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Red Fort Tricolour Hoisting Rope: लाल किले की तिरंगे वाली रस्सी का 1947 से जुड़ा इतिहास
Red Fort Tricolour Hoisting Rope: लाल किले पर तिरंगा फहराने वाली खास रस्सी का इतिहास 1947 से जुड़ा है। जानें कौन बनाता है यह रस्सी और 2001 के बाद इसकी परंपरा में क्या बदलाव आया।
Red Fort Tricolour Hoisting Rope: the Rope Used to Hoist It Also Has a 1947 History
Red Fort Tricolour Hoisting Rope: आजादी की उमंग और उल्लास के साथ हर वर्ष 15 अगस्त देश वासियों में देश प्रेम की अलख जगाने आता है। जब हर गली चौराहा तिरंगे रंग में चहकता नजर आता है। इस दिन का वह क्षण सबसे खास होता है जब दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं। देशभर की निगाहें उस ऐतिहासिक पल पर टिकी होती हैं। तिरंगे के तीन रंग, अशोक चक्र और उसकी शान के बारे में तो हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लाल किले पर इस राष्ट्रीय ध्वज को ऊपर तक पहुंचाने वाली रस्सी कैसी होती है और इसे कौन तैयार करता है? देखने में सामान्य लगने वाली यह रस्सी भी अपने भीतर आजादी के इतिहास से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी समेटे हुए है। इसकी कहानी 15 अगस्त 1947 से जुड़ी है और आज भी दिल्ली की एक पुरानी दुकान इस खास जिम्मेदारी को निभा रही है।
दिल्ली के सदर बाजार से लाल किले तक पहुंचती है यह खास रस्सी
लाल किले पर तिरंगा फहराने के लिए इस्तेमाल होने वाली रस्सी दिल्ली के सदर बाजार स्थित गोरखी मल धनपत राय जैन एंड कंपनी द्वारा तैयार की जाती है। कुतुब रोड, तेलीवाड़ा में स्थित इस प्रतिष्ठान का काम कई दशकों से रस्सियां तैयार करने का रहा है। इस कारोबार को अब परिवार की पांचवीं पीढ़ी संभाल रही है। नरेश जैन के मुताबिक, उनकी फर्म का संबंध लाल किले पर होने वाले ध्वजारोहण से आजादी के पहले स्वतंत्रता दिवस से ही जुड़ा हुआ है। 1947 में जब देश आजाद हुआ और लाल किले से पहली बार स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया गया, तब से इस परंपरा का हिस्सा बनने वाली रस्सी भी खास महत्व रखती है। इसके बाद हर साल स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक समारोह में इस रस्सी की भूमिका बनी रही।
1947 से 2000 तक सरकार देती थी रस्सी की कीमत
नरेश जैन के अनुसार, 15 अगस्त 1947 से लेकर वर्ष 2000 तक उनकी फर्म की ओर से तिरंगा फहराने के लिए रस्सी उपलब्ध कराई जाती थी और इसके बदले सरकार की ओर से शुल्क दिया जाता था। यानी आजादी के शुरुआती वर्षों से ही इस रस्सी और लाल किले के ध्वजारोहण के बीच एक खास रिश्ता बना हुआ है। समय के साथ इस रिश्ते ने एक नया रूप लिया। वर्ष 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में पहली बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले पर तिरंगा फहराने के लिए रस्सी सरकार को निशुल्क भेंट की गई। इसके बाद से यह परंपरा आगे भी जारी रही।
अब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को मुफ्त दी जाती है रस्सी
नरेश जैन बताते हैं कि 2001 के बाद से देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के राष्ट्रीय समारोहों के लिए रस्सी निशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। यानी जिस रस्सी की कभी कीमत सरकार चुकाती थी, उसे बाद में देश के राष्ट्रीय पर्व से जुड़े सम्मान के तौर पर मुफ्त में देने की परंपरा शुरू हो गई। इस परिवार के लिए यह काम अब केवल व्यवसाय का हिस्सा नहीं रह गया है। तिरंगे को फहराने में इस्तेमाल होने वाली रस्सी उपलब्ध कराना उनके लिए देशसेवा और सम्मान से जुड़ा विषय बन चुका है। यही वजह है कि आज भी इस रस्सी को तैयार करने और उपलब्ध कराने में विशेष सावधानी बरती जाती है।
सरकारी स्कूलों से सेना तक इस्तेमाल होती है यह रस्सी
