Content Writer Mail ID - jyotsana.b.singh@gmail.comjyotsana.b.singh@gmail.com

Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

Next Story