लाल किले के अलावा इस फर्म की बनाई रस्सी का इस्तेमाल दिल्ली के कई सरकारी संस्थानों में भी तिरंगा फहराने के लिए किया जाता है। सरकारी स्कूलों और कार्यालयों के अलावा सेना से जुड़े अधिकारी भी इस रस्सी को लेने के लिए यहां पहुंचते हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल के कार्यालय के लिए भी रस्सी निशुल्क उपलब्ध कराने की बात नरेश जैन ने कही है। उनका कहना है कि यदि देश के किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री तिरंगा फहराने के लिए इस रस्सी को लेना चाहते हैं, तो उनकी फर्म उन्हें भी यह रस्सी मुफ्त में उपलब्ध कराने के लिए तैयार है। इस तरह लाल किले के ध्वजारोहण से जुड़ी यह परंपरा अब देश के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंचने की पेशकश कर रही है।
इस्तेमाल के बाद वापस आ जाती है यह रस्सी
इस रस्सी से जुड़ी एक और खास बात है। राष्ट्रीय समारोह में इस्तेमाल होने के बाद इसे सामान्य सामान की तरह फेंक नहीं दिया जाता। नरेश जैन के मुताबिक, शुल्क लेना बंद होने के बाद सरकार इस्तेमाल की गई रस्सी वापस उनकी फर्म को भेज देती है।
रस्सी को विशेष पैकिंग में रखकर वापस किया जाता है। पैकेट पर उसका नाम और वर्ष दर्ज होता है। इसके साथ सरकारी मुहर और प्रमाणपत्र भी भेजे जाने की बात कही गई है। ध्वजारोहण की व्यवस्था में शामिल सेना की ओर से प्रशंसा पत्र भी दिए जाने का उल्लेख नरेश जैन करते हैं। यही वजह है कि उनके पास ऐसी कई रस्सियां सुरक्षित रखी हुई हैं।
हर रस्सी अपने साथ एक ऐतिहासिक याद छोड़ जाती है
नरेश जैन का मानना है कि राष्ट्रीय समारोहों में इस्तेमाल होने वाली इन रस्सियों को भी देश के इतिहास का हिस्सा माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, उनके पास सुरक्षित रस्सियों को प्रधानमंत्री संग्रहालय या किसी अन्य संग्रहालय में जगह मिलनी चाहिए, क्योंकि हर रस्सी उस दौर के एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समारोह की याद अपने साथ रखती है।
जिस रस्सी से लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया गया हो, वह बाद में किसी सुरक्षित जगह पर रखी हो। उस रस्सी को देखने वाला व्यक्ति सीधे उस ऐतिहासिक पल से जुड़ सकता है। यही वजह है कि इन रस्सियों को बेहद संभालकर रखा जाता है।
तिरंगे की रस्सी तैयार करने में भी होती है खास सावधानी
राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ी होने के कारण इस रस्सी को तैयार करने में सामान्य रस्सी के मुकाबले अधिक सावधानी बरती जाती है। नरेश जैन के अनुसार, इसे बनाने के लिए नारियल का रेशा, मूंज, पॉलिप्रोपलीन और कॉटन समेत कई तरह के फाइबर का इस्तेमाल किया जाता है। अलग-अलग रेशों को मिलाकर रस्सी को मजबूत बनाया जाता है, ताकि ध्वजारोहण के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो। रस्सी की लंबाई कितनी होगी, यह भी सामान्य तौर पर मनमाने तरीके से तय नहीं की जाती। समारोह की जरूरत और लाल किले पर ध्वजारोहण की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इसकी लंबाई निर्धारित की जाती है। निर्माण के दौरान रस्सी की मजबूती और गुणवत्ता पर खास ध्यान दिया जाता है।
ध्वजारोहण से काफी पहले शुरू हो जाती है तैयारी
15 अगस्त का समारोह देश के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोजनों में शामिल है। इसलिए लाल किले पर इस्तेमाल होने वाली रस्सी की तैयारी भी समारोह से काफी पहले शुरू कर दी जाती है। नरेश जैन के अनुसार, इसके निर्माण की प्रक्रिया करीब दो महीने पहले शुरू हो जाती है और ध्वजारोहण से लगभग एक महीने पहले सेना के जवान इसे लेने के लिए पहुंचते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में रस्सी की लंबाई, मजबूती और इस्तेमाल की जरूरतों को ध्यान में रखा जाता है। आखिरकार यह वही डोर होती है, जिसके सहारे देश का राष्ट्रीय ध्वज लाल किले की प्राचीर तक पहुंचता है। कई बार किसी ऐतिहासिक घटना से जुड़ी छोटी-सी चीज भी अपने भीतर कई दशकों की कहानी समेटे होती है। लाल किले पर तिरंगा फहराने वाली यह रस्सी भी ऐसी ही एक चीज है, जो वर्षों से भारत की आजादी, लोकतंत्र और राष्ट्रीय गौरव के उन पलों की मूक गवाह बनी हुई है।


